सोमवार 20 मई 1974 की अव्यक्त मुरली
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20-05-74 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
बाप-दादा के दिल रूपी तख्त पर विराजमान बच्चे ही खुशनसीब
पद्मापदम सौभाग्यशाली बच्चों को देख, एक से ही सर्व-सम्बन्धों,सर्व- प्राप्तियों व खुशियों की अनुभूति कराने वाले,स्नेह के सागर, विश्व के प्यारे परमपिता शिव बाबा बोले :-
आज बाप-दादा क्या देख रहे हैं? आज खुशनसीब, पद्मापद्म भाग्यशाली बच्चों की माला देख रहे हैं। माला के हर मणके की विशेषता को देखते हुए हर्षित हो रहे हैं। जैसे बाप बच्चों के श्रेष्ठ भाग्य को देख, हर्षित होते हैं क्या वैसे ही आप अपने सौभाग्य को देख सदा हर्षित रहते हो? क्या भाग्य का सितारा सदा सामने चमकता हुआ दिखाई देता है या कभी कभी भाग्य सितारा आपके सामने से छिप जाता है?जैसे स्थूल सितारे कभी-कभी जगह बदली करते हैं,तो ऐसे भाग्य का सितारा बदलता तो नहीं है?एक ही सितारा है, जो अपनी जगह बदली नहीं करता,क्या ऐसे सितारे हो? वह है दृढ़ संकल्प वाला सितारा, जिसको अपनी इस दुनिया में ध्रुवसितारा कहा जाता है। तो ऐसे दृढ़ निश्चय बुद्धि, और एक-रस स्थिति में सदा स्थित पद्मापद्म भाग्यशाली बने हो, या बन रहे हो? क्या अपनी खुशनसीबी का विस्तार अपनी स्मृति में लाते हो?खुशनसीबी की निशानियाँ व सर्व-प्राप्तियाँ क्या हैं, उनको जानते हो? जिसे सर्व प्राप्ति हो,उसको ही खुशनसीब कहा जाता है। सर्व-प्राप्ति में क्या कोई कमी है? जीवन में मुख्य प्राप्ति श्रेष्ठ सम्बन्ध, श्रेष्ठ सम्पर्क, सच्चा स्नेह और सर्व प्रकार की सम्पत्ति और सफलता इन पांचों ही मुख्य बातों को अपने में देखो। अब सम्बन्ध किससे जोड़ा है? सारे कल्प में इससे श्रेष्ठ सम्बन्ध कभी प्राप्त हो सकता है क्या?सम्बन्ध में मुख्य बात अविनाशी सम्बन्ध की ही होती है। अविनाशी बाप के सर्व-सम्बन्ध ही अविनाशी है। एक द्वारा सर्व- सम्बन्धों की प्राप्ति हो, क्या ऐसा सम्बन्धी कभी मिला हुआ देखा है? तो क्या सर्व- सम्बन्ध सम्पन्न हो।
दूसरी बात सम्पर्क अर्थात् साथ अथवा साथी। साथी क्यों बनाया जाता है? सम्पर्क क्यों और किससे रखा जाता है? आवश्यकता के समय, मुश्किल के समय सहारा अथवा सहयोग के लिए; उदास स्थिति में मन को खुशी में लाने के लिए व दुःख के समय दुःख को बांट लेने के लिए साथी बनाया जाता है। ऐसा सच्चा साथी अथवा ऐसा श्रेष्ठ सम्पर्क जो लक्ष्य रखकर बनाते हो क्या ऐसा साथी मिला?ऐसा साथी जो निष्काम हो,निष्पक्ष हो,अविनाशी हो व समर्थ हो। ऐसा सम्पर्क कभी मिला अथवा मिल सकता है क्या? अविनाशी और सच्चा श्रेष्ठ साथ व संग कौन-सा गाया हुआ है? पारसनाथ जो लोहे को सच्चा सोना बनावे ऐसा सत्संग अथवा सम्पर्क मिला है या कुछ अप्राप्ति है?ऐसा मिला है अथवा मिलना है?मिला है अथवा अभी परख रहे हो? जब साथ मिल गया तो साथ लेने के बाद कभी-कभी साथी से किनारा क्यों कर लेते हो? साथ निभाने में नटखट क्यों होते हो? कभी-कभी रूसने का भी खेल करते हैं। क्या मज़ा आता है, कि साथी स्वयं मनावे इसलिए यह खेल करते हो अथवा बच्चों में खेल के संस्कार होते ही हैं। ऐसा समझ इस संस्कार-वश क्या ऐसे- ऐसे खेल करते हो?यह खेल अच्छा लगता है?बोलो, अच्छा लगता है, तब तो करते हैं?लेकिन, इस खेल में गंवाते क्या हो, क्या यह भी जानते हो? जब तक यह खेल है तो सच्चे साथी का मेल नहीं हो सकता। तो खेल-खेल में मिलन को गंवा देते हो। इतने समय की पुकार व शुभ इच्छा-बच्चे और बाप से मिलने की करते आये हो और यह भी जानते हो,कि यह मेल कितने दिन का है-कितने थोड़े समय का है-फिर भी इतने थोड़े समय के मेल को खेल में गंवाते हो। तो क्या फिर समय मिलेगा?तो अब यह खेल समाप्त करो। आप अब तो वानप्रस्थी हो। वानप्रस्थी को इस प्रकार का खेल करना शोभता है क्या?साक्षी हो देखो, क्या सच्चा साथी,श्रेष्ठ सम्पर्क व संग सदा प्राप्त है?
तीसरी बात है -- स्नेह। क्या सर्व सम्बन्धों का स्नेह प्राप्त नहीं किया है व अनुभवी नहीं बने हो? क्या सर्व-सम्बन्ध में, स्नेह में कोई अप्राप्ति है?इसके निभाने के लिये एक ही बात की आवश्यकता है,अगर वह नहीं है, तो स्नेह मिलते हुए भी, अनुभव नहीं कर पाते। सच्चा स्नेह व एक द्वारा सर्व-सम्बन्धों का स्नेह प्राप्त करने के लिए, मुख्य कौन-सा साधन व अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए, कौन-सी मुख्य बात आवश्यक है? एक बाप दूसरा न कोई,क्या यह बात जीवन में, संकल्प में और साकार में है? सिर्फ संकल्प में नहीं, लेकिन साकार में भी एक बाप, दूसरा न कोई है, तब ही सच्चा स्नेह और सर्व-स्नेह का अनुभव कर सकते हो। ऐसे ही सम्पत्ति व जो भी सुनाया उन सब बातों में सहज ही सर्व-प्राप्ति होती है? ऐसे खुशनसीब जिसमें अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। ऐसे जानते हुए भी,मानते हुए भी और चलते हुए भी कभी-कभी अपने भाग्य के सितारे को भूल क्यों जाते हो?
बाप-दादा आपके भाग्य के सितारे को देख हर्षित होते हैं, और गुणगान करते हैं। ऐसे खुशनसीब बच्चों की रोज़ माला सिमरते हैं। ऐसे बाप के सिमरने के मणके बने हो?विजयमाला के मणके बनना बड़ी बात नहीं है,लेकिन बाप के सिमरने के मणके बनना, यही खुशनसीबी है। ऐसे खुशनसीबी के व बाप-दादा के दिल तख्त नशीन,फिर तख्त छोड़ देते हो! बाप ने अपने श्रेष्ठ कार्य की ज़िम्मेवारी व ताज बच्चों को पहनाया है। ऐसा ताजधारी बनने के बाद ताज उतार और ताज के बजाय अपने सिर के ऊपर क्या रख लेते हो? अगर वह अपना चित्र भी देखो और ताजतख्तधारी का चित्र भी रखो तो वÌया होगा? कौन-सा चित्र पसन्द आयेगा? पसन्द वह ताज-तख्तधारी वाला आता है और करते वह हो?ताज उतार कर व्यर्थ संकल्पों का,व्यर्थ बोलचाल का भरा हुआ बोझ का टोकरा व बोरी सिर पर रख लेते हो। बेताज बन जाते हो! जबकि ऐसा चित्र देखना भी पसन्द नहीं करते हो, उनको देखते हुए रहमदिल बनते हो लेकिन अपने ऊपर फिर क्यों रख लेते हो? तो ऐसे अपने को खुशनसीब बन व समझ कर चलो। समझा! अच्छा!
ऐसे सदा एक के साथ सम्बन्ध, सम्पर्क और स्नेह में रहने वाले, सदा अविनाशी सम्पत्ति से सम्पन्न रहने वाले, सच्चा साथ निभाने वाले और एक बाप दूसरा न कोई, ऐसी स्मृति में रहने वाले बच्चों को बाप-दादा का यादप्यार, गुड मार्निंग और नमस्ते।
इस मुरली का सार
(1) हम कितने खुशनसीब व पद्मापद्म भाग्यशाली हैं,जो कि हमें सच्चा और अविनाशी सम्बन्धी मिला है।
(2) हम कितने सौभाग्यशाली हैं, जो कि हमें शिव बाबा जैसा निष्काम,निष्पक्ष,अविनाशी और समर्थ साथी मिला है।