Sakar murli for Wednesday 1 January 1969 - 1
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
Saving in progress..
You can now listen this murli without Internet.
You can listen this murli without Internet.
in order to be able to listen it without internet.
फिर सुदर्शन चक्रधारी ब्राह्मणों को कुल भूषणों को हम मधुबनवासियों की नमस्ते।
आज बुधवार नए साल जनवरी की पहली तारीख है।
क्लास में शिवबाबा की मुरली सुनते हैं।
ओम शांति।
बाप बैठकर के बच्चों को समझाते हैं।
अभी इनको तो देखते हैं, बच्चे बहुत अच्छी तरह से।
[अस्पष्टः ये है बच्चों की एम ऑब्जेक्ट आता है]।
[अस्पष्टः सुनना इसे] घराने के थे।
फर्क देखते हो, रात-दिन का फर्क है।
तो फिर घड़ी-घड़ी इनको देखना है ना, [अस्पष्टः काम को करना है]।
महिमा इनकी जानते हो अच्छी तरह से।
बाप ने रात को भी समझाया कि ये पॉकेट में रखने से, [अस्पष्टः ये जो बच्चों की बुद्धि रहती है, औरों के तरफ में उसको देह-अभिमान कहा जाती है]।
अगर देही-अभिमानी बन करके इनको देखेंगे, तो ये समझेंगे कि बरोबर अभी हम ऐसे बदल रहे हैं।
तो ज़रूर इनको देखना पड़े।
क्योंकि जबकि तुमको बाप समझाते हैं कि तुमको ऐसा बनना है, [अस्पष्टः मध्याजी भाव] है, ऐसा है ना बच्चे।
तो इसको देखकर के… याद करके वो दृष्टान्त बताते हैं ना, “मैं भैंस हूँ, मैं... [अस्पष्ट]... भैंस हूँ।” ऐसे देखते-देखते और वो बन जाते हैं।
ठीक है न बच्चे?
[अस्पष्टः अभी ये तो तुम जानते हो कि इनको देखते-देखते कि तुम जानते हो अच्छे तरह से], हमारा ये ... ये हमको बनने का है।
है कैसे बनने का है, बाबा को याद करके।
अभी ये तो स्मृति चाहिए न बच्चों को अच्छी तरह से।
तो हर एक अपने आप से ये पूछे कि हम बराबर इनको देख रहे हैं और बाबा को याद कर रहे हैं, [अस्पष्टः और पिता परमात्मा को जिसका अर्थ ही सब जगह अच्छे तरह से मन बना हुआ है, तो मज़ा ही भाव है]।
अगर इनको भी तो देखो तो ये जानते हो कि बाबा ने ही ये बनाया है, ऐसा बनाते हैं, देवता।
तो तो जितना हो सके, ये तो बाप कहते हैं कि निरंतर नहीं हो सकते हैं, समझे नहीं?
परंतु पुरुषार्थ करने से भले गृहस्थ व्यवहार का कार्यक्रम करते हुए भी, [अस्पष्टः अगर तुम स्मृति रखेंगे तो ये ... तो बाप कहेंगे]।
तो इनको याद करने से, बाप ज़रूर याद करेंगे, बाप को याद करेंगे तो ये ज़रूर याद करेंगे।
अभी है सारा मदार तुम्हारा इनको याद करना, ये बनने का।
और ये भी प्यारे हैं, अपन को हम ऐसे प्यारे बनेंगे।
किससे बनेंगे?
ऐसे बाबा से बनेंगे।
तो ये तो धुन अंदर में लगनी चाहिए।
अगर ये धुन होवे, तो ये जो बात, समझा नहीं, सारा दिन ये खराब है, [अस्पष्टः ये चला है, वो लुआ है], ये पाजी है।
[अस्पष्टः ये सारा चलना बहुत हैं बच्चे], जो जब अपने आपस में बैठते हैं, तो अंदर में ये सब उनके पास आते हैं।
पर तो जब कोई दूसरा मिलता है, उनको बोलते हैं, फलाना ऐसा है, फलाना ऐसा है, फलाना ऐसा है।
अभी ये फलाना कैसा है, कौन हमको बनाएंगे, फलाना कौन है, वो बातें छोड़कर करके, फिर जो इन बातों में लग जाते हैं, बताओ वो क्या पद पाए सकेंगे?
नहीं।
वो ऐसे ही रह जाते हैं।
नहीं तो तुम्हारे लिए तो बहुत सहज है, सहज नाम ही है, बिल्कुल सहज।
कि इनको याद करो, बाबा को याद करो, तो बन ही जाएंगे।
यानी ये जो दृष्टांत अनेक प्रकार का संन्यासी बैठ करके बनाते हैं, वो तो फालतू है न, बच्ची, जानवरों का मिसाल देना, फलानों का मिसाल देना।
ये तो तुम तो प्रैक्टिकल में हैं।
भक्ति मार्ग में तो भले ये दृष्टांत के लिए ये दृष्टांत देवे, पर तो यहाँ तो देखो बच्चे, तुम सामने बैठे हो यहाँ, सबके घर में ये जरूर हो ना है।
[अस्पष्टः नहीं, ये एक चित्र, वह है बहुत समझानी, डिटेल में]।
पर तो ये जो चित्र है, ये तो कितना है एक्यूरेट है।
तो इनको याद करो, तो बाबा को याद आएंगे, बाबा को याद करो, तो ये याद आएंगे।
अभी बाबा ने धंधा तो अच्छा दिया है बहुत।
और बैठ करके सारा दिन यही सुनाना औरों को [अस्पष्टः ज्ञान के पदरी में] कि ये ऐसा है, ऐसा है, फलाना ऐसा है, फलाना ऐसा है।
निंदा करते रहना, उसको तो दुविधा कहा जाते हैं न बच्चे।
अभी भी कितनी अच्छी, बिल्कुल मीठी शिक्षा मिलती है बच्चों को।
[अस्पष्टः इसको बचपन से ऊँची शिक्षा, ऐसे ऊँचा प्यार बाप का, तो सब कोई होता ही नहीं है]।
तो कभी भी बाप कहते हैं, कभी भी [अस्पष्टः ऐसा ऊँचा-ऊँचा काम या श्रीमत बिगड़], कभी भी नहीं।
[अस्पष्टः अभी श्रीमत कभी बच्चों को कहती हैं], बच्चे कभी भी ध्यान में जाओ, जो डायरेक्शन मिलते हैं, भोग लगाकर आओ।
बाबा ऐसा तो नहीं कहते, एकदम वैकुण्ठ में जाओ।
अगर गया कहाँ दूसरी जगह, सिवाय भोग के।
तुम दूसरी जगह कहाँ भी गए, तो माया की प्रवेशता है वो।
वो माया कुछ भी करा सकती है उनसे।
माया का पहला नंबर का तो है गटर में डालने का, समझे नहीं?
[अस्पष्टः ये तो जानते हो, बहुत ही वैकुण्ठ गए, अभी गटर में पड़े हुए हैं], माया का ये धंधा है।
[अस्पष्टः फेकारे] जो कोई भी चलते हैं, वो नुकसान बच्चे बहुत है।
दिन-प्रतिदिन हो सकते हैं कि कड़ी सजा भी खानी पड़े बच्चों को, समझे नहीं?
अगर अपन को संभालेंगे नहीं तो, क्योंकि बाप जो कहते रहते हैं, [अस्पष्टः बाप भी बाप बच्चों के तरह बनाए], धर्मराज साथ में हैं।
[अस्पष्टः इस हाथ के ताब का वो सभी रहता है, भेद का]।
बच्चे डरते ज़रा भी नहीं हैं, कुछ भी नहीं डरते, तो कहाँ सज़ा न खाए।
सज़ा तो बहुत खाई है।
देखो, रावण के जेल में कितने बरस पड़े हो, कितने दुखी हुए हो, कितने दुख है दुनिया में, अंदर में।
[अस्पष्टः अंदर में नहीं तो याद]... सब भूल करके, और बाप को ही याद।
बाप भी ऐसे ही कहते हैं कि बच्चे, बाप को ही याद करो, तो तुम्हारे ये [अस्पष्टः ऊँचे पद देवी बनेंगे]।
और सब कचर-पट्टी की बातें अंदर से... ये सभी पाँच भूत, ये माया है न, ये सभी भूत, ये विकार में कौन ले जाते हैं?
ये भूत, माया के।
छीछी बात कौन कराते हैं?
भूत।
तुम बच्चों को तो सर्विस करनी है।
जो बाबा कहते हैं, सब वही बताओ।
देखो, तुम्हारा [अस्पष्टः एम एंड ऑब्जेक्ट, ये है, एक गीता है]।
राजयोग है न, बच्चे।
कैसे है राजयोग, बिल्कुल सहज है।
बाप को याद करो, तो ये वरसा मिलेगा तुमको।
तो उसी ढंग से लगना चाहिए।
बच्चे, अंदर में और ही जो भी कचरा भरा हुआ है, वो तो निकाल देना चाहिए, भले माया लेगी परीक्षा, माया की परीक्षा बड़ी कड़ी है।
और तो उन सब बातों को [अस्पष्टः उलाते, उलाते, उलाते], कोई निरंतर तो कभी नहीं कोई कह सकते हैं।
बाकी बोलते हैं कि जितना हो सके, आखिर में निरंतरता आ जाएगी।
तभी तो हम इतना ऊँचे पद पाएंगे।
[अस्पष्टः अलग कोई भी जो विज्ञान है, जाएंगे अंदर], दूसरा कच्चा-कच्चा ख्याल आते रहेंगे, यानी माया के वश होकर के।
कि जो भी कुछ भी बुरा काम करते हैं, वो माया के वश में होकर के करते हैं, यानी हार खाते हैं।
तो घड़ी-घड़ी हार खाकर, बाप भी कितना समझाते हैं, भाई हार मत खाओ, गंदा काम कर-करके… [अस्पष्टः ये तो की, तमसारे जन्म] करते-करते ये बुरी गति आ करके हुई है।
अभी जब सतगति होती है, तो ये बुरा काम नहीं करना चाहिए।
[अस्पष्टः तो आज बाप तुम समझाना पड़ते हैं, जब-जब कहाँ से चित्र आते हैं, पत्र आते हैं], यहाँ देखते हैं कि कोई को माया ने एकदम आधा तक ग्रास लिया है, पता भी नहीं, समझे नहीं, पता तो नहीं पड़ता है किसको, ना बच्ची।
वो तो समझते हैं हम बहुत अच्छा चल रहे हैं, पर चलन तो… उसका कहते हैं, थॉट, वर्ड, डीड।
[अस्पष्टः तो वर्ड बड़ा अच्छे रहें, कहना मुख से, से भी तो रद्दा नहीं करनी चाहिए], यानी पत्थर तो नहीं निकलने चाहिए।
[अस्पष्टः बहुत के पत्थर निकलते हैं मुख से, ज्ञान नहीं निकलते हैं, पर तू पत्थर निकलते हैं]।
ये तो बच्चे जानते हो, ये एक ही समय है, इस समय में, जो तुम्हारे मुख कमल से रत्न ही निकलने हैं, पत्थर निकलने नहीं।
ये जो किसको ये करना, ये करना, ये करना, गंदी बातें करना, ये पत्थर हैं न बच्ची।
ये भी तो समझ होनी चाहिए न बच्चों को, कि तुम अभी पत्थर से पारस बनते हो।
तो पत्थर तो ही मुख से निकलने चाहिए।
हमेशा मुख से और रत्न निकलने चाहिए।
[अस्पष्टः क्योंकि तुम लोग बाप के पिछाई नहीं समझो]।
बाबा ऐसा करते हैं, अरे बाबा को तो समझाना पड़ते हैं न।
टीचर को तो हक है न बच्चों को कुछ भी कहना।
ऐसे तो नहीं है कि बच्चे बैठ करके भाई-भाई को लाठी मारेंगे, अगर देखेंगे तो ये चंचल है, या कुछ खराबी करते हैं, स्कूल में बैठ करके।
भाई-भाई तो नहीं है, ये तो टीचर का है न, जो कि उसको भी समझाना।
तो टीचर कुछ भी कह सकते हैं, बाकी भाई-भाई को तो नहीं कह सकते हैं न, क्योंकि स्कूल है ये सारा।
स्कूल भी कैसे है, उठते, बैठते, चलते, तुम स्टूडेंट हो।
तो स्टूडेंट, स्टूडेंट को नहीं कुछ कह सकते हैं।
देखो, वो लॉ हाथ में नहीं उठाना ऐसा कहा जाता है।
[अस्पष्टः तो तुम लोग भी जो एक-दो में ये सरीखे हैं न], जैसे लॉ हाथ में रखते हो, आपस में भाई-भाई को।
बाप समझा सकते हैं, कुछ कह भी सकते हैं, समझाने के लिए।
बाकी बच्चों को तो बाप का डायरेक्शन है, बच्चों।
बाप को याद करो, तुम्हारी तकदीर खुली है।
तो न मानने से, श्रीमत पर न चलने से तुम्हारी तकदीर तो बिगड़ पड़ेगी, और फिर बहुत पछताना होगा कि बाप के श्रीमत पर क्यों नहीं चले, [अस्पष्टः उसकी दुर्गति का एक कमाल]।
एक तो सज़ा है, दूसरा पद भ्रष्ट।
सो भी बच्चे बड़ा घाटा है।
[अस्पष्टः घाटे में घाटा जितना हम चाहें न, वो घाटा है], क्योंकि जन्म-जन्मांतर कलप-कलपांतर की बात ये अभी।
[अस्पष्टः तो बाबा के पढ़ाते हैं, तो मेरा बुद्धि में तो रखना चाहिए]।
हमारा बाबा टीचर है।
तो देखो, याद कितनी इज़ी है, अति इज़ी।
[अस्पष्टः क्योंकि बाप है, थोड़ा हुआ]।
नहीं, नॉलेज मिलती है, नहीं क्या?
तुम आत्मा समझो, [अस्पष्टः जैसे जीव है देही संदेहाय हो]।
तो अभी बाबा कहते हैं कि आत्मा समझो, आत्मा और परमात्मा का मेला इसको कहा जाते हैं।
[अस्पष्टः फिर बाद में लगेगा, इसके बाद मेला लगेगा]।
[अस्पष्टः इसमें मेले नहीं आती], फिर से बाप से जितना वर्सा से ले लो, नहीं तो पीछे बहुत पछताएँगे, बहुत रोएँगे, ज़ार-ज़ार रोएँगे।
ऐसे नहीं कि तुम रोएँगे, किसको पता?
नहीं, नहीं।
[अस्पष्टः तब सात-सात का], सबको मालूम पड़ जाएगा।
[अस्पष्टः यानी विलग से काम लो]।
जब कोई स्कूल के बच्चे ट्रांसफर होते हैं, तो क्या, जब पिछाड़ी में बैठते हैं, तो क्या सभी नहीं देख लेते हैं?
दूसरे नंबर में कैसे जाएंगे?
ये भी तो यहीं है ना, ट्रांसफर तो होना है ना, तुमको कि ये भी भूल गए हो।
इस स्कूल से तुम दूसरे स्कूल कहो, पर वो तो देवताओं का, बच्चों का स्कूल होता है ना।
तुम जानते हो, यहाँ से शरीर छोड़ करके फिर सतयुग में हम जा करके प्रिन्स के कॉलेज में पढ़ेंगे, ठीक है ना?
हम प्रिंस होंगे ना, सभी प्रिन्स एण्ड प्रिन्सेस पढ़ेंगे।
क्या पढ़ेंगे?
एम.ए. ऑब्जेक्ट नहीं, भाषा पढ़ेंगे।
वहाँ की जो भाषा, तो सबको पढ़नी पड़ती है, अपनी मदर लैंग्वेज।
तो ये ज्ञान बच्चों को, बड़ों को तो नहीं है एकदम।
एक-दो ऐसे ही बैठे हुए हैं।
[अस्पष्टः आज आएंगे, कल मरे पड़े होंगे स्कूल में]।
क्या हुआ है, कुछ भी नहीं।
कह रहे हैं, [अस्पष्टः माया नाश से पक्का है], क्यों?
क्योंकि बाप आए पढ़ाने, पढ़ते नहीं हैं।
तो एक दफ़ा मिस करेगा, दूसरे दफ़ा मिस करेगा, [अस्पष्टः आधे तो पढ़ जाएंगे मिस करने के]।
[अस्पष्टः स्कूल में, स्कूल में आधे तो कैसे पढ़ती है]?
ऐसे।
तो यहाँ, यहाँ सब किसका है?
माया का।
माया के मुरीदों का।
ये सभी माया के मुरीद हैं ना।
ईश्वर के मुरीद, शिवबाबा के मुरीद तो बहुत थोड़े होते हैं ना, बाकी सब माया के मुरीद हैं।
माया खूब इनको अभी तंग भी... जब तुम शिवबाबा का मुरीद बनते हो, तो माया सहन नहीं कर सकती है।
इसलिए संभालना ऐसे, बाबा ने समझाया, [अस्पष्टः अंगुल बिट्टो, लाल बिट्टो, चूरे की संभाल कर करो]।
तो ये जो भी जीव मनुष्य है, गंदे मनुष्य हैं, इनकी बड़ी संभाल करना, [अस्पष्टः इनका संग भी बिल्कुल नहीं भोले]।
समझे?
ये बड़ी मंजिल है, [अस्पष्टः तुमको संग में रहकर करके चिड़ों के संग में], हंस और बगुला कहा जाते हैं ना।
[अस्पष्टः तो चूड़ा किसको कहा जाता है]?
[अस्पष्टः ये जो बाप ने बैठकर संभाला नहीं], रात को इतनी शिक्षा की कि सारा दिन इसकी निंदा, उसकी निंदा, परचिन्तन, फलाना, वो कौन है?
[अस्पष्टः उनको कोई देर तक, देर तक ऐसे झगड़े करते हैं क्या]?
वहाँ तो निंदा-विंदा वगैरह कुछ है नहीं।
यहाँ जो बैठ करके ऐसे एक-दो की निंदा करते हैं, वो कौन ठहरे?
बाबा कहे कि बच्चे, बाप को याद करो और इनको याद करो।
और वो सब भूल करके और बैठकर निंदा... वो नहीं।
तो क्या है, जन्म-जन्मांतर... [अस्पष्टः एक दो दिन दाँत काटते ही आए हुए हैं]।
[अस्पष्टः एक दो दिन धुलिधार रहती आई है]।
ये फलाना है, दुश्मनी है, दो को कितनी लड़ाई-झगड़ा, मारामारी।
[अस्पष्टः तो ये ठंड क्या है]?
ये भी एक मारामारी है, अंदर में।
ये अपना यूँ खून करते हैं, समझा नहीं, गुप्त खून।
फिर समझ में अगर बाप को भूल कर करके, [अस्पष्टः और ये ठंडे में लग जाते हैं], तो [अस्पष्टः अपना बहुत भोटा करते हैं], बहुत अपन को घाटा देते हैं।
अरे समझते भी हैं, जो एक दो दिन दाँत काटते हैं, फलाना ऐसा, तैसा, ऐसा-ऐसा, उसमें तुम्हारा क्या जाते हैं?
[अस्पष्टः बाप है नहीं], सबका सहायक एक बाप है इस समय में।
वो तो एक-दो को तो जब माया के मुरीद हैं, तब तो एक-दो को मारते-पीटते कुछ भी करते हैं।
[अस्पष्टः अभी तो मति स्त्री की है], मनुष्य मति बड़ी गंदी है एकदम।
मनुष्य मति ये करती है, अंदर में [अस्पष्टः इसकी गला, इसकी गला, उसकी गला, गला करती रहते हैं]।
अभी ये क्या है इसमें?
ये भूत माया का।
[अस्पष्टः जो कोशिश करते हैं, तब देवता बने, चोरा बनाने की कोशिश करते हैं]।
[अस्पष्टः अभी चोरा को तो वो तो नहीं है, जो में तो]... है तो सभी गाय जाते हैं न, पतित।
हर एक अपन को ये तो जान गए हैं, [अस्पष्टः बड़ो-बड़ हम पत्त हैं], पावन बन रहे हैं।
तुम, तुम, तुम्हीं निश्चय करते हो कि [अस्पष्टः हम बड़ो-बड़ पतित थे], बहुत पतित थे, अभी बहुत पावन बनने वाले।
दूसरा कोई थोड़ी है, जो न होंगे इतना ऊँच, वो थोड़ी अंदर में जल्दी ये समझते होंगे।
नहीं, ये बहुत खराबी है।
नहीं, [अस्पष्टः उन लोगों को सुधार किया जाते हैं कि काम पक्का करो]।
[अस्पष्टः तो माता कहते हैं, अगर कुछ भी इसमें देखते हो, क्या भी कहते हैं]?
तुम मुझे बोलो, बाबा को बोलो, [अस्पष्टः बाबा तो बैठे हैं नहीं, भगवान तो यहाँ बैठे हैं नहीं]।
[अस्पष्टः बाप कभी किसकी रिपोर्ट सुनता नहीं], समझे नहीं?
[अस्पष्टः सुनने का जब काम होगा नहीं], सुनने के लिए कान चाहिए, और बोलने के लिए मुँह चाहिए।
देखने के लिए आँखें चाहिए, तो [अस्पष्टः आँखें का भी तो लोन लेता है नहीं], लोन लेता है।
[अस्पष्टः जब बाबा तुमको देखता नहीं है, बाबा भी देखता है तो दादा भी देखते हैं, ऐसे नहीं देखते हैं]।
[अस्पष्टः तो बाबा तो इसमें बैठा हुआ देखते हैं नहीं, इसमें तो नहीं बैठे, बाबा जो इनको देखते हैं]।
[अस्पष्टः ये तो जानतों को], बाबा इनमें है, ये रथ है।
बाबा का वो सब बच्चों को अच्छे से देखते हैं, उनकी चलन, उनकी बातचीत, वातावरण, [अस्पष्टः बिल्कुल कोई तो बिल्कुल बेताज है], समझे नहीं?
तो उनको क्या कहते हैं, जिनको बाप नहीं होता है, उनको छोरा कहा जाते हैं।
[अस्पष्टः तो ये माँ छोरी, जो बेत का बाप को नहीं याद करते हैं], तो वो क्या बनेंगे?
क्योंकि [अस्पष्टः आए हैं नहीं सुधारने के लिए], नहीं सुधरते, तो [अस्पष्टः औरी विरक्ते पड़ते हैं], [अस्पष्टः अपना पद जन्म-जन्मांतर कमाते हैं]।
तो जो भी श्रीमत पर नहीं चलते हैं, उनको क्या कहेंगे?
छोरे कहेंगे न बच्चे।
छोरे कहते हैं जिनको बाप नहीं होते, [अस्पष्टः माँ-बापी कहो]।
[अस्पष्टः सुनना है, ये बाप उनके माँ, नहीं वो बाप]।
क्योंकि ये तो समझ गए हैं, माँ-बाप, तो [अस्पष्टः मेरे माँ, चाची, पिता, बंदू, रिश्तेदार, बंदू-बंदू] तो ये बनते हैं, [अस्पष्टः तुम्हारे को श्रीमत बंदू तो नहीं बनते हैं तुम्हारे]।
तो इनका भी तो दर्जा तो है नहीं, बच्ची।
[अस्पष्टः ग्रेट, ग्रेट, ग्रेट फादर तो इनको भेजते हैं]।
अभी जिसका ग्रेट, ग्रेट, ग्रेट फादर नहीं है, तो उनका मतलब ... [अस्पष्टः फादर, दादर होता है क्या]?
इस तरह भी अक्ल ... बच्चों में नहीं है, बिल्कुल ही नहीं।
तो ये सभी जो समझ मिलती है स्टूडेंट्स को, तुम बच्चे स्टूडेंट्स हो, नहीं?
[अस्पष्टः बुद्धि, बुद्धा तभी]।
तो जो कुछ समझ जाते हैं, तो कितना बैठ करके तुमको याद करना पड़े, बाबा ने क्या कहा, फिर अमल भी करना है, ऐसे नहीं कि कान से सुने, बाहर निकाले, तो बिल्कुल ही चट हो जाते हैं।
ये बहुत ईज़ी चीज़ है।
[अस्पष्टः ये बाप का ये बात समझता है, शौक़ है], तो कैसे मिलें, कैसे तुमको ये समझानी है।
चित्र लेकर करके जब जाते हो म्यूज़ियम वगैरह में, [अस्पष्टः भले कृष्ण का ... या इनका ... कृष्ण भी है तो समझो]।
देखो, ये वसा बाप का मिला हुआ है ना, तो जरूर बाप से मिलना ही चाहिए ना।
तो बाप से कैसे मिलना चाहिए?
क्योंकि पतित बन गए हैं, पावन बनना है।
तो बाप को याद करने से, पतित पावन याद करने से तुम स्वर्ग के मालिक बन जाएंगे।
कितनी मोस्ट ईज़ी है।
तभी बाबा कहते हैं कि ऐसी युक्ति, जाओ ट्रेन में, यहाँ-वहाँ जाओ, तो ये मुख चलाते रहो और [अस्पष्टः अपना ... ऑब्जेक्ट]।
मोस्ट ईज़ी है, एकदम।
तभी तो कहते हैं ना, ये छपाओ, बहुत अच्छे से करके छपे।
तो विशाल बुद्धि वाले जो होंगे, बोलेंगे अंत में यही काम आएगा।
इनके ऊपर ही समझाएंगे, [अस्पष्टः ये पक्की, पक्की सच्ची, पक्की सच्ची] सारी जो ये चक्कर है ना... सब ज्ञान इसमें भरा हुआ है।
[अस्पष्टः अगर बैठकर सोच करेंगे नहीं], मगर सारा ज्ञान इसमें बैठा है।
[अस्पष्टः ये जो चित्रलेखा, ये सारा]।
क्योंकि ये भी मालूम नहीं रहता है कि [अस्पष्टः नारायण, सीता, राम का कनेक्शन] क्या है, वो भी कोई नहीं जानते।
तो वो भी कनेक्शन यहाँ है, बराबर है।
[अस्पष्टः पत्ते तो कनेक्शन बनना है नहीं]।
[अस्पष्टः बेगर तू किसके से ही बनना है], बेगर टू प्रिन्स बनेंगे, फिर प्रिंस बनेंगे।
तो लक्ष्मी-नारायण का कोई भी बताते नहीं है, छोटेपन का।
अच्छा, कभी नहीं कोई कहता है, [अस्पष्टः ये लक्ष्मी-नारायण छोटेपन में राजयोग किसने था], किसको पता नहीं है।
[अस्पष्टः हन्ड्रेड परसेन्ट आइडल बनाते हैं]।
नंबर वन तो आइडल ही है, मूर्त देवता की।
तो समझने की है, बहुत सहज है।
तो माया का जो है आवरण इसको कहा जाता है, [अस्पष्टः पर्दा छाया कहते हैं]।
कोई के ऊपर बहुत आवरण है, कोई के ऊपर कम।
जितना-जितना जो पुरुषार्थ करता है, इतना-इतना वो बंधन से छूटता है।
[अस्पष्टः नहीं तो यहाँ तो तब बुरी बहुतों को है]।
[अस्पष्टः निन्दा का निश्चय, दौलत-दौलत धंधाई जैसे नहीं है उसको]।
उसको फिर कहा जाता है, माया का पाठ, बाबा का पाठ तो बहुत सीधा है, सहज।
तो ये पढ़ाई, निंदा और ये झूठे, कपट, फलाना, [अस्पष्टः सीधा बातें बनाना], बातें बनाना सीखना हो, तो [अस्पष्टः जब व्यास आए नहीं], उनके पास जाके बैठना।
तो ये शास्त्र, बातें कितनी बनाई हैं, जो भी व्यास के नाम पर है।
तो ये बातें जब ये संन्यासी सुनते हैं, जब ये बहुत बातें सुनते रहेंगे, सुनाते रहेंगे, तभी वो भी सुनेंगे।
सुनेंगे तब उनका ज्ञान, उनका ज्ञान [अस्पष्टः आत्मा के प्लेनेंसा तिखाई में है]।
[अस्पष्टः यह ध्यान-ज्ञान, अनभवत्व] कहते हैं कि ध्यान में जाओ।
अरे, ध्यान में कुछ भी फायदा नहीं है।
हो सकता है कि भूत की प्रविष्टा हो जाएगी फिर।
ध्यान में भूत की प्रविष्टा जल्दी आती है।
[अस्पष्टः एक आएते जाते हैं नहीं]।
[अस्पष्टः बाबा ने सिर से कहता रखा है] कि जाओ, भोग लगाकर आओ।
[अस्पष्टः बाकी अगर मैं कुंड से देखेगा तो क्या तुम्हें पहुँच जाएगा]?
नहीं।
वो माया की है, चेंज कर देती है।
जो डायरेक्शन मिलता है, वही डायरेक्शन, बस।
फिर अगर डायरेक्शन इधर कुछ भी आया कि हम डांस करें, करें, कोई काम करें।
इस शुरुआत में साक्षात्कार होते, खुशी होवे बच्चों को।
देखो, बाबा को कितनी खुशी आई।
बोले, अरे, अभी विनाश होगा।
ये तो मैंने देखा है, शायद दो-पाँच रोज में हो जाएगा।
[अस्पष्टः बाबा को थोड़ी मालूम पड़ा, कुछ लगेगा]।
अरे, बस चलो, अभी जाओ, इसी तरह करेंगे।
विनाश तो अभी हो ही जाएंगे, और फिर हम वैकुण्ठ में चले जाएंगे।
ये थोड़ी मालूम था, [अस्पष्टः याद की यात्रा में हलचल में कुछ भी नहीं]।
हाँ, किसको भी... एक पॉइंट मिलती रही है, बुद्धि ज्ञान की पॉइंट मिलती रही है, तो आँखें खुलती जाती हैं, [अस्पष्टः अज्ञान पतते थे]।
इनको साक्षात्कार तो बच्चों को होने लगे, हम बोले, जल्दी-जल्दी शायद विनाश होना है।
[अस्पष्टः बाकी ये मनुष्य तो याद करना है], तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है, ये कोई प्रैक्टिकल थोड़ी होती थी।
नहीं, अगर वो पहले ही शुरू हो गई तो कर्मातीत बन जाएँ, तो इसके पहले ही तो विनाश भी हो जाएगा।
तो नहीं, [अस्पष्टः रामा को देखा जाते हैं कि नहीं], अभी तो अच्छी मेहनत करनी पड़ती है, बहुत अच्छी।
[अस्पष्टः साक्षात्कार अगर तो कुछ काम का नहीं रहा]।
[अस्पष्टः क्यों देखा जाते हैं, साक्षात्कार तो बहुत ही करे थे]।
डूब मरे एकदम।
आगे सिंगल डूबते थे, अभी डबल डूबते।
कहाँ गई ये बच्ची?
तो ले लेने गई है शायद।
[अस्पष्टः तो कई करी सजाएँ नहीं शुरू हो जाएँ]।
क्योंकि सजाएँ भी तो गुप्त होती हैं न बच्चे?
हाँ, बच्चे।
गुप्त बाबा, [अस्पष्टः गुप्त कराई], सजाएँ भी गुप्त।
[अस्पष्टः कोई करी पीड़ा-बीरा न आ जाए कोई]।
[अस्पष्टः खेलते हैं न बच्चे, बहुत लगते हैं, कड़ी-कड़ी]।
चलो बच्ची।
जैसे बाप होते हैं, तो बच्चे या बच्चियाँ कोई तो निकलती हैं न, जो दुख देते हैं।
जैसे यहाँ भी ऐसे ही होते हैं।
बच्चों के ध्यान में रहते हैं, भई हाँ, यहाँ ये दो-चार पाँच हैं, बड़ा तंग करते हैं।
तो फिर बोला, हाँ, धीरे-धीरे करेक्ट कर लिया अपन, ऐसे वक्त निकल जाते हैं।
तो निरंतर याद करने में तो बहुत टाइम... अगर निरंतर याद करने सीख जावे तो कर्मातीत अवस्था आ जावे।
ये तो कभी याद करते हैं, भूलते हैं, याद करते हैं, भूलते हैं।
ये आहिस्ते-आहिस्ते करें, याद की यात्रा थोड़ी-सी की जाती है, वो फिर कम हो जाती है।
है वही खेला जैसे स्कूल में दो को बांध करके दौड़ाते हैं न, कभी एक की होती है, कभी दो की होती है।
अभी एक की तो है संन्यासियों की, कोई अकेला दौड़ते हैं, वहाँ पर प्रवृत्ति मार्ग तो है नहीं, यहाँ प्रवृत्ति मार्ग है।
तो दोनों एकरस अगर चल जाए, तो फिर उस घर में शांति अच्छी रह सकती है।
[अस्पष्टः ... बच्चों पे ... रूहानी बाप ... ज्ञान से ... याद ... रूहानी बच्चों पे, रूहानी बाप ...]