Daily Murli for Friday 19 September 2025
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19-09-2025 प्रातःमुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - इस बेहद के नाटक में तुम आत्माओं को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है, अभी तुम्हें यह शरीर रूपी कपड़े उतार घर जाना है, फिर नये राज्य में आना है''
प्रश्न:- बाप कोई भी कार्य प्रेरणा से नहीं करते, उनका अवतरण होता है, यह किस बात से सिद्ध होता है?
उत्तर:- बाप को कहते ही हैं करनकरावनहार। प्रेरणा का तो अर्थ है विचार। प्रेरणा से कोई नई दुनिया की स्थापना नहीं होती है। बाप बच्चों से स्थापना कराते हैं, कर्मेन्द्रियों बिगर तो कुछ भी करा नहीं सकते इसलिए उन्हें शरीर का आधार लेना होता है।
ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे रूहानी बाप के सामने बैठे हैं। गोया आत्मायें अपने बाप के सम्मुख बैठी हैं। आत्मा जरूर जिस्म के साथ ही बैठेगी। बाप भी जब जिस्म लेते हैं तब ही सम्मुख होते हैं इसको ही कहा जाता है आत्मा-परमात्मा अलग रहे… तुम बच्चे समझते हो ऊंच ते ऊंच बाप को ही ईश्वर, प्रभु, परमात्मा भिन्न नाम दिये हैं, परमपिता कभी लौकिक बाप को नहीं कहा जाता है। सिर्फ परमपिता लिखा तो भी हर्जा नहीं है। परमपिता अर्थात् वह सभी का पिता है एक। बच्चे जानते हैं हम परमपिता के साथ बैठे हैं। परमपिता परमात्मा और हम आत्मायें शान्तिधाम के रहने वाले हैं। यहाँ पार्ट बजाने आते हैं, सतयुग से लेकर कलियुग अन्त तक पार्ट बजाया है, यह हो गई नई रचना। रचता बाप ने समझाया है कि तुम बच्चों ने ऐसे पार्ट बजाया है। आगे यह नहीं जानते थे कि हमने 84 जन्मों का चक्र लगाया है। अभी तुम बच्चों से ही बाप बात करते हैं, जिन्होंने 84 का चक्र लगाया है। सब तो 84 जन्म नहीं ले सकते हैं। यह समझाना है कि 84 का चक्र कैसे फिरता है। बाकी लाखों वर्ष की तो बात ही नहीं। बच्चे जानते हैं कि हम हर 5 हज़ार वर्ष बाद पार्ट बजाने आते हैं। हम पार्टधारी हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान का भी विचित्र पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का विचित्र पार्ट नहीं कहेंगे। दोनों ही 84 का चक्र लगाते हैं। बाकी शंकर का पार्ट इस दुनिया में तो है नहीं। त्रिमूर्ति में दिखाते हैं - स्थापना, विनाश, पालना। चित्रों पर समझाना होता है। चित्र जो दिखाते हो उस पर समझाना है। संगमयुग पर पुरानी दुनिया का विनाश तो होना ही है। प्रेरक अक्षर भी रांग है। जैसे कोई कहते हैं आज हमको बाहर जाने की प्रेरणा नहीं है, प्रेरणा यानी विचार। प्रेरणा का कोई और अर्थ नहीं है। परमात्मा कोई प्रेरणा से काम नहीं करता। न प्रेरणा से ज्ञान मिल सकता है। बाप आते हैं इन कर्मेन्द्रियों द्वारा पार्ट बजाने। करनकरावनहार है ना। करायेंगे बच्चों से। शरीर बिगर तो कर न सकें। इन बातों को कोई भी जानते नहीं। न ईश्वर बाप को ही जानते हैं। ऋषि-मुनि आदि कहते थे हम ईश्वर को नहीं जानते। न आत्मा को, न परमात्मा बाप को, कोई में ज्ञान नहीं है। बाप है मुख्य क्रियेटर, डायरेक्टर, डायरेक्शन भी देते हैं। श्रीमत देते हैं। मनुष्यों की बुद्धि में तो सर्वव्यापी का ज्ञान है। तुम समझते हो बाबा हमारा बाबा है, वो लोग सर्वव्यापी कह देते हैं तो बाप समझ ही नहीं सकते। तुम समझते हो यह बेहद के बाप की फैमिली है। सर्वव्यापी कहने से फैमिली की खुशबू नहीं आती। उनको कहा जाता है निराकारी शिवबाबा। निराकारी आत्माओं का बाबा। शरीर है तब आत्मा बोलती है कि बाबा। बिगर शरीर तो आत्मा बोल न सके। भक्ति मार्ग में बुलाते आये हैं। समझते हैं वह बाबा दुःख हर्ता सुख कर्ता है। सुख मिलता है सुखधाम में। शान्ति मिलती है शान्तिधाम में। यहाँ है ही दुःख। यह ज्ञान तुमको मिलता है संगम पर। पुराने और नये के बीच। बाप आते ही तब हैं जब नई दुनिया की स्थापना और पुरानी दुनिया का विनाश होना है। पहले हमेशा कहना चाहिए नई दुनिया की स्थापना। पहले पुरानी दुनिया का विनाश कहना रांग हो जाता है। अभी तुमको बेहद के नाटक की नॉलेज मिलती है। जैसे उस नाटक में एक्टर्स आते हैं तो घर से साधारण कपड़े पहनकर आते फिर नाटक में आकर कपड़े बदलते हैं। फिर नाटक पूरा हुआ तो वह कपड़े उतार कर घर जाते हैं। यहाँ तुम आत्माओं को घर से अशरीरी आना होता है। यहाँ आकर यह शरीर रूपी कपड़े पहनते हो। हर एक को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। यह है बेहद का नाटक। अभी यह बेहद की सारी दुनिया पुरानी है फिर होगी नई दुनिया। वह बहुत छोटी है, एक धर्म है। तुम बच्चों को इस पुरानी दुनिया से निकल फिर हद की दुनिया में, नई दुनिया में आना है क्योंकि वहाँ है एक धर्म। अनेक धर्म, अनेक मनुष्य होने से बेहद हो जाती। वहाँ तो है एक धर्म, थोड़े मनुष्य। एक धर्म की स्थापना के लिए आना पड़ता है। तुम बच्चे इस बेहद के नाटक के राज़ को समझते हो कि यह चक्र कैसे फिरता है। इस समय जो कुछ प्रैक्टिकल में होता है उसका ही फिर भक्ति मार्ग में त्योहार मनाते हैं। नम्बरवार कौन-कौन से त्योहार हैं, यह भी तुम बच्चे जानते हो। ऊंच ते ऊंच भगवान शिवबाबा की जयन्ती कहेंगे। वह जब आये तब फिर और त्योहार बनें। शिवबाबा पहले-पहले आकर गीता सुनाते हैं अर्थात् आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनाते हैं। योग भी सिखाते हैं। साथ-साथ तुमको पढ़ाते भी हैं। तो पहले-पहले बाप आया शिवजयन्ती हुई फिर कहेंगे गीता जयन्ती। आत्माओं को ज्ञान सुनाते हैं तो गीता जयन्ती हो गई। तुम बच्चे विचार कर त्योहारों को नम्बरवार लिखो। इन बातों को समझेंगे भी अपने धर्म के। हर एक को अपना धर्म प्यारा लगता है। दूसरे धर्म वालों की बात ही नहीं। भल किसको दूसरा धर्म प्यारा हो भी परन्तु उसमें आ न सकें। स्वर्ग में और धर्म वाले थोड़ेही आ सकते हैं। झाड़ में बिल्कुल साफ है। जो जो धर्म जिस समय आते हैं फिर उस समय आयेंगे। पहले बाप आते हैं, वही आकर राजयोग सिखलाते हैं तो कहेंगे शिवजयन्ती सो फिर गीता जयन्ती फिर नारायण जयन्ती। वह तो हो जाता सतयुग। वो भी लिखना पड़े नम्बरवार। यह ज्ञान की बातें हैं। शिव जयन्ती कब हुई वह भी पता नहीं है, ज्ञान सुनाया, जिसको गीता कहा जाता है फिर विनाश भी होता है। जगत अम्बा आदि की जयन्ती का कोई हॉली डे नहीं है। मनुष्य किसी की भी तिथि-तारीख आदि को बिल्कुल नहीं जानते हैं। लक्ष्मी-नारायण, राम-सीता के राज्य को ही नहीं जानते। 2500 वर्ष में जो आये हैं, उनको जानते हैं परन्तु उनसे पहले जो आदि सनातन देवी-देवता थे, उनको कितना समय हुआ, कुछ नहीं जानते। 5 हज़ार वर्ष से बड़ा कल्प तो हो न सके। आधा तरफ तो ढेर संख्या आ गई, बाकी आधा में इनका राज्य। फिर जास्ती वर्षों का कल्प हो कैसे सकता। 84 लाख जन्म भी नहीं हो सकते। वो लोग समझते हैं कलियुग की आयु लाखों वर्ष है। मनुष्यों को अंधियारे में डाल दिया है। कहाँ सारा ड्रामा 5 हज़ार वर्ष का, कहाँ सिर्फ कलियुग के लिए कहते कि अभी 40 हज़ार वर्ष शेष हैं। जब लड़ाई लगती है तो समझते हैं भगवान को आना चाहिए लेकिन भगवान को तो आना चाहिए संगम पर। महाभारत लड़ाई तो लगती ही है संगम पर। बाप कहते हैं मैं भी कल्प-कल्प संगमयुग पर आता हूँ। बाप आयेंगे नई दुनिया की स्थापना पुरानी दुनिया का विनाश कराने। नई दुनिया की स्थापना होगी तो पुरानी दुनिया का विनाश जरूर होगा, इसके लिए यह लड़ाई है। इसमें शंकर के प्रेरणा आदि की तो कोई बात नहीं। अन्डरस्टुड पुरानी दुनिया खलास हो जायेगी। मकान आदि तो अर्थक्वेक में सब खलास हो जायेंगे क्योंकि नई दुनिया चाहिए। नई दुनिया थी जरूर। देहली परिस्तान थी, जमुना का कण्ठा था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। चित्र भी हैं। लक्ष्मी-नारायण को स्वर्ग का ही कहेंगे। तुम बच्चों ने साक्षात्कार भी किया है कि कैसे स्वंयवर होता है। यह सब प्वाइंट्स बाबा रिवाइज़ कराते हैं। अच्छा प्वाइंट्स याद नहीं पड़ती हैं तो बाबा को याद करो। बाप भूल जाता है तो टीचर को याद करो। टीचर जो सिखलाते हैं वह भी जरूर याद आयेगा ना। टीचर भी याद रहेगा, नॉलेज भी याद रहेगी। उद्देश्य भी बुद्धि में है। याद रखना ही पड़े क्योंकि तुम्हारी स्टूडेन्ट लाइफ है ना। यह भी जानते हो जो हमको पढ़ाते हैं वह हमारा बाप भी है, लौकिक बाप कोई गुम नहीं हो जाता है। लौकिक, पारलौकिक और फिर यह है अलौकिक। इनको कोई याद नहीं करते। लौकिक बाप से तो वर्सा मिलता है। अन्त तक याद रहती है। शरीर छोड़ा फिर दूसरा बाप मिलता है। जन्म बाई जन्म लौकिक बाप मिलते हैं। पारलौकिक बाप को भी दुःख व सुख में याद करते हैं। बच्चा मिला तो कहेंगे ईश्वर ने बच्चा दिया। बाकी प्रजापिता ब्रह्मा को क्यों याद करेंगे, इनसे कुछ मिलता थोड़ेही है। इनको अलौकिक कहा जाता है।
तुम जानते हो हम ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा से वर्सा ले रहे हैं। जैसे हम पढ़ते हैं, यह रथ भी निमित्त बना हुआ है। बहुत जन्मों के अन्त में इनका शरीर ही रथ बना है। रथ का नाम तो रखना पड़ता है ना। यह है बेहद का संन्यास। रथ कायम ही रहता है, बाकी का ठिकाना नहीं है। चलते-चलते फिर भागन्ती हो जाते। यह रथ तो मुकरर है ड्रामा अनुसार, इनको कहा जाता है भाग्यशाली रथ। तुम सबको भाग्यशाली रथ नहीं कहेंगे। भाग्यशाली रथ एक माना जाता है, जिसमें बाप आकर ज्ञान देते हैं। स्थापना का कार्य कराते हैं। तुम भाग्यशाली रथ नहीं ठहरे। तुम्हारी आत्मा इस रथ में बैठ पढ़ती है। आत्मा पवित्र बन जाती इसलिए बलिहारी इस तन की है जो इसमें बैठ पढ़ाते हैं। यह अन्तिम जन्म बहुत वैल्युबल है फिर शरीर बदल हम देवता बन जायेंगे। इस पुराने शरीर द्वारा ही तुम शिक्षा पाते हो। शिवबाबा के बनते हो। तुम जानते हो हमारी पहली जीवन वर्थ नाट ए पेनी थी। अब पाउण्ड बन रही है। जितना पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप ने समझाया है याद की यात्रा है मुख्य। इनको ही भारत का प्राचीन योग कहते हैं जिससे तुम पतित से पावन बनते हो, स्वर्गवासी तो सब बनते हैं फिर है पढ़ाई पर मदार। तुम बेहद के स्कूल में बैठे हो। तुम ही फिर देवता बनेंगे। तुम समझ सकते हो ऊंच पद कौन पा सकते हैं। उनकी क्वालिफिकेशन क्या होनी चाहिए। पहले हमारे में भी क्वालिफिकेशन नहीं थी। आसुरी मत पर थे। अब ईश्वरीय मत मिलती है। आसुरी मत से हम उतरती कला में जाते हैं। ईश्वरीय मत से चढ़ती कला में जाते हैं। ईश्वरीय मत देने वाला एक है, आसुरी मत देने वाले अनेक हैं। माँ-बाप, भाई-बहन, टीचर-गुरू कितनों की मत मिलती है। अभी तुमको एक की मत मिलती है जो 21 जन्म काम आती है। तो ऐसे श्रीमत पर चलना चाहिए ना। जितना चलेंगे उतना श्रेष्ठ पद पायेंगे। कम चलेंगे तो कम पद। श्रीमत है ही भगवान की। ऊंच ते ऊंच भगवान ही है, जिसने श्रीकृष्ण को ऊंच ते ऊंच बनाया फिर नीच ते नीच रावण ने बनाया। बाप गोरा बनाते फिर रावण सांवरा बनाते। बाप वर्सा देते हैं। वह तो है ही वाइसलेस। देवताओं की महिमा गाते हैं सर्वगुण सम्पन्न...... सतयुग में आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होते हैं। देवताओं को सब जानते हैं, वो सम्पूर्ण निर्विकारी होने के कारण सम्पूर्ण विश्व के मालिक बनते हैं। अभी नहीं हैं, फिर बन रहे हैं। बाप भी संगमयुग पर ही आते हैं। ब्रह्मा के द्वारा ब्राह्मण। ब्रह्मा के बच्चे तो तुम सब ठहरे। वह है ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर। बोलो, प्रजापिता ब्रह्मा का नाम नहीं सुना है? परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा ही सृष्टि रचेंगे ना। ब्राह्मण कुल है। ब्रह्मा मुख वंशावली भाई-बहिन हो गये। यहाँ राजा-रानी की बात नहीं। यह ब्राह्मण कुल तो संगम का थोड़ा समय चलता है। राजाई न पाण्डवों की है, न कौरवों की। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) 21 जन्म श्रेष्ठ पद का अधिकारी बनने के लिए सब आसुरी मतों को छोड़ एक ईश्वरीय मत पर चलना है। सम्पूर्ण वाइसलेस बनना है।
2) इस पुराने शरीर में बैठ बाप की शिक्षाओं को धारण कर देवता बनना है। यह है बहुत वैल्युबल जीवन, इसमें वर्थ पाउण्ड बनना है।
वरदान:- सर्व आत्माओं को यथार्थ अविनाशी सहारा देने वाले आधार, उद्धारमूर्त भव
वर्तमान समय विश्व के चारों ओर कोई न कोई हलचल है, कहाँ मन के अनेक टेन्शन की हलचल है, कहाँ प्रकृति के तमोप्रधान वायुमण्डल के कारण हलचल है, अल्पकाल के साधन सर्व को चिंता की चिता पर लिये जा रहे हैं इसलिए अल्पकाल के आधार से, प्राप्तियों से, विधियों से थककर वास्तविक सहारा ढूंढ रहे हैं। तो आप आधार, उद्धारमूर्त आत्मायें उन्हें श्रेष्ठ अविनाशी प्राप्तियों की यथार्थ, वास्तविक, अविनाशी सहारे की अनुभूति कराओ।
स्लोगन:- समय अमूल्य खजाना है - इसलिए इसे नष्ट करने के बजाए फौरन निर्णय कर सफल करो।
अव्यक्त इशारे - अब लगन की अग्नि को प्रज्वलित कर योग को ज्वाला रूप बनाओ
जैसे सूर्य की किरणें फैलती हैं, वैसे ही मास्टर सर्वशक्तिवान् की स्टेज पर शक्तियों व विशेषताओं रूपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करें, इसके लिए “मैं मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न-विनाशक आत्मा हूँ'', इस स्वमान के स्मृति की सीट पर स्थित होकर कार्य करो तो विघ्न सामने तक भी नहीं आयेंगे।