Avyakt murli du mardi 14 juin 1977
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14-06-77ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
बाप-दादा का देश और विदेश का सैर-समाचार
सदा बाप समान गुणों का, ज्ञान का, शक्तियों का दान करने वाली महादानी आत्माओं प्रति बाप-दादा के उच्चारे हुए महावाक्य :-
विदेश की विशेषता- एक तरफ सृष्टि के परिवर्तन करने के स्थूल साधन इनवेन्ट(Invent;खोज) करने के निमित्त बनी हुई आत्माएं विज्ञानी लोग अपनी इन्वेंशन की रिफाईननेस (Refineness;महीनता) में लगे हुए थे। वैज्ञानियों की लगन, समय और प्रकृति के तत्त्वों के ऊपर विजय प्राप्त करने की, सर्व तत्वों को अपने वशीभूत करने की इच्छा में लगे हुए हैं। हर वस्तु को रिफाईन करने में वह अपनी विजय समझते हैं। जैसे कल्प पहले की यादगार में भी रावण राज्य की विशेषता सर्व तत्त्वों को अपने वशीभूत करना गाया हुआ है - कल्प पहले माफक इसी कार्य में विदेशी आत्माएं लगी हुई हैं। साथ-साथ विज्ञानी आत्माएं आप योगी आत्माओं के लिए, आपके श्रेष्ठ योग की जो प्रालब्ध स्वर्ग के राज्य भाग की प्राप्ति होनी है; उस आने वाले राज्य में सर्व सुखों के साधन आप राजयोगी आत्मओं को प्राप्त हों, ऐसे साधन न जानते हुए भी बनाने में खूब व्यस्त हैं। अर्थात् आप होवनहार देवताओं के लिए प्रकृति के सतोप्रधान श्रेष्ठ साधनों की इन्वेंशन करने में आपकी ही सेवा में लगे हुए हैं। जैसे आप को करने की एक ही लगन है। बाप द्वारा सर्व प्राप्तियों की लगन में रहते, वैसे विदेशी आत्माएं भी अपने साइन्स बल द्वारा सृष्टि को स्वर्ग बनाने के इच्छुक हैं। स्वर्ग अर्थात् जहाँ अप्राप्त कोई वस्तु न हो। इसी कार्य के लगन में लगी हुई आत्माएं ड्रामानुसार निमित्त बन अपना कार्य बहुत अच्छी तरह से कर रही हैं। लेकिन आपके लिए ही कर रही हैं। ऐसे आप सबको अनुभव होता है कि यह सब हमारी तैयारियों में लगे हुए हैं? कितनी सच्चाई, सफाई से सेवा करने वाले हैं। अगर उन्हीं का कार्य देखो और लगन देखो तो अनुभव करेंगे। सेवा के कार्य में अच्छा ही वफादारी से दिन रात लगे हुए हैं। सेवाधारी तो एक ही लगन में मगन हैं। लेकिन आप आत्माएं जो सर्व सुखों के साधन प्राप्त करने वाली हैं,विश्व के राज्य के अधिकारी बनने वाली हैं, वह इसी लगन में मगन रहती हो,या विघ्न लगन को अविनाशी बनाने नहीं देते? लगन की अग्नि अविनाशी प्रज्वलित रहती है, वा अभी लगन और अभी विघ्न?
विदेश के विज्ञानी आत्माओं में निरन्तर अपने कार्य के लगन की विशेषता देखी, तो जो आपके सेवाधारियों में गुण हैं - वह विश्व का मालिक बनने वाली आत्माओं में भी गुण हैं ना। अपने आपको चैक करो। दूसरी तरफ विदेश में परमात्म-ज्ञानी बच्चों को देख उन्हों में भी वर्तमान समय एक ही दृढ़ संकल्प की लगन है, उमंग,उत्साह है कि अब जल्दी से जल्दी बाप का संदेश देवें। विदेश द्वारा निमित्त बनी हुई विशेष आत्माएं जिन आत्माओं के अनुभव के आवाज़ से भारतवासी कुम्भकरण जागेंगे। ऐसे निमित्त बनी हुई आत्माओं को बाप के सम्मुख प्रत्यक्ष करें अर्थात् सम्बन्ध व सम्पर्क में लावें। समीप समय की सूचना विदेश द्वारा भारत में फैलावें। इसी एक लगन में दृढ़ संकल्प के कंगन में बंधे हुए परमात्म-ज्ञानी बच्चों को देखा। उन्हों को भी न दिन,न रात दोनों समान हैं। इस लगन में मगन हैं। वर्तमान समय की लगन में मैजारिटी विघ्नमुक्त आत्माएं एक दो के स्नेह और सहयोग के धागे में पिरोए हुए माला के मणके अच्छे चमकते हुए नज़र आ रहे थे। नए व पुराने हर आत्मा में एक ही उमंग है कि इस श्रेष्ठ कार्य में हम भी अंगुली दें। कुछ करके दिखावें और क्या देखा? संदेश पाने वाली आत्माएं,इच्छुक आत्माएं अर्थात् जिज्ञासा वाली आत्माएं थोड़े से समय में शान्ति और शक्ति की अंचली प्राप्त कर बहुत खुश होती हैं। निमित्त बनी हुई आत्माओं को परमात्मा द्वारा वा गॉड फॉदर (God Father) द्वारा भेजे हुए अलौकिक फरिश्ते अनुभव करते हैं। थोड़ी सी ली हुई सेवा का भी रिटर्न देने में भी अपनी खुशी अनुभव करते हैं और फौरन रिटर्न करते। थोड़ी सी सेवा का शुक्रिया बहुत मानते हैं। यह वर्तमान समय के परमात्म-ज्ञानियों की वा निमित्त बनी हुई श्रेष्ठ आत्माओं की इस सेवा के चक्र में चक्रवर्ती बनने की जो ड्रामा की नूंध हैं इसी नूंध में स्थापना और विनाश के रहस्य का बहुत कनेक्शन है। यह थोड़े समय की सेवा देना वा चक्रवर्ती बन अपने दृष्टि द्वारा, वाणी द्वारा, वा सम्पर्क द्वारा, वा सूक्ष्म शुभभावना और शुभकामना के वृत्ति द्वारा अनेक प्रकार के आपकी राजधानी के तैयारी के निमित्त बने हुए सेवाधारी आत्माओं को सेवा के फल में सेवाधारी बनने के कार्य में सर्व श्रेष्ठ आत्मा की नज़र द्वारा सब निमित्त बनने वाली आत्माएं ज्ञानी व विज्ञानी प्रसिद्ध हो रही हैं। समझा रहस्य को?
भारत में तो आपकी भक्त आत्माएं मिलेंगी। लेकिन तीन प्रकार की आत्माएं चाहिए - एक ब्राह्मण सो देवता बनने वाली और प्रजा बनने वाली आत्माएं; दूसरी भक्त आत्माएं;और तीसरी आपकी राजधानी तैयार कर देने वाली आत्माएं। सेवाधारी सर्व सुखों के साधन और सामग्री तैयार करने के निमित्त बनते हैं। और आप प्रालब्ध भोगते हो। यह पाँच तत्व और पाँच तत्वों द्वारा बनी हुई रिफाईन चीजें सब आपके सेवा के निमित्त बनेगी। इतना श्रेष्ठ स्वमान स्मृति में रहता है वा अब तक भी स्मृति-विस्मृति के खेल में ही चल रहे हो? स्मृति स्वरूप से समर्थी स्वरूप बनो। सुना, विदेश का समाचार? और भी वर्तमान चक्रवर्ती आत्माओं के चक्र लगाने का रहस्य है। जहाँ-जहाँ परमात्म-ज्ञानी आत्माएं ईश्वरीय सेवा-स्थान खोलने के निमित्त बनी हैं और आगे भी बनने हैं। तो अब के विदेश सेवा-स्थान भविष्य में आपके सैर स्थान बनेंगे। जैसे भारत में यादगार स्थान मंदिर हैं लेकिन यह द्वापर के बाद हैं। इसलिए विदेशी आत्माओं का भी भविष्य स्थापना में कनेक्शन है,समझा? आज विदेश समाचार सुनाया, फिर भारत का सुनायेंगे। यह सब समाचार सुनने के बाद करना क्या है?सिर्फ सुनाना है वा कुछ करना भी है? ऐसे सर्व साधनों को प्राप्त करने के लिए स्वयं को सदैव विश्व के मालिक बनने योग्य बनाओ। निरन्तर योगी बनना ही योग्य आत्मा बनना है। ऐसे अपने को समझते हो? तीव्र पुरुषार्थी बन स्वयं को भी सम्पन्न बनाओ और निमित्त बने हुए सेवाधारी आत्माओं को भी कार्य में सम्पन्न बनने की प्रेरणा दो। तब विश्व-परिवर्तन होगा।
सदा लगन द्वारा विघ्न विनाश करने वाले विघ्न-विनाशक आत्माओं को, सदा अपने दृष्टि और वृत्ति द्वारा भी विश्व सेवा में तत्पर रहने वाली आत्माओं को,सदा बाप समान गुणों का,ज्ञान का,शक्तियों का दान करने वाली महादानी, रूहानी नज़र से वरदान देने वाली आत्माओं को बाप-दादा को याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों से-
विश्व की सर्व आत्माओं प्रति सदा रहम व कल्याण की भावना रहती है? हद के प्रति कल्याण की भावना रहती है वा बेहद के प्रति? अब विश्व के प्रति कल्याण की भावना रहेगी तो ऑटोमेटीकली स्वयं प्रति रहेगी। संगमयुगी ब्राह्मणों की विशेष ड्यूटी व धर्म और कर्म ही है विश्व कल्याण करना। अपने जन्म का काम करना मुश्किल नहीं होता। तो सदा अमृतवेले अपने पोजीशन को स्मृति में लाओ कि हमारा पोजीशन विश्व कल्याणकारी का है। अपने पोजीशन पर सेट होने से आपोजीशन से बच जाएंगे।
सदैव साक्षीपन की सीट पर स्थित होकर रहते हुए हर एक्ट अपनी और दूसरों की देखते हो? कोई ड्रामा की सीन सीट पर स्थित ही देखने में मजा आता है। कोई भी सीन सीट के बिना नहीं देखा जाता। तो साक्षीपन की सीट पर सदा स्थित रहते हो? यह बेहद का ड्रामा सदा चलता रहता है। यह दो-तीन घंटे का नहीं,अविनाशी है तो सदा देखने के लिए सीट भी सदा चाहिए। ऐसे नहीं दो घंटे सीट पर बैठा फिर उतर जाओ। तो सदा साक्षी हो देखेंगे वहकभी हार और जीत के दृश्य को देखकर डगमग नहीं होंगे। सदा एक रस रहेंगे। ड्रामा याद रहे तो सदा एकरस रहेंगे। ड्रामा को भूले तो डगमग रहेंगे। अगर ड्रामा कभी-कभी याद रहता तो राज्य भी कभी-कभी करेंगे? अगर साक्षी कभी-कभी रहते तो स्वर्ग में साथी भी कभी-कभी होंगे। नॉलेजफुल तो हो ना? सब जानते हो लेकिन जानते हुए भी साक्षीपनकी स्टेज पर न रहने का कारण अटेंशन में अलबेलापन,स्वाचिंतन की बजाए अपना व्यर्थ बातों में स्वचिन्तन को गंवा देते। स्वचिन्तन में न रहने वाला साक्षी नहीं रह सकता। परचिन्तन को समाप्त करने का आधार क्या है? अगर हर आत्मा के प्रति शुभ चिन्तक होंगे तो परचिन्तन कभी नहीं करेंगे। तो सदा शुभचिन्तन और शुभचिन्तक रहने से सदा साक्षी रहेंगे। साक्षी अर्थात् अभी भी साथी और भविष्य में भी साथी।
विशेष आत्माओं ने अपनी विशेषता क्या दिखाई है? लास्ट विशेषता कौन-सी होगी विशेष आत्माओं की?जिसका इन-एडवान्स (InAdvance;पहले से) बाप-दादा दृश्य देख रहे हैं। वह क्या विशेषता होगी?जैसे साइंस वाले हर चीज़ रिफाईन भी कर रहे हैं और अपनी स्पीड क्वीक (Quick;तेज) भी कर रहे हैं। जैसे कहने में आता है मिनट-मोटर वैसे विशेष आत्माओं की लास्ट विशेषता यही रहेगी - सेकेण्ड में किसी भी आत्मा को मुक्ति और जीवन्मुक्ति के अनुभवी बना देंगी। सिर्फ रास्ता नहीं बतलायेगी लेकिन एक सेकेण्ड में शान्ति का वा अतिइन्द्रिय सुख का अनुभव करायेगी। जीवन्मुक्ति का अनुभव है सुख,और मुक्ति का अनुभव है शान्ति। सामने आया और अनुभव किया। ऐसी स्पीड जब होगी तब साइंस के ऊपर साइलेन्स की विजय देखते हुए सबके मुख से वाह-वाह का आवाज़ निकलेगा कि साइंस के ऊपर भी इनकी विजय हो गई। जो साइंस नहीं कर सके वह साइलेन्स करके दिखावे। साइंस का लक्ष्य भी है - सबको शान्तिमय,सुखमय जीवन व्यतीत करना। तो जो साइंस नहीं कर सके वह करो तब कहेंगे साइंस के ऊपर विजय। शान्ति वालों को शान्ति और सुख वालों को सुख मिले,तब आपका गायन करेंगे,आपको पूर्वज मानेंगे, अष्टदेव समझेंगे और बारम्बार बाप की महिमा करेंगे। इसी आधार पर फिर द्वापर में भक्त और धर्मपिता के संस्कार इमर्ज होंगे। यह विशेष कार्य अब होने वाला है तब समझो लास्ट विजय का समय आ गया। सबको कुछ न कुछ मिलेगा,सिर्फ भातरवासी ही नहीं समझेंगे कि हमारा बाबा है, सभी समझेंगे हमारा है तब तो ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर (Great Great Grand Father) कहा जायेगा ना! दूसरे देश वाले अभी समझते हैं भारत के पिता का परिचय देते हैं, लेकिन जब कहा जाता गाड इज वन (GodIs One;भगवान एक है) तो सभी वन (One;एक) का अनुभव तो करें ना। जब ऐसे वन का अनुभव करें तब सब समझो विन (Win;विजय) होगी। सबके मुख से एक आवाज़ निकले -हमारा बाबा; तब फिर द्वापर में सभी ओ गाड फॉदर कह पुकारेंगे। अच्छा।