Daily Murli for Sunday 9 August 2026
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09-08-26 प्रातःमुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 02-03-11 मधुबन
“मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान की सीट पर रह, एक दो को उमंग-उत्साह दिलाते, सहयोगी बन व्यर्थ संकल्पों के अक के फूल अर्पण कर नम्बरवन का इनाम लो''
आज आप सभी और साथ में चारों ओर के सर्व बच्चे अमृतवेले से लेकर बड़े स्नेह भरी मुबारकें अपने प्रेम और खुशी की दे रहे हैं। तो बाप भी आप सभी सिकीलधे बच्चों को इस जयन्ती की मुबारकें देने आये हैं। एक-एक बच्चा बाप के लिए अति प्यारा दिल का दुलारा है। तो बापदादा अपने बाहों की माला से आप सबको मुबारकें दे रहे हैं।
बापदादा देख रहे हैं आप तो सामने मुबारक दे भी रहे हो, ले भी रहे हो लेकिन चारों ओर के बच्चे कई स्थानों में मुबारकें दे रहे हैं और बाप भी देश विदेश सब तरफ के बच्चों को अति स्नेह पूर्वक मुबारकें दे रहे हैं। बापदादा देख रहे हैं हर बच्चा खुशनुमा सूरत से प्यार के सागर में लहरा रहे हैं। बाप को खुशी है कि बाप अकेला नहीं आता है, बच्चों के साथ ही आते हैं क्योंकि बाप आते ही हैं यज्ञ रचने। तो यज्ञ में कौन होते हैं? ब्राह्मण, इसलिए बाप अकेले नहीं आते लेकिन बच्चों के साथ आये हैं क्योंकि यही जयन्ती सब जयन्तियों से वन्डरफुल है। सारे कल्प में यह एक ही जयन्ती है जो बाप और बच्चों का साथ में जन्म होता है इसलिए इस जयन्ती को कहा ही जाता है हीरे तुल्य जयन्ती। बाप भी विशेष आदि रत्न बच्चों को विशेष मुबारक दे रहे हैं। तो आप सभी आज मुबारक देने आये हो वा लेने भी आये हो! बाप का कहना ही है साथ रहेंगे, साथ उड़ेंगे, साथ आयेंगे और ब्रह्मा बाप के साथ राज्य करेंगे। साथ रहने का वायदा है। आप भी क्या कहते हो? हम भी जहाँ बाप वहाँ साथ-साथ होंगे। यह है बच्चों का बाप से, बाप का बच्चों से वायदा। कहाँ भी शरीर द्वारा रहते हैं लेकिन दिल में सदा बाप साथ है इसीलिए बाप को दिलाराम कहते हैं। यहाँ यादगार भी दिलवाला (देलवाड़ा) मन्दिर है। तो सभी के दिल में साथ में दिलाराम है ना! और बाप सदा बच्चों को कहते हैं कभी भी अकेले नहीं बनना। सदा साथ हैं, साथ रहना ही है। अकेले होंगे तो माया अपना चांस लेती है और साथ है तो स्वयं लाइट हाउस साथ है, उसके आगे माया दूर से ही भाग जाती, नजदीक भी नहीं आ सकती है इसलिए बच्चों का बाप से, बाप का बच्चों से सदा साथ का वायदा है। आप सभी का भी वायदा है ना! साथ हैं, साथ रहेंगे। अच्छा लगता है ना साथ में। हाँ भले हाथ उठाओ।
बापदादा ने देखा हर बच्चा अमृतवेले बाप से बहुत दिल की बातें करते हैं। वैसे तो समय नहीं मिलता लेकिन अमृतवेले हर एक बहुत मीठी-मीठी दिल की बातें करते हैं और बाप भी हर एक बच्चे के दिल की बातें सुनकर सब बातों का उत्तर भी देते हैं। सभी को एक बात की बहुत खुशी है कि हम दिल से कहते मेरा बाबा, तो बाप हाज़िर हो जाते। हज़ूर हाज़िर हो जाते। इसमें सिर्फ दिल की बात है और कुछ करने की जरूरत नहीं, दिल से कहा मेरा बाबा, हज़ूर हाज़िर।
तो आज चारों ओर से बापदादा के कानों में मीठा गीत बज रहा था। कौन सा गीत? मेरा बाबा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा और बापदादा भी बच्चों के स्नेह में समाये हुए थे, समाये हुए हैं। अभी बापदादा आपके स्नेह के दिव्य कर्तव्य को देख कहते कि आपके भक्त वह भी कम बुद्धि वाले नहीं हैं। उन्होंने भी आपके यादगार की कॉपी बहुत अच्छी बनाई है। द्वापर में आये, पहला-पहला जन्म वैसे भी सतोप्रधान होता है क्योंकि परमधाम से आत्मा आती है। तो भक्तों के तरफ भी आज दृष्टि गई। तो कॉपी बड़ी युक्तियुक्त की है क्योंकि आपके शुरू-शुरू वाले विशेष भक्त जैसा आपका प्रैक्टिकल कर्म है वैसे ही उन्होंने भी यादगार की कॉपी अच्छी बनाई है लेकिन आपका प्रैक्टिकल है उन्हों का यादगार है। जैसे आपने व्रत लिया, कौन सा व्रत लिया? पवित्रता का। तो वह भी व्रत लेते हैं, व्रत की कॉपी की है लेकिन आपका व्रत एक जन्म में लेने से अनेक जन्म वह व्रत चलता है। वह एक दिन के लिए पवित्र भी रहते और खान-पान भी शुद्ध रखते हैं। आपका 21 जन्मों का व्रत, उन्हों का अल्पकाल के लिए है। ऐसे ही जागरण, आप रोशनी में आये तो सारे विश्व के अन्दर अंधकार मिटाया। आधाकल्प अंधकार आ नहीं सकता। मन का अंधकार मिटाया और बाहर प्रकृति का दुःख, वह अंधकार मिटाया। वह भी कॉपी की है, जागरण करते हैं। और बात, आप बाप के ऊपर बलिहार गये, बलि चढ़ गये। पूर्ण सरेन्डर हो गये तो उन्होंने भी कॉपी की है लेकिन अपने को नहीं करते, अपने को बलि नहीं चढ़ाते हैं, किसको चढ़ाते हैं? जानते हो ना! बकरे को चढ़ाते हैं। बकरे को क्यों ढूंढ़ा और किसको नहीं ढूंढा। सब हँस रहे हैं, जानते हो! जो बाप आप बच्चों को बार-बार इशारा देता है मैं पन छोड़ निमित्त भाव धारण करो तो उन्होंने भी बकरे को ढूंढा है क्योंकि वह भी में में करता है। तो भक्तों की बुद्धि कमाल की तो है ना! आपके भक्त हैं ना। बाप के, आपके भक्त हैं। इसीलिए बाप आपके भक्तों को भी जो सच्ची दिल से भक्ति करते हैं, उनको कुछ न कुछ भक्ति का फल दे देते हैं। वह भी सदा सच्चे और सात्विक रहते हैं, खुश रहते हैं। दुःख में दुःखी नहीं होते हैं क्योंकि भक्ति सच्ची दिल से करते हैं। तो बाप भी आजकल आप बच्चों को यही इशारा देते हैं कि मैंपन नहीं लाओ। मैं जो कहता हूँ वही हो। मैं ही ठीक कहता हूँ, वही होना चाहिए। यह मैं मैं, एक साधारण है मैं शरीरधारी हूँ, देहधारी हूँ, तो एक है साधारण मैं और दूसरी है महीन मैं, उसमें बाप की देन को भी मैंने किया, मैंने बोला, मैं करता हूँ, बाप की विशेषताओं में भी मैंपन आ जाता है। ज्ञान की समझ, विशेषताओं की समझ उसमें भी महीन मैं-पन आ जाता है। तो बाप इशारा देते रहते हैं कि मैं और मेरा, सदा मेरा बाबा, उसी तरफ दिल का लगाव हो। हद का मेरा, मेरा नाम, मेरा शान, इसको समाप्त कर मैं बाबा का, बाबा मेरा, कितनी खुशी होती है! भगवान मेरा हो गया और क्या चाहिए! तो एक है साधारण मेरा, एक है महीन मेरा। यह महीन मेरा मैला कर देता है और मेरा बाबा मालामाल कर देता है।
तो आज बर्थ डे मनाने आये हो। अपना भी बर्थ डे मनाने आये हो ना! बाप बच्चों के बिना कुछ नहीं करता इसीलिए आज बाप बच्चों के जन्म उत्सव की मुबारक देने आये हैं, वाह मेरे बच्चे वाह! अभी एक बात कहूं, तैयार हैं! कहें? करना पड़ेगा। हाथ उठाओ, करेंगे? डबल फारेनर्स करेंगे? टीचर्स करेंगे? अच्छा। तो आज बापदादा जैसे यादगार में शिव परमात्मा की यादगार में अक के फूल चढ़ाते हैं, गुलाब के नहीं, और कोई फूल नहीं चढ़ाते, अक के फूल चढ़ाते हैं। तो आज बापदादा आपको कौन सी बात अर्पण करो, वह होमवर्क देने चाहते हैं। तैयार हो ना! अच्छा।
यह तो बच्चों का बाप को बहुत अच्छा लगता है, हाँ जी सब करते हैं। तो आज बर्थ डे पर बाप का यह संकल्प है कि सभी एक दो को उमंग उत्साह दिलाते हुए, एक दो के सहयोगी बनते हुए व्यर्थ संकल्प का अक का फूल अर्पण करो। व्यर्थ संकल्प न करना है, न सुनना है और न संग में आकर व्यर्थ संकल्पों के संग का रंग लगाना है क्योंकि व्यर्थ संकल्प जहाँ होगा वहाँ याद का संकल्प, ज्ञान के मधुर बोल, जिसको मुरली कहते हो, वह शुद्ध संकल्प स्मृति में नहीं रहेंगे। चाहे मुरली सुनते भी हो, पढ़ते भी हो वह तो आवश्यक है। ब्राह्मणों का नियम है लेकिन सुनने तक रहेगी। मन में मनन नहीं चलेगा। सोचेंगे, कहेंगे आज की मुरली बहुत अच्छी थी। सोच रही हूँ क्या थी…। वरदान भी बहुत अच्छा था, लेकिन याद आ जायेगा...। व्यर्थ संकल्प मन बुद्धि को अपने तरफ आकर्षित करने वाले हैं। पता है आपको क्या कहते हैं बाप के आगे? बाबा इन्ट्रेस्टेड समाचार तो सुनना चाहिए ना। नॉलेजफुल बनना होता है लेकिन व्यर्थ बातें पद की प्राप्ति में नुकसान कर देंगी। तो क्या आप सभी व्यर्थ संकल्प का बाप से वायदा करते हो? आप कहेंगे हम तो नहीं चाहते लेकिन वह आ जाते हैं। चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाते हैं। तो बाप को दृढ़ संकल्प से देने से, पहले देना आता है? बाप को दे दिया। दी हुई चीज़ अगर आपके पास वापस भी आ जाए तो दी हुई चीज़ आप रखेंगे, कि वापस करेंगे? अगर दी हुई चीज़ आप अपने पास रखते हो तो आपका टाइटिल क्या होगा? तो बाप को एक बार अपनी रूचि से दृढ़ता से दे दो और चेक करो बार-बार दी हुई चीज़ हमारे पास वापस तो नहीं आई! दूसरे की चीज़ अपनी बनाना, इसको अच्छा नहीं मानते हैं। तो रोज़ आराम के पहले, आराम बाद में करना पहले चेक करना - आज सारे दिन में कोई भी व्यर्थ संकल्प आया तो नहीं? किया तो नहीं? दी हुई चीज़ वापस तो नहीं ले ली?
तो आज बर्थ डे की सौगात देने की हिम्मत है ना! है हिम्मत? हाथ उठाओ, हिम्मत है? तो जहाँ हिम्मत है वहाँ बापदादा भी आपको सौगात देगा। आप दिल से कहना मेरा बाबा, दयालु कृपालु बाबा, आप यह चीज़ ले लो। अगर दिल से कहेंगे तो बाप एकस्ट्रा गिफ्ट देगा क्योंकि हिम्मत आपकी, एकस्ट्रा मदद बाप देगा। जहाँ हिम्मत है वहाँ बाप की मदद अवश्य है ही, यह तो अनुभव किया है ना क्योंकि बापदादा काफी समय से सूचना दे रहा है कि अब तीव्र पुरुषार्थ का रास्ता है तीन बिन्दु लगाना। बिन्दु हूँ, बाप बिन्दु को याद करना है और बीती को बिन्दू लगाना, फुलस्टॉप बिन्दू है, जिसको बापदादा कहते हैं मनन करो, बिन्दू बनना है, बिन्दू देखना है और बिन्दू लगाना है इसलिए बिन्दू का बहुत महत्व है। आजकल के जमाने में भी बिन्दू का महत्व है। देखो पैसे गिनती करते हैं ना। आजकल सबका प्यार, सबसे ज्यादा किससे है? पैसे से। तो पैसा बढ़ता कैसे है? बिन्दू लगाते जाओ, 10 को बिन्दू लगाओ 100 हो जायेगा। दूसरी बिन्दू लगाओ तो 1000 हो जायेगा। तो बिन्दू का महत्व है लेकिन असली बिन्दू कौन सा है वह भूल गये हैं। तो आज बाप को जन्म दिन की सौगात दी? दी? दिल से दी? क्यों, क्या तो नहीं करेंगे? कैसे करूं, क्या करूं? यह कै कै की भाषा खराब है। क्यों करूं, कैसे करूं, क्यों क्या, कै कै नहीं करना। तो सौगात देने के लिए खुशी-खुशी से हाथ उठाया है या संगठन में मजबूरी से? क्योंकि मजबूरी से करने वाले का सदा नहीं होगा, कभी-कभी होगा। दिल से करने वाला करना ही है, बनना ही है। सौगात दे दी, देनी ही है। ऐसा खुशी-खुशी से संकल्प करेंगे तो आप सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे मास्टर सर्वशक्तिवान के लिए क्या बड़ी बात है! सीट पर रहना, मास्टर सर्वशक्तिवान की सीट पर सदा सेट रहना। भूलना नहीं। स्वमान है ना यह। स्वमान अपना छोड़ा नहीं जाता है। स्वमान के पीछे तो लड़ते हैं। तो इसीलिए आज बाप को प्यार आया कि छोटी सी बातों में अपना स्वमान, परमात्मा द्वारा मिला हुआ स्वमान, लोगों द्वारा मिला हुआ स्वमान उसमें भी कितना नशा रहता है! यह परमात्मा द्वारा स्वमान मिला है, मास्टर सर्वशक्तिवान। जो चाहे वह कर सकते हैं। है ना हिम्मत? कांध हिलाओ। हाथ नहीं हिलाओ कांध हिलाओ। हिम्मत है? टीचर्स। आपको कराना पड़ेगा, ध्यान देना पड़ेगा। आप करेंगी और अटेन्शन दिलाके करायेंगी। निमित्त हो ना। फिर देखेंगे कौन सा क्लास, किसका क्लास नम्बर लेता है? फिर अच्छा इनाम देंगे। कौन सा इनाम देंगे वह नहीं बताते हैं। बढ़िया इनाम देंगे। क्लास का क्लास कोशिश करना। ऐसे नहीं एक ने किया, नहीं। मैजारिटी करें।
तो आज बापदादा को एक-एक बच्चे के प्रति प्यार आ रहा है कि नम्बरवन में आवे। टू में भी नहीं। पहली राज गद्दी पर नहीं बैठेंगे, तख्त पर तो दो बैठेंगे लेकिन पहली राजधानी, पहले राज घराने के सम्बन्ध में आवें। दो नम्बर तो हो गये लेकिन राज्य करना है, राज्य अधिकारी बनना है तो पहले राज्य में आवे। तो बापदादा का यही बच्चों से प्यार है कि एक-एक बच्चा कोई न कोई विशेषता में नम्बरवन आवे। नम्बरवार नहीं, नम्बरवन। है उमंग? नम्बरवन में आना है कि जो मिले सो अच्छा? अच्छा, अच्छा नहीं करना। बाप की आशा है एक-एक बच्चा कोई न कोई कमाल में नम्बरवन आवे। चार सब्जेक्ट हैं, कोई न कोई सब्जेक्ट में नम्बरवन बनना ही है। बनना ही है, यह अन्डरलाइन करो। चलो ज्यादा मेहनत नहीं देते, कोई न कोई सब्जेक्ट में नम्बरवन। यह तो सहज है ना। बाकी आज के दिन अमृतवेले एक-एक बच्चा जो भी मिलन मना रहे थे, बड़ा खुशनुमा, खुशी में हँसता हुआ, खुशनुमा चेहरा दिखाई दे रहा था। और बाप ने भी हर बच्चे को सदा उड़ती कला का वरदान दिया। चलती कला नहीं, उड़ती कला। तो बापदादा का आज यह वरदान याद रखना। बापदादा ने आपके और अपने जयन्ती पर क्या वरदान दिया? उड़ती कला भव। आपने भी सारा दिन शिवरात्रि उत्सव दिल में मनाया है ना। तो सभी अच्छे हैं, अच्छे रहेंगे, अच्छे ते अच्छा राज्य पद प्राप्त करेंगे। सभी अच्छे हैं ना! बाप तो अच्छा ही देखता है। अच्छा।
चारों ओर के चाहे सम्मुख बैठे हैं चाहे अपने-अपने स्थान पर बैठ मना रहे हैं, सभी को बापदादा भी देखकर हर्षित हो रहे हैं और बच्चे भी बाप का मिलन देख खुश हो रहे हैं। लेकिन आज का संकल्प रखना सदा खुश। कभी-कभी वाला नहीं, सदा खुश। कोई भी देखे, आपके चेहरे को देख सोचे कि यह बहुत भाग्यवान आत्मा दिखाई देती है। आपका भाग्य चलन और चेहरे से दिखाई दे। ऐसे नहीं सिर्फ मन में बहुत है, नहीं। आपका भाग्यवान चेहरा खुशनुमा चेहरा औरों को परिचय करायेगा। चेहरा बोलेगा कुछ है। आपका चेहरा सर्विस करे। बाप तक लावे। खुशनुमा रहना, यह भी सेवा का साधन है। तो चारों ओर के बच्चों को आपके भी बर्थ डे की पदमगुणा मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। अच्छा।
वरदान:- संशय के संकल्पों को समाप्त कर मायाजीत बनने वाले विजयी रत्न भव
कभी भी पहले से यह संशय का संकल्प उत्पन्न न हो कि ना मालूम हम फेल हो जायें, संशयबुद्धि होने से ही हार होती है इसलिए सदा यही संकल्प हो कि हम विजय प्राप्त करके ही दिखायेंगे। विजय तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, ऐसे अधिकारी बनकर कर्म करने से विजय अर्थात् सफलता का अधिकार अवश्य प्राप्त होता है, इसी से विजयी रत्न बन जायेंगे इसलिए मास्टर नॉलेजफुल के मुख से नामालूम शब्द कभी नहीं निकलना चाहिए।
स्लोगन:- रहम की भावना सहज ही निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।
ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
जैसे छुईमुई का पौधा जरा भी हाथ लगाने से शक्तिहीन हो जाता है, उसमें टाइम नहीं लगता। ऐसे आप एक सेकण्ड के शुद्ध संकल्प की शक्ति से माया को छुईमुई मुआफिक मूर्छित कर दो। अपना निजी-स्वरूप, वरदानी-स्वरूप, सदा ही स्मृति में रहे तो अपवित्रता वा विस्मृति का नामोनिशान भी न रहे।