शुक्रवार 1 दिसंबर 1989 की अव्यक्त मुरली

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0> 101-12-89 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन 2स्वमान से ही सम्मान की प्राप्ति 3अव्यक्त बापदादा अपने बच्चों प्रति बोले

0> > 01-12-89 Om Shanti Avyakt Bapdada Madhuban

4आज बापदादा चारों ओर के स्वमानधारी बच्चों को देख रहे हैं। 5स्वमानधारी बच्चों का ही सारा कल्प सम्मान होता है। 6एक जन्म स्वमानधारी,सारा कल्प सम्मानधारी।

7अपने राज्य में भी राज्य-अधिकारी बनने के कारण प्रजा द्वारा सम्मान प्राप्त होता है और आधा कल्प भक्तों द्वारा सम्मान प्राप्त करते हो। 8अब अपने लास्ट जन्म में भी भक्तों द्वारा देव आत्मा वा शक्ति रूप का सम्मान देख रहे हो और सुन रहे हो। 9कितना सिक व प्रेम से अभी भी सम्मान दे रहे हैं!

10इतना श्रेष्ठ भाग्य कैसे प्राप्त किया! 11मुख्य सिर्फ एक बात के त्याग का यह भाग्य है। 12कौन-सा त्याग किया? 13देह अभिमान का त्याग किया।

1Today BapDada is seeing the children from all four directions who have self respect, and who are respected throughout the kalpa.

14क्योंकि देह अभिमान के त्याग बिना स्वमान में स्थित हो ही नहीं सकते। 15इस त्याग के रिटर्न में भाग्यविधाता भगवान ने यह भाग्य का वरदान दिया है। 16दूसरी बात - स्वयं बाप ने आप बच्चों को स्वमान दिया है।

17बाप ने बच्चों को चरणों के दास वा दासी से अपने सिर का ताज बना दिया। 18कितना बड़ा स्वमान दिया! 19ऐसे स्वमान प्राप्त करने वाले बच्चों का बाप भी सम्मान रखते हैं।

20बाप बच्चों को सदा अपने से भी आगे रखते हैं। 21सदा बच्चों के गुणों का गायन करते हैं। 22हर रोज सिक व प्रेम से यादप्यार देने के लिए परमधाम से साकार वतन में आते हैं।

23वहाँ से भेजते नहीं लेकिन आकर देते हैं। 24रोज यादप्यार मिलता है ना। 25इतना श्रेष्ठ सम्मान और कोई दे नहीं सकता। 26स्वयं बाप ने सम्मान दिया है, इसलिए अविनाशी सम्मान अधिकारी बने हो।

2Because you claim the authority of your kingdom, you receive respect from the subjects, and for half a kalpa you receive respect through bhakti.

27ऐसे श्रेष्ठ भाग्य को अनुभव करते हो? 28स्वमान और सम्मान - दोनों का आपस में सम्बन्ध है। 29स्वमानधारी अपने प्राप्त हुए स्वमान में रहते हुए स्वमान के सम्मान में भी रहता और दूसरों को भी सम्मान से देखता, बोलता वा सम्पर्क में आता है।

30स्वसम्मान का अर्थ ही है स्व को सम्मान देना। 31जैसे बाप विश्व की सर्व आत्माओं द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाले हैं, हर एक सम्मान देते। 32लेकिन जितना ही बाप को सम्मान मिलता है उतना ही सब बच्चों को सम्मान देते हैं।

33जो देता नहीं है तो देवता बनता नहीं। 34अनेक जन्म देवता बनते हो और अनेक जन्म देवता रूप का ही पूजन होता है। 35एक जन्म ब्राह्मण बनते हो लेकिन अनेक जन्म देवता रूप में राज्य करते वा पूज्य बनते हो।

36देवता अर्थात् देने वाला। 37अगर इस जन्म में सम्मान नहीं दिया तो देवता कैसे बनेंगे,अनेक जन्मों में सम्मान कैसे प्राप्त करेंगे? 38फालो फादर?

39साकार स्वरूप ब्रह्मा बाप को देखा - सदा स्वयं को वर्ल्ड सर्वेन्ट (विश्व-सेवाधारी) कहलाया, बच्चों का सर्वेन्ट कहलाया और बच्चों को मालिक बनाया। 40सदा मालेकम् सलाम किया। 41सदा छोटे बच्चों को भी सम्मान का स्नेह दिया,होवनहार विश्व-कल्याणकारी रूप से देखा।

42कुमारियों वा कुमारों को,युवा स्थिति वालों को सदा विश्व की नामीग्रामी महान आत्माओं को चैलेंज करने वाले, असम्भव को सम्भव करने वाले, महात्माओं के सिर झुकाने वाले - ऐसे पवित्र आत्माओं को सम्मान से देखा। 43सदा अपने से भी कमाल करने वाले महान आत्मा समझ सम्मान दिया ना! 44ऐसे ही बुजुर्ग- आत्माओं को सदा अनुभवी आत्मा, हमजिन्स आत्मा को सम्मान से देखा।

45बांधेले या बांधेलियों को निरन्तर याद में नम्बरवन के सम्मान से देखा। 46इसलिए नम्बरवन अविनाशी सम्मान के अधिकारी बने। 47राज्य सम्मान में भी नम्बरवन - विश्व-महाराजन और पूज्य रूप में भी बाप की पूजा के बाद पहले पूज्य - लक्ष्मी-नारायण ही बनते हैं।

48तो राज्य सम्मान और पूज्य सम्मान - दोनों में नम्बरवन हो गये। 49क्योंकि सर्व को स्वमान,सम्मान दिया। 50ऐसे नहीं सोचा - सम्मान देवे तो सम्मान दूँ। 51सम्मान देने वाले निंदक को भी अपना मित्र समझते।

3You claim that fortune primarily by renouncing the body - you cannot stabilise yourself in the stage of soul consciousness without renouncing body consciousness.

52सिर्फ सम्मान देने वाले को अपना नहीं समझते लेकिन गाली देने वाले को भी अपना समझते। 53क्योंकि सारी दुनिया ही अपना परिवार है। 54सर्व आत्माओं का तना आप ब्राह्मण हो।

55यह सारी शाखाएं अर्थात् भिन्न-भिन्न धर्म की आत्माएं भी मूल तना से निकली हैं। 56तो सभी अपने हुए ना। 57ऐसे स्वमानधारी सदा अपने को मास्टर रचयिता समझ सर्व को सम्मान-दाता बनते हैं।

58सदा अपने को आदि देव ब्रह्मा के आदि रत्न, आदि पार्टधारी आत्माएं समझते हो? 59इतना नशा है? 60तो सभी ने सुना - बच्चों का सम्मान क्या है, बूढ़ों का सम्मान क्या है, युवा का क्या है?

61आदि पिता ब्रह्मा ने हमको ऐसे सम्मान से देखा। 62कितना नशा होगा! 63तो सदा यह स्मृति रखो कि आदि आत्मा ने जिस श्रेष्ठ दृष्टि से देखा, ऐसी ही श्रेष्ठ स्थिति की सृष्टि में रहेंगे।

64ऐसे अपने से वायदा करो। 65वायदे तो करते रहते हो ना! 66बोल से भी वायदा करते हो, मन से भी करते हो और लिखकर भी करते हो और फिर भूल भी जाते हो।

67इसलिए वायदे का फायदा नहीं उठा पाते। 68याद रखो तो फायदा भी उठाओ। 69सभी अपने को चेक करो - कितने बार वायदा किया है और निभाया कितने बार है?

70निभाना आता है वा सिर्फ वायदा करना आता है? 71वा बदलते रहते हो - कभी वायदा करने वाले, कभी निभाने वाले? 72टीचर्स क्या समझती हैं? 73निभाने वालों की लिस्ट में हो ना।

4The Father himself has given you children respect - Baba has made you from maids and servants of the feet onto the crown of his forehead.

74टीचर्स को बापदादा सदा साथी शिक्षक कहते हैं। 75तो साथी की विशेषता क्या होती है? 76साथी समान होता है। 77बाप कभी बदलता है क्या?

5Those who claim such great self respect are respected by others.

78टीचर्स भी वायदा और फायदा - दोनों का बैलेंस रखने वाली हैं। 79वायदे बहुत और फायदा कम हो - यह बैलेंस नहीं होता। 80जो दोनों का बैलेंस रखते हैं उसको वरदाता बाप द्वारा यह वरदान वा ब्लैसिंग मिलती है।

81वह सदा दृढ़ संकल्प से कर्म में सफलतामूर्त बनते हैं। 82साथी शिक्षक का यही विशेष कर्म है। 83संकल्प और कर्म समान हों। 84संकल्प श्रेष्ठ और कर्म साधारण हो जाए - इसको समानता नहीं कहेंगे।

6Baba always keeps the children ahead of him - he sings praise of their virtues.

85तो सदा टीचर्स अपने को ‘‘साथी शिक्षक'' अर्थात्‘‘शिक्षक बाप समान'' - इस स्मृति में समर्थ बन चलो। 86बापदादा को टीचर्स की हिम्मत पर खुशी होती है। 87हिम्मत रख सेवा के निमित्त तो बन गये हैं ना।

88लेकिन अभी सदा यह स्लोगन याद रखो- ‘‘हिम्मते टीचर, समान शिक्षक बाप''। 89यह कभी नहीं भूलना। 90तो स्वतः ही समान बनने वाला लक्ष्य - ‘‘बापदादा''आपके सामने रहेगा अर्थात् साथ रहेगा।

91अच्छा!

92चारों ओर के स्वमानधारी सो सम्मानधारी बच्चों को बापदादा नयनों के सम्मुख देखते हुए सम्मान की दृष्टि से यादप्यार दे रहे हैं। 93सदा राज-सम्मान और पूज्य-सम्मान के समान साथी बच्चों को यादप्यार और नमस्ते। 94बिहार ग्रुप:-

951. सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो? 96स्व का राज्य मिला है या मिलने वाला है? 97स्वराज्य अर्थात् जब चाहो, जैसे चाहो वैसे कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करा सको।

98कर्मेन्द्रिय-जीत अर्थात् स्वराज्य अधिकारी। 99ऐसे अधिकारी बने हो या कभी-कभी कर्मेन्द्रियां आपको चलाती हैं? 100कभी मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हो?

101कभी मन व्यर्थ संकल्प करता है या नहीं करता है? 102अगर कभी-कभी करता है तो उस समय स्वराज्य अधिकारी कहेंगे? 103राज्य बहुत बड़ी सत्ता है।

104राज्य सत्ता चाहे जो कर सकती है, जैसे चलाने चाहे वैसे चला सकती है। 105यह मन-बुद्धिसंस्कार आत्मा की शक्तियाँ हैं। 106आत्मा इन तीनों की मालिक है।

107यदि कभी संस्कार अपने तरफ खींच लें तो मालिक कहेंगे? 108तो स्वराज्य-सत्ता अर्थात् कर्मेन्द्रिय-जीत। 109जो कर्मेन्द्रिय-जीत है वही विश्व की राज्य-सत्ता प्राप्त कर सकता है।

110स्वराज्य अधिकारी विश्व-राज्य अधिकारी बनता है। 111तो आप ब्राह्मण आत्माओं का ही स्लोगन है कि ‘स्वराज्य ब्राह्मण जीवन का जन्म-सिद्ध अधिकार है। 112'स्वराज्य अधिकारी की स्थिति सदा मास्टर सर्वशक्तिवान है, कोई भी शक्ति की कमी नहीं।

113स्वराज्य अधिकारी सदा धर्म अर्थात् धारणामूर्त भी होगा और राज्य अर्थात् शक्तिशाली भी होगा। 114अभी राज्य में हलचल क्यों है? 115क्योंकि धर्म-सत्ता अलग हो गई है और राज्यसत्ता अलग हो गई है।

116तो लंगड़ा हो गया ना! 117एक सत्ता हुई ना। 118इसलिए हलचल है।

119ऐसे आप में भी अगर धर्म और राज्य - दोनों सत्ता नहीं हैं तो विघ्न आयेंगे, हलचल में लायेंगे,युद्ध करनी पड़ेगी। 120और दोनों ही सत्ता हैं तो सदा ही बेपरवाह बादशाह रहेंगे, कोई विघ्न आ नहीं सकता। 121तो ऐसे बेपरवाह बादशाह बने हो?

122या थोड़ी-थोड़ी शरीर की, सम्बन्ध की … परवाह रहती है? 123पांडवों को कमाने की परवाह रहती है। 124परिवार को चलाने की परवाह रहती है या बेपरवाह रहते हैं?

125चलाने वाला चला रहा है, कराने वाला करा रहा है - ऐसे निमित्त बन कर करने वाले बेपरवाह बादशाह होते हैं। 126‘‘मैं कर रहा हूँ'' -यह भान आया तो बेपरवाह नहीं रह सकते। 127लेकिन ‘‘बाप द्वारा निमित्त बना हुआ हूँ'' - यह स्मृति रहे तो बेफिकर वा निश्चिंत जीवन अनुभव करेंगे।

128कोई चिंता नहीं। 129कल क्या होगा - उसकी भी चिंता नहीं। 130कभी यह थोड़ी-सी चिंता रहती है कि कल क्या होगा, कैसे होगा? 131पता नहीं विनाश कब होगा,क्या होगा?

7He comes into the corporeal region from paramdham every day - to give you love and remembrances.

132बच्चों का क्या होगा? 133पोत्रों-धोत्रों का क्या होगा - यह चिंता रहती है? 134बेपरवाह बादशाह को सदा ही यह निश्चय रहता है कि -जो हो रहा है वह अच्छा, और जो होने वाला है वह और भी बहुत अच्छा होगा।

135क्योंकि कराने वाला अच्छे-ते-अच्छा है ना! 136इसको कहते हैं - निश्चयबुद्धि विजयी। 137ऐसे बने हो या सोच रहे हो? 138बनना तो है ही ना!

8To have self respect means to have respect for others, and to have the respect of others.

139इतनी बड़ी राजाई मिल जाए तो सोचने की क्या बात है? 140अपना अधिकार कोई छोड़ता है? 141झोंपड़ी वाले भी होंगे,थोड़ी-सी मिलकियत भी होगी - तो भी नहीं छोड़ेंगे। 142यह तो कितनी बड़ी प्राप्ति है!

9Baba receives the respect of all the souls of the entire world, and the more he receives the more he gives to all the children.

143तो मेरा अधिकार है - इस स्मृति से सदा अधिकारी बने उड़ते चलो। 144यही वरदान याद रखना कि - ‘‘स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। 145''मेहनत करके पाने वाले नहीं, अधिकार है।

146अच्छा! 147बिहार माना सदा बहार रहने वाले। 148पतझड़ में नहीं जाना। 149कभी आँधी-तूफान न आये, सदा बहार।

10One who does not give does not become a deity.

150अच्छा!

1512. अपने को रूहानी दृष्टि से सृष्टि को बदलने वाला अनुभव करते हो? 152सुनते थे कि दृष्टि से सृष्टि बदल जाती है लेकिन अभी अनुभवी बन गये। 153रूहानी दृष्टि से सृष्टि बदल गई ना!

154अभी आपके लिए बाप संसार है, तो सृष्टि बदल गई। 155पहले की सृष्टि अर्थात् संसार और अभी के संसार में फर्क हो गया ना! 156पहले संसार में बुद्धि भटकती थी और अभी बाप ही संसार हो गया।

157तो बुद्धि का भटकना बंद हो गया, एकाग्र हो गई। 158क्योंकि पहले की जीवन में,कभी देह के सम्बन्ध में,कभी देह के पदार्थ में - अनेकों में बुद्धि जाती थी। 159अभी यह सब बदल गया।

160अभी देह याद रहती या देही? 161अगर देह में कभी बुद्धि जाती है तो रांग समझते हो ना! 162फिर बदल लेते हो, देह के बजाय अपने को देही समझने का अभ्यास करते हो।

163तो संसार बदल गया ना! 164स्वयं भी बदल गये।

165बाप ही संसार है या अभी संसार में कुछ रहा हुआ है? 166विनाशी धन या विनाशी सम्बन्ध के तरफ बुद्धि तो नहीं जाती? 167अभी मेरा रहा ही नहीं।

168‘‘मेरे पास बहुत धन है'' -यह संकल्प या स्वप्न में भी नहीं होगा क्योंकि सब बाप के हवाले कर दिया। 169मेरे को तेरा बना लिया ना! 170या मेरा,मेरा ही है और बाप का भी मेरा है।

171ऐसे तो नहीं समझते? 172यह विनाशी तन-धन, पुराना मन, मेरा नहीं, बाप को दे दिया। 173पहला-पहला परिवर्तन होने का संकल्प ही यह किया कि सब कुछ तेरा और तेरा कहने से ही फायदा है।

174इसमें बाप का फायदा नहीं है,आपका फायदा है। 175क्योंकि मेरा कहने से फंसते हो, तेरा कहने से न्यारे हो जाते हो। 176मेरा कहने से बोझ वाले बन जाते हो और तेरा कहने से डबल लाइट ‘‘ट्रस्टी''बन जाते हो।

177तो क्या अच्छा है - हल्का बनना अच्छा है या भारी बनना अच्छा है? 178आजकल के जमाने में शरीर से भी कोई भारी होता तो अच्छा नहीं लगता। 179सभी अपने को हल्का करने का प्रयत्न करते हैं।

180क्योंकि भारी होना माना नुकसान है और हल्का होने से फायदा है। 181ऐसे ही मेरा-मेरा कहने से बुद्धि पर बोझ पड़ जाता है,तेरा-तेरा कहने से बुद्धि हल्की बन जाती है। 182जब तक हल्के नहीं बने तब तक ऊँची स्थिति तक पहुँच नहीं सकते।

183उड़ती कला ही आनन्द की अनुभूति कराने वाली है। 184हल्का रहने में ही मजा है। 185अच्छा! 186जब बाप मिला तो माया उसके आगे क्या है?

11You saw Brahma Baba in the sakkar form - he always saw the children in their future form of world benefactors.

187माया है रूलाने वाली और बाप है वर्सा देने वाला, प्राप्ति कराने वाला। 188सारे कल्प में ऐसी प्राप्ति कराने वाला बाप मिल नहीं सकता! 189स्वर्ग में भी नहीं मिलेगा।

190तो एक सेकण्ड भी भूलना नहीं चाहिए। 191हद की प्राप्ति कराने वाला भी नहीं भूलता है तो बेहद की प्राप्ति कराने वाला भूल कैसे सकता! 192तो सदा यही याद रखना कि ट्रस्टी हैं।

193कभी भी अपने ऊपर बोझ नहीं रखना। 194इससे सदा हँसते,गाते, उड़ते रहेंगे। 195जीवन में और क्या चाहिए! 196हँसना,गाना और उड़ना।

12He saw the kumaris, the kumars, and the youth as the ones who are to challenge the great souls of the world.

197जब प्राप्ति होगी तब तो हँसेंगे ना। 198नहीं तो रोयेंगे। 199तो यह वरदान स्मृति में रखना कि हम हँसते-गाते और उड़ने वाले हैं, सदा ही बाप के संसार में रहने वाले हैं।

200और कुछ है ही नहीं जहाँ बुद्धि जाए। 201स्वप्न में भी रोना नहीं। 202माया रूलाए तो भी नहीं रोना।

13He saw them with respect as pure souls.

203मन का भी रोना होता है, सिर्फ आँखों का रोना ही नहीं होता। 204तो माया रूलाती है, बाप हँसाते हैं। 205सदा बिहार माना खुश रहने वाले - खुशबहार।

206और बंगाल माना सदा मीठा रहने वाले। 207बंगाल में मिठाइयाँ अच्छी होती हैं ना, बहुत वैरायटी होती है। 208तो जहाँ मधुरता है वहाँ ही पवित्रता है।

209बिना पवित्रता के मधुरता आ नहीं सकती। 210तो सदा मधुर रहने वाले और सदा खुशबहार रहने वाले। 211अच्छा! 212टीचर्स भी खुशबहार को देख करके सदा-बहार ही रहती हैं ना।

14He always considered them to be great souls, who would perform miracles even more so than he would.

213अच्छा!

214दिल्ली जोन:- दिल्ली को बापदादा ‘‘दिल'' कहते हैं। 215नाम है दिल्ली अर्थात् दिल ली। 216बाप ने आकर दिल ली और आपने आकर क्या किया? 217बाप को दिल में बिठा दिया।

15In the same way he gave respect to the mature ones as experienced souls, those who were the same as he was.

218दिल में और तो कोई नहीं है ना! 219न व्यक्ति,न वस्तु। 220कोई वस्तु भी आकर्षित करती है तो वह भी दिल में बिठाया ना! 221वस्तु के पीछे भी अगर दिल लग गई तो बाप भूल जायेगा ना!

16In their worship worthy form of the world emperors, Lakshmi and Narayan are the first to be worshipped after the worship of Baba.

222बाप को भूला तो माया का लगा बम गोला। 223बम्ब (ँदस्ं गोला) लगने से कितना नुकसान हो जाता है! 224तो यह भी बम्ब लगता है तो बहुत नुकसान कर देता है।

225दिल है ही बाप के लिए तो दूसरा कैसे आ सकता है? 226जो आसन जिसका होगा,वही बैठेगा ना! 227अभी प्राइम मिनिस्टर की सीट पर जो फिक्स होगा वही बैठेगा। 228तो दिल है दिलाराम के लिए।

17He became number one in both receiving respect from the kingdom and in being worshipped, because he gave self respect and respect to everyone.

229एक ही काम मिला है - बाप को याद करो, बस। 230जिसके दिल में बाप है वह सदा ही ‘‘वाह-वाह''के गीत गाता है और बाप नहीं तो ‘‘हायहा य'' के गीत गाता है। 231दुनिया वाले ‘‘हाय-हाय'' करते और आप ‘‘वाह-वाह''करते।

232स्वयं भी ‘‘वाह-वाह''हो गये,बाप भी ‘‘वाह-वाह''और ड्रामा में जो कुछ चल रहा है वह भी ‘‘वाह-वाह''। 233तो सदा ‘‘वाह-वाह''के गीत गाने वाले हो या कभी‘‘हाय-हाय''भी कर देते हो! 234मन से भी,स्वप्न में भी कभी ‘‘हाय''नहीं निकल सकती।

235‘‘हाय''क्या हो गया! 236यह कभी कहते हो? 237जो हुआ वह भी वाह,जो हो रहा है वह भी ‘‘वाह'',जो होना है वह भी ‘‘वाह। 238''तीनों ही काल - ‘वाह-वाह'है।

18He did not think that he would give them respect only if they gave him respect.

239एक काल भी खराब नहीं हो सकता। 240क्योंकि बाप भी अच्छे-ते- अच्छा,संगमयुग भी सबसे अच्छा और जो प्राप्ति है वह भी अच्छेते- अच्छी और भविष्य जो प्राप्त होना है वह भी अच्छे-ते-अच्छा। 241सब अच्छा होना है तो ‘वाह-वाह'के गीत गाते रहो।

242जहाँ सब अच्छा लगेगा वहाँ इच्छा नहीं होगी। 243अगर इच्छा होती है तो अच्छा नहीं होता और अच्छा होता है तो इच्छा नहीं होती। 244क्योंकि अच्छा तब कहेंगे जब सब प्राप्त हो।

245जब अप्राप्ति होती है तब इच्छा होती है। 246तो कोई अप्राप्ति है? 247माताओं को गहने चाहिए? 248सोना चाहिए?

19One who gives respect considers anyone that insults or defames him to be his friend.

249पांडवों को लाख वा पद्म चाहिए? 250करोड़ चाहिए? 251नहीं चाहिए?

20The entire world is your family.

252क्योंकि अब के करोड़पति बनना अर्थात् सदा के करोड़ गँवाना। 253अभी क्या करेंगे? 254यह झूठी माया, झूठी काया - झूठा क्या करेंगे! 255शरीर निर्वाह के लिए, दाल-रोटी के लिए तो बहुत मिल रहा है और मिलता रहेगा।

21You Brahmins are the roots of all souls - all the branches, all the souls of different religions, have emerged from you, the roots.

256बाकि क्या चाहिए? 257लॉटरी वगैरह चाहिए? 258कई बच्चे समझते हैं लॉटरी आयेगी तो यज्ञ में लगा देंगे। 259लेकिन ऐसा पैसा यज्ञ में नहीं लगता।

22So everyone should belong to you.

260होती अपनी इच्छा है लेकिन कहते हैं लॉटरी आयेगी तो सेवा करेंगे! 261अभी तो सच्ची कमाई जमा कर रहे हो,इसलिए - ‘इच्छा मात्रम् अविद्या। 262' क्योंकि इच्छा में अगर गये तो इच्छा के पीछे भागना ऐसे ही है जैसे मृगतृष्णा।

263तो इच्छा समाप्त हो गई,अच्छे बन गये! 264जब रचयिता ही आपका हो गया तो रचना क्या करेंगे! 265बेहद के आगे हद क्या लगती है? 266कुछ भी नहीं है।

23Those with self respect always consider themselves to be master creators, and they give respect to others.

267हद में फँस गये तो बेहद गया। 268दिल्ली वालों को तो नशा चाहिए -दिल्ली में जमुना के किनारे महल बनेंगे! 269तो सिर्फ महल देखने वाले बनेंगे या महल में रहने वाले?

270सभी राज्य करेंगे या देखेंगे? 271अच्छा! 272बाप मिला सब-कुछ मिला। 273याद और सेवा के सिवाय और कोई कार्य है ही नहीं।

24BapDada is seeing in front of him the elevated children who have self respect and who receive respect.

274अगर दफ्तर में जाते हो, बिजनेस करते हो - तो भी सेवा के लिए। 275इस लक्ष्य से कहीं भी जायेंगे तो सेवा होगी। 276अगर यह समझ कर जायेंगे कि ड्यूटी बजाने जा रहा हूँ,जाना ही है - तो सेवा नहीं होगी।

277काम करके लौट आयेंगे लेकिन सेवा नहीं कर सकेंगे। 278सेवा के निमित्त यह कर रहा हूँ - तो सेवा आपके पास स्वतः ही आयेगी और जितनी सेवा करेंगे उतनी और ‘खुशी'बढ़ती जायेगी। 279भविष्य तो है ही लेकिन प्रत्यक्षफल''खुशी’’ मिलती है।

280तो फल खाओ,मेहनत नहीं करो। 281सेवा याद नहीं रहेगी तो मेहनत करनी पड़ेगी। 282खाली बुद्धि रहना अर्थात् माया का आह्वान करना और बुद्धि को याद और सेवा में बिजी रखा तो सदा ही फल खाते रहेंगे।

283अच्छा!

284दिल्ली वालों को बापदादा विशेष सहयोग देते हैं,क्यों? 285क्योंकि समय पर सहयोगी पहले दिल्ली निवासी बने हैं। 286जब यज्ञ में आवश्यक्ता थी तब सहयोगी बनें।

287तो जो समय पर सहयोगी बनता है उसको ऑटोमेटिकली विशेष सहयोग मिलता है। 288दिल्ली निवासियों को यह विशेष लिफ्ट है। 289स्थापना में सहयोग के निमित्त दिल्ली बनी है,उसमें भी विशेष मातायें।

290तो बापदादा किसका रखता नहीं है,अभी ही देता है। 291एक का पद्मगुणा करके दे देता है। 292तो एक्स्ट्रा लिफ्ट हुई ना। 293जब स्थापना में पहला नम्बर बने तो राज्य में भी पहला नम्बर बनेंगे।

25With his drishti of respect he is giving love, remembrances and namaste to the children who are his companions, those who constantly receive respect from the kingdom and are worthy of worship.

294समझा? 295अच्छा!

26* * * O MS H A N T I * * *