Mamma's Murli - gyan-sitar-42
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
१५.१०.६२
अहिंसक बनना है तो पांच विकारों को जीतो, स्व पर और कर्म पर राज्य करो
ओम् शान्ति । अभी हम सबकी बुद्धि परमात्मा की तरफ है। उनको ही दिल में बसाना है। परन्तु बसाने का अर्थ यह नहीं है कि परमात्मा सर्वव्यापी है। लेकिन परमात्मा ने समझाया है कि “जहाँ माया ५ विकार हैं, जहाँ दुःख-अशान्ति है - ऐसे अपवित्र स्थान पर मैं कैसे बैठूंगा ? मेरे बैठने की जगह तो स्वच्छ चाहिए। मैं तो अपने ठांव (घर) वाला हूँ।” गुरुनानक ने भी महिमा की है कि तेरा ऊंचा ठांव है। ऐसे नहीं कि मैं सर्वव्यापी हूँ, मेरा कोई नीचे ठांव है । लेकिन मेरा नाम ही शिव है, मैं अपने नाम, ठांव और कर्तव्य वाला हूँ। अगर परमात्मा की बैठक सबके पास हो, तो उनका रुप ही बदल जाए। इसलिए परमात्मा को फरटाइल रुप समझ लिया है। जैसे यह आकाश है। अन्दर बाहर फरटाइल आकाश है। लेकिन परमात्मा कोई ऐसी चीज थोड़ेही है।
कई कहते हैं कि परमात्मा अखण्ड ज्योति तत्व है। लेकिन परमात्मा कोई यह तत्व नहीं है। परमात्मा तो ज्योति-स्वरुप आकार वाला है, उसमें ही चैतन्यता है। बाकी फरटाइल लाइट में कोई चैतन्यता नहीं है। जैसे यह आकाश तत्व जड़ है ना। इसमें हम जब आत्मायें शरीर के साथ हैं, तब यहाँ रह सकती हैं। परन्तु आत्मा जब शरीर बिगर है, तो उनको रहने का स्थान भी ऐसा चाहिए, जो हुआ छठा तत्व । तो रहने का स्थान और रहने वाला अलग-अलग हैं। हम और यह आकाश एक ही थोड़ेही कहेंगे। भगवान कहते हैं कि मेरा भी रुप है। जैसे हम अब बोलते हैं तो उस बोलने का भी रुप है। जैसे तरंगे बनती हैं, तो उनको फिर औजारों के जरिये कैच करते हैं। वैसे तो आवाज बहुत हो रहे हैं लेकिन किसके पर्टीकुलर आवाज को पकड़ते हैं। सूक्ष्म इन्स्ट्रुमेंट होता है जो उसको पकड़ता है। तो परमात्मा को भी दिव्य-दृष्टि वा दिव्य-नेत्र से देख सकते हैं।
परमात्मा ने तीन रुपों (ब्रह्मा, विष्णु, शंकर) द्वारा स्थापना, विनाश और पालना कराई है। बाकी यह कोई ३ सिर नहीं हैं। त्रिमूर्ति भी निराकार परमात्मा को कहा जाता है। लेकिन निराकार को ३ सिर कैसे देंगे ? इसलिए ब्रह्मा को ३ सिर दे दिये हैं । देवतायें भी दो आंख, दो भुजा वाले होते हैं। और कोई चेंज आदि नहीं होती है। बाकी कोई लूले-लंगड़े होते हैं, वह तो है कर्मों की बात। भगवान ने भी अहिंसा की युक्ति सिखलाई है। अहिंसा माना ५ विकारों को जीतना है। हम विकारों के वश हैं तो जैसे हमारी रोज हिंसा हो रही है। पाप होने से आत्मा के घातक बनते हैं। इसको ही जीव-हिंसा कहेंगे । इसलिए परमात्मा ने कहा कि यह शत्रु तुम्हारी हिंसा कर रहे हैं, इन्हों को जीतो तो अहिंसक बनोगे । फिर स्व का राज्य मिलेगा। सेल्फ के ऊपर, कर्म के ऊपर अपना राज्य चाहिए। तो बाप कहते हैं- मैं ऐसा कॉलेज खोलता हूँ जिसमें यह लक्ष्मी- नारायण, सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजधानी तैयार हो रही है। लक्ष्मी-नारायण भी अपनी राजधानी सहित ऊंचा पद प्राप्त करने यहाँ पढ़ रहे हैं। इस रीति क्राइस्ट आदि भी यहाँ ही अपना पार्ट बजा रहे हैं। हम तो सब धर्म वालों से मिलते हैं। उन्हों के कॉन्टेक्ट में आते हैं। हमारा धन्धा ही यह है। यह धन्धा सबसे श्रेष्ठ है। इससे कर्म श्रेष्ठ बनते हैं। कर्म जो हमारा सामना करते हैं, क्यों न उन पर जीत पायें । कर्म से स्वतन्त्र होना या जीत पाना एक ही बात है। तो अब मुख्य चीज यह है ।
परमात्मा आते हैं पुरानी से नई दुनिया बनाने। भगवान के कर्तव्य करने-कराने में नई-नवाई है। नॉलेजफुल ज्ञान का सागर वह है। भगवान ने ही आकर गीता सुनाई है। अगर पहले से ही वह काम हो रहा होता तो भगवान को आने की क्या जरुरत है ? जरुर कुछ उल्टे काम हो रहे हैं, तब कहा है कि "इन साधुओं आदि का भी उद्धार करने मैं आता हूँ, मेरा जन्म दिव्य अलौकिक है। मैं क्या हूँ, कृष्ण क्या है? गीता में गॉड के बदले कृष्ण का नाम होने के कारण गीता भी हद में आ गई है।" बाइबल में क्राइस्ट के वर्शन्स हैं। वह गॉड नहीं था लेकिन सन आफ गॉड था। परन्तु गीता में तो परमात्मा के वर्शन्स हैं। कुरान आदि में भी गॉड के वर्शन्स नहीं हैं। भगवान के जो वर्शन्स हैं वह तो सब धर्म वालों को मानने चाहिएं। गॉड है ही एक परन्तु यह जानते नहीं हैं। बाप कहते हैं – “मनुष्यों ने सब उल्ट-पुल्ट कर दिया है। संसार को ही झूठा बना दिया है ।" गीता-पाठी भल गीता आदि सुनाते हैं, फल आदि रखते हैं और पित्रों को पानी देते हैं लेकिन भगवान ने जो ओरीजनल सुनाया था वह तो उनके द्वारा ही अब सुन रहे हैं।
बाप कहते हैं कि “अब स्वर्ग आने वाला है। इसलिए चलने की तैयारी करो।” अब धन्धे-धोरी, देश आदि सब नष्ट होने वाले हैं, तब बाप बच्चों को कहते हैं कि “अब बहुत खराब हालतें आनी हैं, बेहतर है कि जितनी पूंजी है सफल कर लो।” ऐसे नहीं कि इतना कमावें जो हमारी वंशावली भी खाती रहे। बाप कहते हैं – “अब यह सब कुछ चलना नहीं है। फिर भी भारत ही कुछ सेफ रहेगा।” कोई फिर कहते हैं कि बाहर में इतने मन्दिर आदि भी नहीं हैं और रहते भी आराम से हैं, और भारत में जितनी यह सब बातें हैं उतना ही भारत दुःखी हुआ है। लेकिन यह भी तो समझने की बात है कि वह सब आये ही पीछे हैं। तो उसी हिसाब से ही सुख-दुःख देखेंगे ना। ज्ञान से फिर भी सेफ्टी है। तो पहले से ही तैयार हो जाना चाहिए। यह है बाप की भविष्यवाणी । ऐसा कोई मनुष्य अथॉरिटी से नहीं बोल सकता। लेकिन जो जानी-जाननहार है वह बतला रहे हैं। समझते हैं -- दादा ने यह संस्था रची है। परन्तु दादा से भी कौन करा रहे हैं -- यह भी तो समझने की बात है। सबका पार्ट अपना-अपना चल रहा है। सब पार्ट एक जैसा नहीं बजा सकते। अच्छा ।