Avyakt murli du mercredi 10 mai 1972
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10-05-72ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
स्वमान में रहने से फ़रमान की पालना
स्वमान और फरमान - दोनों में रहने और चलने के अपने को हिम्मतवान समझते हो? स्वमान में भी सदा स्थित रहें और साथ-साथ फरमान पर भी चलते चलें, इन दोनों बातों में अपने को ठीक समझते हो? अगर स्वमान में स्थित नहीं रहते हैं तो फरमान पर चलने में भी कोई-न-कोई कमी पड़ जाती है। इसलिए दोनों बातों में अपने आप को यथार्थ रूप से स्थित करते हुए सदा ऐसी स्थिति बनाना। वर्तमान पुरूषोत्तम संगमयुग का आप ब्राह्मणों का जो ऊंच ते ऊंच स्वमान है उसमें स्थित रहना है। इस एक ही श्रेष्ठ स्वमान में स्थित होने से भिन्न-भिन्न प्रकार के देह-अभिमान स्वतः और सहज ही समाप्त हो जाते हैं। कहां-कहांसर्विसकरते-करते वा अपने पुरूषार्थ में चलते-चलते बहुत छोटी-सी एक शब्द की गलती कर देते हैं, जिससे ही फिर सारी गलतियां हो जाती हैं। सर्व गलतियों का बीज एक शब्द की कमजोरी है, वह कौनसा शब्द? स्वमान से स्व शब्द निकाल देते हैं। स्वमान को भूल जाते हैं, मान में आने से फरमान भूल जाते हैं। फरमान है - स्वमान में स्थित रहो। तो मान में आने से फरमान खत्म हो गया ना। इसी एक शब्द की गलती होने से अनेक गलतियां हो जाती हैं। फिर मान में आकर बोलना, चलना, करना सभी बदल जाता है। सिर्फ एक शब्द कट होने से जो वास्तविक स्टेज है उससे कट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आने के कारण जो पुरूषार्थ वासर्विसकरते हैं उसकी रिजल्ट यह निकलती है जो मेहनत ज्यादा और प्रत्यक्षफल कम निकलता है। सफलता-मूर्त जो बनना चाहिए वह नहीं बन पाते और सफलता- मूर्त न बनने के कारण वा सफलता प्राप्त न होने के कारण फिर उसकी रिजल्ट क्या होती है? मेहनत बहुत करते-करते चलते-चलते थक जाते हैं। उल्लास कम होते-होते आलस्य आ जाता है और जहां आलस्य आया वहां उनके अन्य साथी भी सहज ही आ जाते हैं। आलस्य अपने सर्व साथियों सहित आता है, अकेला नहीं आता। जैसे बाप भी अकेला नहीं आता अपने बच्चों सहित प्रत्यक्ष होता है। वैसे यह जो विकार है वह भी अकेले नहीं आते, साथियों के साथ आते हैं। इसलिए फिर विकारों की प्रवेशता होने से कई फरमान उल्लंघन करने कारण स्थिति क्या हो जाती है? कोई न कोई बात का अरमान रह जाता है। न स्वयं सन्तुष्ट रहते, न दूसरों को सन्तुष्ट कर पाते, सिर्फ एक शब्द कट करने के कारण। इसलिए कभी भी अपनी उन्नति का जो प्रयत्न करते हो वा सर्विसका कोई भी प्लैन बनाकर प्रैक्टिकल में लाते हो, तो प्लैन बनाने और प्रैक्टिकल में लाने समय भी पहले अपने स्वमान की स्थिति में स्थित हो फिर कोई भी प्लैन बनाओ और प्रैक्टिकल में लाओ। स्थिति को छोड़कर प्लैन नहीं बनाओ। अगर स्थिति को छोड़कर प्लैन्स बनाते हो तो क्या हो जाता है? उसमें कोई शक्ति नहीं रहती। बिगर शक्ति उस प्लैन का प्रैक्टिकल में क्या प्रभाव रहेगा? सर्विस तो खूब करते हो, विस्तार बहुत कर लेते हो लेकिन बीज-रूप अवस्था को छोड़ देते हो। विस्तार में जाने से सार निकाल देते हो। इसलिए अब सार को नहीं निकालो। विस्तार को समाने अर्थात् सार-स्वरूप बनने नहीं आता। क्वान्टिटी में चले जाते हो लेकिन अपनी क्वालिटी नहीं निकलती। अपनी स्थिति में भी संकल्पों की क्वान्टिटी है। इसलिए सर्विसकी रिजल्ट में भी क्वान्टिटी है, क्वालिटी नहीं। सारे झाड़ रूपी विस्तार में एक बीज ही पावरफुल होता है ना। ऐसे ही क्वान्टिटी के बीज में एक भी क्वालिटी वाला है तो वह विस्तार में बीज-रूप के समान है। क्वालिटी की सर्विस करते हो? विस्तार में जाने से वा दूसरों का कल्याण करते-करते अपना कल्याण तो नहीं भूल जाते हो? जब दूसरे के प्रति जास्ती अटेन्शन देते हो तो अपने अन्दर जो टेन्शन चलता है उनको नहीं देखते हो। पहले अपने टेन्शन पर अटेन्शन दो, फिरविश्वमें जो अनेक प्रकार के टेन्शन हैं उनको खलास कर सकेंगे। पहले अपने आपको देखो। अपनी सर्विसफर्स्ट, अपनी सर्विस की तो दूसरों की सर्विसस्वतः हो जाती है। अपनीसर्विसको छोड़ दूसरों की सर्विसमें लग जाने से समय और संकल्प ज्यादा खर्च कर लेते हो। इस कारण जो जमा होना चाहिए वह नहीं कर पाते। जमा न होने के कारण वह नशा, वह खुशी नहीं रहती। अभी-अभी कमाया और अभी-अभी खाया; तो वह अल्पकाल का हो जाता है। जमा रहता है वह सदा साथ रहता है। तो अब जमा करना भी सीखो। सिर्फ इस जन्म के लिए नहीं लेकिन 21 जन्मों के लिए जमा करना है। अगर अभी-अभी कमाया और खाया तो भविष्य में क्या बनेगा? अभी-अभी कमाया और अभी-अभी बांटा, नहीं। खाने बाद समाना भी चाहिए, फिर बांटना चाहिए। कमाया और बांट दिया; तो अपने में शक्ति नहीं रहती। सिर्फ खुशी होती है - जो मिला सो बांटा। दान करने की खुशी रहती है लेकिन उसको स्वयं में समाने की शक्ति नहीं रहती। खुशी के साथ शक्ति भी चाहिए। शक्ति न होने कारण निर्विघ्न नहीं हो सकते, विघ्नों को पार नहीं कर सकते। छोटे-छोटे विघ्न लगन को डिस्टर्ब कर देते हैं। इसलिए समाने की शक्ति धारण करनी चाहिए। जैसे खुशी की झलक सूरत में दिखाई देती है, वैसे शक्ति की झलक भी दिखाई देनी चाहिए। सरलचित बहुत बनो लेकिन जितना सरलचित हो उतना ही सहनशील हों। कि सहनशीलता भी सरलता है? सरलता के साथ समाने की, सहन करने की शक्ति भी चाहिए। अगर समाने और सहन करने की शक्ति नहीं तो सरलता बहुत भोला रूप धारण कर लेती और कहां-कहां भोलापन बहुत भारी नुकसान कर देता है। तो ऐसा सरलचित भी नहीं बनना है। बाप को भी भोलानाथ कहते हैं ना। लेकिन ऐसा भोला नहीं है जो सामना न कर सके। भोलानाथ के साथ-साथ आलमाइटीअथॉरिटीभी तो है ना। सिर्फ भोलानाथ नहीं है। यहां शक्ति-स्वरूप भूल सिर्फ भोले बन जाते हैं तो माया का गोला लग जाता है। वर्तमास समय भोलेपन के कारण माया का गोला ज्यादा लग रहा है। ऐसा शक्ति स्वरूप बनना है जो माया सामना करने के पहले ही नमस्कार कर ले, सामना कर न पावे। बहुत सावधान, खबरदार-होशियार रहना है। अपनी वृति और वायुमण्डल को चेक करो। अपने आपको देखो कि कोई भी वायुमण्डल अपनी वृति को कमजोर तो नहीं करता है? कैसा भी वायुमण्डल हो लेकिन स्वयं की शक्तिशाली वृति वायुमण्डल को परिवर्तन में ला सकती है। अगर वायुमण्डल का वृति के ऊपर असर आ जाता है तो यही भोलापन है। ऐसे भी नहीं सोचना चाहिए कि मैं तो ठीक हूँ लेकिन वायुमण्डल का असर आ गया। नहीं। कैसा भी वायुमण्डल विकारी हो लेकिन स्वयं की वृति निर्विकारी होनी चाहिए। जब कहती हो - हम पतित-पावनियां हैं, पतितों को पावन बनाने वाली हैं; जब आत्माओं को पावन बना सकती हो तो क्या वायुमण्डल को पतित से पावन नहीं बना सकतीं? पावन बनाने वाले वायुमण्डल के वशीभूत नहीं होते। लेकिन वायुमण्डल वृति के ऊपर प्रभाव डाल देता है, यह है कमजोरी। हरेक को ऐसा समझना चाहिए कि मुझे स्वयं अपने पावरफुल वृति से जो भी अपवित्र वा कमजोरी का वायुमण्डल है उसको मिटाना है। तुम मिटाने वाले हो, न कि वश होने वाले। कोई पतित वायुमण्डल का वर्णन भी नहीं करना चाहिए। वर्णन किया तो जैसे कहावत है - ना पाप को देखने वाले पर भी पाप होता है। अगर कोई भी कमजोर वा पतित वायुमण्डल का वर्णन भी करते हैं तो यह भी पाप है। क्योंकि उस समय बाप को भूल जाते हैं। जहां बाप भूल जाता है वहां पाप ज़रूर होता है। बाप की याद होगी तो पाप नहीं हो सकता। इसलिए वर्णन भी नहीं करना चाहिए। जबकि बाप का फरमान है तो मुख से सिवाए ज्ञान रत्नों के और कोई एक शब्द भी व्यर्थ नहीं निकलना चाहिए। वायुमण्डल का वर्णन करना - यह भी व्यर्थ हुआ ना। जहां व्यर्थ है वहां समर्थ की स्मृति नहीं। समर्थ की स्मृति में रहते हुए कोई भी बोल बोलेंगे तो व्यर्थ नहीं बोलेंगे, ज्ञान-रत्न ही बोलेंगे। तो वृति को, बोल को भी चेक करो। कई ऐसे भी समझते हैं कि कर्म कर लिया, पश्चाताप कर लिया, माफी मांग ली, छुट्टी हो गई। लेकिन नहीं। कितनी भी कोई माफी ले लेवे लेकिन जो कोई पाप कर्म वा व्यर्थ कर्म भी हुआ तो उसका निशान मिटता नहीं। निशान पड़ ही जाता है। रजिस्टर साफ-स्वच्छ नहीं होता। इसलिए ऐसे भी नहीं कहना कि हो गया, माफी ले ली। इस रीति रसम को भी नहीं अपनाना। अपना कर्त्तव्य है -- संकल्प में, वृति में, स्मृति में भी कोई पाप का संकल्प न आये। इसको ही कहा जाता है ब्राह्मण अर्थात् पवित्र। अगर कोई भी अपवित्रता वृति, स्मृति वा संकल्प में है तो ब्राह्मण-पन की स्थिति में स्थित हो नहीं सकते, सिर्फ कहलाने मात्र हो। इसलिए कदम- कदम पर सावधान रहो। खुशी के साथ-साथ शक्तियों को भी साथ रखना है। विशेषताओं के साथ अगर कमजोरी भी होती है तो एक कमजोरी अनेक विशेषताओं को समाप्त कर देती है। तो अपनी विशेषताओं को प्रत्यक्ष करने के लिए कमजोरी को समाप्त कर दो। समझा? सर्विस के बीच में अगर डिस्सार्विस हो जाती है तो डिस्सार्विस प्रत्यक्ष हो जाती है। कितना भी अमृत हो लेकिन विष की एक बूंद भी पड़ने से सारा अमृत विष बन जाता है। कितनी भी सर्विसकरो लेकिन एक छोटी-सी गलतीडिस्सार्विस का कारण बन जाती है, सर्विस को समाप्त कर देती है। इसलिए बहुत अटेन्शन रखो अपने ऊपर और अपनीसर्विसके ऊपर। पहले करना है, फिर कहना है। कहना सहज होता है लेकिन करने में मेहनत है। मेहनत का फल अच्छा होता है, सिर्फ कहने का फल अच्छा नहीं। तो पहले करो, फिर कहो। फिर देखना, कैसी क्वालिटी वाली सर्विस होती है! अपनी क्वालिटी को देखो। समझा? वृति और वायुमण्डल को पावरफुल बनाओ। आप ब्राह्मणों का जन्म ही है -- बनने और बनाने के लिए, सिर्फ बनने के लिए नहीं। पढ़ना पढ़ाने के लिए है।विश्वकल्याणकारी हो ना। जैसे बाप कल्याणकारी है, साथ में आप भी मददगार हो। इसलिए यह भी नहीं सोचना चाहिए कि मेरी वृति तो ठीक है, यह वायुमण्डल ने कर दिया है। अगर अपनी वृति ठीक है और उसका वायुमण्डल पर असर नहीं होता हो, गोया पावरफुल वृति नहीं है। पावरफुल चीज़का प्रभाव आस-पास ज़रूर पड़ता है, वह छिप नहीं सकता। तो अपनी वृति को भी परखने के लिए यह चेक करो कि वृति का वायुमण्डल पर असर क्या है? वायुमण्डल अगर और दिखाई देता है तो समझना चाहिए अपनी वृति में भी कमज़ोरी है। उस कमजोरी को मिटाना चाहिए। आजकल चारों ओर की सर्विस की रिजल्ट में विशेष क्या दिखाई देता है?
साज़ बजाने में बड़े होशियार हो गये हैं लेकिन साज में जाने से राज से खिसक जाते हैं। बनना है राजयुक्त लेकिन बन गये हैं साज़युक्त। साज और राज - दोनों ही साथ-साथ समान होना चाहिए। अगर एक बात ज्यादा फोर्स में है और दूसरी बात गुप्त है तो रिजल्ट भी गुप्त रह जाती है। साज बजाने में तो सभी बहुत होशियार हो गये हैं लेकिन राजयुक्त भी बनना है। तो अब राजयुक्त बनो, योगयुक्त बनो। अच्छा! ऐसे राजयुक्त, योगयुक्त, युक्तियुक्त चलने वालों को नमस्ते।