Avyakt murli du samedi 13 septembre 1975
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13-09-75 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
विश्व-परिवर्तन ही ब्राह्मण जीवन का विशेष कर्त्तव्य है
विश्व-परिवर्तक, विश्व-कल्याणकारी,सदा साक्षी स्वरूप शिव बाबा विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बच्चों को देख बोले -
विश्व का रचयिता बाप आज अपने सहयोगी विश्व-परिवर्तक श्रेष्ठ आत्माओं को देख रहे हैं। जैसे बाप विश्व को परिवर्तन करने के लिए निमित्त हैं, वैसे ही आप सब भी सदा अपने को इसी कार्य के निमित्त समझ चलते हो? सदा यह स्मृति कायम रहती है कि मुझे परिवर्तन करना है? विश्व को परिवर्तन करने वाले पहले स्वयं को परिवर्तन करते हैं। जो स्वयं का परिवर्तन किसी भी बात में नहीं कर पाते,वे विश्व के परिवर्तन का कार्य करने अर्थ निमित्त कैसे बन सकते हैं? अभी-अभी बापदादा डायरेक्शन दें कि एक सेकेण्ड में अपनी स्मृति को परिवर्तन कर लो, अर्थात् स्वयं को देह नहीं आत्मा के स्वरूप में स्थित होकर देखो, तो स्वयं की स्मृति को एक सेकेण्ड में परिवर्तन कर सकते हो? ऐसे ही अपनी वृत्ति को सेकेण्ड में परिवर्तन कर सकते हो? अपने स्वभाव और संस्कार को सेकेण्ड में परिवर्तन कर सकते हो?अपनी आत्मा के किसी भी सम्पर्क को सेकेण्ड में परिवर्तन कर सकते हो?अपने सेकेण्ड के संकल्प को सेकेण्ड में,व्यर्थ से समर्थ में परिवर्तन कर सकते हो?अपने पुरूषार्थ की रफ्तार को सेकेण्ड में साधारण से तीव्र कर सकते हो? अपने को सेकेण्ड में साकार वतन से पार निराकारी परमधाम के निवासी बना सकते हो?इसको कहा जाता है - परिवर्तन शक्ति। संगमयुग पर विशेष खेल ही परिवर्तन का है। जैसे और शक्तियाँ स्वयं में चेक करते हो वैसे ही परिवर्तन करने की शक्ति इन सब बातों में कहाँ तक आयी है, यह चेक करते हो? पुरूषार्थ में विघ्न रूप,परिवर्तन की शक्ति की कमी है।
सर्व प्राप्ति का आधार परिवर्तन शक्ति है। स्वयं का परिवर्तन न कर सकने के कारण जितना ऊंचा लक्ष्य रखते हो उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हो। परिवर्तन करने की शक्ति न होने के कारण चाहते हुए भी, साधन अपनाते हुए भी,संग करते हुए भी, यथा-शक्ति नियमों पर चलते हुए भी और स्वयं को ब्राह्मण कहलाते हुए भी अपने-आप से संतुष्ट नहीं। एक परिवर्तन करने की शक्ति सर्व शाक्तिमान् बाप और सर्व श्रेष्ठ आत्माओं के समीप जाने का साधन बन जाती है। परिवर्तन शक्ति नहीं तो सदैव हर प्राप्ति से वंचित अपने को किनारे पर खड़ा हुआ अनुभव करेंगे। सब बातों में दूर-दूर देखने और सुनने वाला अपने को अनुभव करेंगे। सदा स्नेह, सहयोग और शक्ति के अनुभव करने के प्यासे रहेगे। अनेक प्रकार की स्वयं के प्रति इच्छाओं का व आशाओं का और कामनाओं का विस्तार तूफान के समान आता ही रहेगा। इस तूफान के कारण प्राप्ति की मंज़िल सदा दूर नजर आयेगी।
आज ऐसे विश्व-परिवर्तक बच्चों का दृश्य देखा। साकार दुनिया में पानी का तूफान आया हुआ है उसका नजारा सुनते रहते हो। सुनते हुए मजा आता है या रहम आता है या भय भी आता है? क्या होता है - कभी भय लगता, कभी रहम आता है?पाण्डवों को भय लगता है?रहम आता है या मजा आता है। भय तो होना न चाहिए। मैं फीमेल (कमज़ोर,बिना मेल के) हूँ, उस समय यह स्मृति भी राँग (गलत) है - अपने को अकेला कभी नहीं समझना चाहिए। अपने कम्बाइन्ड रूप शिव-शक्ति के रूप की स्मृति में रहना चाहिए। सिर्फ शक्ति भी नहीं-शिव शक्ति। कम्बाइन्ड रूप की स्थिति से जैसे स्थूल में दो को देखते हुए वार करने के लिए संकोच होता है - वैसे ही कम्बाइन्ड स्थिति का प्रभाव उस समय के प्रकृति और व्यक्ति के ऊपर पड़ेगा अर्थात् किसी भी प्रकार के वार करने में संकोच होगा। न सिर्फ व्यक्ति लेकिन प्रकृति का तत्व भी संकोच करेगा अर्थात् वह भी वार नहीं कर सकेगा। एक कदम की दूरी पर भी सेफ (सुरक्षित) हो जायेंगे। शस्त्र होते हुए भी,शस्त्र शक्तिवान् होते हुए भी निर्बल हो जायेंगे। लेकिन उस सेकेण्ड परिवर्तन करने की शक्ति यूज़ (प्रयोग) करो कि मैं अकेली नहीं,मैं फीमेल नहीं, शिव-शक्ति हूँ और कम्बाइन्ड हूँ। इसमें भी परिवर्तन शक्ति चाहिए ना? जो स्वयं की पॉवरफुल स्मृति और वृत्ति से व्यक्ति को व प्रकृति को परिवर्तन कर लें। अब तो यह दूसरी-तीसरी चौपड़ी या दूसरी-तीसरी क्लास के पेपर्स है। फाइनल (अन्तिम) पेपर की रूप-रेखा तो इससे कई गुना भयानक रूप की होगी। फिर क्या करेंगे। कइयों का संकल्प चलता है - कौन-सा ? कई स्नेह और हुज्जत में कहते हैं कि इस दृश्य के पहले ही हमको बुलाना, हम भी वतन से देखेंगे। लेकिन शक्ति स्वरूप का प्रैक्टिकल पार्ट व शक्ति अवतार की प्रत्यक्षता का पार्ट, स्वयं द्वारा सर्वशक्तिवान् बाप को प्रत्यक्ष करने का पार्ट ऐसी ही परिस्थिति में होना है। इसलिये ऐसे नजायें को, अकाले मृत्यु के नगाड़ों को देखने और सुनने के लिये परिवर्तन की शक्ति को बढ़ाओ। एक सेकेण्ड में परिवर्तन करो,क्योंकि खेल ही एक सेकेण्ड के आधार पर है।
ऐसे समय पर एक तरफ नाथिंग न्यू का पाठ भी याद रहना चाहिए - जिससे मिरूआं मौत मलूकाँ शिकार की स्थिति होगी तो साक्षीपन की स्थिति अर्थात् देखने में मजा भी आयेगा और साथ-साथ विश्व-कल्याणकारी की स्थिति जिसमें तरस भी होगा। दोनों का बैलेन्स (सन्तुलन) चाहिए। साक्षीपन की स्टेज भी और विश्व-कल्याणकारी स्टेज भी। समझा? यह तो हुआ-साकारी दुनिया का समाचार। आकारी वतन का समाचार क्या हुआ - जो पहले सुनाया कि परिवर्तन शक्ति की कमी होने के कारण जो अनेक प्रकार की कामनाओं के तूफान दिखाई देते हैं - उसके अन्दर मैजॉरिटी (अधिकांश) बच्चे नम्बरवार दिखाई देते हैं। उनकी पुकार क्या सुनाई देती है? - हम चाहते हैं, फिर क्यों नहीं होता? यह होना चाहिए-लेकिन होता नहीं-बहुत पुरूषार्थ कर लिया। ऐसी अनेक प्रकार की मन की आवाज सुनाई देती है। इसलिये-इस तूफान से निकलने का साधन परिवर्तन शक्ति को बढ़ाओ तो प्रत्यक्ष फल की प्राप्ति कर सकेंगे। सदैव यह स्मृति में रखो कि मैं बाप का सहयोगी, विश्व का परिवर्तन करने वाला - मैं हूँ ही विश्व-परिवर्तक। परिवर्तन करना ही मेरा कार्य है। अर्थात् इसी कार्य-अर्थ ही ब्राह्मण जीवन प्राप्त हुआ है। तो अपने निजी कार्य को स्मृति में रखते हुए चलो।
ऐसे हर संकल्प और हर सेकेण्ड बाप के साथ सहयोगी आत्मायें, प्रकृति और परिस्थिति व व्यक्ति को परिवर्तन करने वाले, सदा बाप-समान मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान में स्थित रहने वाले, स्वयं के प्रति और सर्व के प्रति सदा कल्याण की भावना रखने वाले, ऐसे विश्व-कल्याणकारी विश्व-परिवर्तक आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
इस मुरली का सार-तत्व
1. विश्व-परिवर्तन का कार्य सम्पन्न करने के लिए सबसे पहले स्वयं में सेकेण्ड में परिवर्तन करने की शक्ति की आवश्यकता है। स्वयं की पॉवरफुल स्मृति और वृत्ति से व्यक्ति व प्रकृति को परिवर्तन कर लो।
2. सर्व प्राप्तियों का आधार परिवर्तन शक्ति है। परिवर्तन करने की शक्ति सर्वशक्तिवान् बाप और सर्वश्रेष्ठ आत्माओं के समीप जाने का साधन बन जाती है।