Avyakt murli du jeudi 4 janvier 1979
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> > 04-01-79ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
सम्पूर्णता के आईने में निज स्वरूप को देखो
विश्व कल्याणकारी त्रिमूर्ति शिव बाबा के बच्चों के प्रति महावाक्य :-
आज बाप दादा ब्राह्मण बच्चों की आदि से अब तक के जीवन में ब्राह्मणों का विशेष कर्तव्य है विनाश और स्थापना का, उस कर्तव्य में हरेक किस रफ्तार से चल रहे हैं, उस कर्तव्य की गति को देख रहे हैं - कहाँ तक अपने कर्तव्य की जिम्मेवारी निभाई है और आगे भी कितनी रही हुई है। ब्राह्मणों का कर्त्तव्य के आधार से विशेष टाइटिल है विश्व कल्याणकारी,विश्व के आधारमूर्त,विशेष उद्धारमूर्त्त,विश्व के परिवर्तक। तो जैसे टाइटिल है उसी प्रमाण कर्तव्य का प्रैक्टिकल रूप कहाँ तक हुआ है और कहाँ तक होना है। हरेक अपने कर्तव्य की परसेन्टेज को देखो। समय प्रमाण अभी तक स्पीड तीव्र है। वह अब तीव्र होनी है। पहली बात स्वयं को चैक करो - स्वयं प्रति विनाश और स्थापना के कर्तव्य ने अर्थात् पास्ट पुराने हिसाब-किताब स्वभाव वा संस्कार कहाँ तक विनाश किए हैं और नये संस्कार स्वभाव अर्थात् बाप समान स्वभाव संस्कार की स्थापना कहाँ तक की है, सम्पूर्ण विनाश किया है वा अधूरा किया है, जितना पुराना विनाश किया है उतना नया संस्कार वा स्वभाव धारण होगा - तो चैक करो किस गति से यह कार्य कर रहे हैं।
2 - दूसरी बात स्वयं के सम्पर्क में आने वाली आत्मायें वा सम्बन्ध में रहने वाली आत्माएं जो हैं उन्हों के पुराने संस्कार वा स्वभाव देखते हुए न देखो अर्थात् अपने कर्तव्य की स्मृति द्वारा वा अपने टाइटिल की समर्थी द्वारा उन आत्माओं में भी परिवर्तन करने के कार्य की गति कहाँ तक है। चैरिटी बिगेन्स ऐट होम किया है! कितनी भी तमोगुणी आत्मा हो, लेकिन ब्राह्मणों के कर्तव्य प्रमाण सदा ऐसी आत्माओं के प्रति भी कल्याण की भावना रहती है! वा घृणा की भावना रहती है। रहम आता है वा रोब में आते हो! रोब में आकर बाप के आगे वा निमित्त बनी हुई आत्माओं के आगे बार-बार उन आत्माओं के प्रति प्रोब (Complaint) करते रहते। यह ऐसे करते यह ऐसे कहते। ऐसे वैसे क्यों? यह प्रोब करते हैं।
3 - तीसरी बात विश्व की सर्व आत्माओं प्रति सदा संकल्प में कल्याण करने की स्मृति रहती है - बेहद की सेवा अर्थात् विश्व सेवा की जिम्मेदारी समझते हुए चलते हो। मन्सा द्वारा भी विश्व प्रति अपनी शक्तियों के खज़ाने वा ज्ञान, गुणों के खज़ाने को महादानी बन दान करते रहते हो। अपने को विश्व के आगे अथॉरिटी समझते हो। वा जहाँ निवास करते हो उस देश वा गाँव के अथॉरिटी समझते हो। प्रैक्टिकल स्मृति में क्या सेवा रहती है। सामने हद आती है या बेहद! संकल्प में इतनी समर्थी है जो विश्व की आत्माओं तक शक्तिशाली संकल्प द्वारा सेवा कर सको - वृत्ति की शुद्धि अनुसार वायुमण्डल को शुद्ध कर सको। वृत्ति की शक्ति है! शुद्ध अर्थात् प्यूरिटी। प्युरिटी का आधार है भाई-भाई की स्मृति की वृत्ति। कहाँ तक बनी है। इसी प्रकार अपने कर्तव्य की गति और विधि को चैक करो। जब तक स्वयं में विनाश और स्थापना का प्रैक्टिकल स्वरूप नहीं लाया है तब तक विश्व में कर्तव्य की प्रत्यक्षता होना भी स्वयं की गति के प्रमाण ही होगा। क्योंकि आज विश्व की आत्माएं, देखकर सौदा करने वाली हैं सिर्फ सुनकर मानने वाली नही हैं। अपनी यथार्थ मान्यताओं को मान्यताओं को मानने के लिए पहले स्वयं उन मान्यताओं का स्वरूप बनना पड़े। जिस स्वरूप के सैम्पुल द्वारा सौदा सिम्पुल समझ में आवेगा। नहीं तो अब तक अनेक अल्पज्ञ अयथार्थ मान्यताओं द्वारा मेजोरिटी आत्मायें विश्व परिवर्तन वा स्वयं का परिवर्तन अति मुश्किल वा असम्भव समझ बैठी है। इस कारण दिलशिकस्त की बीमारी ज्यादा है। जैसे आजकल शारीरिक रोग हार्टफेल का ज्यादा है वैसे आध्यात्मिक उन्नति में दिलशिकस्त का रोग ज्यादा है। ऐसी दिलशिकस्त आत्माओं को प्रैक्टिकल परिवर्तन द्वारा ही अर्थात् आंखों देखी वस्तु द्वारा ही हिम्मत वा शक्ति आ सकती है। सुना बहुत है अब देखना चाहते हैं। प्रमाण द्वारा परिवर्तन चाहते हैं। तो विश्व परिवर्तन के लिए वा विश्व कल्याण के लिए सदा स्वकल्याण पहले सैम्पुल के रूप में दिखाओ। अब समझा कर्तव्य के लिए क्या चैक करना है। विश्व कल्याण की सेवा के लिए क्षेत्र में सहज सफलता का साधन प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा बाप की प्रत्यक्षता है। जो बोले वह देखें। बोलते हो कि हम ब्राह्मण आलमाइटी अथॉरिटी हैं,मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, मायाजीत हैं, रहमदिल हैं, रूहानी सेवाधारी हैं। तो जो बोलते हो वह प्रैक्टिकल स्वरूप देखना चाहते हैं। नाम मास्टर सर्वशक्तिवान और स्वयं के व्यर्थ संकल्प को भी समाप्त नहीं कर सके तो विश्व कल्याणकारी कौन मानेगा! चलते-चलते स्वयं के संस्कार स्वभाव परिवर्तन करने में दिलशिकस्त होने वाले को विश्व परिवर्तक कौन मानेगा। स्वयं ही सहयोग मांगने वाले को वरदानी कौन मानेगा! इसलिए सम्पूर्णता के आइने में स्वयं का स्वरूप देखो। स्वयं को सम्पन्न बनाए सैम्पुल बनो। समझा क्या करना है। इस वर्ष स्वयं को सम्पन्न बनाए विश्व कल्याणकारी बनो - चेक भी करो और चेन्ज भी करो।
पहले गुजरात आरम्भ करे - जब सुनने में इतनी खुशी होती तो बनने में कितनी खुशी होगी। गुजरात की धरनी वैसे भी सात्विक है - तो गुजरात को सेम्पुल तैयार करने चाहिए। जिसको देखो वह सैम्पुल नजर आए। गुजरात ने विस्तार अच्छा किया है। वृद्धि भी अच्छी है - अब बाकी क्या करना है? ऐसी विधि करो - जो ऐसा वायु मण्डल पावरफुल हो जिससे विघ्न विनाश का भी हो और विश्व की आत्माओं की आकर्षण भी ऐसे रूहानी वायुमण्डल के तरफ हो। गुजरात को लाइट हाउस बनाओ। न सिर्फ गुजरात लाइट हाउस हो बल्कि विश्व लाइट हाऊस। जिस द्वारा विश्व की आत्माओं को स्वयं के वा बाप के परिचय को रोशनी मिले। परमात्म बाम्ब आरम्भ करो। ऐसा बाम्ब फैंको जो एक ठका आत्मायें दौड़ती हुई अपने एक एसलम में पहुँच जायें - पहले गुजरात आबू में क्यू शुरू करें। जो ओटे सो अर्जुन हो जावेगा। अर्जुन अर्थात् पहला नम्बर। अच्छा
ऐसे सदा सेवाधारी सेकेण्ड वा संकल्प भी सेवा के बिना चैन न आवे, निरन्तर योगी निरन्तर सेवाधारी सर्व प्रकार की सेवा में प्रत्यक्षफल दिखाने वाले ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण बन विश्व का कल्याण करने वाली आत्माओं को बाप दादा का याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों से मुलाकात
1-संगमयुग के समय हर कदम में पद्मों की कमाई का चान्स - सदा बाप की याद में रहते हुए हर कदम उठाते पदमों की कमाई जमा करते रहते हो? यह जो गायन है हर कदम में पदम यह किन्हों का है? आप सबका है ना। इस संगम पर ही पदमों की कमाई की खान मिलती है। फिर सारे कल्प में यह चान्स नहीं मिलता। संगमयुग है जमा करने का युग, सतयुग को भी प्रालब्ध का युग कहेंगे,जमा करने का नहीं। अभी जमा करने का युग है, जितना जमा करना चाहो उतना जमा कर सकते हो। तो कितना जमा किया है वा करते जा रहे हो? जितना करना चाहिए उतना कर रहे हो वा जितने वा उतने में अन्तर है। एक कदम अर्थात् एक सेकेण्ड भी बिना जमा के न जाए अर्थात् व्यर्थ न हो। इतना अटेन्शन रहता है!
सतयुग में भी विश्व महाराजा वा राजा बनने का आधार इस समय के जमा करने पर है। तो क्या बनेंगे बड़े महाराजा या छोटे राजा!। बड़े राजे जो होंगे उन्होंके पास अनगिनत सम्पत्ति होगी तो इतनी अनगिनत कमाई जमा की है? सदा भण्डारा भरपूर है। अप्राप्त नहीं कोई वस्तु…ऐसे संस्कार अभी हैं। सदा तृप्त आत्मा अप्राप्त कुछ नहीं ऐसे हैं?वह सभी बन्धन कांटों - थोड़ा सहयोग दो, ऐसे तो नहीं, सहयोग मिले, आगे बढ़ाया जाए तो आगे बढ़े इससे सिद्ध है कि सम्पन्न नहीं हैं। स्वयं की शक्ति में कमी है तब दूसरे कि शक्ति से आगे बढ़ायें तब बढ़ेंगे। तो क्या इसको ही तृप्त वा सम्पन्न आत्मा कहेंगे। बापदादा तो स्वतः ही दाता है, देते ही रहेंगे, वह मांगने की भी जरूरत नहीं तो ऐसे तृप्त आत्मा भविष्य में अखुट खज़ाने के मालिक होंगे अभी से संस्कार भरेंगे तब भविष्य में होंगे। अच्छा