Avyakt murli du jeudi 19 avril 1973
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19-04-73 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
प्रत्यक्षता का पुरूषार्थ
निकृष्ट से श्रेष्ठ तथा भाग्यहीन से भाग्यवान् बनाने वाले शिवबाबा बोले
क्या आप अपने को बापदादा के समीप रहने वाले पद्मापद्म भाग्यशाली, श्रेष्ठ आत्माएं समझते हो? जो जिसके समीप रहने वाले होते हैं, उन में समीप रहने वाले के गुण स्वतः और सहज ही आ जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संग का रंग अवश्य लगता है। तो आप आत्माएं,जो सदा बापदादा के समीप अर्थात् श्रेष्ठ संग में रहती हो, उन के गुण व संस्कार तो अवश्य बापदादा के समान ही होंगे?निरन्तर श्रेष्ठ संग में रहने वाले आप वत्स अपने में सदैव वह रूहानी रंग लगा हुआ अनुभव करते हो? क्या आप वत्स स्वयं को हर समय रूहानी रंग में रंगी हुई आत्माएं समझते हो? जैसे स्थूल रंग स्पष्ट दिखाई देता है, वैसे ही कुसंग में रहने वाली आत्माओं का मायावी रंग भी छिप नहीं सकता। बोलो,दिखाई देता है ना?
वत्सों ने सिर हिला कर कहा - हाँ।
तब वैसे ही श्रेष्ठ संग में रहने वालों का रूहानी रंग भी सभी को दिखाई देना चाहिए। कोई भी देखे तो उनको यह मालूम हो कि यह रूहानी रंग में रंगी हुई आत्माएं हैं। ऐसे सभी को मालूम होता है या अभी गुप्त हो? यह रूहानी रंग गुप्त ही रहना है क्या? प्रत्यक्ष कब होना है?क्या अन्त में प्रत्यक्ष होंगे? वह डेट कौन-सी होगी? अन्त की डेट सभी की प्रत्यक्षता के आधार पर है। ड्रामा प्लान अनुसार आप श्रेष्ठ आत्माओं के साथ पश्चाताप का सम्बन्ध है। जब तक पश्चाताप न किया है तब तक मुक्तिधाम जाने का वरसा भी नहीं पा सकते। इसीलिए जो निमित्त बनी हुई हैं उन से ही तो पूछेंगे ना?निमित्त कौन है? आप सभी हो ना? अभी अपने ही आगे अपने सम्पूर्ण स्टेज प्रत्यक्ष नहीं है तो औरों के आगे कैसे प्रत्यक्ष होंगे?क्या अपनी सम्पूर्ण स्टेज आप को श्रेष्ठ दिखाई देती है वह हाथ उठाओ। वास्तव में सम्पूर्ण स्टेज तो नॉलेज से सभी जानते हैं। लेकिन अपने-आप को क्या समझते हो? समीप के हिसाब से उस समान बनेंगे ना? तो अपनी सम्पूर्ण स्टेज दिखाई देती है?
मैं कौन हूँ? यह पहेली हल नहीं हुई है क्या?कल्प पहले मैं क्या थी,वह अपनी सम्पूर्ण स्टेज भूल गये हैं क्या? औरों को तो 5000वर्ष की बात पहले याद दिलाती हो। पहले-पहले जब आते हैं तो पूछती हो ना कि पहले कभी मिले थे? जब औरों को कल्प पहले वाली बातें याद दिलाती हो तो याद दिलाने वालों को अपने-आप की तो याद होगी ना?दर्पण स्पष्ट नहीं है? जब दर्पण स्पष्ट होता है और पॉवरफुल होता है तो जो जैसा है वह वैसे ही दिखाई देता है। आप विशेष आत्माएं और सर्व श्रेष्ठ आत्माएं क्या अपनी श्रेष्ठ स्टेज को देख नहीं पातीं?इतनी ही देरी है, विनाश के आने में,जब तक आप निमित्त बनी हुई आत्माओं को अपने सम्पूर्ण स्टेज का स्पष्ट साक्षात्कार हो जाए। अब बताओ विनाश में कितना समय है? जल्दी होना है कि देरी है?
आज सद्गुरूवार है ना? तो आज वतन में रूह-रिहान चल रही थी। कौनसी रूह-रिहान? वर्तमान स्टेज कहाँ तक नम्बरवार पुरूषार्थियों की चल रही है?इसमें रिजल्ट क्या निकली होगी?पहले प्रश्न की रिजल्ट में मैजारिटी 50% से ज्यादा नहीं निकले। वह पहला प्रश्न कौन-सा?इस वर्ष का जो महत्व सुनाया था और डायरेक्शन दिया था कि यह वर्ष विशेष रूप में याद की यात्रा में रहना है वा अव्यक्त स्थिति में स्थित रहते हुए वरदान प्राप्त करने हैं? तो डायरेक्शन प्रमाण जो वर्ष के आदि में अटेन्शन और स्थिति रही वह अभी है? जो अव्यक्त वातावरण व रूहानी अनुभव पहले किये क्या वही रूहानी स्थिति अभी है?स्टेज में व अनुभव में फर्क है? जैसे सभी सेवा-केन्द्रों का आकर्षणम य,वातावरण,जो आप सभी को भी आकर्षण करता रहा, वही क्या सर्विस करते हुए नहीं बन सकता है?इस प्रश्न के रिजल्ट में सुनाया कि 50% भी रिजल्ट नहीं था।
दूसरे प्रश्न में रिजल्ट 60% ठीक थी। वह कौन-सा प्रश्न? सर्विस की रिजल्ट वा उमंग उत्साह में रिजल्ट बहुत अच्छी है। लेकिन बैलेन्स कहाँ है? अगर बैलेन्स ठीक रखो तो बहुत शीघ्र ही मास्टर सक्सेसफुल हो कर अपनी प्रजा और भक्तों को ब्लिस (Bliss)देकर इस दुःख की दुनिया से पार कर सकेंगे। अभी भक्तों की पुकार स्पष्ट और समीप नहीं सुनाई देती है क्योंकि आपको स्वयं ही अपनी स्टेज स्पष्ट नहीं हैं। यह है दूसरे प्रश्न की रिजल्ट।
तीसरा प्रश्न है, सम्पर्क वा सम्बन्ध में स्वयं अपने आप से सन्तुष्ट वा अन्य आत्माएं कहाँ तक सन्तुष्ट रहीं,सर्विस में वा प्रवृत्ति में। सेवा-केन्द्र भी प्रवृत्ति है ना? तो प्रवृत्ति में व सर्विस में सन्तुष्टता कहाँ तक रही? इसमें माइनॉरिटी पास हैं। मैजॉरिटी 50-50 है। अभी है,अभी नहीं है। आज है, कल नहीं है। इसको50-50 कहते हैं। इन तीनों प्रश्नों से चलते हुए वर्ष की रिजल्ट स्पष्ट है ना?सुनाया था कि इस वर्ष में विशेष वरदान ले सकते हो? लेकिन एक मास ही वरदानी-मास समझ अटेन्शन रखा। अब फिर धीरे-धीरे समयानुसार वरदानी-वर्ष भूलता जा रहा है।
इसलिए जितना ही इस वरदानी वर्ष में वरदान लेने की स्मृति में रहेंगे तो सहज वरदान भी प्राप्त होंगे, और यदि विस्मृति हुई तो विघ्नों का सामना भी बहुत करेंगे। इसलिए चारों ओर सर्व ब्राह्मण परिवार की आत्माओं के आगे सर्वप्रकार के विघ्नों को मिटाने के लिए जैसे पहले मास में याद की वा लगन की अग्नि को प्रज्वलित किया वैसे ही अभी ऐसा ही अव्यक्त वातावरण बनाना। एक तरफ वरदान दूसरी तरफ विघ्न। दोनों का एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध है। सिर्फ अपने प्रति विघ्न-विनाशक नहीं बनना है। लेकिन अपने ब्राह्मण-कुल की सर्व-आत्माओं के प्रति विघ्न-विनाश करने के लिए सहयोगी बनना है ऐसी स्पीड तेज करो। बीच-बीच में चलते-चलते स्पीड ढीली कर देते हो। इसलिए प्रत्यक्षता होने में भी ड्रामा में इतनी देर दिखाई दे रही है। तभी तो स्वयं को भी प्रत्यक्ष कर सकेंगे। अपने में सर्वशक्तिवान का प्रत्यक्ष रूप अनुभव करो। एक दो शक्ति का नहीं,सर्वशक्तिवान् का। मास्टर सर्वशक्तिवान् हो, न कि दो चार शक्तिवान् की सन्तान हो? सर्वशक्तिवान् को प्रत्यक्ष करो। अच्छा।
मास्टर ब्लिसफुल, मास्टर नॉलेजफुल, मास्टर सक्सेसफुल,सर्व श्रेष्ठ, सदा रूहानी संग के रंग में रहने वाले विशेष आत्माओं को याद-प्यार और नमस्ते।
इस मुरली की विशेष बातें
जैसे कुसंग में रहने वाली आत्माओं का मायावी रंग छिप नहीं सकता वैसे ही श्रेष्ठ संग में रहने वाली आत्माओं का रूहानी रंग भी दिखाई देना चाहिए। कोई भी देखे तो उनको यह मालूम हो कि ये रूहानी रंग में रंगी आत्माएं हैं।