Avyakt murli du mercredi 26 juin 1974
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
>
26-06-74 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
सर्व-सिद्धियों की प्राप्ति के रूहानी नशे में सदा स्थित रहो
सर्व आत्माओं की जन्मपत्री को जानने वाले, सर्व-सिद्धियों के दाता, वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी शिव बाबा बोले:-
आज ज्ञान-सूर्य बाप हर सितारे के मस्तक पर तकदीर की लकीर देख रहे हैं। लौकिक रीति में भी, भक्तों द्वारा हस्तों से जो जन्मपत्री देखी जाती है,उनमें मुख्यतः चार बातें देखते हैं। यहाँ हस्तों द्वारा तो नहीं, लेकिन मस्तक द्वारा मुख्य चार बातें देख रहे हैं-(1)एक बात यह कि बुद्धि की लाइन कितनी क्लियर है और विशाल है (2) दूसरी बात, हर समय ज्ञान-धन को धारण करने में, तन के कर्मभोग से निर्विघ्न और मन से एकरस लगन लगाने में मरजीवा जन्म से लेकर अभी तक कहाँ तक निर्विघ्न चलते आ रहे हैं? (3) तीसरी बात, इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म की स्मृति की आयु लम्बी है या छोटी है? बार-बार स्मृति अर्थात् जीना, विस्मृति अर्थात् मरने की हालत में पहुँच जाना,इसी हिसाब से आयु छोटी अथवा बड़ी गिनी जाती है। (4) मरजीवा जन्म लेते ही,स्नेह,सम्बन्ध सम्पर्क और सर्वशक्तियों में कहाँ तक तकदीरवान रहे हैं? क्या तकदीर की रेखा प्रतिशत के हिसाब से अटूट रही है और साथ-साथ पढ़ाई में व कमाई जमा करने में सदा सफलतामूर्त,रेग्युलर और पंक्चुअल कहाँ तक रहे हैं?कितनी आत्माओं के प्रति महादानी, वरदानी,कल्याणकारी बने हैं अर्थात् दान-पुण्य की रेखा लम्बी है या छोटी? इन सब बातों से हरेक सितारे के वर्तमान और भविष्य को देख रहे हैं।
आप सब अपने मस्तक की रेखाओं को जान और देख सकते हो, परन्तु कैसे? बाप-दादा के दिल-तख्तनशीन बन कर, स्मृति के तिलकधारी बनकर नॉलेजफुल और पॉवरफुल स्टेज पर स्थित हो देखेंगे तो स्पष्ट जान सकेंगे। अपनी पोज़ीशन को छोड़कर, माया की ऑपोज़ीशन की स्थिति में व स्टेज पर स्थित होकर अपने को व अन्य आत्माओं को जब देखते हो, तब स्पष्ट दिखाई नहीं देता। पोज़ीशन कौन-सी है? आपकी अपनी पाज़ीशन कौन-सी है, जिसमें सब बातें आ जाती हैं? मास्टर आलमाइटी अथॉरिटी। सदा इसी पाज़ीशन में स्थित रहते हुए, हर कर्म को करो तो यह पोज़ीशन माया के हर विघ्न से परे,निर्विघ्न बनाने वाली है। जैसे कोई लौकिक रीति में भी जब कोई अथॉरिटी वाला होता है, तो उनके आगे कोई भी सामना करने की हिम्मत नहीं रखते हैं और अगर कोई अपनी अथॉरिटी को यूज़ करने के बजाय हर समय लूज़ रहता है, तो साधारण आदमी भी सामना करने के लिए अथवा डिस्टर्ब करने के लिए,विघ्न डालने के लिए लूज़ रहते हैं। तो यहाँ भी अपनी अथॉरिटीज़ को,प्राप्त हुई सर्व-शक्तियों को, वरदानों को यूज करने के बजाय लूज़ रहते हो। इसलिए हर समय,माया को सामना करने की हिम्मत रहती है। मन्सा में,वाचा में,कर्मणा में,सम्बन्ध में और सम्पत्ति में सब में इन्टरफियर करने की हिम्मत रखती है। किसी भी बात में छोड़ती नहीं, क्योंकि अपनी पाज़ीशन से नीचे आकर साधारण बन जाते हो।
रिवाज़ी रीति से यदि कोई साधारण आत्मायें भी अल्पकाल की सिद्धि प्राप्त कर लेती हैं, तो कितनी अथॉरिटी में रहती हैं। यहाँ सर्व-सिद्धियाँ प्राप्त होते हुए (1) चाहे सदा निरोगी बनने की सिद्धि (2) चाहे कोई भी प्रकृति के तत्व को वश में करने की सिद्धि (3) चाहे कोई दुःखी, निर्धन व अशान्त आत्मा को अविनाशी धनवान बनाने व सदा सुखी बनाने की सिद्धि (4) निर्बल को महा बलवान बनाने की सिद्धि (5) संकल्पों को एक सेकेण्ड में जहाँ और जैसे ठहराना चाहो वा संकल्प को अपने वश में करने की सिद्धि (6) पाँच विकारों रूपी महाभूतों को वश में करने की सिद्धि (7) नैनहीन को त्रिनेत्री बनाने की सिद्धि (8) अनेक परिस्थितियों की परेशानी में मूर्छित हुई आत्मा को स्व-स्थिति द्वारा सुरजीत करने व जी-दान देने की सिद्धि (9) भटकी हुई आत्मा को सदाकाल के लिए ठिकाना देने की सिद्धि (10) जन्मजन्मान्तर के लिए आयु लम्बी करने की सिद्धि (11) अकाले मृत्यु से बचाने की सिद्धि (12) राज्यभाग व ताज-तख्त प्राप्त करने की सिद्धि। ऐसी सर्व-सिद्धियों को विधि द्वारा प्राप्त करने वाली आत्मायें कितने नशे में रहनी चाहिए?
अपने आप को क्यों भूल जाते हो? लेना है बाप का सहारा और कर देते हो सर्वशक्तिमान से किनारा। खिवैया से किनारा कर और किनारे को अर्थात् मंज़ल जब ढूंढ़ते हो, तो मिलेगी या समय व्यर्थ जायेगा? बाप-दादा को ऐसे भोले व भूले हुए बच्चों पर रहम आता है। लेकिन कब तक? जब तक बाप द्वारा रहम लेने की आवश्यकता व इच्छा है,तब तक अन्य आत्माओं के प्रति रहमदिल नहीं बन सकेंगे?जो स्वयं ही लेने वाला है,वह देने वाला दाता नहीं बन सकता जैसे भिखारी,भिखारी को सम्पन्न नहीं बना सकता। हाँ अल्पकाल के लिए वे कुछ शक्तियों के आधार से,उन्हों पर थोड़े समय के लिए प्रभाव डाल सकते हैं। लेकिन सदा काल के लिए और सर्व में सम्पन्न नहीं बना सकते। अच्छा-अच्छा कहने तक अनुभव करा सकते हैं,लेकिन इच्छा मात्रम् अविद्या की स्टेज तक नहीं ला सकते। अच्छा-अच्छा कहने के साथ,सर्व-प्राप्ति की इच्छा समाप्त नहीं होती। क्योंकि स्वयं भी बाप द्वारा व सर्व सहयोगी आत्माओं द्वारा सहयोग,स्नेह,हिम्मत,उल्लास,उमंग की इच्छा रखने वाले और कोई भी प्रकार का आधार लेने वाले सर्व-आत्माओं के निमित्त आधार-मूर्त नहीं बन सकते। प्रकृति के व परिस्थिति के और व्यक्ति के व वैभव के अधीन रहने वाली आत्मा अन्य आत्माओं को भी सर्व अधिकारी नहीं बना सकती। इसलिए अपनी सर्व-सिद्धियों को जानकर उन्हें यूज़ करो। लेकिन निमित्त-मात्र बन कर यूज़ करो। मैं-पन भूल, श्रीमत के आधार से हर सिद्धि को यूज़ करो। अगर मैं-पन में आकर, कोई भी सिद्धि को यूज़ किया, तो क्या कहावत है? करामत खैर खुदाई।अर्थात् श्रेष्ठ-पद के बजाय, सज़ा के भागी बन जावेंगे। साक्षीपन नहीं, तो फिर सज़ा है। इसलिए सदा स्मृति-स्वरूप और सिद्धि-स्वरूप बनो। समझा?
मुरली का सार
(1) सदा मास्टर आलमाइटी अथॉरिटी की पोज़ीशन में स्थित रहते हुए, यदि हर कर्म करो तो यह पोज़ीशन माया की ऑपाज़ीशन अर्थात् हर विघ्न से परे निर्विघ्न बनाने वाली बन जायेगी।
(2) प्रकृति व परिस्थिति के और व्यक्ति के वैभव के आधीन रहने वाली आत्मा कभी भी अन्य आत्माओं को स्व-अधिकारी नहीं बना सकती।
(3) अपनी सर्व-सिद्धियों को जानकर, मैं-पन को भूल निमित्त-मात्र बन कर, श्रीमत के आधार से युज़ करो।
(4) यदि साक्षीपन नहीं, तो फिर सज़ा है।