Avyakt murli du mardi 30 septembre 1975
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30-09-75 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
सारे कल्प में विशेष पार्ट बजाने वाली श्रेष्ठ आत्माओं की विशेषताएँ
सर्व श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले, अपने ज्ञान के प्रकाश से चन्द्रमा (ब्रह्मा) को सोलह कला प्रकाशित करने वाले ज्ञान सूर्य शिव बाबा बोले -
स्वयं को सारे कल्प के अन्दर सर्व आत्माओं से श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाली विशेष आत्मायें समझते हो? आप विशेष आत्माओं की आदि से अन्त तक क्या-क्या विशेषतायें हैं व आपने कौन-सा विशेष पार्ट बजाया है, उसको जानते हो? एक होता है विशेष काम करने के कारण विशेष आत्मा कहलाना,दूसरा विशेष गुणों के प्रभाव के कारण विशेष आत्मा कहलाना, तीसरा पोजीशन व स्टेटस के कारण और चौथा सम्बन्ध और सम्पर्क द्वारा अनेकों को विशेष प्राप्ति कराने के कारण। इन सब विशेषताओं को सामने रखते हुए देखो कि यह चार प्रकार की विशेषतायें किस स्टेज तक और कितने परसेन्टेज में हैं।
सतयुग के आदि में आप विशेष आत्माओं की फर्स्ट स्टेज कौन-सी होती है, उनकी विशेषता आज के भक्त भी गाते रहते हैं - जिसमें सम्पन्न और सम्पूर्णता का गायन है वह तो सबकी स्मृति में है ना? अब आगे चलो। सतयुग के बाद कहाँ आते हो? - (त्रेता) वहाँ की विशेषता क्या है? वहाँ की विशेषता भी इतनी ही प्रसिद्ध है,कि जो आज के कलियुगी नेता उसी राज्य का स्वप्न देखते रहते कि ऐसा होना चाहिए। कोई भी प्लान सोचते हैं,तो भी आपकी सेकेण्ड स्टेज को अति विशेष समझते हुए उसे सामने रखते हैं। और आगे चलो त्रेता के बाद कहाँ आते हैं? (द्वापर) लेकिन द्वापर में भी कहाँ पहुँचे। द्वापर में भी राज्य सत्ता तो होती है ना?वहाँ धर्मसत्ता और राज्य सत्ता दो टुकड़ों में बट जाती है। इसलिए द्वापर हो जाता है। दो पुर हो गये ना?एक राज्य-सत्ता दूसरी धर्म सत्ता। फिर भी आप विशेष आत्माओं के विशेष संस्कार गायब नहीं होते। चाहे अन्य धर्म पिता, धर्म सत्ता के आधार से धर्म की स्थापना भी करते हैं लेकिन आपकी विशेषताओं का पूजन, गायन और वन्दन आरम्भ हो जाता है। यादगार फिर भी आप विशेष आत्माओं की ही बनायेंगे। गुणगान आप विशेष आत्माओं के ही होते हैं। राज्य सत्ता में भी राजाई ठाठ और राजाई पावर्स रहती है। आपकी विशेषताओं की यादगार में शास्त्र बन जाते हैं। अपनी विशेषतायें याद आती हैं?अच्छा, इससे आगे चलो। कहाँ पहुँचे? (कलियुग) वहाँ की विशेषता क्या है? आप विशेष आत्माओं के नाम से सब काम शुरू होते हैं। हर कार्य की विधि में आपकी विशेषताओं की सिद्धि सुमिरण होती रहती है। आपके नाम से अनेक आत्माओं का शरीर निर्वाह होता है। नाम की महिमा - यह कलियुग की विशेषता है। आपका नाम सब स्थूल-सूक्ष्म प्राप्तियों का आधार बन जाता है। क्या इस विशेषता को जानते हो? अच्छा फिर आगे चलो?कहाँ पहुँचे? (संगम) जहाँ हैं वहाँ पहुँच गये।
संगम युग की विशेषताओं को तो स्वयं अब अनुभव कर ही रहे हो। सारे कल्प की विशेषताओं को सदा स्मृति में रखते हुए सदा अलौकिक विचित्र रास करते रहते हो। गोप-गोपियों की रास तो प्रसिद्ध ही है। तो निरन्तर रास करते हो अथवा प्रोग्राम से? यह है हुल्लास का रास। लेकिन इस रास में सम्पूर्ण पूर्णमासी की रास प्रसिद्ध है। इसका रहस्य क्या है?पूर्णमासी अर्थात् उसमें सम्पूर्णतः की निशानी गाई हुई है। इस रास की विशेषतायें अब तक वर्णन करते रहते हैं। वह कौन-सी विशेषतायें?उस समय गोप-गोपियों की विशेषता क्या थी? आपकी ही बातें हैं ना? मुख्य विशेषता क्या थी, तीन बातें सुनाओ?एक विशेषता रात को दिन बनाया हुआ था। दिन अर्थात् हर एक गोप-गोपी के जीवन में सतोप्रधानता का सूर्य उदय था। लोगों के लिये कुम्भकरण के नींद की रात थी अर्थात् तमोप्रधानता थी। दूसरी विशेषता सारा समय जागती ज्योति थे। माया एक संकल्प-रूप में भी आ नहीं पाती थी। मायावी लोग अर्थात् माया मूर्छित थी और बेहोश थी। क्योंकि सर्व जागती ज्योति निरन्तर बाप के साथ लगन में मग्न थे। तीसरी विशेषता सर्व का हाथ में हाथ मिला हुआ था और ताल से ताल मिला हुआ था अर्थात् संस्कार मिले हुए थे। स्नेह और सहयोग का संगठन था। रास में सार्किल अर्थात् चक्र लगाते हैं ना?सार्किल अर्थात् चक्र - यह शक्ति स्वरूप प्रकृति और माया को घेराव डालने की व किले की निशानी है। यह है विशेषतायें इसलिये इस रास का विशेष महत्व गाया हुआ है। यह हुआ संगमयुग की विशेषताओं का गायन। तो ऐसी रास निरन्तर होनी चाहिए। कितनी बार यह रास की है? अनेक बार की हुई है,फिर कभी भूल क्यों जाते हो?जब संस्कार मिलाना अर्थात् ताल से ताल मिलाना,ऐसी कोई परिस्थिति आती है तो क्या कहते हो?उस समय भक्त अर्थात् कमज़ोर बन जाते हो। संस्कार मिलाना पड़ेगा,मरना पड़ेगा,झुकना पड़ेगा, सुनना पड़ेगा और सहन करना पड़ेगा - यह कैसे होगा? -ऐसे-ऐसे कहने से भक्त बनते हो। इसलिए अब उस भक्तपन के वंश के अंश को भी खत्म करो, तब ही इस रास मण्डल के अन्दर पहुँच सकेंगे। नहीं तो देखने वाले बन जायेंगे। जो करने में मजा है,वह देखने में नहीं। तो अपनी सर्व-विशेषतायें सुनी ना? ऐसी सर्वश्रेष्ठ आत्मायें हो?ऐसी सर्वश्रेष्ठ आत्माओं के लिये बापदादा को भी आना पड़ता है। अच्छा।
ऐसी विशेष आत्मायें जो बापदादा को भी मेहमान बनाने वाली है, ऐसी महान् आत्मायें जिन्हों का हर संकल्प अनेकों को महान् बनाने वाला है,ऐसी तकदीरवान जिनके मस्तक पर सदैव तकदीर का सितारा चमकता है और ऐसी पदमा-पदम भाग्यशाली आत्माओं के प्रति बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
राशि मिलने वाले ही मणके के दाने
ऐसे रास करने वाले तैयार हुए हैं? संस्कारों का मिलना अर्थात् रास से रास मिलना। रास में अगर कोई का हाथ ऊपर, कोई का हाथ नीचे होगा, तो रास में मजा नहीं आयेगा। रास अर्थात् राशि मिलना। जैसे कोई भी कनेक्शन जोड़ते हैं व मिलन करते हैं,तो राशि मिलाते हैं ना?अगर राशि नहीं मिलती तो जोड़ी नहीं मिलाते हैं। एक-दो में राशि मिलना अर्थात् स्वभाव, संस्कार,गुण और सेवा साथ-साथ मिलने में दिखाई दे। समान तो नहीं हो सकता। नम्बर तो होंगे लेकिन जरा-सा अन्तर जो न के बराबर दिखाई दे-ऐसी राशि मिलने वाले कितने तैयार हुए हैं?क्या आधी माला? जितने भी तैयार हुए हैं, होना तो है, हुई पड़ी है सिर्फ घूँघट के अन्दर है। अच्छा।