Avyakt murli du dimanche 14 juillet 1974
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14-07-74 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
बाप के समान सफलता-मूर्त्त बनने के लिए सर्व के प्रति शुभ भावना
सफलता के सितारे बनाने वाले तथा सम्पूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति कराने वाले हर आत्मा के शुभ चिन्तक शिव बाबा ने ये मधुर महावाक्य अपनी धरती के रूहानी सितारों रूपी बच्चों के सम्मुख उच्चारे:-
आज इस सभा के बीच, बाप-दादा तीन प्रकार के सितारे देख रहे हैं। ज्ञान-सितारे तो आप सभी हो परन्तु ज्ञान सितारों में भी तीन प्रकार कौन-कौन से हैं? एक हैं सफलता के सितारे, दूसरे हैं लक्की सितारे और तीसरे हैं उम्मीदों के सितारे। हरेक सितारे की, अपनी-अपनी दुनिया है। क्या आप सभी ने अपनी-अपनी दुनिया देखी है या सिर्फ अपने आप को ही देखा है? दुनिया अर्थात् रचना। क्या आपको, अपनी रचना दिखाई देती है?क्या जानते हो कि रचना में कितनी और क्या-क्या बातें देखी जाती हैं? आप अपनी रचना को तो देखते होंगे ना? जो बाप की रचना,सो आपकी रचना। आप तो मास्टर रचयिता हो ना?आपने बाप की प्रजा पर ही तो राज्य नहीं करना है ना?आप मास्टर रचयिता नहीं बनते हो क्या?सदा रचना ही रहेंगे क्या?रचना अर्थात् अपनी राजधानी तो बना रहे हो ना? राजधानी में भी नम्बरवार तो होते हैं ना?वह भी किस आधार से होते हैं और उनमें भी,आपके ही भक्त हैं। शक्तियों के भक्त और बाप के भक्त अलग-अलग हैं।
आपके भक्त कौन बनेंगे, किस हिसाब से आपके भक्त बनेंगे?जिन आत्माओं को,जिन श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा व निमित्त बनी हुई आत्माओं द्वारा कुछ-न-कुछ प्राप्ति का अनुभव होता है,उन द्वारा कोई साक्षात्कार होता है और या कोई वरदान प्राप्ति का अनुभव होता है, तो उस आधार पर, वह उनकी प्रजा और भक्त बनते हैं। जो समीप आत्माएं होती हैं; जिन आत्माओं का,बाप से सम्बन्ध भी जुट जाता है और साथ-साथ बाप द्वारा वर्से के अधिकारी भी बनते हैं, वे रॉयल फेमिली में आते हैं। एक ही समय में,हरेक आत्मा,अपनी रॉयल फेमिली बना रही है अर्थात् वह भविष्य सम्बन्ध व राजघराना भी बना रही है;प्रजा भी बना रही है और भक्त भी बना रही है। भक्तों और प्रजा की निशानी क्या होगी? राज्य के सम्बन्ध में आने की बात तो सुनाई,परन्तु प्रजा और भक्त इन दोनों में अन्तर क्या होगा?प्रजा केवल ज्ञान और योग की प्राप्ति करने की पुरुषार्थी होगी, वह सम्बन्ध में समीप नहीं होगी, लेकिन दूर के सम्बन्ध में जरूर होगी। वह मर्यादा पूर्वक जीवन बनाने में, यथायोग्य तथा यथा-शक्ति पुरुषार्थी होगी, बाकी और भी जो दूसरे सब्जेक्ट्स हैं-धारणा और ईश्वरीय सेवा- उनमें भी यथा-शक्ति सहयोगी होगी,लेकिन सफलतामूर्त नहीं होगी। इसीलिये वह सोलह कला सम्पूर्ण नहीं बन पाती। कोई-न-कोई संस्कार व स्वभाव के वशीभूत होने के कारण, निर्बल आत्मा हाईजम्प नहीं दे सकती। इसलिये रॉयल परिवार में व राजकुल में आने के बजाय वह रॉयल प्रजा बन जाते हैं। रॉयल कुल नहीं,रॉयल प्रजा बाकि भक्त जो होंगे, वह कभी भी, स्वयं को अधिकारी अनुभव नहीं करेंगे। उनमें अन्त तक,भक्तपने के संस्कार रहेंगे और वे सदा मांगते ही रहेंगे-आशीर्वाद दो, शक्ति दो,कृपा करो,बल दो, या दृष्टि दो आदि। ऐसे माँगने के संस्कार व आधीन होने के संस्कार उनके लास्ट तक दिखाई देंगे। वे सदैव जिज्ञासु रूप में ही रहेंगे। उन्हें बच्चेपन का नशा मालिकपन का नशा, और मास्टर सर्वशक्तिमान् का नशा धारण कराते भी वे धारण नहीं कर सकेंगे। वे थोड़े में ही राज़ी रहने वाले होंगे-यह है भक्तों की निशानी। अभी इससे देखो कि प्रजा और भक्त कितने बने हैं?भक्त कभी भी डायरेक्ट बाप के कनेक्शन में आने की शक्ति नहीं रखते, वे सदा आत्माओं के सम्बन्ध में ही संतुष्ट रहते हैं। उनके बार-बार यही बोल रहेंगे, आप ही हमारे लिए सब-कुछ हो, आपके पास ऐसे भक्त भी आवेंगे। न चाहते हुए भी हरेक निमित्त बनी हुई आत्माओं की प्रजा और भक्त बनते ही रहते हैं। अब समझा! आपकी दुनिया व रचना क्या है? आगे चलकर हरेक को यह साक्षात्कार भी होगा कि मैं किस राजधानी में राज्यपद पाने वाली हूँ या पाने वाला हूँ।
अच्छा, यह तो हुई सितारों की दुनिया अर्थात् उनकी रचना। सितारों में,पहले नम्बर सितारे हैं-सफलता के सितारे। सफलता के सितारों की निशानी क्या है कि जिससे कि स्वयं को चैक कर सको कि मैं सफलता का सितारा हूँ या होवनहार सितारा हूँ? लक्की सितारों की निशानी और उम्मीदवार सितारों की निशानी क्या है? अपने आप को जानते हुए भी, बाप-दादा नॉलेज के दर्पण द्वारा तीन स्टेजिस का साक्षात्कार कराते हैं। साक्षात्कार करना तो सब चाहते हो ना?दिव्य- दृष्टि से नहीं, तो नॉलेज के दर्पण द्वारा तो कर सकते हो ना? सफलता के सितारों की निशानी यह है कि उनके हर संकल्प में दृढ़ता होगी की सफलता अनेक बार हुई है और अभी भी हुई पड़ी है। होनी चाहिए, होगी या नहीं होगी यह स्वप्न में भी कभी उनकी स्मृति में नहीं आयेगा। बल्कि उन्हें शत-प्रतिशत निश्चय होगा कि सफलता हमारी हुई ही पड़ी है। उनके हर बोल की यह विशेषता होगी-कि वे हर बात में निश्चय-बुद्धि होंगे और उनके बोल में, ईश्वरीय सन्तान की खुमारी दिखाई देगी अर्थात् उनमें ईश्वरीय नशा दिखाई देगा। उनमें देह-अभिमान का नशा नहीं दिखाई पड़ेगा। उनके बोल द्वारा संशय बुद्धि वाला भी, निश्चय बुद्धि हो जायेगा; क्योंकि उन्हें एक तो ईश्वरीय खुमारी होती है और दूसरा उनका हर बोल शक्तिशाली होता है। उनके बोल साधारण व व्यर्थ नहीं होते और उनका हर कर्म तो श्रेष्ठ होता ही है, लेकिन उनमें विशेषता यह होगी कि उनके हर कर्म द्वारा,अनेक आत्माओं का पथ-प्रदर्शन होगा। जो गायन भी है कि जैसे कर्म हम करेंगे, हमको देख और सभी करेंगे ऐसे उनके हर कर्म,अनेक आत्माओं को,एक पाठ पढ़ाने के निमित्त बन जावेंगे और उनका हर कर्म शिक्षा-स्वरूप होगा। इसको ही कहा जाता है-समर्थ-कर्म। ऐसे संकल्प,बोल और कर्म वाला ही हर बात में सदा स्वयं से सन्तुष्ट होगा। सन्तुष्ट होने के कारण ही वह हर्षित भी होगा लेकिन उसे हर्षित बनाना नहीं पड़ेगा बल्कि वह स्वतः ही सदा हर्षित होगा।
ऐसे सफलतामूर्त से अन्य आत्मायें भी सदा संतुष्ट रहेंगी अर्थात् उन सर्व की संतुष्टता की सफलता, प्रत्यक्ष फल के रूप में दिखाई देगी। भविष्य फल नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष फल ऐसे सदा हर्षित आत्मा को देख कर, अन्य आत्मायें भी,उनके प्रभाव से, दुःख व उलझन की लहर से बदल कर हर्षित हो जावेंगी। अर्थात् ऐसी आत्मा के सम्पर्क में और उसके समीप आने से अन्य आत्माओं पर भी हर्ष का प्रभाव पड़ जायेगा। जैसे सूर्य के समीप व सम्मुख जाने वाले के ऊपर, न चाहते भी किरणें पड़ती रहती हैं। ऐसे ही सफलतामूर्त के हर्ष की किरणें,अन्य आत्माओं पर भी पड़ती हैं अर्थात् जैसे कि बाप के संग का रंग,एक सेकेण्ड में अनुभव करते हो। अर्थात् जब योग-युक्त होते हो तो बाप का संग लगता है तो उसके रंग का अनुभव होता ना? ऐसे ही सफलता के सितारों के संग का रंग,अन्य आत्माओं को भी अनुभव होता है। यह है सफलतामूर्त व सफलता के सितारों की निशानी।
दूसरे हैं लक्की सितारे । उसकी निशानी क्या होगी? लक्की सितारे विशेष रूप से बाप के स्नेही, बाप के चरित्र, बाप के सर्व-सम्बन्धों के रस में ज्यादा मग्न रहते हैं। उनके संकल्प भी ज्यादा शक्तिशाली नहीं, लेकिन स्नेही होंगे। उनकी स्मृति रूप में भी बाप के मिलन और बाप के चरित्रों का ज्यादा वर्णन रहेगा। उनकी बीज रूप स्टेज कम रहेगी, लेकिन अव्यक्त मिलन,अव्यक्त स्थिति और स्नेह भरी रूह रूहान इसमें वे ज्यादा रहेंगे। ऐसी आत्माओं को स्नेह के कारण और संग तोड़,एक संग सर्व-सम्बन्ध निभाने के कारण ही सहयोग प्राप्त होता है। उन्हें बाप के सहयोग के कारण मेहनत कम करनी पड़ती है और प्राप्ति अधिक होती है। वह सदैव ऐसा अनुभव करते हैं कि मेरा लक्क अच्छा है;मुझे बाप की एकस्ट्रा मदद है और मैं तो पार हो ही जाऊंगी। मेरे जैसा स्नेह किसी का भी नहीं है। सहयोग होने के कारण, उनके बोल फलक के होते हैं। पहले नम्बर वाले में झलक होती है, दूसरे नम्बर वाले में झलक नहीं बल्कि फलक होती है। वह बाप समान होते हैं और यह बाप स्नेही होते हैं। लेकिन सहयोग क्यों और किस आधार पर मिला या वे लक्की भी क्यों बने? इसका मूल आधार, सर्व-सम्बन्ध तोड़ एक संग जोड़ना,इस सम्बन्ध में वे अटूट और अटल हैं। इस कारण उनको लक्की कहा जाता है। सफलतामूर्त के बोल होंगे,यह तो हुआ ही पड़ा है और लक्की सितारों के बोल होंगे, हाँ मैं समझता हूँ यह अवश्य होगा,बाप मददगार बनेगा-यह है दूसरी स्टेज।
तीसरे हैं उम्मीदवार सितारे। ऐसी आत्मायें, सदा सफलता प्राप्त न होने के कारण,उम्मीद रखती हैं, कि करूँगा जरूर,पहुँचूँगा जरूर वा बनूंगा जरूर;लेकिन बीच-बीच में कही रूकते भी है, अटकते भी हैं और कभी-कभी वे दिलशिकस्त भी होते हैं। अनेक प्रकार के, भिन्न-भिन्न विघ्न आने के कारण, कभी वे घबराते हैं और कभी वे महावीर बन जाते हैं। कभी बाप के मिलन का उन्हें नम्बर मिलता है और कभी उन्हें मेहनत के बाद मिलता है। इसलिए उनका तीसरा नम्बर कहलाया जाता है। वह सदा हर्षित नहीं रहेगा और वह सदा संतुष्ट भी नहीं रहेगा। लेकिन, उम्मीद कभी नहीं छोड़ेगा। वह इस निश्चय से भी कभी डगमग नहीं होंगे, कि मैं बाप का हूँ। लेकिन निर्बल होने के कारण, वे कभी-कभी दिलशिकस्त हो जाते हैं। यह हैं उम्मीदवार सितारे, समझा! अब अपने ज्ञान-दर्पण में देखना है कि मैं कौन हूँ यही पहेली हल करने आये थे ना? और अब अन्त में भी यही पहेली हल करनी है कि मैं कौन हूँ?लक्ष्य सफलता का सितारा बनने का रखना है;क्योंकि बाप-समान बनना है। सिर्फ बाप स्नेही बनने से खुश नहीं रहना है।
बाप-समान बनाने के लिये व सफलतामूर्त बनने के लिये, आज आपको दो बातें सिर्फ दो शब्दों में सुनाते हैं। दो शब्द धारण करना तो सहज है ना? सदैव सर्व-आत्माओं के प्रति, सम्पर्क में आते हुए,सम्बन्ध में आते हुए और सेवा में आते हुए अपनी शुद्ध भावना रखो। शुभ भावना और शुद्ध कामना। चाहे आपके सामने कोई भी परीक्षा का रूप आवे और चाहे डगमग करने के निमित्त बन कर आवे लेकिन हरेक आत्मा के प्रति आप शुभ कामना, और शुद्ध भावना यह दो बातें हर संकल्प, बोल और कर्म में लाओ, तो आप सफलता के सितारे बन जायेंगे। यह तो सहज है ना?ब्राह्मणों का यही धर्म और यही कर्म है। जो धर्म होगा वही कर्म होगा। बाप की हर बच्चे के प्रति यही शुभ कामना और शुद्ध भावना है कि वह बाप से भी ऊंच बने। इस कारण जब छोटी-छोटी बातें देखते व सुनते हैं, तो समझते है कि अब उसी घड़ी से सब सम्पन्न हो जावें। मास्टर सर्वशक्तिमान् यदि वे दृष्टि व वृत्ति की बात कहें तो क्या शोभता है?अर्थात् सर्वशक्तिमान् बाप के आगे,मास्टर सर्वशक्तिमान् कमजोरी की बातें करते हैं तो इसलिए अब बाप इशारा देते हैं कि अब मास्टर बनो,क्योंकि स्वयं को बनाकर फिर विश्व को भी बनाना है। समझा!
ऐसे समझदार बच्चे, सुनना और करना समान बनाने वाले,हर संकल्प व हर बोल में बाप-दादा को फॉलो करने वाले, सफलता के सितारे लक्की और उम्मीदवार सितारे, लक्ष्य को सम्पूर्ण पाने के अधिकारी बच्चों को बाप-दादा का याद प्यार, गुडनाइट और नमस्ते।
इस मुरली का सार
1. जो समीप की आत्माएं होती हैं; जिन आत्माओं का बाप से सम्बन्ध भी जुट जाता है और साथ-साथ वर्से के अधिकारी भी बनते हैं वे रॉयल फेमिली अर्थात् राज परिवार में आते हैं।
2. प्रजा ज्ञान-योग की पुरुषार्थी होगी, लेकिन वह सम्बन्ध में समीप नहीं होगी। धारणा एवं ईश्वरीय सेवा में यथा-शक्ति सहयोगी होगी,किन्तु सफलतामूर्त नहीं होगी और वह किसी संस्कार व स्वभाव के वशीभूत होगी।