Avyakt murli du vendredi 28 janvier 1977

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28-01-77ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन

ब्राह्मणों का धर्म और कर्म

सर्व शक्तिवान, विश्व-परिवर्तक,विश्व-कल्याणकारी बाबा बोले :-

अपने को ब्रह्मा-मुखावंशावली ब्राह्मण समझते हो ना? ब्राह्मणों का धर्म और कर्म क्या है,वह जानते हो?धर्म अर्थात् मुख्य धारणा है - सम्पूर्ण पवित्रता। सम्पूर्ण पवित्रता की परिभाषा जानते हो? संकल्प व स्वप्न में भी अपवित्रता का अंशमात्र भी न हो? ऐसी श्रेष्ठ धारणा करने वाले ही सच्चे ब्राह्मण कहलाते हैं,इसी धारणा के लिए ही गायन है ‘प्राण जाएँ पर धर्म न जाएँ।’ ऐसी हिम्मत, ऐसा दृढ़ निश्चय करने वाले अपने को समझते हो?किसी भी प्रकार की परिस्थिति में अपने धर्म अर्थात् धारणा के प्रति कुछ त्याग करना पड़े, सहन करना पड़े, सामना करना पड़े, साहस रखना पड़े तो खुशी-खुशी से करेंगे? पीछे हटेंगे नहीं? घबरायेंगे नहीं?

त्याग को त्याग न समझ भाग्य अनुभव करना, इसको कहा जाता है - ‘सच्चा त्याग’। अगर संकल्प में,वाणी में भी इस भावना का बोल निकलता है कि मैंने यह त्याग किया, तो उसका भाग्य नहीं बनता। जैसे भक्ति मार्ग में भी जब बलि चढ़ाते हैं,तो वह बलि चढ़ाने वाला पशु ज़रा भी आवाज़ करता या चिल्लाता है,तो वह ‘महाप्रसाद’नहीं माना जाता; वा बलि नहीं मानी जाती - यह भी अभी का यादगार चल रहा है। अगर त्याग करने के साथ यह संकल्प उठा कि मैंने त्याग किया; नाम,मान, शान का अभिमान आया तो वह त्याग नहीं, उसे भाग्य नहीं कहेंगे। ऐसी धारणा वाले ही सच्चे ब्राह्मण कहलाते हैं।

ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ की रचना कराते हो। इस महायज्ञ में पुरानी दुनिया की आहुति पड़ने के बाद यज्ञ समाप्त होना है। पहले अपने आपसे पूछो - पुरानी दुनिया की आहुति के पहले निमित्त बने हुए ब्राह्मणों ने अपने पुराने व्यर्थ संकल्प वा विकल्प, जिसको भी संकल्पों की सृष्टि कहा जाता है, इन पुराने संकल्पों की सृष्टि को, पुराने स्वभाव-संस्कार रूपी सृष्टि को महायज्ञ में स्वाहा किया है? अगर अपने हद की सृष्टि को स्वाहा न किया वा अपने पास रही सामग्री की आहुति नहीं डाली तो बेहद की पुरानी सृष्टि की आहुति कैसे पड़ेगी? यज्ञ की समाप्ति का आधार हर एक निमित्त ब्राह्मण है तो चैरिटि बिगेन्स एट होम (Charity Begins At Home) करना पड़े, तो अपने मन के अन्दर चैक करो कि आहुति डालाrहै? सम्पूर्ण अन्तिम आहुति कौन-सी है? उसको जानते हो? जैसे आत्म-ज्ञानी आत्मा का परमात्मा में समा जाना ही आत्मा की सम्पूर्ण स्थिति मानते हैं। इस अन्तिम आहुति का स्वरूप है - मैं-पन समाप्त हो, बाबा! बाबा! बोल मुख से व मन से निकले अर्थात् बाप में समा जाएं। इसको कहा जाता है, ‘समा जाना अर्थात् समान बन जाना’। इसको कहा जाता है अन्तिम आहुति,संकल्प,स्वप्न में भी देहभान का ‘मैं-पन’न हो। अनादि आत्मिक स्वरूप की स्मृति हो; बाबा-बाबा! अनहद शब्द हो। आदि ब्राह्मण स्वरूप को धर्म और कर्म की धारणा हो। इसको कहा जाता है ‘सच्चे ब्राह्मण’।

ऐसे सच्चे ब्राह्मण ही यज्ञ की समाप्ति निमित्त बनते हैं। यज्ञ रचने वाले तो बने, अब समाप्ति के भी निमित्त बनो। अर्थात् अपनी अन्तिम आहुति डालो। तो बेहद की पुरानी दुनिया की आहुति भी पड़ ही जाएगी। समझा, अब क्या करना है?सम्पूर्ण बनने का यही सहज साधन है। सम्पूर्ण आहुति देना - इसको ही सम्पूर्ण स्वाहा कहा जाता है। तो स्वाहा हो गए वा अभी होना है? अन्तिम आहुति अन्तिम घड़ी पर ही डालनी है क्या?जब स्वयं डालेंगे तब दूसरों से डलवा सकेंगे। फिर करेंगे - ऐसा न सोच, अब करना ही है। जैसे सुनने के लिए चात्रक रहते हो, मिलने के लिए प्लान्स (Plans) बनाते हो, हमारा टर्न (Turn) पहले हो। तो जैसे यह सोचते हो वैसे मिटने में भी पहले टर्न लो। करने में फर्स्ट टर्न लो। अच्छा।

ऐसे सम्पूर्ण स्वाहा होने वाले, सम्पूर्ण आहुति डालने वाले, स्वयं के परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन के निमित्त बनने वाले, सच्चे ब्राह्मणों को, बाप समान सम्पूर्ण ब्राह्मणों को सर्व श्रेष्ठ धर्म और कर्म में स्थित रहने वाले ब्राह्मणों को, बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।