Avyakt murli du jeudi 18 septembre 1975
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18-09-75 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
माया के चक्करों से परे, स्वदर्शन चक्रधारी ही भविष्य में छत्रधारी
निर्बल को महा बलवान बनाने वाले, माया के चक्करों से मुक्त करने वाले, रहम दिल व स्नेहमूर्त शिव बाबा स्वदर्शन चक्रधारी सो छत्रधारी बच्चों को देख बोले -
आज बापदादा सब ब्राह्मण बच्चों के वर्तमान और भविष्य दोनों को देख हर्षित हो रहे हैं। हर एक स्वदर्शन चक्रधारी सो छत्रधारी है। वर्तमान चक्रधारी और भविष्य में छत्रधारी। चक्रधारी नहीं तो छत्रधारी भी नहीं। जिन बच्चों का इस संगम युग का यह थोड़ा-सा अमूल्य समय, निरन्तर सदाकाल चक्र चलता रहता है अर्थात् अविनाशी चक्रधारी हैं,वही आत्मायें सदाकाल छत्रधारी बन सकती हैं। चक्रधारी बनने वाली आत्मा सदा माया अधिकारी होगी-माया अधिकारी आत्मायें ही बाप के बेहद वर्से की अधिकारी बनती हैं - अर्थात् स्वदर्शन चक्रधारी सो छत्रधारी बनती हैं। सदैव चक्र और छत्र दिखाई देता है?
चक्रधारी आत्मा की निशानी क्या दिखाई देगी? अपनी निशानी आप सबने देखी है?चक्रधारी अब भी लाइट के छत्रधारी दिखाई देंगे। चक्र की निशानी लाईट का चक्र दिखाई देगा। ऐसा चक्रधारी सदैव माया के अनेक प्रकार के चक्रों से मुक्त होगा। जैसे अपनी देह की स्मृति के अनेक व्यर्थ संकल्पों के चक्र से, लौकिक और अलौकिक सम्बन्धों के चक्र से, अपने अनेक जन्मों के स्वभाव और संस्कारों के चक्र से और प्रकृति के अनेक प्रकार के आकर्षण के चक्र से वह सदैव मुक्त होगा। सिवाय स्वदर्शन चक्र के वह और कोई चक्र में आ नहीं सकेगा। अन्य आत्माओं को भी बाप से प्राप्त हुई शक्तियों द्वारा अनेक चक्करों से सहज ही छुड़ा देगा।
माया के अनेक प्रकार के चक्करों की निशानी क्या होगी? जैसे चक्रधारी आत्मा लाइट के ताजधारी होंगी और बाप के वर्से की अधिकारी होंगी वैसे माया के अनेक प्रकार के चक्कर में आने वाले की निशानी क्या होगी? जैसे उनके सिर पर लाईट का ताज है, वैसे उनके सिर पर अनेक प्रकार के विघ्नों का बोझ होगा। ताज नहीं। सदैव किसी-न-किसी प्रकार का बोझ उनके सिर पर अर्थात् बुद्धि में महसूस होगा। ऐसी आत्मा सदैव कर्जदार और मर्जदार होगी - उनके मस्तक पर,मुख पर,सदैव क्वेश्चन मार्क होंगे। हर बात में क्यों, क्या और कैसे, यह क्वेश्चन्स होंगे। एक सेकेण्ड भी बुद्धि एकाग्र अर्थात् फुलस्टॉप में नहीं होगी। फुलस्टॉप की निशानी बिन्दी (.) होती है। अर्थात् मन्सा में भी बिन्दु स्वरूप की स्थिति नहीं होगी। वाचा और कर्मणा में भी बीती सो बीती,नाथिंग न्यू, जो होता है वह कल्याणकारी है, ऐसा फुलस्टॉप अर्थात् बिन्दी लगानी नहीं आयेगी। क्वेश्चन मार्क की निशानी देखने में भी टेढ़ी आती है फुलस्टॉप लिखना सहज है -फुलस्टॉप लिखने से क्वेश्चन मार्क लिखना जरा मुश्किल होता है। तो अनेक प्रकार के क्वेश्चन करना, चाहे स्वयं से अथवा दूसरों से या बाप से - यही निशानी है कि यह आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी सो छत्रधारी नहीं।
ऐसी आत्मा हर संकल्प में सदा स्वयं से भी क्वेश्चन करती रहेगी कि क्या मैं सफलता मूर्त्त बन सकती हूँ? मैं सर्व के सम्पर्क में सफलता प्राप्त कर समीप आत्मा बनूँगी? मैं सर्व के स्वभाव-संस्कारों में चल सकूँगी?सर्व को सन्तुष्ट कर सकूँगी?ऐसे अनेक प्रकार के क्वेश्चन स्वयं के प्रति भी होंगे और अन्य के प्रति भी होंगे। यह मेरे से ऐसे क्यों चलते,मुझे विशेष सहयोग क्यों नहीं मिलता - मेरा नाम, मेरा मान क्यों नहीं होता? इसी प्रकार के अन्य के प्रति क्वेश्चन होंगे। ऐसे ही बाप के प्रति भी क्वेश्चन होंगे। जब बाप सर्व शक्तिवान् है तो मेरी बुद्धि को क्यों नहीं पलटाते? नजर से निहाल करने वाले मेरी तरफ नजर क्यों नहीं रखते? जबकि बाप है तो जैसी भी हूँ,कैसी भी हूँ,उनकी ही हूँ,उनकी ज़िम्मेवारी है, मुझे पार कराना - जब दाता है तो मैं जो चाहती हूँ वह क्यों नहीं देता? त्रिकालदर्शी है, मेरे तीनों कालों को जानता है,तो मुझे स्वयं ही अपनी शक्ति से श्रेष्ठ पद क्यों नहीं दिलाता? ऐसी मीठी-मीठी शिकायतें बाप के आगे रखते हैं। एक तरफ जन्म-जन्म का बोझ, दूसरी तरफ बाप के बच्चे होने के नाते, बाप द्वारा प्राप्त हुए सर्व अधिकार का रिटर्न करने का फर्ज पालन न करने के कारण अथार्त् अपना फर्ज न पालन करने के कारण फर्ज के बजाय कर्ज बन जाता है। कर्ज का बोझ आत्मा की सर्व कमजोरियों के मर्ज के रूप ले लेता है। ऐसे डबल बोझ वाले स्वदर्शन चक्रधारी कैसे बन सकेंगे?
एक तो है चक्रधारी, दूसरे हैं बोझदारी। ऐसे बोझ वाली आत्मायें डबल लाइटधारी कैसे बनेंगी?इसलिये उनकी बार-बार एक ही आवाज निकलती है, कि अनुभव नहीं होता। सुनते भी रहते,चलते भी रहते लेकिन प्राप्ति की मंज़िल नजर नहीं आती है। बड़ा मुश्किल है - ऐसी आवाज बाप सुने और ऐसे बच्चों को देखे तो बाप क्या करेंगे?मुस्करायेंगे और क्या करेंगे? फिर भी रहमदिल बाप के सम्बन्ध के कारण बार-बार हिम्मत और उल्लास दिलाते रहते हैं कि तुम ही बच्चों ने अनेक बार विजय प्राप्त की है - हिम्मत आपकी,मदद बाप की। फिर भी चलते चलो। रूको नहीं। कल्प पहले मुआफिक फिर से विजयी बन जाओ। सिर्फ एक सेकेण्ड भी सच्चे दिलसे,सर्व सम्बन्धों से याद करो तो उस एक सेकेण्ड में मिलने की अनुभूति व प्राप्ति सारे दिन में बार-बार सब तरफ से दूर कर बाप तरफ आकर्षित करती रहेगी। भले कितने भी निर्बल हो - लेकिन एक सेकेण्ड की याद इतना तो कर सकते हैं?ऐसी निर्बल आत्माओं को एक सेकेण्ड की याद रखने की हिम्मत के रिटर्न (बदले,उत्तर) में बाप हजार गुना मददगार बनेंगे। इससे सहज और क्या करेंगे? या आपकी तरफ से योग भी बाप ही लगायें? नाज़ुक बच्चे हैं न?नाज़ुक बच्चे बाप से भी नाज करते हैं, इसलिए नाज-युक्त नहीं बनो-लेकिन राज-युक्त और युक्ति-युक्त बनो। समझा? अच्छा।
ऐसे चक्रधारी सो छत्रधारी स्वयं को और सब को निर्बल से महा-बलवान बनाने वाले, सर्व कमज़ोरियों की सेकेण्ड में संकल्प में बलि देने वाले, ऐसे महाबलि चढ़ाने वाले महाबलवान अर्थात् मास्टर सर्वशक्तियों को शस्त्र समान कर्त्तव्य में लाने वाले ऐसे कर्मयोगी,सहज योगी आत्माओं के प्रति बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
इस मुरली के विशेष ज्ञान-बिन्दु
1. जो मनुष्यात्मा वर्तमान संगमयुग के समय स्वदर्शन चक्रधारी है,वही आत्मा भविष्य में छत्रधारी अर्थात् राज्य का अधिकारी बन सकती है।
2. चक्रधारी आत्मा की निशानी यह है कि लाइट का चक्र दिखाई देगा। ऐसी आत्मा माया के अनेक प्रकार के चक्करों से मुक्त, प्रकृति के भिन्न-भिन्न प्रकार के आकर्षणों से परे, बिन्दु रूप में स्थित