Avyakt murli du dimanche 18 janvier 1981
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> 18-01-81 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
"स्मृति-स्वरूपका आधार याद और सेवा"
आज बापदादा अपनी अमूल्य मणियों को देख रहे हैं। हरेक मणी अपने-अपने स्थिति रूपी स्थान पर चमकती हुई मणियों के स्वरूप में बाप-दादा का श्रृंगार है। आज बाप-दादा अमृतवेले से अपने श्रृंगार (मणियों) को देख रहे हैं। आप सभी साकारी सृष्टि में हर स्थान को सजाते हो, भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्पों से सजाते हो। यह भी बच्चों की मेहनत बाप-दादा ऊपर से देखते रहते हैं। आज के दिन जैसे आप सब बच्चे मधुबन के हर स्थान की परिक्रमा लगाते हो, बाप-दादा भी बच्चों के साथ परिक्रमा पर होते हैं। मधुबन में भी 4धाम विशेष बनाये हैं। जिसकी परिक्रमा लगाते हो, तो भक्तों ने भी 4 धाम का महत्व रखा है। जैसे आज के दिन आप परिक्रमा लगाते हो, वैसे भक्तों ने फालो किया है। आप लोग भी क्यू बनाकर जाते हो, भक्त भी क्यू लगाए दर्शन के लिए इन्तजार करते हैं। जैसे भक्ति में सत वचन महाराज कहते हैं वैसे संगम पर सत वचन के साथ-साथ आपके सत कर्म महान हो जाते हैं। अर्थात् यादगार बन जाते हैं। संगमयुग की यह विशेषता है। भक्त, भगवान के आगे परिक्रमा लगाते हैं लेकिन भगवान अब क्या करते हैं? भगवान बच्चों के पीछे परिक्रमा लगाते हैं। आगे बच्चों को करते पीछे खुद चलते हैं। सब कर्म में चलो बच्चे- चलो बच्चे कहते रहते हैं। यह विशेषता है ना। बच्चों को मालिक बनाते,स्वयं बालक बन जाते, इसलिए रोज मालेकम् सलाम कहते हैं।
भगवान ने आपको अपना बनाया है या आपने भगवान को अपना बनाया है। क्या कहेंगे? किसने किसको बनाया?बाप-दादा तो समझते हैं बच्चों ने भगवान को अपना बनाया है। बच्चे भी चतुर तो बाप भी चतुर। जिस समय आर्डर करते हो और हाजिर हो जाते हैं।
आज का दिन मिलन का दिन है आज के दिन को वरदान है- सदा स्मृति भव''। तो आज स्मृति भव का अनुभव किया?आज स्मृति भव के रिर्टन में मिलन मनाने आये हैं। याद और सेवा देनों का बैलेन्स स्मृति स्वरूप स्वतः ही बना देता है। बुद्धि में भी बाबा मुख से भी बाबा। हर कदम विश्व कल्याण की सेवा प्रति। संकल्प में याद और कर्म में सेवा हो यही ब्राह्मण जीवन है। याद और सेवा नहीं तो ब्राह्मण जीवन ही नहीं। अच्छा
सर्व अमूल्यण मणियों को, स्मृति स्वरूप वरदानी बच्चों को हर कर्म सत कर्म करनेव ले महान और महाराजन,सदा बाप के स्नेह और सहयोग में रहने वाले, ऐसी विशेष आत्माओं को बाप-दादा का यादप्यार और नमस्ते।
पर्सनल मुलाकात -बाप-दादा हर बच्चे को सदैव किस नजर से देखते हैं? बाप-दादा की नजर हरेक बच्चे की विशेषता पर जाती है। और ऐसा कोई भी नहीं हो सकता जिसमें कोई विशेषता न हो। विशेषता है तब विशेष आत्मा बनकर ब्राह्मण परिवार में आये हैं। आप भी जब किसी के सम्पर्क में आते हो तो विशेषता पर नजर जानी चाहिए। विशेषता द्वारा उनसे वह कार्य करा सकते हो और लाभ ले सकते हो। जैसे बाप होपलेस को होपवाला बना देते। ऐसा कोई भी हो कैसा भी हो उनसे कार्य निकालना है,यह है संगम- युगी ब्राह्मणों की विशेषता। जैसे जवाहरी की नजर सदा हीरे पर रहती, आप भी ज्वैलर्स हो आपनी नजर पत्थर की तरफ न जाए, हीरे को देखो। संगमयुग है भी हीरे तुल्य युग। पार्ट भी हीरो, युग भी हीरे तुल्य,तो हीरा ही देखो। फिर स्टेज कौन-सी होगी? अपनी शुभ भावना की किरणें सब तरफ फैलाते रहेंगे। वर्त्तमान समय इसी बात का विशेष अटेन्शन चाहिए। ऐसे पुरूषार्थी को ही तीव्र पुरू- षार्था कहा जाता है। ऐसे पुरूषार्थी को मेहनत नहीं करनी पड़ती सब कुछ सहज हो जाता है। सहजयोगी के आगे कितनी भी बड़ी बात ऐसे सहज हो जाती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं, सूली से काँटा। तो ऐसे सहजयोगी हो ना? बचपन में जब चलना सीखते हैं तब मेहनत लगती, तो मेहनत का काम भी बचपन की बातें हैं, अब मेहनत सामप्त सब में सहज। जहाँ कोई भी मुश्किल अनुभव होता है वहाँ उसी स्थान पर बाबा को रख दो। बोझ अपने ऊपर रखते हो तो मेहनत लगती। बाप पर रख दो तो बाप बोझ को खत्म कर देंगे। जैसे सागर में किचड़ा ड़ालते हैं तो वह अपने में नहीं रखता किनारे कर देता, ऐसे बाप भी बोझ को खत्म कर देते। जब पण्डे को भूल जाते हो तब मेहनत का रास्ता अनुभव होता। मेहनत में टाइम वेस्ट होता। अब मंसा सेवा करो, शुभाचिंतन करो, मनन शक्ति को बढ़ाओ। मेहनत मजदूर करते आप तो अधिकारी हैं। शक्ति को बढ़ाओ। मेहनत मजदूर करते आप तो अधिकारी हैं।