Sakar murli du mercredi 1 janvier 1969 - 2

Le murli français n'est pas disponible.

१-१-६९ — रात्रि क्लास

हेलो, गुड इवनिंग। यह पहली जनवरी का रात्रि क्लास है।

[अस्पष्टः देखो, बाप द्वारा या मैगज़ीन द्वारा, या अपना विचार-सागर-मंथन कर पॉइंट्स निकाल करके], जैसे प्रदर्शनियों में और सभाओं में सुनाते हो, ऐसे में अभी सुनाते ही होंगे।

सावधानी हर प्रकार की मिलती रहती है। टाइम बड़ा वैल्युएबल है।

टाइम जितना बाप की याद में सफल हो, इतना झरमुई-झगमुई, उनसे कोई फायदा नहीं।

बाबा ने कल भी समझाया, ये गोपों में भी यही बहुत है। [अस्पष्टः बाबा ने समझाया ना कि दिल्ली में बहुत गोप हैं। अक्सर करके जहाँ बहुत हैं], वहाँ से ही समाचार भी आते हैं जरूर।

[अस्पष्टः और फिर माताओं में भी ऐसे ही है।] कुमारियों में ही कहो, ब्रह्माकुमारियों में ही कहो, फिर सब कुमारियाँ-माताएँ भी आ जाती हैं, तो कुमारियाँ भी आ जाती हैं। वेस्ट टाइम जाए। उससे या तो कोई को बैठ करके रास्ता बताना, और या तो बाप को याद करना।

[अस्पष्टः टाइम तो बहुत ही देते हैं हम बाप], और समझा भी देते हैं। हर एक को अपना-अपना पार्ट बजाना है।

है याद की यात्रा मुख्य और दैवी गुण। दैवी गुण धारण करने में वा याद करने में माया की लड़ाई जरूर है।

ऐसी है ये माया, जो तुम स्टूडेंट्स हो, तो तुम्हारी पढ़ाई भी [अस्पष्टः छुड़ा देती है]। ऐसे बहुत हैं। [अस्पष्टः खास … पुरुष ... बच्चियाँ]। पुरुष बहुत पढ़ाई छोड़ते हैं। तो छोड़ करके क्या करते हैं? यही झरमुई-झगमुई।

वैसे ही [अस्पष्टः माताएँ भी] ऐसे बैठेंगी, तो [अस्पष्टः टिक-टिक] चलती ही रहेंगी, कोई न कोई। उसको बाप कहते हैं, वेस्ट टाइम [अस्पष्टः करते हैं बहुत]। उसमें बड़ी सम्भाल रखनी है माया की, क्योंकि लड़ाई है माया से।

क्योंकि भिन्न-भिन्न सब्जेक्ट्स हैं ना, ये भी है। हमको याद भी जरूर करना है, माया से लड़ाई भी जरूर करना है।

और जैसे हम अभी पतित बन पड़े हैं ना माया के कारण, तो अभी पावन बनने के लिए भी पुरुषार्थ रखना चाहिए। माया के [अस्पष्टः वार] अनेक प्रकार के होते हैं।

यहाँ भी देखते हो, तो माया छोड़ती नहीं है यहाँ। मगर बाप बैठे हैं, बच्चे नजदीक में बैठे हैं, तो भी माया अपना काम करती ही रहती है।

माया का काम ही क्या है? गिराना। लड़ते हैं तो गिरते हैं ना बच्चे। कोई भी बात में लड़ते हैं तो नीचे धरनी पर गिरते हैं। कुश्ती कहो, मल्लयुद्ध कहो, बॉक्सिंग कहो, नीचे जरूर गिराती है। तो माया का धंधा ही यह है।

लेकिन कितना भी अच्छा हो, [अस्पष्टः नहीं?] गफलत किया तो माया अच्छा वार कर देती है। लाइफ में जो खुशी रहती है अच्छी, बाप को याद करने से, तो [अस्पष्टः एक ही थप्पड़ से गँवा देती है]। ऐसी जबरदस्त भी है।

और ये भी है कि तुम बच्चे जब पहले-पहले आये हो, तो [अस्पष्टः कोई कमाल की है ना बच्चे, झट बाबा के] बन गये हो। कोई ने कुछ भी तकलीफ यहाँ-वहाँ की है, तो [अस्पष्टः जहद-जहद कर दिया, एकदम ... करके] बाप के बन गये हैं। तो गोया जीते-जी मर तो गये।

परन्तु फिर भी तो याद तो कुछ न कुछ पड़ती है। माया तो जरूर [अस्पष्टः कोशिश करेगी अपने तरफ खींचने की]।

तो देखो, विचार करो अभी। बाबा जो कहते रहते हैं ना कि [अस्पष्टः आधा को]—आधा महारथी, आधा घोड़े-सवार, आधे प्यादे—जीतेगी जरूर।

तो अभी भी तुम अगर हिसाब करेंगे, तो जिन्होंने जहद किया या घरबार भी छोड़ा, तुम हिसाब निकालेंगे तो आधा तो जरूर [अस्पष्टः गुम होंगे], गिरे होंगे।

अच्छे-अच्छे, फर्स्ट क्लास, फर्स्ट क्लास बच्चे—देखो, आज हैं नहीं। और गिरना भी कितना! गिरती है, गिराती है तो एकदम लिटा ही देती है।

[अस्पष्टः हम मल्लयुद्ध तो देखे नहीं हैं।] बस सुलाई करके ऊपर में बैठ जाती है। तो माया भी ऐसी ही है। सारी कमाई चट कर देती है। क्योंकि जब चित पड़ते हैं तो सारी कमाई चट हो जाती है, नहीं?

तो इसीलिए बाप भी [अस्पष्टः सदैव कहते हैं]—खबरदार! सावधान! [अस्पष्टः माथे के] ऊपर में माया है। और उनका धंधा ही है [अस्पष्टः तुमको गिराने का, विषय-विकार में ले आने का]।

जैसे बाप कहते रहते हैं—झरमुई-झगमुईः फलाना ऐसा है, [अस्पष्टः तिलाना] ऐसा है, फलानी ऐसी है, फलानी ऐसी है। ये धंधा बहुत है। वो भूलते ही नहीं हैं।

बाबा जानते तो हैं, नहीं? तो जिनको जानते हैं कि हाँ, ये निंदा करना कभी भूलते ही नहीं हैं, भले कितना भी समझाओ उनको। रोज बाबा समझाते रहते हैं कि बच्चे, कोई भी बैठ करके निंदा नहीं करो।

अगर तुम उनको कुछ भी समझते हो, कुछ भी बुरा करेगा, तो अपना घात करेगा। [अस्पष्टः तुम अपना ही पद भ्रष्ट करोगे।]

तो अभी भी देखो, समझा रहे हैं ना। उनको [अस्पष्टः दिलचस्पी] लगती है। जो-जो भी जैसे कहते हैं, तो फिर वो कहते हैं, “आज बाबा ने मुरली मेरे ऊपर चलाई, आज बाबा ने मुरली मेरे ऊपर चलाई।”

मुरली है सभी को सुधारने के लिए। तो सभी हैं ऐसे। [अस्पष्टः अगर सोचें तो सभी में से कोई न कोई कहते रहेंगे]। क्योंकि मुरली तो भिन्न-भिन्न प्रकार की चलती रहती है। [अस्पष्टः माया बड़ी जोर से ... पता भी नहीं पड़ेगा।]

[अस्पष्टः जब आप एक बार समझाते होंगे और कुछ उनके होता होगा], तो भी जब समझते होंगे कि बरोबर हार खाई है। हार खाते रहते हैं, क्योंकि [अस्पष्टः युद्ध तो ... है ना]।

कौरव और पाण्डव हैं। अभी कौरवों और पाण्डवों की है। तो ठीक है, कौरव हैं आसुरी सेना और पाण्डव हैं दैवी सेना। अभी वो युद्ध नहीं [अस्पष्टः करती] है, नहीं। तुम कोशिश करते हो कौरवों को देवता बनाने, दैवी गुण धारण करने। बस दैवी गुण धारण किया, वही जीत।

अगर कोई [अस्पष्टः आसुरी ... किया], तो वही हार। [अस्पष्टः पीछे गये भी जाते हैं, नहीं?] माया ते हारे हार है, माया पर जीते जीत।

तो सम्भाल बहुत करनी पड़ती है। भिन्न प्रकार से, [अस्पष्टः उलटे-सुलटे प्रकार से भी] माया मुँह का देखती रहती है, तरीका देखती रहती है गिराने का।

जैसे बॉक्सिंग में अन्दर में उनके कितने तरीके चलते होंगे—ऐसे करे, ऐसे मारे। वो पहले ही से, शुरुआत से ही—वो ऐसे मारे, ऐसे [अस्पष्टः मुँह पर] मारे, ऐसे नाक पर मारे, ऐसे खोपड़ी पर मारे, ऐसे [अस्पष्टः ठोड़ी/चोटी] पर, ये ब्रेन पर मारे। तो उनकी उस समय [अस्पष्टः ये चर्चा रहती है—मारने की], और उनको बचाव करना।

तो इसमें तो तुम बच्चों का बचाव है ही एक बाप को याद [करना]। [अस्पष्टः वो तो अनेक प्रकार से बाप से छुड़ाने की युक्ति करती है।] इसीलिए बच्चों को बाप सावधान करते ही रहते हैं।

और ये सावधानी तो बाप ही देते हैं। अगर कोई बाप को भूल गया या माया ने भुला दिया, तो [अस्पष्टः पद तो भ्रष्ट हो जाएगा ना बच्चा]। बड़ी घाटा, बड़ी [अस्पष्टः चमाट] लगती है। क्योंकि थोड़ा ही टाइम में कमाई इक्कीस जन्म की बड़ी भारी है, बहुत भारी है।

और गफलत करने से कितनी भारी कमाई खत्म हो जाती है। फिर बहुत पछताना बहुत पड़ता है।

और अगर कोई उल्टा काम करता है, तो फिर [अस्पष्टः पैर] ठहर नहीं सकते हैं। माया पैर ठहरने देती ही नहीं है। देखती है ना, कच्चा मिल गया तो खाने लग पड़ती है।

इसलिए बच्चों को टाइम वेस्ट बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शरीर निर्वाह के लिए भले कमाओ, वो भी कमाई है। ये भी कमाई है। वो कमाई है इस शरीर के लिए, इस समय के लिए; वो कमाई है [अस्पष्टः भिन्न-भिन्न शरीर के लिए] और एक ही जन्म के लिए। और इसमें है फायदा, उसमें है घाटा। तो वो घाटा भी कितना, कितना थोड़ा-थोड़ा, कितना [अस्पष्टः ...]।

यूं तो शिवालय [अस्पष्टः ...]। ये जो दुनिया शिवालय बन जाती है, जब भक्ति मार्ग शुरू हो जाता है, तो शिव के लिए वो शिवालय बना देते हैं। तो सारी दुनिया को शिवालय नहीं कह सकते।

तो बाबा ने समझा दिया है—भारत के लिए वैश्यालय बनना, शिवालय बनना। ये पक्का याद कर रहे हो? किसको भी समझाओ कि ये भारत शुरुआत में शिवालय था।

शिव बाबा की स्थापना थी, परमपिता परमात्मा की स्थापना थी। और परमपिता परमात्मा ही नई दुनिया की स्थापना करते हैं, अर्थात् [अस्पष्टः स्वर्ग का वर्सा देते हैं, आधाकल्प के लिए देते हैं]।

और फिर भारतीय ही हार खाने शुरू कर देते हैं। हार होती है विकार में, जीत होती है विकार को जीतने पर। [अस्पष्टः गायन देखो होता है ना]—विकार पर जीतने से जगतजीत बनते हैं। क्यों ऐसे कहा जाता है?

बरोबर [अस्पष्टः विकार में जय का ... आया है ना]। ये तो बच्चे जानते हैं। बरोबर ये दुनिया ही सारी विकारी है। और ये भी समझते हैं, विकार नहीं था। जब नहीं था, तो विकार नहीं है। इनको गिराया है और फिर [अस्पष्टः उनको विकारी कर दिया ...]।

देखो, बात बड़ी सिंपल है, बिल्कुल। सारा मदार विकार के ऊपर। और जो बाकी मनुष्य हैं, वो तो ऐसे हो नहीं सकते हैं। विकार बिगर तो चल नहीं सकती है—वो होगी मनुष्य मत। वो होगी श्रीमत।

श्रीमत कहे—काम जीते जगतजीत। मनुष्य मत कहे कि नहीं, काम जीता नहीं जा सकता। तो देखो, पुरुषार्थ ही नहीं करते। बहुत समझाने से, बहुत समझाने से बुद्धि में बैठते हैं।

सो भी जानते हैं बच्चे, जो-जो भी हमारे [अस्पष्टः देवी-देवता धर्म के] होंगे, [अस्पष्टः फूल ... वही आने के हैं]। वो भी बच्चों को [अस्पष्टः ...]। हम जो यहाँ बैठे हुए हैं, ये [अस्पष्टः देवी-देवता धर्म में] अवश्य जायेंगे। इतना जरूर है कि नम्बरवार जायेंगे। नम्बर में तो बहुत फर्क है, पर जायेंगे जरूर।

उनके साथ फिर वो भी समझते हैं कि मोचरा भी खायेंगे। [अस्पष्टः थाली बाँधा/थाले बाधे ...] कहा जाता है, नहीं? किसको कहा जाता है? [अस्पष्टः थाले बाधे मार देंगे तुमको]। तो माना भी सामने ही ऐसे कहते हैं। [अस्पष्टः थाले-थाले]।

अगर बाप को भूले और कुछ भी विकर्म किया, तो [अस्पष्टः थाले बाधे] मार खायेंगे। क्योंकि बैठती है बरोबर बच्चों के लिए। अच्छे तुम बच्चों के लिए खास ये ट्रिब्यूनल कहा जाता है ना। ये ट्रिब्यूनल के ऊपर ही एक शास्त्र भी है।

अच्छा। बाबा याद—सावधान करते रहते हैं कि यहाँ [अस्पष्टः उठके/रहते] यहाँ तो बहुत बच्चों को ज्यादा याद करना चाहिए, क्योंकि बाप भी तो यहाँ बैठे हुए हैं। घड़ी-घड़ी देखते रहते हैं।

पर तो माया ऐसी है—जो देखते हैं तो कोई शिव बाबा को थोड़ी याद करे। देखते हैं इसके शरीर को। [अस्पष्टः ब्रह्मा/इसको] याद करते हैं और उनको भूल जाते हैं।

और बाबा से कोई पूछे, बाबा खुद [अस्पष्टः कैसे हैं/कहते हैं]—अरे, बहुत थोड़ा। बाबा को देखते हुए भी कोई शिव बाबा को याद करे, वो बहुत थोड़े हैं।

तो पढ़ाई है, तो पढ़ाई है; [अस्पष्टः साथ में दैवी गुण भी] जरूर धारण करना है। जरूर जब [अस्पष्टः कृष्ण के लायक] बनने, दुनिया के लिए देवता बनने हैं, नहीं, तो जरूर अपने आसुरी गुणों को बदलना पड़े।

तो बस बदलाना किसको कहा जाता है, नहीं? सबको देखते रहे, समझाते रहे। बाकी जो [अस्पष्टः झरमुई-झगमुई] बंद नहीं होती है, उसमें बड़ा टाइम वेस्ट करते हैं। वो पढ़ाई [अस्पष्टः नहीं है]। वो एक-दो का—ये थोड़ा ऐसा है, थोड़ा ऐसा है, थोड़ा ऐसा है।

नहीं, बाबा को [अस्पष्टः एकदम सुनायें ... बाबा जाए, वो बच्चा जाए]। सीधी राय देते हैं ना बच्चे, और नई राय तो नहीं देते हैं ना। तो टाइम यही है राय देने के लिए ही। देखो, श्रीमत देते-देते-देते-देते [अस्पष्टः ...] मालूम पड़ जाते हैं कौन-कौन किस-किस पद को पायेंगे। [अस्पष्टः वो बच्चे बड़ा सहज है।]

अच्छा। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति [अस्पष्टः मात-पिता बापदादा का] गुड नाइट। सबको देते हैं, नहीं? फिर नम्बरवार भी तो जानते हैं। यात्रा भी देते हैं। फिर नम्बरवार भी कहते हैं। और नम्बरवार भी तुम्हारे लिए कहते हैं ज्ञान में।

बाकी जब नमस्ते कहते हैं, तभी [अस्पष्टः नम्बरवार नहीं/भी] कहते हैं। बच्चों प्रति तो नमस्ते। क्यों? तुम सभी स्वर्ग में जाते हो।

पीछे वहाँ जाकर कोई [अस्पष्टः ... बकरी भी बनते हैं], तो कोई शेर, कोई महारथी, कोई घोड़े-सवार। पर देता सबको है। समझ रहे हो?

[अस्पष्टः बाप सद्गति दाता है, सर्व ... वाला है]। वो तो समझ की बात है कि बहुत-बहुत जो पुरुषार्थ [अस्पष्टः अच्छा करेंगे], वो ऊँचा पद पायेंगे।

[अस्पष्टः इनको माया थप्पड़ लगा के रहेगी], वो गिर जायेंगे भले।