Daily Murli for Friday 23 December 2016

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023/12/16 प्रातःमुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन 1``मीठे बच्चे - देह-अभिमान तुम्हें बहुत दुःखी करता है इसलिए देही-अभिमानी बनो, देही-अभिमानी बनने से ही पापों का बोझा खत्म होगा'' 2प्रश्न:- सतयुग में साहूकारी का पद किस आधार पर प्राप्त होता है?

3उत्तर:- साहूकार बनते हैं ज्ञान की धारणा के आधार पर। 4जो जितना ज्ञान धन धारण करते हैं और दान करते हैं उतना वह साहूकार पद पायेंगे, एवर वेल्दी बनेंगे। 5पढ़ाई पढ़नी और पढ़ानी है।

6बाकी विश्व महाराजन बनने के लिए बहुत रॉयल सर्विस करनी है। 7सब खामियां निकाल देनी है। 8पूरा देही-अभिमानी बनना है।

9बड़े धैर्य और गम्भीरता से बाप को याद करना है। 10गीत:- धीरज धर मनुवा… 11ओम् शान्ति।

12यह किसने कहा? 13बाप ने कहा बच्चों को, धीरज धरो। 14सारी दुनिया को नहीं कहा।

15भल बच्चे तो सभी हैं परन्तु सब बैठे तो नहीं हैं। 16बच्चे ही जानते हैं बरोबर यह दुःखधाम बदली हो रहा है। 17सुखधाम के लिए हम पढ़ रहे हैं वा श्रीमत पर चल रहे हैं।

18बच्चों को धीरज भी देते हैं। 19वास्तव में सारी दुनिया को गुप्त धीरज़ मिल रहा है। 20तुम समझते हो हम सम्मुख सुनते हैं।

21सब तो सुनते नहीं। 22वह बेहद का बाप है, बेहद का दुःख हर्ता सुख कर्ता है। 23दुःख हरकर सुख का रास्ता बताता है।

24तुमको जब सुख होगा तो दुःख का नाम नहीं हो सकता। 25सुख की दुनिया को सतयुग, दुःख की दुनिया को कलियुग कहा जाता है। 26यह भी बच्चे ही जानते हैं।

27सतयुग में सम्पूर्ण सुख है, सो भी 16 कला सम्पूर्ण। 28जैसे चन्द्रमा भी 16 कला सम्पूर्ण होता है फिर कला कम होते-होते अमावस पर कितनी छोटी किनारी रह जाती है। 29प्रायः अन्धियारा हो जाता है।

3016 कला सम्पूर्ण, तो सम्पूर्ण सुख भी होगा। 31कलियुग में है 16 कला अपूर्ण तो फिर दुःख भी होता है। 32इस सारी दुनिया को माया रूपी ग्रहण लग जाता है इसलिए अब बाप कहते हैं तुम्हारे में जो देह-अभिमान है, पहले-पहले उनको छोड़ो।

33यह देह-अभिमान तुमको बहुत दुःख देता है। 34आत्म-अभिमानी रहो तो बाप को भी याद कर सकेंगे। 35देह-अभिमान में रहने से बाप को याद नहीं कर सकते।

36यह आधाकल्प का देह-अभिमान है। 37इस अन्तिम जन्म में देही-अभिमानी बनने से एक तो पापों का बोझा खत्म होगा और फिर 16 कला सम्पूर्ण सतोप्रधान बनेंगे। 38बहुत देह-अभिमान की बात को भी समझते नहीं हैं।

39मनुष्य को दुःखी करता ही है देह-अभिमान। 40पीछे हैं और विकार।

41देही-अभिमानी बनने से यह सब विकार छूटते जायेंगे। 42नहीं तो छूटना मुश्किल है। 43देह-अभिमान की प्रैक्टिस पक्की हो गई है तो अपने को देही-अभिमानी (आत्मा) समझते ही नहीं।

44इसमें सब विकार दान देना पड़े। 45पहले-पहले देह-अभिमान को छोड़ना है। 46काम, क्रोध आदि सब पीछे आते हैं।

47तुम्हारा बाप वह है। 48देह-अभिमान के कारण लौकिक बाप को ही बाप समझते आये हैं। 49अब मुख्य बात है कि हम पावन कैसे बनें।

50पतित दुनिया में हैं ही सब पतित; पावन कोई हो नहीं सकते। 51एक बाप ही सबको पावन बनाकर खुशी-खुशी से वापिस ले जाते हैं। 52अब तुम बच्चों को तो योग का चिंतन लगा हुआ है।

53जीते जी मरना है। 54देह-अभिमान तोड़ना माना मरना। 55हम आत्मा बाबा को याद कर पतित से पावन बन जायें।

56यह पावन बनने की युक्ति बाबा ने ही समझाई थी। 57अब फिर से समझा रहे हैं। 58कल्प-कल्प फिर भी समझायेंगे।

59दुनिया भर में और कोई भी समझा नहीं सकते। 60मूल बात है शिव को याद करने की। 61सो भी जब यहाँ आकर बी.के. द्वारा सुनें क्योंकि दादे का वर्सा मिलना है।

62तो बाप जरूर चाहिए जिस द्वारा मिलें। 63डायरेक्शन तो जरूर लेने हैं साकार द्वारा। 64बहुत बच्चे हैं जो समझते हैं हम शिवबाबा से योग लगायें, ब्रह्मा को छोड़ दें।

65परन्तु शिवबाबा से सुनेंगे कैसे? 66कहते हैं हमारा ब्रह्मा बाबा के साथ कोई कनेक्शन नहीं है। 67अच्छा तुम अपने को आत्मा समझो शिवबाबा को याद करो।

68घर जाकर बैठो।

69परन्तु यह जो नॉलेज मिलती है सृष्टि चक्र की, वह कैसे सुनेंगे। 70यह समझने बिना सिर्फ याद कैसे कर सकेंगे। 71ज्ञान तो इन द्वारा ही लेना पड़ेगा ना।

72फिर कभी भी ज्ञान तो मिल नहीं सकता। 73रोज़ नई-नई बातें बाप द्वारा ही मिलती हैं। 74बिना ब्रह्मा और ब्रह्माकुमारियों के कैसे समझ सकेंगे।

75यह सब सीखना पड़े।

76बाप कहते हैं जो घर बैठकर पुरूषार्थ करे कर्मातीत अवस्था को पाने का, तो हो सकता है मुक्ति में जाये। 77जीवनमुक्ति में जा न सकें। 78ज्ञान धन धारण कर और दान करेंगे तो धनवान बनेंगे।

79नहीं तो एवरवेल्दी कैसे बनेंगे। 80मुरली का भी आधार जरूर लेना पड़े। 81पढ़ाई तो पढ़नी है ना।

82ऐसे बहुत आयेंगे सिप्ार् लक्ष्य लेकर जायेंगे मुक्ति में। 83तुम सब मनुष्य मात्र को समझाते हो कि तुम सिर्फ बाप को याद करो तो सतोप्रधान पवित्र बन जायेंगे। 84फिर जब ज्ञान धन लें तब सतयुग में साहूकार बनें।

85नहीं तो मुक्ति में जाकर फिर भक्ति मार्ग के समय आकर भक्ति करेंगे। 86किसका कल्याण कर नहीं सकेंगे क्योंकि मनुष्य को देवता बनने के लिए ज्ञान जरूर चाहिए। 87ज्ञान सुनकर फिर सुनाना भी है।

88प्रदर्शनी में देखो कितना माथा मारते हैं। 89फिर भी किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है। 90आत्मा कितनी छोटी बिन्दी है। 91हर आत्मा को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है।

0 23/12/16 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban

92यह तुम अभी जान गये हो। 93सब मनुष्य मात्र पार्टधारी हैं। 94यह बना बनाया खेल है।

95पुरानी दुनिया का विनाश भी होना है। 96गाया हुआ है राम गयो रावण गयो ... कोई भी जायेगा परन्तु बच्चों को दुःख नहीं हो सकता। 97तुम जानते हो यह बना बनाया ड्रामा है, सबका विनाश तो होना ही है।

98किंग क्वीन, साधू सन्त सब मरेंगे फिर कौन बैठ उनकी मिट्टी उठायेंगे। 99यह तो किसका नाम बाला करने के लिए करते हैं, इसमें कोई फायदा नहीं रखा है। 100न कोई उनकी आत्मा को सुख मिलता है।

101मनुष्य तो भक्ति मार्ग में जो कुछ करते हैं, सब बेसमझी से। 102अभी तुमको बाप कितना सेन्सीबुल बनाते हैं। 103घड़ी-घड़ी इन चित्रों को आकर देखना चाहिए।

104तो हमको बाबा पढ़ाकर क्या बना रहे हैं, परन्तु किसकी तकदीर में नहीं है तो अमल नहीं करते। 105बाबा बहुत कुछ समझाते हैं, जिस पर अमल करना चाहिए। 106बाप का बच्चा बनकर सर्विस नहीं कर सकते।

107बाप तो है ही कल्याणकारी।

108कई बच्चे तो बहुतों का और ही अकल्याण करते रहते हैं। 109जिनकी कुछ भावना भी होती - यहाँ के लिए, उनकी भावना भी उड़ा देते हैं। 110ऐसे-ऐसे विकर्म भी करते हैं।

111भूतों की प्रवेशता होती है ना इसलिए गायन भी है सतगुरू के निंदक ठौर न पायें। 112इसमें बापदादा दोनों आ जाते हैं। 113निराकार को तो कोई कुछ कर न सके।

114उनको क्या कहेंगे! 115यह तो भक्ति मार्ग में कह देते थे भगवान ही दुःख देते हैं... सो भी अज्ञान के कारण ऐसे समझते थे। 116अब तो बच्चे जानते हैं अज्ञान वश कितना बाप का तिरस्कार करते हैं।

117ऐसा कोई नहीं जो तमोप्रधान को सतोप्रधान बनाये और ही उल्टी मत देते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी है। 118मनुष्य कितना मूंझ जाते हैं। 119तब कहते ब्रह्मा के तन में परमात्मा कैसे आ सकता है।

120फिर किसके तन में आये? 121कृष्ण के तन में आये?

122तो फिर ब्रह्माकुमार कुमारियां कैसे बनें? 123वह तो फिर दैवी कुमार, कुमारियां बन जायेंगे। 124ब्राह्मण तो जरूर ब्रह्माकुमार और कुमारियां होंगे।

125ब्राह्मणों के बिना तो बाबा कुछ कर न सके इसलिए इनका चित्र तो जरूर देना पड़े। 126यह ब्रह्मा भी ब्राह्मण है। 127प्रजापिता ब्रह्मा तो चाहिए भारत में।

128दिन-प्रतिदिन ब्रह्मा का साक्षात्कार घर बैठे बहुतों को होता रहता है। 129वृद्धि होती जायेगी। 130जिनका पार्ट होगा तो फिर बहुत भागेंगे।

131बहुत लोग समझते हैं भगवान कोई रूप में होगा जरूर। 132साक्षात्कार भी परमपिता परमात्मा के सिवाए कोई करा नहीं सकता। 133शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ही स्थापना करते हैं।

134ज्ञान देते हैं और ब्राह्मण धर्म भी रचते हैं। 135ब्राह्मणों का धर्म जरूर चाहिए। 136वह है ऊंचे ते ऊंच।

137प्रजापिता ब्रह्मा तो बहुत ऊंचा है ना। 138उनको कहेंगे नेक्स्ट गॉड। 139सूक्ष्मवतन में दूसरा कोई तो है नहीं।

140ब्रह्मा द्वारा स्थापना होगी, बस। 141ब्रह्मा फिर देवता बन जाते।

14284 जन्मों के बाद फिर ब्रह्मा बन जाते हैं। 143ब्रह्मा सरस्वती सो फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। 144ज्ञान-ज्ञानेश्वरी फिर राज-राजेश्वरी बनती है।

145ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा कैसे बनें - यह बड़ी फर्स्टक्लास प्वाइंट है, इस पर अच्छी तरह समझा सकते हो। 146यह ज्ञान एक बाप द्वारा मिलता है। 147प्रदर्शनी में अच्छी तरह समझाओ कि तुम ब्रह्मा पर मूँझते क्यों हो।

148इतने सब ब्राह्मण ब्राह्मणियां हैं - पहले जब कोई ब्राह्मण बनें तब ही विष्णुपुरी के मालिक देवता बनें। 149ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात मशहूर है ना। 150अभी है रात।

151ऐसे-ऐसे चित्रों के सामने बैठ प्रैक्टिस करो। 152जिसको सर्विस करनी है उनको सर्विस के सिवाए कोई विचार नहीं आयेगा। 153सर्विस पर एकदम भागते रहेंगे।

154बुद्धि में ज्ञान टपकता हो, अच्छी रीति झोली भरी हुई हो तब तो उछल आयेगी। 155सर्विस पर एकदम भागते रहेंगे। 156ज्ञान हो और समझा न सके - यह तो हो ही नहीं सकता।

157तब ज्ञान किसलिए लेते हैं? 158लेना है तो दान करना है। 159दान नहीं करते, आप समान नहीं बना सकते तो ब्राह्मण ही क्या ठहरा!

160थर्ड ग्रेड। 161फर्स्ट ग्रेड ब्राह्मणों का धन्धा ही यह है। 162बाबा रोज़ बच्चों को समझाते हैं।

163सर्विस और डिस-सर्विस यह बच्चों से ही होता है। 164अगर सर्विस नहीं कर सकते तो जरूर डिस-सर्विस करते होंगे। 165अच्छे-अच्छे बच्चे कहाँ भी जायेंगे तो जरूर सर्विस ही करेंगे।

166जब ज्ञान कम्पलीट हो जायेगा तो कोई अनन्य बच्चों से भूल नहीं होगी तब ही माला के दाने बनेंगे। 167मुख्य हैं 8 दानें। 168इम्तहान भी बड़ा भारी है ना।

169बड़े इम्तहान में हमेशा थोड़े पास होते हैं क्योंकि गवर्मेन्ट को फिर नौकरी देनी पड़ती है। 170बाबा को भी विश्व का मालिक बनाना पड़े, इसलिए थोड़े ही पास होते हैं। 171प्रजा तो लाखों हो जाती है इसलिए बाबा पूछते हैं महाराजा बनेंगे या प्रजा में साहूकार बनेंगे?

172या गरीब बनेंगे? 173बोलो क्या बनेंगे?

174महाराजाओं के पास दास-दासियां तो बहुत होती हैं, जो फिर दहेज में भी देते हैं। 175पुरूषार्थ कर अच्छा पद पाना चाहिए। 176ऐसा होशियार बनना चाहिए जो सब कोई बुलावें।

177अक्सर करके कइयों को बुलाते हैं। 178यह तो जानते हो ना।

179बाकी जिनमें लक्षण नहीं उनको तो कभी कोई बुलाते ही नहीं हैं। 180परन्तु खुद थोड़ेही जानते हैं कि हम थर्डक्लास हैं। 181कोई तो सर्विसएबुल हैं, जहाँ तहाँ सर्विस पर भागते हैं।

182नौकरी का भी ख्याल नहीं कर सर्विस पर भागते हैं। 183कोई तो नौकरी नहीं होते भी सर्विस नहीं करते, शौक नहीं। 184तकदीर में नहीं है या ग्रहचारी है।

185सर्विस तो बहुत है। 186मेहनत भी लगती है।

187थक भी जाते हैं। 188समझाते-समझाते गले भी घुट जाते हैं। 189ऐसे तो थर्डक्लास वालों का भी गला घुट जाता है।

190इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने बहुत अच्छी सर्विस की। 191बाबा जानते हैं - अच्छी रॉयल सर्विस करने वाले कौन हैं। 192परन्तु कइयों में खामियाँ भी रहती हैं।

193नाम-रूप में फँसते रहते हैं। 194फिर शिक्षा देकर सुधारा जाता है। 195नाम-रूप में कभी नहीं फँसना चाहिए।

196देही-अभिमानी बनना है। 197आत्मा छोटी बिन्दी है। 198बाप भी बिन्दी है।

199अपने को छोटी बिन्दी समझ और बाबा को याद करना बहुत मेहनत है। 200मोटे हिसाब में तो कह देते - शिवबाबा हम आपको बहुत याद करते हैं। 201परन्तु एक्यूरेट बुद्धि में याद रहनी चाहिए।

202बड़ा धैर्य व गम्भीरता से याद करना होता है। 203इस रीति कोई मुश्किल याद करते हैं। 204इसमें बहुत मेहनत है।

205अच्छा।

206मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। 207रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। 208धारणा के लिए मुख्य सार:-

2091) अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरपूर कर दान करना है। 210इसी धन्धे में बिजी रह फर्स्टक्लास ब्राह्मण बनना है। 2112) कल्याणकारी बाप के बच्चे हैं इसलिए सबका कल्याण करना है।

212किसी की भावना को तोड़ना, उल्टी मत देना, यह अकल्याण का कर्तव्य कभी नहीं करना है। 213वरदान:- कल्याण की वृत्ति और शुभचिंतक भाव द्वारा विश्व कल्याण के निमित्त बनने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव 214तीव्र पुरुषार्थी वह हैं जो सभी के प्रति कल्याण की वृत्ति और शुभचिंतक भाव रखे।

215भल कोई बार-बार गिराने की कोशिश करे, मन को डगमग करे, विघ्न रूप बने फिर भी आपका उसके प्रति सदा शुभचिंतक का अडोल भाव हो, बात के कारण भाव न बदले। 216हर परिस्थिति में वृत्ति और भाव यथार्थ हो तो आपके ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। 217फिर कोई भी व्यर्थ बातें देखने में ही नहीं आयेंगी, टाइम बच जायेगा।

218यही है विश्व कल्याणकारी स्टेज। 219स्लोगन:- सन्तुष्टता जीवन का श्रृंगार है इसलिए सन्तुष्टमणि बन सन्तुष्ट रहो और सर्व को सन्तुष्ट करो।