Avyakt murli du vendredi 27 mai 1977
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
Le murli français n'est pas disponible.
>
27-05-77ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
पॉवरफुल स्टेज अर्थात् बाप समान बीजरूप स्थिति
सदा समर्थ, सदा ज्ञान के खज़ाने से सम्पन्न,बाप समान गुणमूर्त्त और शक्ति मूर्त्त, ज्ञानी तू आत्मा, ऐसी विदेशी सो स्वदेशी आत्माओं प्रति बाप-दादा के उच्चारे हुए महावाक्य:-
आज बाप-दादा के सामने कौन सी सभा बैठी हुई है? जानते हो?आज डबल प्रकार की सभा है। एक,जो सभी सामने बैठी हैं - भारतवासी बच्चों की सभा। दूसरे, विदेशी बच्चों की सभा। विदेशी बच्चे बहुत उमंग,उत्साह और लगन से बाप को प्रत्यक्ष करने के प्लान्स (Plans) बनाते हुए, बार-बार बाप के गुण गाते,खुशी में नाच रहे हैं। उन्हों की खुशी का, मन का गीत बाप-दादा के सामने सुनाई दे रहा है। सब तरफ,विशेष रूप से बाप के स्नेह और सेवा का वातावरण आकर्षण करने वाला है। बाप-दादा को भी बच्चों को देख, बच्चों के उमंग पर खुशी होती है। साथ-साथ आप सभी बच्चों का मिलन का उमंग देख हर्षित होते हैं।
आज अमृतवेले बाप-दादा चारों ओर के बच्चों के पास चक्कर लगाने निकले। क्या देखा? मधुबन वरदान भूमि में, खुशी-खुशी से आए हुए बच्चे, इस ही मिलन की खुशी में और सब बाते भूले हुए हैं। हरेक नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार वरदान प्राप्त करने के उमंग, उत्साह में थे। और सब तरफ चक्कर लगाते हुए क्या देखा? मैजारिटी(Majority;अधिकतर) का शरीर भल अपने-अपने स्थान पर है,लेकिन मन की लगन मधुबन तरफ है। अव्यक्त रूप से योगयुक्त बच्चे मधुबन में ही अपने को अनुभव करते हैं। चारों ओर स्वरूप चात्रक समान दिखाई दे रहा था। याद की यात्रा के चार्ट में क्या दिखाई दिया?पोजीशन (Position;मर्तबा) और आपोजीशन (Opposition;विरोध) दोनों का खेल देखा था। यथा शक्ति हरेक अपने पोजीशन पर स्थित रहने का प्रयत्न बहुत करते, लेकिन माया की आपोजीशन, एक रस स्थिति में स्थित होने में विघ्न-स्वरूप बन रही थी। इसका कारण क्या? (1) एक तो सारे दिन की दिनचर्या पर बार-बार अटेंशन की कमी है। (2) दूसरा शुद्ध संकल्प का खजाना जमा न होने कारण व्यर्थ संकल्पों में ज्यादा समय व्यतीत करते हैं। मनन शक्ति बहुत कम है। (3) तीसरा,किसी भी प्रकार की छोटी-छोटी परिस्थितियाँ जो हैं कुछ भी नहीं, उन छोटी सी बातों की कमज़ोरी का कारण बहुत बड़ा समझ, उसको मिटाने में टाईम बहुत वेस्ट (Time Waste;समय व्यर्थ) करते हैं। कारण क्या? समय प्रति समय जो अनेक प्रकार की परिस्थितियों को पार करने की युक्तियाँ सुनते हैं, वह उस समय घबराने के कारण स्मृति में नहीं आती हैं। (4) चौथा अपने ही स्वभाव संस्कार, जो समझते भी हैं कि नहीं होने चाहिए, बार-बार उन स्वभाव-संस्कार के वशीभूत होने से धोखा भी खा चुके हैं, लेकिन फिर भी रचता कहलाते हुए भी,वशीभूत हो जाते हैं। अपने अनादि,आदि संस्कार बार-बार स्मृति में नहीं लाते हैं। इस कारण संस्कार स्वभाव मिटाने की समर्थी नहीं आ सकती हैं। ऐसे चारों ही प्रकार के योद्धा देखे। योद्धा शब्द सुनकर हँसी आती है। और जिस समय प्रेक्टीकल एक्ट (Practical Act;व्यवहारिक कर्म) में आते हो, उस समय हँसी आती है?बाप-दादा को ऐसा खेल देखते हुए, बच्चों पर रहम और कल्याण का संकल्प आता है। अब तक मैजारिटी व्यर्थ संकल्पों की कम्पलेन (Complain;शिकायत) बहुत करते हैं। व्यर्थ संकल्प के कारण तन और मन दोनों कमज़ोर हो जाते हैं। व्यर्थ संकल्प का कारण क्या? सुनाया था,अपनी दिनचर्या को सेट करना नहीं आता।
अमृतवेले रोज़ की दिनचर्या, तन की और मन को सेट करो। जैसे तन की दिनचर्या बनाते हो कि सारे दिन में यह-यह कर्म करना है,वैसे अपने स्थूल कार्य के हिसाब से,मन की स्थिति को भी सेट करो। जैसे अमृतवेले याद की यात्रा का समय सेट है,तो ऐसे सुहावने समय पर, जबकि समय का भी सहयोग है, सतोप्रधान बुद्धि का सहयोग है, ऐसे समय पर मन की स्थिति भी सबसे पॉवरफुल स्टेज (Powerful Stage;शक्तिशाली स्थिति) की चाहिए। पॉवरफुल स्टेज अर्थात् बाप समान बीजरूप स्थिति। तो यह अमृतवेले का जैसा श्रेष्ठ समय है, वैसी श्रेष्ठ स्थिति होनी चाहिए। साधारण स्थिति में तो,कर्म करते भी रह सकते हो,लेकिन यह विशेष वरदान का समय है। इस समय को यथार्थ रीति यूज़ (USE;प्रयोग) न करने का कारण, सारे दिन की याद की स्थिति पर प्रभाव पड़ता है। तो पहला अटेंशन - अमृतवेले की पॉवरफुल स्थिति की सैटिंग करो।
दूसरी बात, जब ज्ञान की गुह्य बातें सुनते हो, अर्थात् रेग्युलर स्टडी (नियमित अध्ययन) करते हो, उस समय जो प्वाइन्टस निकलती हैं,उस हर प्वाइन्ट को सुनते हुए,अनुभवी मूर्त्त होकर नहीं सुनते। ज्ञानी तू आत्मा हर बात के स्वरूप का अनुभव करती हैं। सुनना अर्थात् उस स्वरूप के अनुभवी बनकर सुनना। लेकिन अनुभवी मूर्त्त बनना बहुत कम आता है। सुनना अच्छा लगता है,गुह्य भी लगता है, खुश भी होते हैं,बहुत अच्छा खजाना मिल रहा है, लेकिन समाना अर्थात् स्वरूप बनना - इसका अभ्यास होना चाहिए। मैं आत्मा निराकार हूँ - यह बार-बार सुनते हो, लेकिन निराकार स्थिति के अनुभवी बनकर सुनो। जैसी पाइंट,वैसा अनुभव। परमधाम की बातें सुनो तो परमधाम निवासी होकर परमधाम की बातें सुनो। स्वर्गवासी देवताई स्थिति के अनुभवी बन,स्वर्ग की बातें सुनो। इसको कहा जाता है सुनना अर्थात् समाना। समाना अर्थात् स्वरूप बनना। अगर इसी रीति से मुरली सुनो तो शुद्ध संकल्प का खजाना जमा हो जाएगा। और इसी खज़ाने के अनुभव को बार-बार सुमिरण करने,सारा समय बुद्धि इसी में ही बिजी रहेगी। व्यर्थ संकल्पों से सहज किनारा हो जाएगा। अगर अनुभवी होकर नहीं सुनते,तो बाप के खज़ाने को अपना खजाना नहीं बनाते। इसीलिए खाली रहते हो। अर्थात् व्यर्थ संकल्पों को स्वयं ही जगह देते। और आगे बढ़कर सारी दिनचर्या में क्या-क्या कमी करते हो,वह फिर दूसरे दिन सुनायेंगे। पहले इन दो बातों को ठीक करो। ज्यादा डोज़ (Dose;खुराक) नहीं देते हैं। अच्छा।
सदा समर्थ, सदा ज्ञान के खज़ाने से सम्पन्न,याद की यात्रा द्वारा सर्व शक्तियों के अनुभवी मूर्त्त, सदा हर परिस्थति को स्वस्थिति द्वारा सेकेण्ड में और सहज पार करने वाले,ऐसे बाप समान गुण मूर्त्त और शक्तिमूर्त्त ज्ञानी तू आत्माओं को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दीदी जी के साथ:-
आज विशेष विदेश वालों का बाप को अपनी तरफ खींचने का चल रहा है। यह सभा देखते हुए भी बाप-दादा को बार-बार सामने विदेशी नज़र आते हैं। विशेष याद के आकर्षण का बहुत फुलफोर्स से मीठी-मीठी बातें करते हैं। हरेक अपने मन के उमंग का संकल्प बाप के आगे ऐसे रख रहे हैं, जैसे सम्मुख बातें की जाती हैं,विदेश में रहने वालों को इतनी खुशी क्यों है? इसका कारण क्या है?क्योंकि नई-नई फुलवाड़ी समझती हैं कि हम पीछे आने वाले जब तक कोई विशेष कार्य नहीं करेंगे तो हाई जम्प (ऊँची छलांग) देकर आगे कैसे बढ़ेंगे।? उन्होंको यह लगन है हम कुछ विशेष करके दिखावें। जो न हुआ है वह करके दिखावें। इस कारण इस नशे में रात-दिन तन-धन कुछ दिखाई नहीं देता है। लक्ष्य अच्छा रखा है। हरेक स्थान यही सोच रहा है कि हमारे देश का चारों ओर नाम निकले। इस रेस के कारण एक दो से आगे बढ़ रहे हैं। विदेश से नाम निकलना है - यह तो ठीक है,लेकिन किस कोने से निकलता?कौन सा स्थान निमित्त बनता?किस स्थान का व्यक्ति निमित्त बनता है? इसलिए हरेक अपने धुन में लगे हुए हैं। और बाप-दादा को भी बच्चों की मेहनत और उत्साह अच्छा लगता है। (दादी को) आप यहाँ बैठी हो या विदेश में?विदेश सर्विस के प्लान चलते हैं कि जब प्लेन (Plane) में चढ़ेंगी तब प्लान चलेंगे?
महारथियों से एक प्रश्न पूछते हैं। बाप से तो बहुत पूछते हैं। महारथियों के लिए विशेष है रूह-रूहान, महारथियों से अच्छी लगती है। विजय माला के जो मणके बनते हैं पहला नम्बर वा 108वाँ नम्बर, दोनों में अन्तर क्या है?कहलाते तो सब विजयी रत्न हैं। नाम ही है विजयमाला। लेकिन पहला नम्बर विजयी रत्न और जो लास्ट का विजयी रत्न है उनमें कोई विशेष सब्जेक्ट (विषय) पर विजय का आधार है वा टोटल नम्बर पर आधार है। एक होता है विशेष सब्जेक्ट में। दूसरा होता है सब सब्जेक्ट के टोटल मार्क्स का अन्तर। तो इसकी गुह्यता क्या है अर्थात् विजय की गुह्य गति? इसमें बहुत कुछ रहस्य भरा हुआ है। युगल दाने की विशेष सब्जेक्ट कौन सी है और अष्ट रत्नों की कौन सी है। 100रत्नों की कौन सी है? उसमें भी आगे और पीछे वालों में क्या अन्तर है? इस गुह्य गति को आपस में मनन करना। फिर बतायेंगे। आज चक्कर लगाया ना। यह तो हुई मोटी बात। लेकिन विशेष महारथियों के पुरूषार्थ में क्या महीन अन्तर रह जाता है जिससे दो नम्बर के बाद तीसरा आता, फिर चौथा आता? हैं महारथी, नामी-ग्रामी लेकिन दूसरा तीसरा नम्बर भी किस आधार से बनता है?तो आज महारथियों के इस गुह्य गति के पुरूषार्थ को देख रहे थे। अष्ट में भी पहला नम्बर और आठवाँ नम्बर में क्या अन्तर है?पूजते तो आठ ही हैं लेकिन पूजा में भी अन्तर, विजय में अन्तर है। हरेक की विशेषता भी विशेष है और फिर जो कमी रह जाती है वह भी विशेष है जिसके आधार पर फिर नम्बर बनते हैं। आज दोनों ही देख रहे थे तो यह आपस में विचार करना। समझा?
दिल्ली पार्टी से:-
दिल्ली को दरबार बनाया है? दिल्ली दरबार कहते हैं तो दिल्ली को अपनी राज्य दरबार बनाई है?राजाई तैयार हो गई है? दरबार में कौन बैठेंगे? दरबार में पहले तो महाराजा,महारानियाँ चाहिए। कितने महाराजा, महारानियाँ तैयार हुई हैं?दिल्ली वालों को राज्य का फाउण्डेशन (Foundation;नींव) लगाना है। राज्य का फाउन्डेशन कैसे लगेगा,उसका आधार क्या? राज्य अर्थात् अधिकार प्राप्त कर लेना। पहले स्वयं का राज्य,फिर विश्व का राज्य। तो दिल्ली निवासी स्वयं पर अधिकारी बने हैं? विदेश से तो नाम निकलेगा, लेकिन नाम पहुँचेगा कहाँ? (दिल्ली में) तो दिल्ली वालों को नवीनता करनी चाहिए क्योंकि सेवा का आदि स्थान है। सेवा की बीज रूप दिल्ली है। तो जैसे दिल्ली आदि स्थान है सेवा के हिसाब से और राज्य का स्थान राजस्थान भी है, तो दोनों ही हिसाब से दिल्ली वालों को विशेषता करनी चाहिए तो क्या करेंगे?मेला करेंगे? कान्फ्रेंस करेंगे? यह तो पुरानी बातें हो गयीं। लेकिन नवीनता क्या करेंगे? पहली बात तो दिल्ली वालों का एक दृढ़ संकल्प संगठित रूप से होना चाहिए किहम सब दिल्ली का किला मजबूत कर सफलता होनी ही है, इस संकल्प का व्रत एक हो।जैसे कोई भी कार्य में सफलता के लिए व्रत रखते हैं ना। वह तो स्थूल व्रत रखते हैं,लेकिन यह मन्सा का व्रत है जिस व्रत से निमित्त कोई भी कार्य करेंगे।
भला कार्य साधारण भी हो, रिजल्ट नवीनता की हो। मानो कानफ्रेंस करते, बाहर का जैसे रूप साधारण का होता लेकिन सफलता नवीनता की हो। जब एक ही समय और सर्व का एक ही संकल्प व्रत होगा कि होना ही है,तो देखो दिल्ली क्या कमाल करती है! कमज़ोरी के संकल्प न हो - होना है, नहीं होना है, होगा,नहीं होगा,अभी तक तो हुआ नहीं - यह कमज़ोरी के संकल्प हैं। एक दृढ़ संकल्प की भट्ठी हो फिर सब दिल्ली को कापी करेंगे। अभी ऐसी कोई नवीनता दिखाओ। भाषण किया, जनता आई, सुना और गए। भाषण करने वाले ने भाषण किया और चले - यह तो होता रहता है। अब डबल स्टेज स्वयं की और दूसरी स्थान की तैयार करो। जब डबल स्टेज हो तब सफलता हो। स्थूल स्टेज पर झंडा लगाना, स्लोगन लगाना, चित्र लगाना बहुत सहज है, लेकिन हर एक चैतन्य चित्र हो। हरेक की बुद्धि में विजय का झंडा लगा हो। स्लोगन सबका एक हो - सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। फिर देखो दिल्ली वाले कमाल करेंगे। दिल्ली वालों को विशेष एक लिफ्ट की गिफ्ट भी है,वह कौन सी है?दिल्ली वालों का, उसमें भी विशेष शक्ति सेना का विशेष गुण कौनसा है? यज्ञ की स्थापना के कार्य में दिल्ली की शक्ति सेना का सुदामा मिसल जो चावल चपटी काम में आई है। वह बहुत महत्व के समय काम में आई है। तो महत्व के समय पर अगर कार्य में चावल चपटी भी लगाते तो वह बहुत वृद्धि हो जाती है। जैसे समय इतना फलीभूत नहीं होता। समय पर सहयोग देने से दिल्ली वालों को विशेष गिफ्ट की लिफ्ट मिली है। बाप की ओर से ड्रामा प्रमाण दिल्ली वालों को सदा सम्पन्न रहने का वरदान प्राप्त है। दिल्ली की धरनी का फाउन्डेशन अच्छा है। एक्जाम्पल (Example;मिसाल) बनने वालों को विशेष सहयोग मिलता है। दिल्ली को निमित्त सेवा,अन्य सेवा स्थानों के निमित्त एक्जाम्पल बने। जैसे आदि में विशेषता दिखाई, वैसे अभी दिखाओ। तो उसका सहयोग मिल जाएगा। दिल्ली वाले फारेन (विदेशी) वालों से भी अच्छे प्लान बना सकते हैं; क्योंकि यहाँ बहुत सेवा के साधन हैं। यहाँ मेहनत की जरूरत नहीं सिर्फ किला मजबूत की बात है। अच्छा। जब सबके संकल्प की अंगुली इकट्ठी होगी तो हर कार्य सफल होगा। सबकी नज़र दिल्ली पर है। जब एक दो के समीप हो हाथ में हाथ मिलाएंगे तब घेराव डाल सकेंगे। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् संकल्प मिलाना। सबमें एक जैसा उमंग उत्साह हो,दिलाना ना पड़े। अच्छा।
पुरूषार्थ की गुह्य गति क्या है? अथवा श्रेष्ठ पुरूषार्थ कौन सा है? हर संकल्प, स्वांस में स्वतः बाप की याद हो। इसको कहा जाता है स्मृति स्वरूप। जैसे भक्ति में भी कहते हैं - अनहद शब्द सुनाई दे,अजपाजप चलता रहे, ऐसा पुरूषार्थ निरन्तर हो - इसको कहा जाता है श्रेष्ठ पुरूषार्थ। याद करना नहीं,याद आता ही रहे। महारथियों का पुरूषार्थ यह है - महारथी अर्थात् स्वतः याद। महारथी हर संकल्प महान होगा। जितनाजितना आगे बढ़ते जायेंगे साधारणता खत्म होती जायेगी, महातना आती जायेगी। यह है बढ़ने की निशानी।