Avyakt murli du mardi 24 mai 1977
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24-05-77ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
बाप के डायरेक्ट बच्चे ही डबल पूजा के अधिकारी बनते हैं
पद्मापद्म भाग्यशाली, डायरेक्ट बाप की पहली रचना, डबल पूजा के अधिकारी,बाप के सिर के ताजधारी श्रेष्ठ आत्माओं प्रति बाबा बोले:-
बापदादा हरेक बच्चे के भाग्य को देख हर्षित हो रहे हैं। सारे विश्व के अन्दर कोटों में कोई गाई हुई आत्माएं कितनी थोड़ी सी हैं, जिन्होंने बाप को पाया है। न सिर्फ जाना,लेकिन जानने के साथ-साथ, जिसको पाना था, वो पा लिया। ऐसे बाप के अति स्नेही,सहयोगी बच्चों के भाग्य को देख रहे थे। वैसे सर्व आत्माएं बच्चे हैं, लेकिन आप आत्माएं डायरेक्ट बच्चे हो। शिव वंशी ब्रह्माकुमार और कुमारियाँ हो। सारे विश्व में जो भी अन्य आत्माएं धर्म के क्षेत्र में वा राज्य के क्षेत्र में महान वा नामी-ग्रामी बने हैं, धर्म-पिताएं बने हैं, जगत् गुरू कहलाने वाले बने हैं;लेकिन मात-पिता के सम्बन्ध से,अलौकिक जन्म और पालना किसी को भी प्राप्त नहीं होता है। अलौकिक माता-पिता का अनुभव स्वप्न में भी नहीं करते। और आप श्रेष्ठ आत्माएं वा पद्मापद्मपति आत्माएं हर रोज मात-पिता की वा सर्व सम्बन्धों की याद प्यार लेने के पात्र हो। हर रोज यादप्यार मिलती है ना। न सिर्फ यादप्यार, लेकिन स्वयं सर्वशक्तिवान बाप, आप बच्चों का सेवक बन हर कदम में साथ निभाता है। अति स्नेह से सिर का ताज बनाकर नयनों का सितारा बनाकर,साथ ले जाते हैं। ऐसा भाग्य जगत् गुरू वा धर्मपिता का नहीं हैं,क्योंकि आप श्रेष्ठ आत्माएं सम्मुख बाप कीश्रीमतलेने वाली हो। प्रेरणा द्वारा व टचिंग(Touching;प्रेरणा) द्वारा नहीं, मुख वंशावली हो। डायरेक्ट मुख द्वारा सुनते हो। ऐसा भाग्य किन आत्माओं का है? मैजारिटी (Majority;अधिकतर) भारतवासी गरीब,भोली सी आत्माओं का है। जो ना उम्मीदवार थे कि हमें कब बाप मिल सकता है। इतना श्रेष्ठ भाग्य, फिर ऐसे नाउम्मीदवार को ही मिला है। जब कोई नाउम्मीदवार से उम्मीदवार बनता है वा असम्भव से सम्भव बात होती है, तो कितना नशा और खुशी होती है! ऐसा भाग्य अपना सदैव स्मृति में रहता है?
सारे ड्रामा के अन्दर और धर्म की आत्माओं को देखो और अपने को देखो तो महान अन्तर है। पहली बात सुनाई कि डायरेक्ट बच्चे हो। माता-पिता वा सर्व सम्बन्धों का सुख का अनुभव करने वाले, डायरेक्ट बच्चे होने के कारण, विश्व के राज्य का वर्सा सहज प्राप्त हो जाता है। सृष्टि के आदिकाल सतयुग अर्थात् स्वर्ग की सतो प्रधान, सम्पूर्ण प्राप्ति आप आत्माओं को ही प्राप्त होती है। और सर्व आत्माएं आती ही मध्यकाल में हैं। आप श्रेष्ठ आत्माओं का भोगा हुआ सुख वा राज्य रजो प्रधान रूप में प्राप्त करते हैं। जैसे आप आत्माओं को धर्म और राज्य दोनों प्राप्ति हैं,लेकिन अन्य आत्माओं को धर्म है तो राज्य नहीं,राज्य है तो धर्म नहीं। क्योंकि द्वापर युग से धर्म और राज्य का दोनों पुर अलग-अलग हो जाते हैं। जिसकी निशानी सारे ड्रामा के अन्दर डबल ताजधारी सिर्फ आप हो। और कोई देखा है? और भी विशेषताएं हैं। सम्पूर्ण प्राप्ति अर्थात् तन,मन, धन,सम्बन्ध और प्रकृति के सर्व सुख, जिसमें अप्राप्त कोई वस्तु नहीं, दुःख का नाम-निशान नहीं - ऐसी श्रेष्ठ प्राप्ति अन्य कोई आत्मा को प्राप्त नहीं होती है। डायरेक्ट बच्चे होने के कारण, ऊँच ते ऊँच बाप की सन्तान होने के कारण, परम पूज्य पिता की सन्तान होने कारण आप आत्माएं भी डबल रूप में पूजी जाती हो। एक सालिग्राम के रूप में, दूसरा देवी वा देवता के रूप में। ऐसे विधि पूर्वक पूज्य, धर्मपिता वा कोई भी नामी-ग्रामी आत्मा नहीं बनती। कारण? क्योंकि तुम डायरेक्ट वंशावली हो। समझा कितने भाग्यशाली हो,जो स्वयं भगवान आपका भाग्य बाला करते हैं! तो सदा अपने ऐसे भाग्य को स्मृति में रखो। कमज़ोरी के गीत नहीं गाओ। भक्त कमज़ोरी के गीत गाते हैं और बच्चे भाग्य के गीत गाते हैं। तो अपने आप से पूछो कि भक्त हूँ वा बच्चा हूँ? समझा अपने श्रेष्ठ भाग्य को? अच्छा।
ऐसे पद्मापद्म भाग्यशाली, डायरेक्ट बाप की पहली रचना, सर्व सम्बन्धों के सुख के अधिकारी,सर्व प्राप्ति के अधिकारी, राज्यभाग के अधिकारी,डबल पूजा के अधिकारी, बाप के भी सिर के ताजधारी, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।