Avyakt murli du lundi 10 mars 1986
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10-03-86ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
बेफिक्र बादशाह बनने की युक्ति
फिकर से फारिग करने वाले बापदादा बोले
आज बापदादा बेफिकर बादशाहों की सभा देख रहे हैं। यह राज्य सभा सारे कल्प में विचित्र सभा है। बादशाह तो बहुत हुए हैं लेकिन बेफिकर बादशाह, यह विचित्र सभा इस संगमयुग पर ही होती है। यह बेफिकर बादशाहों की सभा सतयुग की राज्य सभा से भी श्रेष्ठ है। क्योंकि वहाँ तो फिकर और फखुर दोनों के अन्तर का ज्ञान इमर्ज नहीं रहता है। फिकर शब्द का मालूम नहीं होता। लेकिन अभी जबकि सारी दुनिया कोई न कोई फिकर में है - सवेरे से उठते अपना, परिवार का,कार्य व्यवहार का, मित्र-सम्बन्धियों का कोई न कोई फिकर होगा लेकिन आप सभी अमृतवेले से बेफिकर बादशाह बन दिन आरम्भ करते और बेफिकर बादशाह बन हर कार्य करते। बेफिकर बादशाह बन आराम की नींद करते। सुख की नींद, शान्ति की नींद करते हो। ऐसे बेफिकर बादशाह बन गये। ऐसे बने हो या कोई फिकर है? बाप के ऊपर जिम्मेवारी दे दी तो बेफिकर हो गये। अपने ऊपर जिम्मेवारी समझने से फिकर होता है। जिम्मेवारी बाप की है और मैं निमित्त सेवाधारी हूँ। मैं निमित्त कर्मयोगी हूँ। करावनहार बाप है, निमित्त करनहार मैं हूँ। अगर यह स्मृति हर समय स्वतः ही रहती है तो सदा ही बेफिकर बादशाह है। अगर गलती से भी किसी भी व्यर्थ भाव का अपने ऊपर बोझ उठा लेते हो तो ताज के बजाए फिकर के अनेक टोकरे सिर पर आ जाते हैं। नहीं तो सदा लाइट के ताजधारी बेफिकर बादशाह हो। बस बाप और मैं,तीसरा न कोई। यह अनुभूति सहज बेफिकर बादशाह बना देती है। तो ताजधारी हो या टोकरेधारी हो?टोकरा उठाना और ताज पहनना कितना फर्क हो गया। एक ताजधारी सामने खड़ा करो और एक बोझ वाला, टोकरे वाला खड़ा करो तो क्या पसन्द आयेगा! ताज या टोकरा? अनेक जन्मों के अनेक बोझ के टोकरे तो बाप आकर उतार कर हल्का बना देता। तो बेफिकर बादशाह अर्थात् सदा डबल लाइट रहने वाले, जब तक बादशाह नहीं बने हैं तब तक यह कर्मेन्द्रियाँ भी अपने वश में नहीं रह सकती हैं। राजा बनते हो तब ही मायाजीत,कर्मेन्द्रिय-जीत,प्रकृति जीत बनते हो। तो राज्य सभा में बैठे हो ना! अच्छा
आज यूरोप का टर्न है। यूरोप ने अच्छा विस्तार किया है। यूरोप ने अपने पड़ोस के देशों के कल्याण का प्लैन अच्छा बनाया है। जैसे बाप सदा कल्याणकारी है वैसे बच्चे भी बाप समान कल्याण की भावना रखने वाले हैं। अभी किसी को भी देखेंगे तो रहम आता है ना कि यह भी बाप के बन जाएँ। देखो बापदादा स्थापना के समय से लेकर विदेश के सभी बच्चों को किसी न किसी रूप से याद करते रहे हैं। और बापदादा की याद से समय आने पर चारों ओर के बच्चे पहुँच गये हैं। लेकिन बापदादा ने आह्वाहन बहुत समय से किया है। आह्वाहन के कारण आप लोग भी चुम्बक की तरह आकर्षित हो पहुँच गये हो। ऐसे लगता है ना कि नामालूम कैसे हम बाप के बन गये! बन गये यह तो अच्छा लगता ही है, लेकिन क्या हो गया,कैसे हो गया यह कभी बैठकर सोचो, कहाँ से कहाँ आकर पहुँच गये हो तो सोचने से विचित्र भी लगता है ना! ड्रामा में नूँध नूँधी हुई थी। ड्रामा की नूँध ने सभी को कोने-कोने से निकालकर एक परिवार में पहुँचा दिया। अभी यही परिवार अपना लगने के कारण अति प्यारा लगता है। बाप प्यारे ते प्यारा है तो आप सभी भी प्यारे बन गये हो। आप भी कम नहीं हो। आप सभी भी बापदादा के संग के रंग में अति प्यारे बन गये हो। किसी को भी देखो तो हर एक,एक-दो से प्यारा लगता है। हर एक के चेहरे पर रूहानियत का प्रभाव दिखाई देता है। फारेनर्स को मेकप करना अच्छा लगता है! तो यह फरिश्तेपन का मेकप करने का स्थान है। यह मेकप ऐसा है जो फरिश्ता बन जाते हैं। जैसे मेकप के बाद कोई कैसा भी हो लेकिन बदल जाता है ना। मेकप से बहुत सुन्दर लगता है। तो यहाँ भी सभी चमकते हुए फरिश्ते लगते हो। क्योंकि रूहानी मेकप कर लिया है। उस मेकप में तो नुकसान भी होता है। इसमें कोई नुकसान नहीं। तो सभी चमकते हुए सर्व के स्नेही आत्मायें हो ना! यहाँ स्नेह के बिना और कुछ है ही नहीं। उठो तो भी स्नेह से गुडमार्निंग करते,खाते हो तो भी स्नेह से ब्रह्मा भोजनखाते हो। चलते हो तो भी स्नेह से बाप के साथ, हाथ मे हाथ मिलाकर चलते हो। फारेनर्स को हाथ में हाथ मिलाकर चलना अच्छा लगता है ना! तो बापदादा भी कहते हैं कि सदा बाप को हाथ में हाथ दे, फिर चलो। अकेले नहीं चलो। अकेले चलेंगे तो कभी बोर हो जायेंगे और कभी किसकी नजर भी पड़ जायेगी। बाप के साथ चलेंगे तो एक तो कभी भी माया की नजर नहीं पड़ेगी और दूसरा साथ होने के कारण सदा ही खुशी-खुशी से मौज से खाते चलते मौज मनाते जायेंगे। तो साथी सबको पसन्द है ना! या और कोई चाहिए! और कोई कम्पेनियन की जरूरत तो नहीं है ना! कभी थोड़ा दिल बहलाने के लिए कोई और चाहिए?धोखे देने वाले सम्बन्ध से छूट गये। उसमें धोखा भी है और दुःख भी है। अभी ऐसे सम्बन्ध में आ गये जहाँ न धोखा है, न दुःख है। बच गये। सदा के लिए बच गये। ऐसे पक्के हो - कोई कच्चे तो नहीं। ऐसे तो नहीं वहाँ जाकर पत्र लिखेंगे कि क्या करें, कैसे करें,माया आ गई।
यूरोप वालों ने विशेष कौन-सी कमाल की है? बापदादा सदा देखते रहे हैं कि बाप जो कहते हैं कि हर वर्ष बाप के आगे गुलदस्ता ले करके आना वह बाप के बोल प्रैक्टिकल में लाने का सभी ने अच्छा अटेन्शन रखा है। यह उमंग सदा ही रहा है और अभी भी है कि हर वर्ष नये-नये बिछुड़े हुए बाप के बच्चे अपने घर में पहुँचे,अपने परिवार में पहुँचे। तो बापदादा देख रहे हैं कि यूरोप ने भी यह लक्ष्य रख करके वृद्धि अच्छी की है। तो बाप के महावाक्यों को, आज्ञा को पालन करने वाले आज्ञाकारी कहलाये जाते हैं। और जो आज्ञाकारी बच्चे होते हैं उन्हों पर विशेष बाप की आशीर्वाद सदा ही रहती है। आज्ञाकारी बच्चे स्वतः ही आशीर्वाद के पात्र आत्मायें होते हैं। समझा! कुछ वर्ष पहले कितने थोड़े थे लेकिन हर साल वृद्धि को प्राप्त करते,बड़े ते बड़ा परिवार बन गया। तो एक से दो, दो से तीन, अभी कितने सेन्टर हो गये। यू. के. तो अलग बड़ा है ही,कनेक्शन तो सबका यू. के. से है ही। क्योंकि विदेश का फाउण्डेशन तो वही है। कितनी भी शाखायें निकल जाएँ, झाड़ विस्तार को प्राप्त करता रहे लेकिन कनेक्शन तो फाउण्डेशन में होता ही है। अगर फाउण्डेशन से कनेक्शन नही रहे तो फिर विस्तार को, वृद्धि को कैसे प्राप्त करें। लण्डन मे विशेष अनन्य रतन को निमित्त बनाया क्योंकि फाउण्डेशन है ना। तो सभी का कनेक्शन, डायरेक्शन सहज मिलने से पुरूषार्थ और सेवा दोनों में सहज हो जाता है। बापदादा तो है ही। बापदादा के बिना तो एक सेकण्ड भी नहीं चल सकते हो ऐसा कम्बाइन्ड है। फिर भी साकार रूप में,सेवा के साधनों में,सेवा के प्रोग्राम्स-प्लैन्स में और साथसाथ अपनी स्वउन्नति के लिए भी किसी को भी कोई भी डायरेक्शन चाहिए तो कनेक्शन रखा हुआ है। यह भी निमित्त बनाये हुए माध्यम है। जिससे सहज ही हल मिल सकें। कई बार ऐसे माया के तूफान आते हैं जो बुद्धि को क्लीयर न होने के कारण बापदादा के डायरेक्शन को,शक्ति को कैच नहीं कर सकते हैं। ऐसे टाइम के लिए फिर साकार माध्यम निमित्त बनाये हुए हैं। जिसको आप लोग कहते हो - दादियाँ,दीदियाँ।यह निमित्त हैं। जिससे टाइम वेस्ट न जावे। बाकी बापदादा जानते हैं कि हिम्मत वाले हैं। वहाँ से ही निकलकर और वहाँ ही सेवा के निमित्त बन गये हैं तो चैरिटी बिगन्स एट होम का पाठ अच्छा पक्का किया है,वहाँ के ही निमित्त वृद्धि को प्राप्त कराना यह बहुत अच्छा है। कल्याण की भावना से आगे बढ़ रहे हो तो जहाँ दृढ़ संकल्प है वहाँ सफलता है ही। कुछ भी हो जाए लेकिन सेवा में सफलता पानी ही है - इस श्रेष्ठ संकल्प ने आज प्रत्यक्ष फल दिया है। अभी अपने श्रेष्ठ परिवार को देख विशेष खुशी होती है और विशेष पाण्डव ही टीचर हैं। शक्तियाँ सदा मददगार तो हैं ही। पाण्डवों से सदा सेवा की विशेष वृद्धि का प्रत्यक्षफल मिलता है। और सेवा से भी ज्यादा सेवाकेन्द्र की रिमझिम, सेवाकेन्द्र की रौनक शक्तियों से होती है। शक्तियों का अपना पार्ट है, पाण्डवों का अपना पार्ट है। इसलिए दोनों आवश्यक हैं। जिस सेन्टर पर शक्तियाँ नहीं होती या पाण्डव नहीं हैं तो पावरफुल नहीं होते। इसलिए दोनों ही जरूरी हैं। अभी आप लोग जगे हो तो एक दो से सहज ही अनेक जगते जायेंगे। मेहनत और टाइम तो लगा लेकिन अभी अच्छी वृद्धि को पा रहे हो। दृढ़ संकल्प कभी सफल न हो यह हो नहीं सकता। यह प्रैक्टिकल प्रूफ देख रहे हैं। अगर थोड़ा भी दिल-शिकस्त हो जाते कि यहाँ तो होना ही नहीं है तो अपना थोड़ा सा कमज़ोर संकल्प सेवा में भी फर्क ले आता है। दृढ़ता का पानी फल जल्दी निकालता है। दृढ़ता ही सफलता लाती है।