Murli du jour du dimanche 8 novembre 2026
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08-11-26 प्रातःमुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 18-10-71 मधुबन
विशेष दीपावली निमित्त अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य
आज बापदादा क्या देख रहे हैं? आप दीपकों की माला देखने के लिए आए हैं। जो दीपमाला का यादगार दिवस लोग मनाते हैं लेकिन बापदादा चैतन्य दीपकों की माला को देख रहे हैं। आप सभी भी जब दीपमाला के दिन जगे हुए दीपकों को देखते हो तो देखते हुए यह खुशी होती है कि हमारी ही यादगार मना रहे हैं? जैसे जगा हुआ दीपक प्यारा लगता है वैसे अपनी यादगार को देख स्मृति आने से आप सभी भी विश्व के बाप और सारे विश्व के आत्माओं को प्यारे लगते हो। तो आज यादगार रूप को प्रत्यक्ष रूप में देखने आए हैं। माला में एक दाना नहीं होता है, अनेकों की माला बनती है। अगर एक दीपक अलग जगा हुआ हो तो उसको दीपकों की माला नहीं कहेंगे। तो ऐसे ही अनेक दीपक जगे हुए, माला के रूप में दिखाई देते हें। तो हरेक अपने को इस दीपमाला के बीच पिरोया हुआ, जगा हुआ दीपक समझते हो? वा आप लोग भी अनेक जगे हुए दीपकों की माला को देखते हुए हर्षित होते हो? आज दीपमाला के दिन आप सभी ने दीपावली मनाई? आज विशेष रूप से दीपावली मनाई? यूं तो सदैव जगे हुए दीपक हो, लेकिन जब विशेष यादगार का दिवस होता है तो विशेष आत्माओं को क्या करना चाहिए? विशेष आत्माएं जो विशेष रूप से निमित्त बनते हैं, उन्हों को विशेष सर्विस क्या करनी है? विशेष आत्माओं को तो अन्य से विशेष कार्य करना है नाक्योंकि जो अन्य आत्माएं भी कर सकती हैं और कर रही हैं वह किया तो बाकी फर्क क्या हुआ? विशेष आत्माओं को विशेष कार्य करना है। बापदादा विशेष दिनों पर विशेष रूप से बच्चों की और भक्तों की तीनों ही रूप से सेवा करते हैं। विशेष आत्माओं को खास अपने यादगार के दिन साक्षात्कार-मूर्त्त बन, साक्षात् बापदादा समान आत्माओं के प्रति अपनी कल्याण की भावना से, अपने रूहानी स्नेह के स्वरूप से, अपने सूक्ष्म शक्तियों द्वारा आत्माओं में बल भरना चाहिए। जैसे अव्यक्त रूप में बापदादा चारों ओर बच्चों की सेवा करते हैं। वह समझते हैं कि बापदादा ने मेरे से मुलाकात की, मेरी याद का रेसपान्स दिया वा मेरी याद का प्रत्यक्ष फल मैंने अनुभव किया अथवा भक्त भी अनुभव करते हैं कि हमारे प्यार वा भावना का फल भगवान् ने पूरा किया, यह अनुभव प्रैक्टिकल रूप में होता रहता है।
ऐसे विशेष आत्माओं को अपने अव्यक्त स्थिति में, अपनी रूहानी लाइट और माइट की स्थिति द्वारा लाइट हाउस और माइट हाउस बन एक स्थान पर रहते हुए भी चारों ओर अलौकिक रूहानी सर्विस की भावना और वृत्ति द्वारा सर्विस करनी चाहिए इसको कहते हैं बेहद की सर्विस। ऐसे अनुभव वा महसूस होना चाहिए कि मेरी प्रजा वा भक्त आज विशेष रूप से यादगार के दिन मुझ विशेष आत्मा को याद कर रहे हैं। अल्पकाल के रिद्धि-सिद्धि वाले एक स्थान पर रहते हुए अपने भक्तों को अपने रूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करा सकते हैं, तो क्या विशेष आत्माएं अपने लाइट और माइट द्वारा भक्तों को वा प्रजा को अपनी सेवा द्वारा अनुभव नहीं करा सकते हैं? तो जब ऐसे विशेष यादगार के दिन आते हैं तो विशेष आत्माओं को ऐसी विशेष सर्विस पर अनुभव करना चाहिए। ऐसी सर्विस की? अच्छा यह रही सर्विस। और दीपावली के दिन अपने प्रति विशेष अटेन्शन रहा? आज के दिन अपने आत्मा के संस्कारों में सदा के लिए परिवर्तन लाने का विशेष अटेन्शन दिया? जब यादगार रूप में आज का दिन पुराने खाते खत्म करने की रीति रूप में चलता आ रहा है वह अवश्य प्रैक्टिकल रूप में आप आत्माओं ने किया है तब तो यादगार चलता आया है। तो आज के दिन अपने पुराने संस्कारों का जरा भी रहा हुआ खाता खत्म किया? खत्म करने के पहले अपने खाते को चेक किया जाता है। रिज़ल्ट निकाली जाती है। ऐसे आप सभी ने अपना पोतामेल चेक किया? क्या चेक करना है? आज के दिन तक जो भी पुरुषार्थ चला उसकी रिज़ल्ट अब तक किन बातों में और किस परसेन्टेज में सफलता मूर्त्त बने? पहले अपने मन्सा संकल्पों के पोतामेल को चेक करो कि अब तक सम्पूर्ण श्रेष्ठ संकल्पों के पुरुषार्थ में कहाँ तक सफलता आई है? व्यर्थ संकल्पों वा विकल्पों के ऊपर कहाँ तक विजयी बने हैं? और वाणी द्वारा कहाँ तक आत्माओं को बाप का परिचय दे सकते, कितनी आत्माओं को बाप के स्नेही वा सहयोगी बना सकते हैं? वाचा में कहाँ तक रूहानियत वा अलौकिकता वा आकर्षण आई है? ऐसे ही कर्मणा द्वारा सदा न्यारे और प्यारे, अलौकिक, असाधारण कर्म कहाँ तक कर सकते हैं? कर्मों में कहाँ तक कर्मयोगी का, योगयुक्त, युक्तियुक्त स्नेहयुक्त रूप लाया है? अपने संस्कारों और स्वरूपों में अर्थात् सूरत में कहाँ तक बाप समान आकर्षण रूप, स्नेही रूप, सहयोगी रूप बने? ऐसे अपना पोतामेल चेक करने से अब तक जो कमी वा कमज़ोरी रह गई है उसको समाप्त कर नया खाता शुरू कर सकेंगे? ऐसा अपना पोतामेल चेक करो।
इसको कहते हैं दीपावली मनाना अथवा अपने को सम्पूर्ण बनाने का दृढ़ संकल्प करना ही मनाना है। तो ऐसे दीपावली मनाई है कि सिर्फ मिलन मनाया? मिलन मनाने का यादगार माला के रूप में है लेकिन दृढ़ संकल्पों का यादगार दीपक के ज्योति रूप का है। तो दोनों रूप से मनाया? नये वस्त्र पहने? आत्मा को नया चोला किस आधार से मिलता है? संस्कारों के आधार से मिलता है ना। आत्मा के जैसे संस्कार होते हैं उस प्रमाण ही चोला तैयार होता है। तो नया चोला वा नये वस्त्र कौन-से पहनेंगे? आत्मा में नये युग के संस्कार वा नये युग के स्थापक बाप जैसे सम्पूर्ण संस्कारों को धारण करना - यही नये वस्त्र पहनना है। शरीर में नये वस्त्र भल कितने भी पहनों लेकिन आज के पुरानी दुनिया की नई वस्तु भी नई दुनिया के आगे पुरानी है क्योंकि जड़जड़ीभूत अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं इसलिए नये वस्त्र पहनों तो भी नये नहीं कहेंगे। सतोप्रधान दुनिया में ही सब कुछ नया है। तमोप्रधान दुनिया की चीज़ें सभी पुरानी हैं। असार हैं। तो उनको नया कहेंगे क्या? तो नया वस्त्र अर्थात् अपनी आत्मा के नये संस्कार, श्रेष्ठ संस्कार धारण करना है। और क्या करेंगे? जब नये संस्कार धारण कर लिए हैं तो पोतामेल रखने से पोताई हो जायेगी ना। तो पोतामेल रखना यही पोताई अर्थात् सफाई, स्वच्छता है। जैसे पोताई करते हैं तो जो भी गन्दगी व कीटाणु होते हैं वह स्वतः ही खत्म हो जाते हैं। तो जब ऐसा पोतामेल चेक करेंगे तो जो भी कमजोरी होगी वह स्वतः ही खत्म हो जायेगी। एक दो में अपने मधुर बोल से लेन-देन क्या करेंगे? जैसे दीपावली पर एक दो से खर्ची लेते हैं ना। आप लोग एक दो में कौनसी खर्ची देंगे। आपके पास कौनसी चीज़ है जो एक दो को खर्ची देंगे? (स्नेह की खर्ची) स्नेही तो एक दो के सदा के लिए हो, कि आज के दिन खास स्नेही बनेंगे? स्नेही तो हो और इसी स्नेह की निशानी, एक दो के समी-पता की निशानी दीपमाला कहा जाता है। विशेष दिनों पर विशेष खर्ची कौनसी देनी है? जो अब तक अपने पुरुषार्थ द्वारा सहज सफलता प्राप्त हुई हो वा अनुभव हुआ हो, ऐसा अपने अनुभव का ज्ञान रत्न, जिस द्वारा प्रैक्टिकल अनुभवी बन अनुभवी बना सकते हो, ऐसा रत्न एक दो को खर्ची के रूप में विशेष रूप से देना चाहिए। समझा? बाप के खज़ाने को अपने अनुभव द्वारा जो अपना बनाया ऐसा अपना बनाया हुआ ज्ञान रत्न एक दो को देना चाहिए जिससे वह आत्मा भी इससे सहज़ अनुभवी बन जाये, यह है खर्ची। तो एक-दो को ऐसी खर्ची देना चाहिए जो सदा के लिए याद रूप बन जाए। जब ऐसा रत्न किसको देंगे तो सदा के लिए उस आत्मा को बाप के साथ आपके दिये हुए रत्न की याद ज़रूर रहेगी। तो किसको सदा के लिए सम्पन्न करने वाली खर्ची देनी चाहिए। ऐसी दीपावली मनाओ और ऐसे ही श्रेष्ठ आत्मा बन अन्य आत्माओं की श्रेष्ठ सेवा करो।
आज के दिन सर्व आत्माएं धन के प्यासी हैं। तो ऐसी प्यासी आत्माओं को ऐसा रूहानी धन दो जिससे कभी भी आत्मा को धन मांगने की आवश्यकता ही न रहे। धन कौन मांगते हैं? भिखारी। आज के दिन आत्मा भिखारी बनती है। रॉयल भिखारी कहो। कितने भी करोड़पति हों, लेकिन आज के दिन भिखारी बनते हैं। ऐसी भिखारी आत्मा को भिखारीपन से छुड़ाओ, यह है बेहद की सेवा। दाता के बच्चे हो ना। तो दाता के बच्चे, वरदाता के बच्चे, अपने वरदान की शक्ति से, ज्ञान दान की शक्ति से भिखारियों को मालामाल बनाओ। आज के दिन इन भिखारी आत्माओं के ऊपर विधाता और वरदाता के बच्चों को तरस पड़ना चाहिए। जिन आत्माओं को ऐसा तरस पड़ता है, उन्हों को ही माया और विश्व की ऐसी आत्माएं नमस्कार करती हैं इसलिए अब तक भी दीपक जगाते हैं। जब लाइट जलाते हैं तो नमस्कार ज़रूर करते हैं। तो ऐसी ज्योति जगी हुई आत्माओं की यादगार अभी तक भी कायम है। बुझे हुए दीपक को नमस्कार नहीं करते तो सदा जागती ज्योति बनो। ऐसी आत्माओं को बापदादा भी नमस्ते करते हैं।
(महाराष्ट्र ज़ोन के भाई बहिनों प्रति अव्यक्त बापदादा के महावाक्य - रिवाइज-20-3-12)
इस ज़ोन की संख्या बहुत है। नाम है महाराष्ट्र। तो महा होंगे ना! तो जैसे नाम है वैसे ही संख्या भी महान है। बाम्बे और दिल्ली दोनों तरफ के बच्चे सर्विस तो अच्छी कर रहे हैं, वह तो कहने की बात नहीं है। अच्छी कर रहे हैं, करते रहेंगे लेकिन बाप-दादा देहली और बाम्बे से यही चाहते हैं कि जो आपके सम्बन्ध सम्पर्क में आये हुए विशेष आत्मायें जो माइक भी बन सकते हैं और फिर वारिस भी बन सकते हैं, ऐसे कोई ग्रुप निकालो क्योंकि लिस्ट सभी वर्गो ने मैजारिटी बापदादा को भेजी थी। देखी है वह लिस्ट। अच्छे अच्छे हैं लिस्ट में जो नाम बाला कर सकते हैं। अभी उनको प्रत्यक्ष करो। आपके बजाए वह भाषण करें। अनुभव सुनायें आपका, ज्ञान क्या है, हमने जीवन में क्या अन्तर आया है, वह वर्णन करें। जब फंक्शन होता है, अभी भी तो अपना अनुभव कई अच्छे-अच्छे सुनाते भी हैं लेकिन वह तो फंक्शन में सुनाया, लेकिन लगातार जीवन का अनुभव करें। यह अटेन्शन देंगे तो निकलने वाले हैं। कई योग्य हैं लेकिन थोड़ा पुरुषार्थ करके उन्हों को आगे बढ़ाओ। हर एक वर्ग को वास्तव में यह लिस्ट प्रत्यक्ष रूप में परिवार और बाप के सामने लानी चाहिए। कार्य किया है वर्गो ने। बापदादा ने देखा कार्य किया है लेकिन बहुत समय से कर रहे हैं, अभी कोई नवीनता लाओ। नवीनता यह है वारिस बनाओ। कम से कम जो सम्पर्क वाले हैं वह सम्बन्ध में आवे, सम्बन्ध के बाद सेवा में लगे। सम्बन्ध यह नहीं, आने जाने का संबंध नहीं लेकिन बाप और परिवार के साथी बन जाएं। यह भी होना है, अभी बापदादा ने देखा कि अगर ब्राह्मण मिलके कोई भी एक संकल्प करें तो हुआ ही पड़ा है लेकिन सबका एक ही संकल्प हो क्योंकि अभी वायुमण्डल बदल गया है। तो बापदादा ऐसे माइक क्वालिटी के बच्चों का संगठन कराना चाहते हैं। मधुबन में मिलने आते हैं वह बात अलग है लेकिन परिवार के बनके आवें क्योंकि सर्विस में कोई न कोई नवीनता तो चाहिए ना! अच्छा।
बाकी बापदादा की एक आशा और भी ज़ोन वालों के प्रति रह गई है। वह कौन सी है? हर सेन्टर यह खुशखबरी लिखे कि हमारा सेन्टर निर्विघ्न है, मिलनसार है। सब बाबा के बच्चे एक्यूरेट, जो कार्यक्रम बना हुआ है उस तरफ बिजी हैं, निर्विघ्न हैं। यह अभी किसी ज़ोन का नहीं आया है। तो महाराष्ट्र तो महान कार्य करेंगे ना! किसी भी ज़ोन ने अभी यह खुशखबरी नहीं भेजी है। बनना है, बनना तो आपको ही है और कौन बनेंगे! आपकी तपस्या कम नहीं है। चाहे टीचर है, चाहे स्टूडेन्ट हैं, दुनिया के हिसाब से हर एक महान आत्मायें हैं। अभी-अभी देखना आपको यह निर्विघ्न का थोड़ा सा करो तो सभी आपको जैसे आपके जड़ चित्र में शुभ भावना से देखते हैं, ऐसे आपको चैतन्य रूप में देवियों के रूप में, देवताओं के रूप में देखेंगे। बाकी सेवा सभी ने अच्छी की है। उसकी बापदादा मुबारक दे रहे हैं। अच्छा।
वरदान:- दिव्य गुणों के आह्वान द्वारा अवगुणों को समाप्त करने वाले दिव्यगुणधारी भव
जैसे दीपावली पर श्रीलक्ष्मी का आह्वान करते हैं ऐसे आप बच्चे स्वयं में दिव्यगुणों का आह्वान करो तो अवगुण आहुति रूप में खत्म होते जायेंगे। फिर नये संस्कारों रूपी नये वस्त्र धारण करेंगे। अब पुराने वस्त्रों से जरा भी प्रीत न हो, जो भी कमजोरियां, कमियां, निर्बलता, कोमलता रही हुई है - वो सब पुराने खाते आज से सदा-काल के लिए समाप्त करो तब दिव्यगुणधारी बनेंगे और भविष्य में ताजपोशी होगी। उसी का ही यादगार यह दीपावली है।
स्लोगन:- स्वराज्य अधिकारी बनना है तो मन रूपी मत्री को अपना सहयोगी बना लो।
ये अव्यक्त इशारे - ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव करो
“बिन्दु और सिन्धु'' यह दो शब्द भी अगर याद रखो तो सम्पूर्णता सहज आ सकती है। एक बिन्दू की याद और एकरस अवस्था, एक की ही मत और एक के ही कर्तव्य में मददगार। सिर्फ बिन्दु और एक, उसके आगे विस्तार में जाने की दरकार नहीं। विस्तार में जाना है तो सिर्फ सर्विस प्रति। उसके आगे अपनी बुद्धि को चलाने की आवश्यकता नहीं है।