सोमवार 20 मार्च 2017 की दैनिक मुरली

ध्यान दें: वाक्यों का संरेखण अक्षरों की संख्या पर आधारित है और पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है।

आप पूरी मुरली या उसके किसी भाग का वाक्य संरेखण स्वयं सुधार सकते हैं।

020/03/17 प्रातःमुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन

1“मीठे बच्चे - तुम्हें अपनी तकदीर हीरे जैसी बनानी है, पुरूषार्थ कर बाप से स्वर्ग का पूरा-पूरा वर्सा लेना है''

2प्रश्न:- कौन सा राज़ बुद्धि में अगर युक्तियुक्त बैठ जाए तो अपार खुशी रहेगी?

3उत्तर:- ड्रामा का।

4इस ड्रामा में हर एक्टर को अविनाशी पार्ट मिला हुआ है, जो बजाना ही है।

5कोई का भी पार्ट घिसता वा मिटता नहीं।

6बनी बनाई बन रही… इसमें हेर-फेर भी नहीं हो सकती।

7कल्प पूरा होगा तो फिर से वही पार्ट सेकेण्ड बाई सेकेण्ड रिपीट होगा।

8यह बहुत गुह्य राज़ है जो युक्तियुक्त बुद्धि में बैठे तो खुशी रहे।

9नहीं तो मूँझते हैं।

10बाबा कहते हैं बच्चे मूँझो नहीं।

11बाप में निश्चय रख पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ करो।

12गीत:- तुम्हें पाके हमने .....

13ओम् शान्ति।

14मीठे-मीठे ईश्वरीय बच्चों ने गीत सुना।

15ड्रामा अनुसार समझ में आता है कि तुम अभी बने हो ईश्वर के बच्चे।

16ईश्वर से तुम स्वर्ग का मालिक बनने आये हो अथवा स्वराज्य लेने आये हो।

17नर्क के मनुष्य मात्र तो यह जानते ही नहीं कि स्वर्ग क्या होता है!

18तुम तो जानते हो बाबा स्वर्ग की स्थापना करते हैं।

19रावण फिर नर्क की स्थापना करते हैं।

20यह भी कोई नहीं जानते।

21तुम जानते हो हम बाबा से स्वर्ग की राजाई ले रहे हैं।

22जब कोई मनुष्य मरते हैं तो कहते हैं स्वर्ग पधारा।

23गोया अपने को कहते हैं हम नर्क में हैं और सब नर्क के मालिक हैं।

24यह बिल्कुल सहज बात है, मूँझने की दरकार नहीं।

25तुम्हारी तकदीर अब हीरे जैसी बन रही है।

26हीरे जैसी तकदीर बाप के सिवाए कोई बना नहीं सकते।

27तुम जानते हो कि बाप से हम स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं।

28नर्क कितना समय चलता है, कोई को भी समझाओ तो कहते हैं सतयुग को तो लाखों वर्ष हुए।

29तुम हो गॉड फादरली स्टूडेन्ट।

30गॉड फादर द्वारा स्वर्ग का वर्सा पा रहे हो।

31फिर बाबा को भूलते क्यों हो - यह बाबा को समझ में नहीं आता है।

32तूफान तो बहुत आयेंगे।

33तब क्या बिगर मेहनत तुम स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे।

34कोई मरा तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ।

35फिर रोते क्यों हो?

36तुमको तालियाँ बजानी चाहिए, खुशी मनानी चाहिए!

37अगर स्वर्ग में जाना इतना सहज है फिर तो सबको गोली दे दो तो स्वर्ग में पहुँच जायें।

38फिर यहाँ दुःख में रहने की दरकार ही क्या पड़ी है।

39दुःख में मनुष्य जहर खाकर भी मर जाते हैं।

40सिपाही कितने मरते हैं।

41एक दो को भी मारते हैं।

42बाबा कहते हैं - सबको समझाओ जबकि स्वर्ग गया तो फिर तुम रोते क्यों हो?

43वास्तव में न कोई स्वर्ग में जा सकते हैं, न वापिस निर्वाणधाम में जा सकते हैं।

44अब तुमको स्वर्ग में चलने का उपाय बाप ही बताते हैं।

45स्वर्ग का रचयिता जब स्वर्ग रचे तब तो स्वर्ग में कोई जावे ना।

46अब स्वर्ग का रचयिता बाप आया हुआ है।

47यह भी तुम बच्चे ही जानते हो जब रावणराज्य शुरू होता है तो देवी देवतायें वाम मार्ग में चले जाते हैं।

48उसी समय से विकार शुरू हो जाते हैं।

49रावणराज्य कब शुरू होता है, उसका कोई दिन मुकरर नहीं है।

50तुम बच्चे यह थोड़ेही कह सकेंगे - बाबा ने कब इनमें प्रवेश किया।

51जब साक्षात्कार हुआ तब आया वा कब?

52साक्षात्कार तो भक्ति मार्ग में भी ऐसे ही होते हैं।

53पता नहीं पड़ता कि बाबा किस समय आया।

54कृष्ण के आने की घड़ी दिखाते हैं।

55शिवबाबा की घड़ी आदि कुछ होती नहीं।

56बाबा तो मालिक है।

57कब आते हैं, पता नहीं पड़ता है।

58यहाँ मुरली से समझ जाते हैं।

59बाप समझाते हैं मैं कालों का काल हूँ, मैं सबको वापिस ले गया था।

60सतयुग में तो थोड़े थे, कलियुग में कितने ढेर मनुष्य हैं।

61सभी आत्माओं को वापिस जाना है।

62जरूर पण्डा चाहिए ले जाने वाला।

63मैं रूहानी पण्डा बनकर आया हूँ, तुमको ले जाऊंगा।

64नई दुनिया के लिए तुमको पढ़ा रहा हूँ।

65नर्क, स्वर्ग क्या है, कितना समय चलता है, कब शुरू होता है।

66कोई भी सन्यासी आदि नहीं जानते हैं।

67रचता भी एक है, सृष्टि भी एक है।

68शास्त्रों में तो आताल-पाताल आदि बहुत सृष्टियाँ बना दी हैं, जिनको ढूढते रहते हैं।

69समझते हैं एक-एक स्टार में दुनिया है।

70बाप कहते हैं मैं फिर से तुमको गीता का ज्ञान सुनाता हूँ।

71क्राइस्ट को फिर अपने समय पर आना है।

72ड्रामा एक ही है।

73सतयुग में सिवाए देवी-देवता राज्य के और कोई होता नहीं।

74अभी तुम जानते हो हम बाबा से वर्सा लेने आये हैं।

75याद करते ही हैं हे पतित-पावन आओ।

76तो जरूर संगम पर ही आना पड़ेगा।

77अभी तुम जानते हो हम यहाँ क्यों आये हैं?

78क्या लेने आये हैं?

79तुम कहेंगे हम बाबा का वर्सा लेने आये हैं।

80हम राजयोग सीख रहे हैं।

81कल्प-कल्प वर्सा लेते हैं और गँवाते हैं।

82अभी फिर पुरुषार्थ करना है।

83पूरी नॉलेज लेकर औरों को देनी है।

84नहीं तो वृद्धि कैसे होगी।

85गीत कितना अच्छा है।

86इनका अर्थ तुम बच्चे ही समझते हो।

87गीत कितना मीठा है, तुम्हारे दिल से लगता है।

88बाबा आपसे हम ऐसा राज्य लेते हैं जो कोई भी लूट न सके।

89यह है अविनाशी वर्सा, जो अविनाशी बाप से मिलता है।

90अनादि वर्ल्ड ड्रामा अनुसार अथवा गीता के कथन अनुसार फिर से बाबा गीता सुनाने आया है, जिसमें राजयोग सिखाया था।

91शास्त्रों में तो अगड़म-बगड़म कर दिया है।

92युक्ति से समझाने वाला भी चाहिए।

93कोई कहते हैं ज्योति ज्योत समा गया।

94आत्मा तो अविनाशी है।

95उनको पार्ट भी अविनाशी बजाना है, उनका पार्ट कभी घिस नहीं सकता।

96कभी मिट नहीं सकता।

97बनी बनाई बन रही... उसमें अदली-बदली भी हो नहीं सकती।

98कितना वन्डर है।

99इतनी छोटी सी आत्मा में अविनाशी पार्ट भरा हुआ है।

100कल्प पूरा होगा तो फिर ऐसे ही पार्ट रिपीट करेंगे।

101सेकेण्ड बाई सेकेण्ड वैसे ही पास होगा।

102ड्रामा को भी पूरा युक्तियुक्त समझना है।

103कई तो इन बातों में मूँझते हैं।

104पहले तो बाप में निश्चय होना चाहिए कि बाप से जरूर वर्सा मिलना है।

105कल्प-कल्प भारत को ही मिलता है।

10684 जन्म भी लेने पड़े।

107वर्ण भी जरूर समझाने हैं।

108यह स्मृति एक दो को दिलानी है कि हम बेहद के बाप से बेहद का वर्सा ले रहे हैं।

109सभी तो नहीं आकर पढ़ेंगे।

110देखते हो सेन्टर खुलते जाते हैं, जहाँ नर्कवासी आकर स्वर्गवासी बनते हैं।

111बाबा को लिखते हैं हम प्रबन्ध कर सकते हैं।

112मुझे कोई वस्तु में ममत्व नहीं है।

113यह सब कुछ ईश्वर अर्थ है।

114अब आप जो राय दो।

115मैं भी लिखता हूँ, भल आपस में राय करो, जहाँ अच्छी लोकल्टी हो, वहाँ सेन्टर खोलो।

116हिम्मते मर्दा मददे बाप है।

117बाबा कितना खुश होता है।

118दिल में समझता है ऐसा दान तो अच्छा होता है, बहुतों को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना।

119यह बड़े ते बड़ी हॉस्पिटल भी है, कालेज भी है।

120सिर्फ 3 पैर पृथ्वी का चाहिए।

121कितना सहज रीति बाबा कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं।

122ऐसा बाबा रहते देखो कितना साधारण हैं।

123कहाँ आये हैं, कोई राजा के पास क्यों नही आये!

124कहते हैं मैं साधारण बूढ़े तन में आता हूँ, जिसने 84 जन्म एक्यूरेट पूरे किये हैं।

125सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स तो यह है ना।

126इनका नाम भी रखा है - श्याम और सुन्दर।

127तुम बच्चे इसका भी अर्थ समझते हो, उन्हों ने अर्थ को न समझने के कारण काला कर दिया है।

128मुख्य शिवबाबा का लिंग भी काला।

129कृष्ण, राम को भी काला कर दिया है।

130एक तरफ गोरा फिर दूसरे तरफ काला क्यों?

131जगन्नाथ के मन्दिर में शक्ल ऐसी दिखाते हैं जैसे अफ्रीकन लोग।

132कहाँ-कहाँ नारायण को भी काला कर दिया है।

133कहाँ लक्ष्मी को भी ऐसा ही दिखाते हैं।

134अब वन्डर लगता है - मनुष्यों की बुद्धि कैसी है।

135बाबा ही सत्य मत देते हैं, अपने साथ मिलने के लिए।

136बाकी तो यज्ञ तप दान पुण्य आदि करते हैं, मुफ्त में पैसे बरबाद करते रहते हैं।

137फिर क्यों कहते हैं - पतित-पावन आओ।

138याद क्यों करते हैं?

139गंगा जमुना, नाले आदि कितने हैं।

140बाबा ने भी बहुत तीर्थ आदि किये हैं।

141अभी तुम मोस्ट बिलवेड लकी सितारे नर्क स्वर्ग को जान गये हो।

142मनुष्य मरते हैं तो कहते हैं स्वर्ग गया।

143तो उनको भी समझाओ, स्वर्ग किसको कहते हैं।

144हम जानते हैं तब तो समझाते हैं।

145हमको भी स्वर्ग स्थापन करने वाला बाप मिला है, वह नॉलेज दे रहे हैं।

146हमारा कोई मनुष्य गुरू नहीं है।

147सतगुरू एक बाबा है, वही पतित-पावन है, जिसको बुलाते हैं।

148निराकार को ही बुलाते हैं ना, जिसको तुम ज्ञान सागर कहते हो।

149वह सत-चित-आनंद स्वरूप है, ज्ञान का सागर है।

150हमको तो नॉलेज है नहीं।

151देखा भी जाता है, उनके पास जो नॉलेज है वह कोई के पास नहीं है।

152तुमको कितना गदगद होना चाहिए।

153पतित-पावन गॉड फादर हमको पढ़ाते हैं।

154वह हमारा बाप टीचर सतगुरू है, इसमें घुटका खाने की बात नहीं है।

155अपनी रचना को तो सम्भालना ही है।

156अगर यहाँ आकर बैठ जायें - यह तो सन्यासियों का ज्ञान हो गया।

157गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए तुम एक घण्टा, आधा घण्टा निकाल सकते हो।

158पहले 7 रोज़ भट्ठी में पड़ना पड़े।

1597 दिन कोई की याद न आये, कोई को चिट्ठी न लिखें।

160बिल्कुल सबको भूल जाना है।

161तुम बहुत वर्ष भट्ठी में रहे, फिर भी तकदीर... कोई को तो माया खींच लेती है।

162ऐसी माया प्रबल है।

163बाप कहते हैं बच्चे, धीरे-धीरे परिपक्व अवस्था में आते जाओ।

164तुम जानते हो हमारे 84 जन्म पूरे हुए हैं।

165तुम्हारी बुद्धि में सारा झाड़, सब धर्म हैं।

166वहाँ भी अलग-अलग सेक्शन हैं।

167यहाँ भी ऐसे है, वहाँ भी ऐसे है।

168बाकी मोक्ष किसको भी मिल नहीं सकता।

169ऐसे नहीं बुदबुदे मिसल आत्मा परमात्मा में लीन हो जायेगी।

170फिर तो सारा पार्ट ही खलास हो जाये।

171सब ज्योति-ज्योत में समा जायें, खेल ही न चले।

172यह सब झूठ है।

173झूठ तो बिल्कुल झूठ, सच की रत्ती भी नहीं।

174भक्ति में कोई मुख मीठा थोड़ेही होता है।

175तुम बच्चे जानते हो - मुख मीठा कौन कराते हैं!

176तो बाप की पढ़ाई में पूरा ध्यान देना चाहिए।

177पुरानी दुनिया को देख लट्टू मत बन जाओ।

178देह-अभिमान में मत आओ।

179अब तो अपनी बैग-बैगेज तैयार कर ट्रान्सफर कर दो।

180अब यह दुनिया खलास होनी है।

181बाबा कहते हैं सब कुछ इन्श्योर कर दो।

182भक्ति मार्ग में करते हो तो अल्पकाल के लिए फल मिल जाता है।

183समझते हैं ईश्वर ने दिया।

184अभी तुम भी देते हो तो बाबा फिर रिटर्न में देते हैं।

185डायरेक्ट होने के कारण तुमको 21 जन्म का इन्श्योरेन्स मिलता है।

186बाबा कहते हैं देखो हमने फुल इन्श्योर किया तो फुल राजाई मिलती है।

187वह है जिस्मानी इन्श्योरेन्स, यह है रूहानी बाप के साथ।

188ईश्वर अर्थ दान करते हैं ना।

189तो ईश्वर रिटर्न में देते हैं।

190वह तो भक्ति मार्ग में भी दाता है तो ज्ञान मार्ग में भी दाता है।

191यह है बेहद की पढ़ाई, बेहद की बादशाही के लिए।

192अब जितना चाहो उतना लो।

193विश्व की राजाई ले सकते हो।

194पुरूषार्थ की जय है।

195कोशिश करो - विजय माला में पिरो जाओ।

196मूँझते हो तो सर्जन राय बताने वाला बैठा है।

197तुम जानते हो हमने अनेक बार बादशाही ली है और गॅवाई है।

198यह ज्ञान अभी है, सतयुग में फिर भूल जायेगा।

199अच्छा-

200मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग।

201रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

202धारणा के लिए मुख्य सार:-

2031) पुरानी दुनिया को देख लट्टू नहीं बनना है।

204अपनी बैग बैगेज ट्रांसफर कर देनी है।

205अपना सब कुछ इन्श्योर कर देना है।

2062) कोई भी वस्तु में अगर ममत्व नहीं है तो फिर कौड़ी से हीरे जैसा बनने की सेवा करनी है। 207दान करने से ही ज्ञान धन बढ़ेगा। 208वरदान:- फालो फादर करते हुए सपूत बन हर कर्म में सबूत देने वाले सफलता स्वरूप भव 209जो फालो फादर करने वाले बच्चे हैं वही समान हैं, क्योंकि जो बाप के कदम वो आपके कदम।

0 20/03/17 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban

210बापदादा सपूत उन्हें कहता - जो हर कर्म में सबूत दे।

211सपूत अर्थात् सदा बाप के श्रीमत का हाथ और साथ अनुभव करने वाले।

212जहाँ बाप की श्रीमत व वरदान का हाथ है वहाँ सफलता है ही, इसलिए कोई भी कार्य करते ये स्मृति में लाओ कि बाप के वरदान का हाथ हमारे ऊपर है।

213स्लोगन:- हीरे तुल्य ऊंची स्थिति में स्थित होकर किये गये कर्म ही मूल्यवान कर्म हैं।