Daily Murli for Sunday 21 June 2026
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21-06-26 प्रातःमुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 15-11-10 मधुबन
स्व-परिवर्तन की गति को तीव्र कर संस्कार-स्वभाव के समाप्ति का समारोह मनाओ, हर संकल्प, बोल और कर्म में ब्रह्मा बाप को कापी करो
आज बापदादा सभी के मस्तक पर तीन भाग्य की चमकती हुई निशानियां देख रहे हैं। एक है बाप द्वारा पालना का भाग्य, दूसरा है शिक्षक रूप में शिक्षा का भाग्य, तीसरा है सतगुरू द्वारा वरदानों का भाग्य। तीनों भाग्य चमकता हुआ देख रहे हैं। हर एक का मस्तक तीनों भाग्य से चमक रहा है। ऐसा भाग्य और कोई के मस्तक में चमकता हुआ दिखाई नहीं देता है। लेकिन आप सबका मस्तक भाग्य से चमक रहा है। आप सभी भी अपने भाग्य को देख रहे हो ना! बापदादा ने देखा भाग्य तो सबको मिला है लेकिन भाग्य की चमक सभी की एक जैसी नहीं है। कोई की चमक बहुत तेज है, कोई की चमक थोड़ी कम दिखाई देती है। वैसे बापदादा ने सभी को एक साथ एक जैसा ही भाग्य दिया है। पढ़ाई एक ही पढ़ाते हैं। पालना एक जैसी दी है और वरदान भी एक जैसे दिये हैं। आदि रत्न वा पीछे आने वाले सभी को एक ही मुरली द्वारा पालना मिलती है, पढ़ाई मिलती है। वरदान भी एक ही सभी को मिलते हैं। आदि रत्नों की मुरली अलग नहीं होती, एक ही होती है। लेकिन नम्बरवार चमकता हुआ भाग्य दिखाई दे रहा है। बाप के प्यार की पालना सभी को एक जैसी मिल रही है। हर एक के मुख से यही निकलता “मेरा बाबा'', चाहे आगे आने वाले, चाहे पीछे आने वाले लेकिन हर एक अपने अधिकार से कहते “मेरा बाबा''। किसी से भी पूछो बाप से प्यार मिला है? तो फलक से कहते मेरे को बाप का प्यार सबसे ज्यादा मिलता है। यह मेरा बाबा दिल से कहने वाले क्या फलक से कहते हैं? कि मेरा प्यार सबसे ज्यादा है। बाबा का प्यार पहले मेरे से है क्योंकि प्यार ही बाप की पालना है। इस मेरा बाबा मानने से आप बाबा के बन गये और बाप आपका बन गया।
आज आप सभी आये हो तो प्यार के प्लेन में आये हो ना। प्यार ने खींच के सभी को यहाँ लाया है। सभी प्यार से आराम से पहुंच गये। यह परमात्म प्यार सिर्फ अभी संगम पर प्राप्त होता है। भविष्यदेव आत्माओं का प्यार प्राप्त होता है लेकिन परमात्म प्यार इस एक जन्म में प्राप्त होता है। तो बापदादा भी ऐसे पात्र आत्माओं को देख क्या कहते हैं? वाह बच्चे वाह! आप ही कोटों में कोई पात्र बने हैं और हर कल्प आप ही पात्र बनेंगे। ऐसा नशा चलते फिरते रहता है ना! आपकी दिल भी यह गीत गाती है वाह मेरा भाग्य! यह गीत गाते रहते हो ना! बाप को भी खुशी होती है कि यह सभी बच्चे अधिकारी हैं। अपने को कोई भी परमात्म प्यार में कम नहीं समझते। प्यार में सब पास हैं। बापदादा पूछते हैं कि सबसे ज्यादा प्यार किसका है? तो कौन कहेंगे? सब जानते हैं कि हमारा प्यार कम नहीं है, बाप भी कहते हैं कि प्यार की सब्जेक्ट में सभी पास हैं तब मेरा बाबा कहते हैं। कितना प्यार है, वह हर एक जानता है। तो बापदादा ने देखा कि प्यार में तो सब पास हैं लेकिन अभी समय के प्रमाण स्व परिवर्तन, उसकी भी आवश्यकता है। सिर्फ स्व परिवर्तन, विशेष सुनाया भी था कि इस समय स्व परिवर्तन में विशेष संस्कार परिवर्तन, स्वभाव परिवर्तन, उसकी आवश्यकता है।
अभी स्व परिवर्तन की गति फास्ट चाहिए। करते भी हो, अटेन्शन भी है लेकिन गति अभी फास्ट चाहिए। बापदादा को याद है पहले भी बाप से वायदा किया कि नये वर्ष में स्व परिवर्तन, संस्कार परिवर्तन करना ही है लेकिन बापदादा ने देखा कि संस्कार परिवर्तन में जितना फास्ट पुरुषार्थ चाहिए, उसकी गति और फास्ट चाहिए। आप सभी क्या समझते हो कि समय प्रमाण जितनी फास्ट गति चाहिए उस अनुसार हर एक का तीव्र पुरुषार्थ है या और होना चाहिए? क्योंकि समय अनुसार, समय में परिवर्तन फास्ट हो रहा है तो आपका भी तीव्र परिवर्तन तब होगा जो संकल्प किया और हुआ, अयथार्थ संकल्प ऐसा समाप्त होना चाहिए जैसे कोई कागज पर बिन्दी लगाओ। कितने में लगेगी? अयथार्थ अर्थात् फालतू संकल्प, इतना फास्ट परिवर्तन होना चाहिए। क्या ऐसी गति जो बापदादा चाहते हैं यह कर सकते हो? है हिम्मत? जो समझते हैं कि अब से इतनी रफ्तार से बिन्दी लगा सकते हैं, हिम्मते बच्चे मददे बाप, वह हाथ उठाओ। बापदादा बच्चों का दृढ़ संकल्प देख मुबारक देते हैं। बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि दृढ़ संकल्प के संकल्प हैं - करना ही है। तो आज की सभा में सभी ने यह दृढ़ संकल्प किया है ना! आपने देखा, दादियों ने देखा, सभी ने, मैजारिटी ने हाथ उठाया। देखा! तो कल से स्वभाव संस्कार समाप्ति की सेरीमनी मनानी चाहिए। मनायें? जिन्होंने हाथ उठाया वह हाथ उठाओ, सेरीमनी मनायें? इसकी सेरीमनी तो बहुत धूमधाम से मनाना। जैसे लक्ष्य हिम्मत का रखा है वैसे लक्षण भी हिम्मत का रखेंगे तो कोई बड़ी बात नहीं है। जब लक्ष्य ही है बाप समान बनने का तो अभी लक्ष्य और लक्षण एक करना है। फालो ब्रह्मा बाप। जो भी संकल्प, बोल, कर्म करो पहले ब्रह्मा बाप से मिलाओ। कॉपी करो। दुनिया में कॉपी करना मना है, लेकिन बापदादा कहते हैं ब्रह्मा बाप को कॉपी करो। निराकार बाप के लिए तो कहेंगे उसको देह नहीं, तो देहभान क्या है! लेकिन ब्रह्मा बाप देहधारी रहे हैं। वास्तव में देखो आप जो सरेन्डर हुए, सरेन्डर होने वाले हाथ उठाओ, जो सरेन्डर हैं वह हाथ उठाओ। जब सरेन्डर किया तो क्या संकल्प किया? बाबा यह तन, मन, धन सब आपका। ऐसे किया ना! किया? किया था? इसमें हाथ उठाओ। तो अभी सरेन्डर किया मेरा नहीं, तन भी मेरा नहीं, धन भी मेरा नहीं, जैसे ब्रह्मा बाप ने बाप को सेवार्थ शरीर दे दिया, तो ब्रह्मा बाप जानते थे कि यह शरीर मेरा नहीं, सेवार्थ है। तो जब आपने तन मन धन तीनों अर्पण किया तो आपका शरीर बाप के सेवार्थ निमित्त है। जैसे ब्रह्मा बाप का शरीर सेवा अर्थ रहा। तो आपका शरीर आपका नहीं है, सेवार्थ है। तो यह जो संस्कार हैं देह अभिमान वा देहभान का, यह होना चाहिए? अगर यह स्मृति में रखो कि यह तन विश्व सेवा अर्थ है, मेरा नहीं है, बाप ने आपको सेवार्थ दिया है। तो देहभान वा देह अभिमान, देह अभिमान ज्यादा नुकसान करता है। देहभान उससे हल्का है, लेकिन दोनों जब दे दिया, फार्म भरते हो तो क्या लिखते हो? टीचर्स फार्म भराती हो ना, तो क्या भराती हो? कि यह मेरा जीवन अभी सेवा प्रति है। जो भी ब्राह्मण बने हैं उन सभी का बाप से वायदा है - तन मन धन बाप का, मेरा नहीं। तो यह संस्कार जो पैदा होते हैं वह देह भान या देह अभिमान में होते हैं इसलिए जो आज भी वायदा किया है, संस्कार समाप्ति का, क्योंकि जो विघ्न डालते हैं बाप को प्रत्यक्ष करने में, सभी को उमंग यह है, बापदादा सुनते रहते हैं, कहते भी रहते हो कि बाप को प्रत्यक्ष करना है। अभी तक ब्रह्माकुमारियाँ, ब्रह्माकुमार प्रत्यक्ष हुए हैं, भगवान बाप आ गया, यह बाप की प्रत्यक्षता गुप्त है। पुरुषार्थ कर रहे हैं लेकिन यह प्रत्यक्ष आवाज फैले, हमारा बाप आ गया, भगवानुवाच है, न कि ब्रह्माकुमारियों के वाच हैं। अभी यह प्रत्यक्षता होनी ही है, यह स्वभाव संस्कार परिवर्तन होने से आप एक-एक के चेहरे और चलन से प्रत्यक्ष होगा। बाप को प्रत्यक्ष करना है, कर रहे हैं लेकिन सबके कानों में यह आवाज गूंजे भगवान आ गया, बाप आ गया, होना है ना! हाथ उठाओ होना है, होना है? हाथ तो बहुत अच्छा उठाया। बापदादा खुश है कि सभी के मन में लगन है और होना ही है। इसके लिए जैसे कल से संस्कार स्वभाव को परिवर्तन करेंगे वैसे ही उसका साधन है कि हर एक जो भी ब्राह्मण हैं, हर ब्राह्मण को अपने चार्ट में शुभ भावना, शुभ कामना का विशेष अटेन्शन रखना होगा। जैसे दुनिया वालों को काम दिया कि कितना समय शुभ भावना, कामना रख सकते हैं, उनको कहा रख सकते हैं और आप तो रख ही सकते हैं। किसी भी समय किसका भी स्वभाव संस्कार तब सामना करता है जब शुभ भावना, शुभ कामना, उस आत्मा प्रति उस समय नहीं है। तो आप भी अगर अमृतवेले से यह संकल्प करो कि मुझे हर आत्मा प्रति शुभ भावना शुभ कामना रखनी ही है तो जो संकल्प किया, परिवर्तन करना ही है, वह पूरा कर सकेंगे। बातें आयेंगी, बातों का काम है आना, माया है ना! और आपका काम है विजय प्राप्त करना। तो कल आपस में ग्रुप बनाके जो निमित्त हैं उन्हों को आपस में रूहरिहान कर जो संकल्प किया है, उसको आगे प्रैक्टिकल में कैसे लायें, उस पर रूहरिहान करना। फिनिस, बिन्दी लगा देना। हाथ तो उठाया है ना! आगे वालों ने हाथ उठाया। तो आपको निमित्त बनना पड़ेगा। जैसे ब्रह्मा बाप के आगे कितने संस्कार वाले पहले-पहले आये, आदि में ब्रह्मा बाप ने कितने संस्कारों का खेल देखा। लेकिन बाप के सहयोग से आगे बढ़ते औरों को भी बढ़ाते रहे, जिसकी रिजल्ट आज कितनी संख्या हो गई है। हिलाने वाली बातें आते भी अचल रहे। उसका परिणाम कितने सेन्टर खुले, कितने प्रोग्राम हो रहे हैं।
आजकल कितने प्रोग्राम हो रहे हैं? हुए हैं ना! यह सारी रिजल्ट ब्रह्मा बाप की हिम्मत, पहले अकेला ब्रह्मा बाप था, आप पीछे आये हो लेकिन अकेला हिम्मत रख आगे बढ़ा। रिजल्ट में प्रैक्टिकल प्रमाण आप सब साथी हो। तो है ना हिम्मत! ब्रह्मा बाप ने अकेला हिम्मत रखी, आप तो बहुत साथी हैं। तो फालो फादर। सभी अपने को ब्रह्मा बाप के बच्चे, साथी बच्चे समझते हो ना, साथ हैं साथ चलेंगे और ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आयेंगे। तो अभी समय है, जैसे ब्रह्मा बाप ने हिम्मत रखी, रिजल्ट देख रहे हो तो इतने संगठन में हिम्मत का पांव रखो तो क्या नहीं हो सकता है! कल्प कल्प हुआ है, होना ही है।
तो अभी बाप क्या चाहता है, वह सुनाया। सिर्फ आप सभी एक बात करो, वह एक बात है साधारण पुरुषार्थ को तीव्र पुरुषार्थ में परिवर्तन करो। बापदादा ने देखा कि कहाँ कहाँ अलबेलापन आता है, हो ही जाना है, विजय तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, ऐसे ज्ञान के हिसाब से निश्चित है लेकिन अलबेलेपन में भी यही शब्द आते हैं हमारी विजय तो है ही, हुई पड़ी है। कोई काम रुका नहीं है, होना ही है। एक है पुरुषार्थ के यह शब्द, दूसरे अलबेलेपन के भी यही शब्द हैं। कोई काम रुकना नहीं है, होना ही है… तो यह अलबेलापन है, यह भी संस्कार चेक करना। अलबेलेपन की निशानी है कि उनके जीवन में छोटी-छोटी बातों में थकावट दिखाई देगी। शक्ल में वह खुशी की झलक नहीं दिखाई देगी, सेवा से पुण्य बन रहा है, तो चेहरे पर खुशी होनी चाहिए। किसी न किसी प्रकार की थकावट का कारण कोई न कोई बात का अलबेलापन है। जब करना ही है तो खुशी से करो। चेहरा आपकी सेवा करे, चलन आपकी सेवा करे। तो आज मैजारिटी का संस्कार समाप्ति का हाथ देख बापदादा बार-बार मुबारक दे रहा है।
अच्छा, इस ग्रुप में जो पहली बार आये हैं वह उठो। देखा कितने हैं? बहुत हैं। हाथ हिलाओ। जो पहली बार आये हैं, उनको अपने बाप से मिलने की मुबारक हो। तो विशेष समय प्रमाण अभी आपको तीव्र पुरुषार्थ करना पड़ेगा और बापदादा का यह कहना है कि जो तीव्र पुरुषार्थ करेगा, ढीला ढाला नहीं, वह लास्ट सो फास्ट और फास्ट सो फर्स्ट हो जायेगा। ऐसी कमाल करना। चांस है। ऐसे नहीं समझो हम तो आये लास्ट हैं, नहीं, फास्ट जा सकते हो। लेकिन हर समय तीव्र पुरुषार्थ करना ही है। बदलना ही है। गे-गे नहीं करना, देखेंगे, सोचेंगे... गे-गे नहीं करना। अच्छा है अपना घर, दाता का घर अच्छा लगा ना! तो सभी भाई बहिनें भी आपका स्वागत करते हैं। अच्छा।
अभी चारों ओर के ब्राह्मण बच्चों को बापदादा का स्नेह भरा यादप्यार स्वीकार हो, बापदादा जानते हैं दूर बैठे भी कई बच्चे देख भी रहे हैं, मिलन भी मना रहे हैं, उन चारों ओर के बच्चों को बापदादा यही कहते जैसे अभी सभी मैजारटी ने हाथ उठाया, संस्कार समाप्त, अभी आप सभी भी मिलकर एक ही संकल्प रूपी हाथ उठा ही रहे हो कि हम सब मिलकर समाप्ति के समय को समीप लाने के लिए यह संकल्प कर रहे हैं और चारों ओर सम्पूर्ण समय होने पर ब्रह्मा बाप शिव बाप दोनों को प्रत्यक्ष करेंगे कि हमारा बाप आ गया। सबके मुख पर बाप की प्रत्यक्षता हो जाए, अभी इस वर्ष में यही दृढ़ संकल्प रखो कि बाप को प्रत्यक्ष करना ही है। आधा काम तो किया है, बच्चों को बाप ने विश्व के आगे प्रत्यक्ष किया है, अभी बच्चों का कार्य है भगवान आ गया, यह आवाज विश्व के एक एक बच्चे तक पहुंचे। तो सभी को बापदादा देख हर एक को दिल का स्नेह, दिल का प्यार, दिल के उमंग उत्साह सहित यादप्यार दे रहे हैं। अच्छा।
सेवा का टर्न कर्नाटक ज़ोन का है:- सेवा का चांस लेना अर्थात् बाप के समीप आने का चांस मिलना। देखो, सेवा के कारण कितने लोगों को आने का चांस मिलता है। सबकी दुआयें आप निमित्त टीचर्स को मिलती हैं क्योंकि सेवा की हिम्मत रखी और चांस इतनों को मिला। बापदादा ने देखा कि नये नये भी पहले बारी बहुत आये हैं, जो पहले बारी आये हैं कर्नाटक वाले, वह लम्बा हाथ उठाओ। पहले बारी भी बहुत आये हैं। अच्छा है। कर्नाटक की वृद्धि अच्छी है, अभी जैसे वृद्धि हुई है वैसे तीव्र पुरुषार्थ की विधि उसकी भी चारों ओर लहर फैलाओ। नम्बर ले लो। संस्कार समाप्ति का नम्बर ले लो। ले सकते हो? जो समझते हैं हम पहला नम्बर ले सकते हैं, वह हाथ उठाओ। अच्छा है। ऐसा आपस में संगठन करके प्रोग्राम बनाओ, सब एक हैं। भिन्न-भिन्न स्थान हैं लेकिन हैं एक। यह कमाल करके दिखाओ। है ना हिम्मत? हिम्मत है? तो बापदादा के पास समाचार तो आता रहता है। तो मधुबन में हर मास अपने परिवर्तन का समाचार लिखना। लिखेंगे ना! हर मास का। बीती सो बीती, अब नम्बरवन होके दिखाओ। अच्छा है। बापदादा ने देखा सेवा अच्छी है, अभी संगठन देखना चाहते हैं। एक्जैम्पुल बनो। रेडी। रेडी हैं? हाथ उठाओ। आप देखना, एक मास में रिजल्ट आयेगी। अच्छा, बहुत-बहुत विशेष यादप्यार।
वरदान:- सम्पूर्ण समर्पण की विधि द्वारा अपने पन का अधिकार समाप्त करने वाले समान साथी भव
जो वायदा है कि साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ में राज्य करेंगे - इस वायदे को तभी निभा सकेंगे जब साथी के समान बनेंगे। समानता आयेगी समर्पणता से। जब सब कुछ समर्पण कर दिया तो अपना वा अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता है। जब तक किसी का भी अधिकार है तो सर्व समर्पण में कमी है इसलिए समान नहीं बन सकते। तो साथ रहने, साथ उड़ने के लिए जल्दी-जल्दी समान बनो।
स्लोगन:- अपने समय, श्वांस और संकल्प को सफल करना ही सफलता का आधार है।
ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।
जो सरल स्वभाव वाले होंगे उसमें समेटने की शक्ति स्वतः होगी। सरल स्वभाव वाला सभी का सहयोगी और स्नेही भी होगा और जितना सरल स्वभाव वाला होगा उतना माया कम सामना करेगी। सरल स्वभाव वाले का व्यर्थ संकल्प नहीं चलता। उसका समय भी व्यर्थ नहीं जाता। उनकी बुद्धि विशाल और दूरांदेशी रहती है, इसलिए उनके आगे कोई भी समस्या सामना नहीं कर सकती।
विशेष सूचना - मास के तीसरे रविवार का योग अभ्यास
आज मास का तीसरा रविवार है, सभी भाई बहिनें संगठित रूप में एकत्रित होकर सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अपने फरिश्ते स्वरूप द्वारा भटकती हुई दुःखी अशान्त आत्माओं को सुख शान्ति की पवित्र किरणें देकर उन्हें सहारे दाता परमात्मा बाप की स्मृति दिलाने की सेवा करें।