Murli du jour du dimanche 30 novembre 2025
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant écouter ce murli sans internet.
Vous pouvez écouter ce murli sans internet.
pour pouvoir l'écouter sans internet.
30-11-25 प्रातःमुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 18-01-08 मधुबन
सच्चे स्नेही बन, सब बोझ बाप को देकर मौज का अनुभव करो, मेहनत मुक्त बनो
आज बापदादा अपने चारों ओर के बेफिक्र बादशाहों के संगठन को देख रहे हैं। इतनी बड़ी बादशाहों की सभा सारे कल्प में इस संगम के समय होती है। स्वर्ग में भी इतनी बड़ी सभा बादशाहों की नहीं होगी। लेकिन अब बापदादा सर्व बादशाहों की सभा को देख हर्षित हो रहे हैं। दूर वाले भी दिल के नजदीक दिखाई दे रहे हैं। आप सब नयनों में समाये हुए हो, वह दिल में समाये हुए हैं। कितनी सुन्दर सभा है, आज के विशेष दिवस पर सभी के चेहरों पर अव्यक्त स्थिति के स्मृति की झलक दिखाई दे रही है। सबके दिल में ब्रह्मा बाप की स्मृति समाई हुई है। आदि देव ब्रह्मा बाप और शिव बाप दोनों ही सर्व बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं।
आज तो सवेरे दो बजे से लेकर बापदादा के गले में भिन्न-भिन्न प्रकार की मालायें पड़ी हुई थी। यह फूलों की मालायें तो कॉमन हैं। हीरों की मालायें भी कोई बड़ी बात नहीं हैं लेकिन स्नेह के अमूल्य मोतियों की माला अति श्रेष्ठ है। हर एक बच्चे के दिल में आज के दिन स्नेह विशेष इमर्ज रहा। बापदादा के पास चार प्रकार की भिन्न-भिन्न मालायें इमर्ज थी। पहला नम्बर श्रेष्ठ बच्चों की जो बाप समान बनने के श्रेष्ठ पुरुषार्थी बच्चे हैं, ऐसे बच्चे माला के रूप में बाप के गले में पिरोये हुए थे। पहली माला सबसे छोटी थी। दूसरी माला - दिल के स्नेह समीप समान बनने के पुरुषार्थी बच्चों की माला, वह श्रेष्ठ पुरुषार्थी यह पुरुषार्थी। तीसरी माला थी - जो बड़ी थी वह थी - स्नेही भी, बाप की सेवा में साथी भी लेकिन कभी तीव्र पुरुषार्थी और कभी, कभी-कभी तूफानों का सामना ज्यादा करने वाले। लेकिन चाहने वाले, सम्पन्न बनने की चाहना भी अच्छी रहती है। चौथी माला थी उल्हनें वालों की। भिन्न-भिन्न प्रकार के बच्चों की अव्यक्त फरिश्ते फेस के रूप में मालायें थी। बापदादा भी भिन्न-भिन्न मालाओं को देख खुश भी हो रहे थे और स्नेह और सकाश साथ-साथ दे रहे थे। अभी आप सब अपने आपको सोचो मैं कौन? लेकिन चारों ओर के बच्चों में विशेष संकल्प वर्तमान समय दिल में इमर्ज है कि अब कुछ करना ही है। यह उमंग-उत्साह मैजारिटी में संकल्प रूप में है। स्वरूप में नम्बरवार है लेकिन संकल्प में है।
बापदादा सभी बच्चों को आज के स्नेह के दिन, स्मृति के दिन, समर्थी के दिन की विशेष दिल की दुआयें और दिल की बधाईयां दे रहे हैं। आज का विशेष दिन स्नेह का होने कारण मैजारिटी स्नेह में खोये हुए हैं। ऐसे ही पुरुषार्थ में सदा स्नेह में खोये हुए रहो। लवलीन रहो तो सहज साधन है स्नेह, दिल का स्नेह। बाप के परिचय की स्मृति सहित स्नेह। बाप की प्राप्तियों के स्नेह सम्पन्न स्नेह। स्नेह बहुत सहज साधन है क्योंकि स्नेही आत्मा मेहनत से बच जाती है। स्नेह में लीन होने के कारण, स्नेह में खोये हुए होने के कारण किसी भी प्रकार की मेहनत मनोरंजन के रूप में अनुभव होगी। स्नेही स्वतः ही देह के भान, देह के सम्बन्ध का ध्यान, देह की दुनिया के ध्यान से ऊपर स्नेह में स्वतः ही लीन रहते। दिल का स्नेह बाप के समीप का, साथ का, समानता का अनुभव कराता है। स्नेही सदा अपने को बाप की दुआओं के पात्र समझते हैं। स्नेह असम्भव को भी सहज सम्भव कर देता है। सदा अपने मस्तक पर, माथे पर बाप के सहयोग का, स्नेह का हाथ अनुभव करते हैं। निश्चयबुद्धि, निश्चितं रहते हैं। आप सभी आदि स्थापना के बच्चों को आदि के समय का अनुभव है, अभी भी सेवा के आदि निमित्त बच्चों को अनुभव है कि आदि में सभी बच्चों को बाप मिला, उस स्मृति से स्नेह का नशा कितना था! नॉलेज तो पीछे मिली लेकिन पहला-पहला नशा स्नेह में खोये हुए हैं। बाप स्नेह का सागर है तो मैजारिटी बच्चे आदि से स्नेह के सागर में खोये हुए हैं, पुरुषार्थ की रफ्तार में बहुत अच्छे स्पीड से चले हैं। लेकिन कोई बच्चे स्नेह के सागर में खो जाते हैं, कोई सिर्फ डुबकी लगाके बाहर आ जाते हैं इसीलिए जितना खोये हुए बच्चों को मेहनत कम लगती उतनी उन्हों को नहीं। कभी मेहनत, कभी मुहब्बत, दोनों में रहते हैं। लेकिन जो स्नेह में लवलीन रहते हैं वह सदा अपने को छत्रछाया के अन्दर रहने का अनुभव करते हैं। दिल के स्नेही बच्चे मेहनत को भी मुहब्बत में बदल लेते हैं। उन्हों के आगे पहाड़ जैसी समस्या भी पहाड़ नहीं लेकिन रूई समान अनुभव होती है। पत्थर भी पानी समान अनुभव होता है। तो जैसे आज विशेष स्नेह के वायुमण्डल में रहे तो अनुभव किया मेहनत है या मनोरंजन हुआ!
आज तो स्नेह का सबको अनुभव हुआ ना! स्नेह में खोये हुए थे? खोये हुए थे सभी! आज मेहनत का अनुभव हुआ? किसी भी बात की मेहनत का अनुभव हुआ? क्या, क्यों, कैसे का संकल्प आया? स्नेह सब भुला देता है। तो बापदादा कहते हैं कि बाप के इस स्नेह को भूलो नहीं। स्नेह का सागर मिला है, खूब लहराओ। जब भी कोई मेहनत का अनुभव हो ना, क्योंकि माया बीच-बीच में पेपर तो लेती है, लेकिन उस समय स्नेह के अनुभव को याद करो। तो मेहनत मुहब्बत में बदल जायेगी। अनुभव करके देखो। क्या है, गलती क्या हो जाती है! उस समय क्या, क्यों… इसमें बहुत चले जाते हो। जो आया है वह जाता भी है लेकिन जायेगा कैसे? स्नेह को याद करने से मेहनत चली जायेगी क्योंकि सभी को भिन्न-भिन्न समय पर बापदादा दोनों के स्नेह का अनुभव तो है। है ना अनुभव! कभी तो किया है ना, चलो सदा नहीं है कभी तो है। उस समय को याद करो - बाप का स्नेह क्या है! बाप के स्नेह से क्या-क्या अनुभव किया! तो स्नेह की स्मृति से मेहनत बदल जायेगी क्योंकि बाप-दादा को किसी भी बच्चे की मेहनत की स्थिति अच्छी नहीं लगती। मेरे बच्चे और मेहनत! तो मेहनत मुक्त कब बनेंगे? यह संगमयुग ही है जिसमें मेहनत मुक्त, मौज़ ही मौज़ में रह सकते हैं। मौज नहीं है तो कोई न कोई बोझ बुद्धि में है, बाप ने कहा है बोझ मुझे दे दो। मैं-पन को भूल ट्रस्टी बन जाओ। जिम्मेवारी बाप को दे दो और स्वयं दिल के सच्चे बच्चे बन खाओ, खेलो और मौज करो क्योंकि यह संगमयुग सभी युग में से मौज़ों का युग है। इस मौजों के युग में भी मौज नहीं मनायेंगे तो कब मनायेंगे? बापदादा जब देखते हैं ना कि बच्चे बोझ उठाके बहुत मेहनत कर रहे हैं। दे नहीं देते, खुद ही उठा लेते। तो बाप को तो तरस पड़ेगा ना, रहम आयेगा ना। मौजों के समय मेहनत! स्नेह में खो जाओ, स्नेह के समय को याद करो। हर एक को कोई न कोई समय विशेष स्नेह की अनुभूति होती ही है, हुई है। बाप जानता है हुई है लेकिन याद नहीं करते हो। मेहनत को ही देखते रहते, उलझते रहते। अगर आज भी अमृतवेले से अब तक बापदादा दोनों अथॉरिटी के स्नेह का दिल से अनुभव किया होगा तो आज के दिन को भी याद करने से स्नेह के आगे मेहनत समाप्त हो जायेगी।
अभी बापदादा इस वर्ष में हर बच्चे को स्नेह युक्त, मेहनत मुक्त देखने चाहते हैं। मेहनत का नामनिशान दिल में नहीं रहे, जीवन में नहीं रहे। हो सकता है? हो सकता है? जो समझते हैं करके ही छोड़ना है, हिम्मत वाले हैं वो हाथ उठाओ। आज विशेष ऐसे हर बच्चे को बाप का विशेष वरदान है - मेहनत मुक्त होने का। स्वीकार है? फिर कुछ हो जाए तो क्या करेंगे? क्या, क्यों तो नहीं करेंगे ना? मुहब्बत के समय को याद करना। अनुभव को याद करना और अनुभव में खो जाना। आपका वायदा है। बाप भी बच्चों से प्रश्न पूछते हैं, कि आप सबका वायदा है कि हम बाप द्वारा 21 जन्मों के लिए जीवनमुक्त अवस्था का पद प्राप्त कर रहे हैं, करेंगे ही, तो जीवनमुक्त में मेहनत होती है क्या? 21 जन्म में एक जन्म संगम का है। आपका वायदा 21 जन्मों का है, 20 जन्मों का नहीं है। तो अभी से मेहनत मुक्त अर्थात् जीवनमुक्त, बेफिक्र बादशाह। अभी के संस्कार आत्मा में 21 जन्म इमर्ज रहेंगे। तो 21 जन्म का वर्सा लिया है ना! या लेना है अभी? तो अटेन्शन प्लीज़, मेहनत मुक्त, सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना। सिर्फ रहना नहीं, करना भी है। तभी मेहनत मुक्त रहेंगे। नहीं तो रोज़ कोई न कोई बोझ की बातें, मेहनत की बातें, क्या क्यों की भाषा में आयेंगी। अभी समय की समीपता को देख रहे हो। जैसे समय की समीपता हो रही है, ऐसे आप सबका भी बाप के साथ समीपता का अनुभव बढ़ना चाहिए ना। बाप से आपकी समीपता समय की समीपता को समाप्त करेगी। क्या आप सभी बच्चों को आत्माओं के दुःख अशान्ति का आवाज कानों में नहीं सुनाई देता! आप ही पूर्वज भी हो, पूज्य भी हो। तो हे पूर्वज आत्मायें, हे पूज्य आत्मायें, कब विश्व कल्याण का कार्य सम्पन्न करेंगे?
बापदादा ने समाचारों में देखा है, हर वर्ग वाले अपनी-अपनी मीटिंग करते हैं, प्लैन बनाते हैं कि विश्व कल्याण की गति को तीव्र कैसे करें? प्लैन तो बहुत अच्छे बनाते हैं, लेकिन बापदादा पूछते हैं आखिर भी कब तक? इसका उत्तर दादियां देंगी - आखिर कब तक? पाण्डव देंगे - आखिर कब तक? बाप की प्रत्यक्षता हो, यही सभी हर वर्ग के प्लैन बनाने में लक्ष्य रखते हैं। लेकिन प्रत्यक्षता होगी दृढ़ प्रतिज्ञा से। प्रतिज्ञा में दृढ़ता, कभी किसी कारण से वा बातों से दृढ़ता कम हो जाती है। प्रतिज्ञा बहुत अच्छी करते हैं, अमृतवेले अगर आप सुन सको ना, बाप तो सुनते हैं, आपके पास ऐसा अभी साइंस ने साधन नहीं दिया है जो सभी के दिल का आवाज सुन सको। बापदादा सुनते हैं, वायदों की मालायें, संकल्प करने की बातें इतनी अच्छी-अच्छी दिल खुश करने वाली होती हैं जो बापदादा कहते वाह बच्चे वाह! सुनायें क्या क्या करते हो! जब कर्म में आते हो ना, मुरली तक भी 75 परसेन्ट ठीक होते हैं। लेकिन जब कर्मयोग में आते हो तो उसमें फ़र्क आ जाता है। कुछ संस्कार कुछ स्वभाव, स्वभाव और संस्कार सामना करते हैं, उसमें प्रतिज्ञा दृढ़ के बजाए साधारण हो जाती है। दृढ़ता की परसेन्टेज़ कम हो जाती है।
बापदादा एक खेल बच्चों का देख मुस्कराते हैं। कौन सा खेल करते हो, बतायें क्या? बापदादा को तो खेल देखने में रहम आता है, मज़ा नहीं आता है क्योंकि बापदादा देखते हैं बच्चे अपनी बात दूसरे के ऊपर रखने में बहुत होशियार हैं। क्या खेल करते? बातें बना देते हैं। सोचते हैं कौन देखने वाला है! मैं जानूं मेरी दिल जाने। बाप तो परमधाम में, सूक्ष्मवतन में बैठा है। अगर किसको कहो कि यह नहीं करना चाहिए, तो खेल क्या करते हैं, पता है? हाँ हुआ तो है लेकिन... लेकिन जरूर डालते हैं। लेकिन क्या? ऐसा था ना, ऐसा किया ना, ऐसे होता है ना, तभी हुआ, मैंने नहीं किया, ऐसे हुआ तभी। अभी इसने किया, तभी किया। नहीं तो मैं नहीं करता, तो यह क्या हुआ? अपनी महसूसता, रियलाइजेशन कम है। अच्छा, मानों उसने ऐसा किया, तभी आपने किया, चलो बहुत अच्छा। पहला नम्बर वह हुआ, दूसरा नम्बर आप हुए, ठीक है। बापदादा यह भी मान लेते हैं। आप पहला नम्बर नहीं है, दूसरा नम्बर हैं लेकिन अगर आप सोचते हो कि पहला नम्बर परिवर्तन करे तो मैं ठीक हूँगा, ठीक है? यही समझते हो ना उस समय। मानो पहला नम्बर परिवर्तन करता है। बापदादा और सभी पहले नम्बर वाले को कहते हैं आपकी गलती है, आपको परिवर्तन करना है, ठीक है। अच्छा अगर पहले नम्बर वाले ने परिवर्तन किया, तो पहला नम्बर किसको मिलेगा? आपका तो पहला नम्बर नहीं होगा। परिवर्तन शक्ति में आपका पहला नम्बर नहीं होगा। पहला नम्बर आपने उसको दिया तो आपका कौन सा नम्बर हुआ? दूसरा नम्बर हुआ ना। अगर आपको कहें दूसरा नम्बर हैं तो मंजूर करेंगे। करेंगे? कहेंगे नहीं, ऐसे था, वैसे था, कैसे था... यह भाषा बहुत खेल में आती है। ऐसे वैसे कैसे यह खेल बन्द करके मुझे परिवर्तन होना है। मैं परिवर्तन होके दूसरे को परिवर्तन करूँ, लेकिन अगर दूसरे को परिवर्तन नहीं कर सकते हो तो शुभ भावना, शुभ कामना तो रख सकते हो! वह तो आपकी अपनी चीज़ है ना! तो हे अर्जुन मुझे बनना है। पहला विश्व के राज्यधारी लक्ष्मी-नारायण के समीप आपको आना है या दूसरे नम्बर वाले को?
बापदादा की इस वर्ष की यही आश है कि सभी ब्राह्मण आत्मायें, ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी जैसे यहाँ यह बैज लगाते हो ना, सभी लगाते हैं ना! यहाँ भी आते हो तो आपको बैज मिलता है ना, चाहे कागज का, चाहे सोने का, चाहे चांदी का। तो जैसे यहाँ बैज लगाते हो वैसे दिल में, मन में यह बैज लगाओ, मुझे परिवर्तन होना है। मुझे निमित्त बनना है। यह बदले, यह बात बदले, यह व्यक्ति बदले, यह सरकमस्टांश बदले, नहीं। मुझे बदलना है। बातें तो आयेंगी, आप ऊंचे जा रहे हो, ऊंचे स्थान पर समस्यायें भी तो ऊंची आती हैं ना! लेकिन जैसे आज नम्बरवार यथाशक्ति स्नेह के स्मृति का वायुमण्डल था। ऐसे अपने मन में सदा स्नेह में लवलीन रहने का वायुमण्डल सदा इमर्ज रखो।
बापदादा के पास समाचार बहुत अच्छे अच्छे आते हैं। संकल्प तक बहुत अच्छे हैं। स्वरूप में आने में यथाशक्ति हो जाते हैं। अभी दो मिनट के लिए सभी परमात्म स्नेह, संगमयुग के आत्मिक मौज की स्थिति में स्थित हो जाओ। (ड्रिल) अच्छा - यही अनुभव हर दिन बार-बार समय प्रति समय अनुभव करते रहना। स्नेह को नहीं छोड़ना। स्नेह में खो जाना सीखो। अच्छा।
चारों ओर के योगयुक्त, युक्तियुक्त, राज़युक्त, खुद भी राज़ को जान सदा राज़ी करने वाले और राज़ी रहने वाले, सिर्फ स्वयं राज़ी नहीं रहना है, राज़ी करना भी है, ऐसे सदा स्नेह के सागर में लवलीन बच्चों को, सदा बाप समान बनने के तीव्रगति के पुरुषार्थी बच्चों को, सदा असम्भव को भी सहज सम्भव करने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बाप के साथ रहने वाले और बाप की सेवा में साथी रहने वाले ऐसे बहुत-बहुत लक्की और लवली बच्चों को आज के अव्यक्त दिवस की, अव्यक्त फरिश्ते स्वरूप की यादप्यार और दिल की दुआयें, अच्छा।
वरदान:- याद के जादू मन्त्र द्वारा सर्व सिद्धियां प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव
बाप की याद ही जादू का मन्त्र है, इस जादू के मन्त्र द्वारा जो सिद्धि चाहो वह प्राप्त कर सकते हो। जैसे स्थूल में भी किसी कार्य की सद्धि के लिए मन्त्र जपते हैं, ऐसे यहाँ भी अगर किसी कार्य में सिद्धि चाहिए तो यह याद का महामन्त्र ही विधि स्वरूप है। यह जादू मन्त्र सेकण्ड में परिवर्तन कर देता है। इसे सदा स्मृति में रखो तो सदा सिद्धि स्वरूप बन जायेंगे क्योंकि याद में रहना बड़ी बात नहीं है, सदा याद में रहना - यही बड़ी बात है, इसी से सर्व सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
स्लोगन:- सेकण्ड में विस्तार को सार रूप में समा लेना अर्थात् अन्तिम सर्टीफिकेट लेना।
अव्यक्त इशारे - अशरीरी व विदेही स्थिति का अभ्यास बढ़ाओ
जैसे कोई शरीर के वस्त्र सहज उतार सकते हो ऐसे यह शरीर रूपी वस्त्र भी सहज उतार सको और सहज ही समय पर धारण कर सको, इसका अभ्यास चाहिए। अगर वस्त्र तंग वा टाइट है तो सहज उतार नहीं सकते, ऐसे यह देह रूपी वस्त्र भी किसी संस्कार में चिपका हुआ तंग वा टाइट न हो। इसके लिए सभी बातों में इजी रहो, यदि इज़ी रहेंगे तो सभी कार्य इज़ी होंगे। जितना पुराने संस्कारों से न्यारा रहेंगे उतना अवस्था भी न्यारी अर्थात् विदेही सहज बन जायेगी।