Sakar murli for Friday 10 January 1969

प्रातः सभा 10/1/69 ओमशान्ति पिताश्री शिवबाबा याद है ?

ओमशान्ति। बाप बैठ समझाते हैं ज्ञान और भक्ति के ऊपर। यह तो बच्चे समझ गये हैं

भक्ति से दुर्गति होती है और सतयुग में भक्ति होती नहीं, ज्ञान भी सतयुग में नहीं

मिलता। कृष्ण न भक्ति करते हैं, न ज्ञान की मुरली बजाते हैं। मुरली माना ही ज्ञान

देना। गायन है ना मुरली में जादू। तो जरूर कोई जादू होगा ना। सिर्फ मुरली बजाना

वह तो कामन है। फकीर लोग भी बजाते रहते हैं। इसमें ज्ञान का जादू है। अज्ञान को

जादू नहीं कहेंगे। मुरली को ही जादू कहते हैं। मनुष्य समझते हैं कृष्ण मुरली बजाता

था। उनकी बहुत महिमा गाते हैं। बाप कहते हैं श्रीकृष्ण जो देवता था, मनुष्य भी था;

क्योंकि मनुष्य से देवता, देवता से फिर मनुष्य यह होता ही रहता है। दैवी सृष्टि भी

होती है, मनुष्य-सृष्टि भी होती है। मनुष्य से देवता बनते हैं ज्ञान से। जब सतयुग है

तो वह ज्ञान का वरसा है। वहां भक्ति होती ही नहीं। भक्ति होती ही है द्वापर से, जब

कि देवताएं मनुष्य बन जाते हैं। मनुष्य को हमेशा विकारी कहा जाता है, देवताओं को

निर्वि कारी कहा जाता है। देवताओं की सृष्टि को पवित्र दुनियां कहा जाता है। अभी तुम

मनुष्य से देवता बन रहे हो। मनुष्य में ज्ञान नहीं है तो मनुष्य कहा जाता है। जब

मनुष्य में ज्ञान है तो उनको देवता कहा जाता है। ज्ञान किसको कहा जाता है? एक तो

पहचान और फिर सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान को ज्ञान कहा जाता है। भक्त

लोग यह नहीं जानते हैं। तुम हम, यह दादा भी कहते हैं तुम हम में ज्ञान था नहीं।

ज्ञान से होती है सद्गति, फिर भक्ति होती है उनको कहा जाता है दुर्गति। क्योंकि

भक्ति को रात, ज्ञान को दिन कहा जाता है। यह तो कोई को भी बुद्धि में बैठ सकता

है; परन्तु दैवीगुण धारण नहीं करते हैं तो यह धारणा भी हो नहीं सकती। दैवीगुण हो

तो समझ जाये ज्ञान की धारणा है। ज्ञान की धारणा है तो दैवी गुणों की भी धारणा

होगी। ज्ञान की धारणा नहीं तो दैवी गुणों की भी धारणा हो न सके। ज्ञान की धारणा

वालों की चलन देवता मिसल होते हैं। कम धारणा वाले की चलन मिक्स रहते हैं।

असुर तो नहीं कहा जावेगा। कहेंगे यह बच्चे दैवी गुणों वाले हैं। धारणा नहीं तो गोया

हमारे बच्चे ही नहीं। बच्चे बाप को नहीं जानते तो बाप भी बच्चों को नहीं मानते।

कितनी कच्ची2 गालियां देते हैं। मनुष्य है तो भगवान को गाली देते हैं, फिर वह

ब्राह्मणकुल में आते हैं तो गाली देना बन्द हो (जाता) है। तो यह ज्ञान का विचार

सागर मंथन करना चाहिए। स्टुडेन्ट विचार सागर मंथन कर ज्ञान को उन्नति में …

हैं। तुमको ज्ञान मिलता है उस पर अपना विचार सागर मंथन करने से अमृत निकलेगा।

विचार सागर मंथन नहीं करेंगे तो बाकी क्या मंथन होगा। आसुरी विचार, उनसे किचड़ा

ही निकलेगा। अभी तुम ईश्वरीय स्टुडेन्ट । जानते हो मनुष्य से देवता बनने की पढ़ाई

बाप ही पढ़ा रहे हैं। देवता नहीं पढ़ावेंगे। देवताओं को कब (ज्ञान) का सागर नहीं कहा

जाता। ज्ञान का सागर तो एक बाप को ही कहा जाता है। दैवीगुण भी ज्ञान से.... है।

यह ज्ञान अभी जो तुम बच्चों को मिलता है यह सतयुग में होता नहीं। इन देवताओं में

दैवीगुण हं महिमा भी करते सर्व गुण सम्पन्न ........ तो अभी तुमको ऐसा बनना है। अपन

से पूछना चाहिए हमारे में स... दैवीगुण है या कोई आसुरी गुण है। अगर आसुरी गुण है

तो उनको निकाल देना चाहिए। तब ही देवता ..... नहीं तो कम दर्जा पा लेंगे। अभी तुम

दैवीगुण धारण करते हो। बहुत अच्छी2 बातें सुनाते हो। इनको कहा जाता है पुरूषोत्तम

संगम युग जब कि तुम पुरूषोत्तम बन रहे हो, तो वातावरण भी बहुत अच्छा होना

चाहिए। छी छी बातें न निकले, नहीं तो कहा जावेगा कमदर्जे के हैं। वातावरण से झट

पता पड़ जाता है। मुख .... ही दुःख देने वाने निकलते हैं। तुम बच्चों को तो बाप का

नाम बाला करना है ना। सदैव मुखड़ा .... रहना चाहिए, नहीं तो उनमें ज्ञान नहीं कहा

जावेगा। मुख से सदैव रत्न निकले। यह (ल0ना0) देखो कि(तने) हर्षितमुख हैं। इन्हों

की आत्मा ने ज्ञान रत्न धारण की थी। मुख से भी ज्ञान रत्न निकाले थे। रत्न ही सु....

थे। कितनी खुशी रहती है। ज्ञान रत्न जो अभी तुम लेते हो वह फिर सच्चे हीरे जवाहर

बन जाते हैं। माला कोई हीरे जवाहरों के नहीं है। इन रत्नों की ही माला है। मनुष्य

लोग फिर वह रत्न समझ अंग ....पहन लेते हैं। इन ज्ञान रत्नों की माला इस पुरूषोत्तम

संगम युग पर ही पड़ते हैं। यह रत्न ही तुमको

21 जन्म माला-माल बनाते हैं। इनको कोई लूट न सके। यहां तुम वह हीरे जवाहर नहीं

पहनते हो। यहां पहनों तो झट कोई लूट लेवे। तो अपन को बहुत2 समझदार बनाना है।

आसुरी गुणों को निकालना है। आसुरी गुणों से सिकल ही ऐसे हो जाते हैं। क्रोध में

लाल लाल ताँम्बे मिसल सिकल हो जाते हैं। काम विकार वाले तो काले बन जाते हैं।

जैसे कृष्ण को काला दिखाते हैं ना। विकारों के कारण ही गोरा से सांवरा बन गया। तुम

बच्चों को हरेक बात में विचार सागर मंथन करना चाहिए। यह पढ़ाई है ही बहुत धन

पाने की। तुमने सुना होगा क्वीन विक्टोरिया का वजीर जो था वह पहले बहुत गरीब था।

दीवा जलाकर पढ़ता था; परन्तु वह पढ़ाई कोई रत्न थोड़े ही है। वह तो अक्षर पढ़ते हैं।

नालेज पढ़कर पूरा पोजीशन पा लेते हैं। तो पढ़ाई काम आई ना, न कि पैसा? पढ़ाई ही

धन है। वह है हद का धन। यह फिर है बेहद का धन। है दोनों पढ़ाई। अभी तुम

समझते हो बाप हमको पढ़ाकर विश्व का मालिक बना देते हैं। वह अल्पकाल क्षणभंगुर

की पढ़ाई है। एक जन्म लिये। फिर दूसरे जन्म में नये सिरे पढ़ना पड़े। वहां तो धन के

लिये पढ़ाई की दरकार ही नहीं। वहां तो अभी के पुरूषार्थ से अकीचार धन मिलता है।

धन अविनाशी बन जाता है। देवताओं के पास बहुत धन था। फिर जब वाममार्ग में अर्था त ्

रावण राज्य में आये हैं तो भी कितना धन था। कितने मंदिर बनाये हुये हैं। फिर बाद में

आकर मुसलमानों ने लूटा। कितने धनवान थे। आजकल की पढ़ाई से र्कोइ इतना

धनवान बन नहीं सकते। अभी तुम जानते हो हम इतनी ऊंच पढ़ाई पढ़ते हैं जिससे यह

बनते हैं। कृष्ण तो न ज्ञान को न भक्ति को जानते हैं। तो इस पढ़ाई से देखो मनुष्य

क्या बन जाते हैं। गरीब से साहुकार। अभी भारत भी कितना गरीब है। साहुकारों को तो

फुर्सत ही नहीं। अपना ही अहंकार रहता है हम फलाना हूं। इसमें अहंकार आदि मिट

जाना चाहिए। हम आत्मा हैं। आत्मा के पास तो धन-दौलत, हीरे-जवाहर आदि कुछ भी

नहीं है। बाप भी कहते हैं देह सहित सभी सम्बन्ध छोड़ो। आत्मा शरीर छोड़ती है तो

फिर साहुकारी आदि सभी खत्म हो जाते हैं। जब नये सिरे पढ़ते हैं, धन कमाते हैं फिर

धनवान बने या तो दान-पुण्य अच्छा किया होगा तो साहुकार के घर जन्म लेंगे। कहते हैं

ना यह पास्ट के कर्मों का फल है। नालेज का दान दिया है वा कालेज, धर्मशाला आदि

बनाई है तो उसका फल मिलता है; परन्तु अल्पकाल के लिये। यह दान-पुण्य भी यहां

किया जाता है। सतयुग में नहीं किया जाता। सतयुग में अच्छे ही कर्म होते हैं। क्योंकि

अभी का वरसा मिला हुआ है। वहां कोई का भी विकर्म नहीं बनेगा। क्योंकि रावण ही

नहीं। गरीबों का भी नहीं बनेगा। यहां तो साहुकारों के भी विकर्म बनते हैं। तब तो यह

बिमारी आदि दुःख होते हैं। विकार में जाने से विकारी कर्म बन जाते हैं। विकार भी कर्म

करते हैं तो वह विकर्म बन जाता। वहां विकार में जाते ही नहीं तो विकर्म कैसे बनेगा।

सारा मदार कर्मों पर है। यह माया रावण का अवगुण है। जो मनुष्य विकारी बन जाते हैं।

बाप आकर पढ़ाते हैं निर्विकारी बनाने लिये। बाप निर्विकारी बनाते हैं माया फिर विकारी

बना देती है। रामवंशी और रावण वंशी की युद्ध चलती है। तुम बाप के बच्चे हो। वह

रावण के बच्चे हैं। कितने अच्छे2 बच्चे माया से हार खा लेते हैं। माया बड़ी प्रबल है।

बाबा नाम नहीं सुनाते हैं फिर भी उम्मीद रखते हैं। अधम ते अधम का भी उद्धार करना

होता है ना। बाप को तो सारे विश्व का उद्धार करना होता है। बहुत गिरते हैं। एकदम

चट खाते में। अच्छे2 सेन्टर्स के हेड होकर रहते हुये भी अधम ते अधम बन जाते हैं। ऐसे

का भी बाप उद्धार करते हैं। अधम तो सभी हैं रावण के राज्य में; परन्तु बाप बचाते हैं

फिर गिरते हैं तो बहुत अधम ते अधम बन जाते हैं। उनका फिर इतना चढ़ना नहीं होता।

वह अधमपना अन्दर खाता रहेगा। जैसे तुम कहते हो अन्त काल जो...... उनकी बुद्धि में

वह अधमपना ही याद आता रहेगा। तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं कल्प2 तुम्हीं सुनते

हो, सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है जानवर जानेंगे क्या! मनुष्य ही सुनते और समझते हैं।

जानवर तो नहीं कहेंगे। तो मनुष्य मनुष्य ही हैं। इन (ल0ना0) को भी नाम, कान आदि

सभी है। मनुष्य है ना; परन्तु दैवीगुण है इसलिये इनको देवता कहा जाता है। यह ऐसा

सुधर देवता कैसे बनते हैं फिर कैसे गिरते हैं यह चक्र का तुमको पड़ गया है। जो

विचार सागर मंथन करते रहेंगे उनको धारणा भी अच्छी......

विचार-सागर-मंथन ही नहीं करते तो बुद्धू बन पड़ते। मुरली चलाने वाले का विचार

सागर मंथन चलता रहेगा, इस टॉपिक पर यह यह समझाना है। आटोमेटकलि विचार

सागर मंथन चलता है। फलाने आने वाले हैं। ज्ञान तो नहीं है, उन्हों को भी हुलास से

समझावेंगे। हो सकता है कोई कुछ समझ जाये। उनके भाग्य .... है। र्कोइ झट निश्चय

करेंगे तो र्कोइ नहीं करेंगे। उम्मींद रखी जाती है अभी नहीं समझेंगे; परन्तु आगे चल

जरूर समझेंगे। उम्मीद रखनी चाहिए ना। उम्मीद रखना माना ही सर्विस का शौक है।

थकना नहीं है। भल र्कोइ चढ़कर फिर अधम बना है, आता है तो जरूर उनको विजि़ट

रूम में बिठावेंगे वा कहेंगे चले जाओ? जरूर पूछेंगे इतने दिन नहीं आये? कहेंगे माया से

हराये लिया था। ऐसे ढेर आते हैं। समझते हैं ज्ञान बहुत अच्छा था; परन्तु माया ने हराये

लिया। स्मृति तो रहती है ना। भक्ति में तो हराने और जीत पाने की तो बात ही नहीं।

यह नॉलेज धारण करनी है। इनका नाम कुछ रख नहीं सकते हैं; परन्तु धर्म है इसलिये

गीता पुस्तक रचा हुआ है। एक गीता ही ज्ञान का पुस्तक है; परन्तु वह भी झूठी होने

कारण भक्ति के लाइन में आ गया। वास्तव में गीता शास्त्र की भी दरकार नहीं। झूठी

गीता क्या काम की। हाँ, र्कोइ संस्कृत में गीता कंठ कर लेते हैं तो फिर भक्तलोग

सुनकर खुश होते हैं। कुछ पैसे भी दे देते हैं। गीता है नम्बरवन। गीता वास्तव में

ब्राह्मण ही पढ़ते हैं। तुम ब्राह्मण हो ना। तुम्हारा गीता पर हक है। सीखते भी ब्राह्मण

हैं। जबतक ब्राह्मण न बने हैं तब तक देवता बन न ..... क्रिश्यचन, पारसी, मुसलमानों

आदि में ब ्राह्मण थोड़े ही होते हैं। ब्राह्मण ब्रह्मा के बच्चे पढ़ते हैं। यह सभी तुम अभी

समझते हो। तुम जानते हो अलफ को याद करना है। अलफ को याद करने से ही बे

बादशाही मिलती है। जब भी कोई तुमको मिले बोलो, अलफ अल्ला बाप को याद करो।

अलफ को ही ऊंच कहा जाता है। अंगुली से अलफ का इशारा करते हैं। सीधा ही सीधा

अलफ है। अलफ को एक भी कहा जाता। एक ही भगवान है। बाकी तो सभी हैं बच्चे।

बाप तो सदैव अलफ ही रहते हैं। बे नहीं बनते। बे ऐसे मुड़ता है ना। तो नीचे बादशाही

में नहीं आते हैं। ज्ञान भी देते हैं, अपना बच्चा भी बनाते हैं। तुम बच्चों को कितना खुशी

में रहना चाहिए। बाबा हमारी कितनी सेवा करते हैं। हमको विश्व का मालिक बनाते हैं।

फिर खुद उस पवित्र नई दुनियां में आते ही नहीं। पावन दुनियां में उनको कोई बुलाते

ही नहीं। पतित ही बुलाते हैं। पावन दुनियां में आकर क्या करेंगे। इसका नाम ही है

पतित-पावन। तो पुरानी दुनियां को नई बनाने की उनकी ड्युटी है। बाप का नाम है

शिव और शालीग्राम बच्चों को कहा जाता है। उनकी भी पूजा होती है; परन्तु पूजा करने

वालों को कुछ भी पता नहीं है। बस एक रसम रिवाज है। पूजा होनी चाहिए। देवियों की

तो बहुत फस्र्ट क्लास हीरे मोतियों के महल आदि बनाते हैं। पूजा करते हैं। वह तो लिंग

मिट्टी का बनाया और तोड़ा। वह बनाने में कोई मेहनत नहीं लगती है। देवियों को

सजाने में बहुत मेहनत लगती है। उनकी पूजा में भी मेहनत नहीं। मुफ्त में मिलता है।

पत्थर पानी में घिस2 कर गोल बन जाते हैं। पूरा अण्डा बना देते हैं। कहते भी हैं ना

अण्डे मिसल आत्मा है जो ब ्रह्मतत्व में रहती है। इसलिये उनको कहते हैं ब्रह्माण्ड।

अण्डों की रहने जगह। तुम ब्रह्माण्ड के भी मालिक बनते हो विश्व के, भी मालिक बनते

हो। तो पहले-पहले समझानी देनी है बाप की। शिव को बाबा कह सभी याद करते हैं। दूसरा

ब्रह्मा को भी बाबा कहते हैं। प्रजापिता है तो सारी प्रजा हुई ना। ग्रेट-ग्रेट ग्रेन्ड फादर है।

यह सारा ज्ञान तुम बच्चों की बुद्धि में अभी है। प्रजापिता ब्रह्मा कहते तो बहुत हैं; परन्तु

यथार्थ रीति जानते नहीं। ब्रह्मा किसका बच्चा है। तुम कहेंगे परमपिता परमात्मा शिव ने

इनको एडॉप्ट किया है। यह तो शरीरधारी है ना। ईश्वर के औलाद सभी आत्माएं हैं।

फिर शरीर मिलता है तो प ्रजापिता ब्रह्मा एडॉप्शन कहते हैं। वह एडाप्शन नहीं है।

आत्माओं को परमपिता परमात्मा ने एडाप्ट किया। नहीं। तुमको एडाप्ट किया है। तुम हो

ब्रह्माकुमार-कुमारियां। शिवबाबा एडाप्ट नहीं करते हैं। सभी आत्माएं अनादि अविनाशी

हैं। सभी आत्माओं को अपना-अपना शरीर, पार्ट मिला हुआ है, जो बजाना ही है। यह अनादि

परंपरा से चला आता है। उनकी आदि, अन्त नहीं कहा जाता। अच्छा, मीठे-मीठे रूहानी

बच्चों को रूहानी बाप दादा का यादप्यार गुडमॉर्निंग और नमस्ते।