Avyakt murli du samedi 6 décembre 1975
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06-12-75 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
अलौकिक शमा पर रूहानी पतंगे बन स्वाहा हो
विश्व के शो-केस में अमूल्य रत्न के रूप में प्रसिद्धि दिलाने वाले, मास्टर त्रिकालदर्शी की स्टेज पर स्थित कराने वाले, सर्व-गुणों के मास्टर सागर स्वरूप बनाने वाले,रूहानियत की लाली से तस्वीर को चित्ताकर्षक बनाने वाले रूहानी पिता शिव बोले :-
अपने को सारी दुनिया के बीच चमकता हुआ विशेष लक्की सितारा अनुभव करते हो? ऐसे लक्की जिन्हों का स्वयं बाप गायन करते हैं! इससे श्रेष्ठ भाग्य और किसी का हो सकता है?सदा ऐसी खुशी रहती है,जो अपनी खुशी को देखते हुए देखने वालों के गम के बादल व दुःख की घटायें समाप्त हो जायें, दुःख को भूल सुख के झूले में झूलने लग जायें! ऐसे अपने को अनुभव करते हो? जैसे गायन है - पारस के संग में लोहा भी पारस बन जाता है;ऐसे आप पारसमणियों के संग से अन्य आइरन-एजड आत्मायें गोल्डन बन जायें, ऐसी अवस्था अनुभव करते हो? कोई भी आत्मा भिखारी बन कर आये और वह मालामाल हो कर जाये, ऐसे अपने तकदीर की तस्वीर रोज अपने दर्पण में देखते हो?किस समय देखते हो? क्या अमृतवेले? देखने का टाइम निश्चित है अथवा चलते-फिरते जब आता है तब देखते रहते हो?सारे दिन में कितनी बार देखते हो? बार-बार देखते हो या एक ही बार? आजकल का फैशन है कि बार-बार अपना चेहरा देखते हैं। वह देखते हैं अपने फीचर्स और आप देखते हो अपना फ्यूचर आपका फीचर्स तरफ अटेन्शन नहीं है लेकिन हर समय अपने फ्यूचर को श्रेष्ठ बनाने का ही अटेन्शन है। तो अपने तकदीर की तस्वीर देखते हो कि हमारी तस्वीर में कहाँ तक रूहानियत बढ़ती जा रही है? जैसे वे लोग लौकिक दृष्टि से रूप में व शक्ल में अपनी लाली को देखते हैं कि कहाँ तक लालहुए हैं; और आप सब अलौकिक तस्वीर देखते हुए रूहानियतरूपी लाली को देखते हो।
आज तो विशेष दूर देशी व डबल विदेशी अर्थात् त्रिकालदर्शी बच्चों से विशेष मिलने आये हैं। यह भी विशेष लक्क हुआ ना। ऐसा लक्की अपने को समझते हो? पद्मा-पद्म भाग्यशाली अपने को समझते हो या सौभाग्यशाली या पद्मा-पद्म शब्द भी कुछ नहीं है? अपने को क्या समझते हो? कहो पद्म तो हमारे कदमों में समाये हुए हैं। जिनके कदमों में अनेक पद्म भरे हुए हों वह स्वयं क्या हुआ? जैसे कोई भी विशेषता सुनाते हैं वा अपनी श्रेष्ठता वर्णन करते हैं तो कहते हैं ना वह तो हमारे पाँव के नीचे हैं, यह हमारे आगे क्या हैं? ऐसे ही पद्म तो आपके पॉव के नीचे हैं। ऐसे श्रेष्ठ लक्की हो? सिर्फ अपने भाग्य का ही सुमिरण करो तो क्या बन जायेंगे? भाग्य का सुमिरण करते-करते बाप से भी सर्व-श्रेष्ठ और बाप के भी सिर के ताज बन जायेंगे। अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थिति का यादगार चित्र देखा है?आपके सर्वश्रेष्ठ भाग्य की निशानी का यादगार चित्र कौन-सा है कि जिससे सर्व से ऊंचे प्रसिद्ध होते हो? विराट् स्वरूप में ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठ यादगार में चोटी दिखाई है। चोटी से ऊंचा कुछ होता है क्या? शक्ति सेना भी ऐसे अपने को लक्की समझती है? यह (मीरा लण्डन की) सबसे अधिक अपने को लक्की समझती है, क्योंकि इसकी अपनी हम-जिन्स में तो यह एक ही विशेष रत्न है ना अभी।
बाप भी आज विशेष बच्चों का विशेष भाग्य देख हर्षित हो रहे हैं। कैसे कोने-कोने से विदेश के कोनों से भी निकलकर के अपने घर में पहुँच गये हैं। बाप भी घर में आये हुए बच्चों को, जो आधा कल्प की आशा लगाते हुए अब यहाँ तक पहुँच गये हैं,तो बच्चों को अपने ठिकाने पर आया देख कर व सर्व आशायें पूरी होती हुई देख कर बाप भी हर्षित होते हैं। विदेशी ग्रुप की विशेषता क्या है? विदेशियों को देख कर बाप भी विदेशियों की विशेषता देखते हुए विशेष हर्षित होते हैं। क्योंकि भले मैजॉरिटी भारतवासियों की है लेकिन अब विदेशी कहलवाये वा कहे जाते हैं। तो मैजॉरिटी में जो पहली क्वॉलिटी है,आने से ही पतंगे मिसल शमा पर जल कर मर जाना उसमें फिर सोचना नहीं। सुना,अनुभव किया और चल पड़े। तो विदेशियों में यह क्वॉलिटी भारतवासियों से विशेष है। भारतवासी पहले क्वेश्चन करेंगे, फिर सोचेंगे, फिर बाद में स्वाहा होंगे। विदेश से जो निकली हुई आत्मायें हैं उनकी शमा पर पतंगे के समान स्वाहा होने की विशेषता है। समझा? जैसे कोई दूर बैठे बहुत तड़पन में हो और ऐसी तड़पती हुई आत्मा को ठिकाना मिल जाये तो ऐसी तड़पती हुई आत्माएँ मैजॉरिटी रूप से विदेशी ग्रुप में दिखाई देती हैं। समझा? अपनी विशेषता को। पतंगा होने के कारण ऑटोमेटिकली उन्हों का पुरूषार्थ याद और सेवा के सिवाय और कुछ रहता नहीं। इसलिये फास्ट जाते हैं।
आप लोग कब, क्यों और क्या का क्वेश्चन करते हो? माया के वार से हार खाने वाले हो या सदा विजयी हो?माया को हार खिलाने वाले हो, न कि खाने वाले। तो विदेशियों को बाप की विशेष लिफ्ट भी है जिस लिफ्ट के गिफ्ट के कारण फास्ट जा रहे हैं। इस विशेषता को सदा कायम रखना। क्यों और क्या के क्वेश्चन के बजाय सदा मास्टर त्रिकालदर्शी स्टेज पर स्थित होते और हर कार्य व संकल्प को उसी प्रमाण स्वरूप में लाओ। जब त्रिकालदर्शी हो तो फिर क्यों और क्या का क्वेश्चन समाप्त हो जायेगा ना? तो सदा मास्टर त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहो, सदा अपने को एक बाप की याद में समाया हुआ बाप-समान समझते हुए चलो। जैसे तत्वयोगी सदा यही लक्ष्य रखते हैं कि तत्व में समा जायें व लीन हो जायें - लेकिन यह कब अनुभव नहीं करते हैं। इस समय नॉलेज के आधार पर तुम समझते हो कि बाप की याद में समा जाना व लवलीन हो जाना, अपने आप को भूल जाना इसी को ही वह एक हो जाना कहते हैं। जब लव में लीन हो जाते हो अर्थात् लगन में मग्न हो जाते हो तो बाप के समान बन जाते हो,इसी को उन्हों को समा जाना कह दिया है। तो ऐसा अनुभव करते हो?आत्मा बाप के लव में अपने को बिल्कुल खोई हुई अनुभव करे, क्या ऐसा अनुभव होता है? जैसे कोई सागर में समा जाय तो उस समय का उसका अनुभव क्या होगा? सिवाय सागर के और कुछ नजर नहीं आयेगा। तो बाप अर्थात् सर्वगुणों के सागर में समा जाना। इसको कहा जाता है लवलीन हो जाना अर्थात् बाप के स्नेह में समा जाना। बाप में नहीं समाना है, लेकिन बाप की याद में समा जाना है। क्या ऐसा अनुभव होता है ना?
विदेश पार्टी को देख बापदादा उन्हों के भविष्य को देख रहे हैं। विदेश पार्टी का भविष्य क्या है? सतयुग का नहीं, सतयुग का भविष्य तो राजा-रानी है लेकिन संगम का भविष्य क्या है? (बाप को प्रत्यक्ष करने का) लेकिन वह कब करेंगे?उनकी डेट क्या है? जब तक डेट फिक्स नहीं करेंगे तब तक पॉवरफुल प्लैन नहीं बनेगा। विदेशियों द्वारा ही भारत के कुम्भकरण जागने हैं। अगर आप लोग भी सोचेंगे कि कर लेंगे तो वह भी कहेंगे - हाँ, जाग जायेंगे। इसलिये जगाने वालों को फुलफोर्स से अपना पॉवरफुल प्लैन बनाना पड़े। इस वर्ष यह-यह करना ही है तब वह भी सोचेंगे कि इस वर्ष के अन्दर जगना ही है। अभी जगाने वालों का भी समय निश्चित नहीं है। इसलिये जागने वालों के पास भी समय निश्चित नहीं है। जैसे जगाने वाले सोचते हैं - करना तो है,ऐसे वह भी सोचते हैं, जागना तो है अन्त में जाग जायेंगे। इसलिये विदेशियों का भविष्य क्या रहा? भारत के नामी-ग्रामियों को जगाना है। यह है विदेशियों का भविष्य। साधारण कुम्भकरण नहीं लेकिन नामी-ग्रामी कुम्भकरणों को जगाना है। जिस एक के जगाने से अनेक जग जायें उसको कहते हैं नामी-ग्रामी। धरणी अथवा स्टेज तो तैयार होती जा रही है। अब सिर्फ पार्टधारियों को पार्ट बजाना है लेकिन पार्ट भी हीरो पार्ट,साधारण पार्ट से नहीं होगा। हीरो पार्ट बजाने से कुम्भकरण भी जाग कर हिअर-हिअरकरेंगे। अच्छा!
ऐसे तकदीर जगाने के निमित्त बने हुए जागती ज्योति, सदा स्वयं के और समय के मूल्य को जानने वाले,ऐसे अमूल्य रत्न, विश्व के शोकेस में विशेष प्रसिद्ध होने वाले सर्व-सिद्धि स्वरूप, हर संकल्प को स्वरूप में लाने वाले बाप-समान सर्व गुणों को सेवा और स्वरूप में लाने वाले, ऐसी विशेष आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
ग्रुप्स से मुलाकात
समय की समीपता की निशानी है कि हर कदम में सदा सफलता समाई हो। सफलता होगी अथवा नहीं यह स्वप्न में भी संकल्प नहीं आयेगा। हर कार्य करने के पीछे निश्चित रूप से सफलता दिखाई देगी। करें अथवा नहीं करें और होगा या नहीं, यह संकल्प भी नहीं उठेगा। जो होना ही है वही ऑटोमेटिकली होता रहेगा। सफलता ब्राह्मणों के रास्ते में फूलों के समान आजान करती है। जैसे कोई भी बड़ा आदमी आता है तो उसके रास्ते में फूल को बिछा देते हैं और उससे उन्हों का स्वागत करते हैं। तो जैसे विशेष आत्मा होते जाते हैं वैसे सफलता फूलों के सदृश्य आजान करती है। आह्वान करती है कि सफलता-मूर्त्त मुझे अपनावें। स्वयं को आह्वान नहीं करना पड़ता सफलता का। लेकिन सफलता-मूर्त्त का सफलता आह्वान करती है। यह फर्क पड़ जाता है। अच्छा!
महावाक्यों की विशेष बातें
1. सदा ऐसी खुशी में रहो कि आपकी खुशी को देखते हुए देखने वालों के गम के बादल व दुःख की घटायें समाप्त हो जायें और वे सुख के झूले में झूलने लग जाएं।
2. अपनी अलौकिक तस्वीर को देखते हुए रूहानियत रूपी लाली सदा देखते रहो कि कहाँ तक चेहरे में रूहानी लाली बढ़ी है?
3. विराट रूप में ब्राह्मणों की यादगार चोटी दिखाई गई है जो कि आपके सर्वश्रेष्ठ भाग्य की निशानी यादगार चित्र है।
4. विदेश से जो निकली हुई आत्मायें हैं उनकी शमा पर पतंगे के समान स्वाहा होने की विशेष विशेषता है।
5. सदा मास्टर त्रिकालदर्शी की स्थिति में रहने से सारे क्वेश्चन समाप्त हो जायेंगे।
6. सदा अपने को एक बाप की याद में समाया हुआ बाप-समान समझते हुए चलो। बाप में नहीं समाना है लेकिन बाप की याद में समा जाना है।