Avyakt murli du jeudi 14 décembre 1978
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14-12-78ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
विघ्नों से मुक्त होने की सहज युक्ति
सर्व के मुक्ति, जीवनमुक्ति दाता शिवबाबा अपने सिकीलधे बच्चों प्रति बोलेः -
आज बाप-दादा सदा अपने सिकीलधे लाडले बच्चों को स्नेह की नज़र से, अपने सर्व श्रेष्ठ सिरताज बच्चों को उसी पद्मापद्म भाग्यशाली रूप में देखते हुए सदा खुश होते हैं कि कल्प पहले वाले बिछुड़े हुए बच्चे कितना श्रेष्ठ पद पाने के योग्य बने हैं। हर बच्चे की योग्यता, हर बच्चे की विशेषता बाप-दादा के आगे सदा स्पष्ट है और बाप-दादा हर बच्चे की विशेषता के मूल्य को जानते हुए हर एक को अमोलक रतन समझते हैं। सदैव बाप-दादा के स्मृति स्वरूप सदा सहयोगी बच्चे हैं। बाप-दादा अपने वैरायटी मूल्यवान रत्नों के ही सदा साथ रहते हैं। ऐसे अमूल्य रत्न जिन्हों को बाप ने अपने गले का हार बनाया, दिलतख्त नशीन बनाया,नयनों के सितारे बनाया,सिर का ताज बनाया, विश्व में अपने साथ-साथ पूज्यनीय बनाया, अनेक भक्तों के ईष्ट देव बनाया-ऐसे स्वमान में सदा स्थित रहते हो? जिस नज़र से बाप-दादा देखते वा विश्व देखता उसी स्वरूप में सदा स्थित रहते हो?
आज बाप और दादा दोनों की रूह-रूहान चल रही थी बच्चों के ऊपर। बाप-दादा बोले-सहजयोगी बच्चे राजऋषि बच्चे चलते-चलते तीव्रगति के बजाए कभी कभी रूक जाते हैं-क्यों रूकते? अपने जीवन की भविष्य श्रेष्ठ मांज़िल स्पष्ट दिखाई नहीं देती। आगे क्या होगा यह क्वेश्चन मार्क का पेपर सामने आ जाता है जिसके कारण तीव्रगति वा तीव्र पुरूषार्थ बदल पुरूषार्थ के रूप में हो जाता है। आई हुई रूकावट को मिटाने की वा पत्थर को पार करने की हिम्मत कम हो जाती है इसलिए चलते-चलते थक जाते हैं। कोई थक जाते, कोई दिलशिकस्त हो जाते अर्थात् अपने से नाउम्मीद हो जाते हैं। ऐसे समय पर बाप का सहारा मिलते हुए भी अपने को बेसहारे अनुभव करते हैं - लेकिन बाप-दादा एक सेकेण्ड का सहज साधन वा किसी भी विघ्न से मुक्त होने की युक्ति जो समय प्रति समय सुनाते रहते हैं वह भूल जाते हैं। सेकेण्ड में स्वयं का स्वरूप अर्थात् आत्मिक ज्योति स्वरूप और कर्म में निमित्त भाव का स्वरूप-यह डबल लाइट स्वरूप सेकेण्ड में हाई जम्प दिलाने वाला है। लेकिन बच्चे क्या करते हैं? हाई जम्प के बजाए पत्थर को तोड़ने लग पड़ते हैं। हटाने लग जाते हैं। जिस कारण जो भी यथा शक्ति हिम्मत और उल्लास है वह उसी में ही खत्म कर देते और थक जाते हैं वा दिलशिकस्त हो जाते हैं। जब ऐसी मेहनत बच्चों की देखते तो बाप-दादा को भी तरस पड़ता है। जम्प लगाओ और सेकेण्ड में पार हो जाओ यह भूल जाते हैं। तो आज यह रूह-रूहान हो रही थी कि बच्चे क्या करते और बाप-दादा क्या कहते। सहज मार्ग को थोड़ी सी विस्मृति के कारण इतना मुश्किल कर देते जो स्वयं ही थक जाते।
और क्या करते हैं? अपने ही व्यर्थ संकल्पों का तूफान स्वयं ही रचते और उसी तूफान में स्वयं ही हिल जाते। अपने निश्चय के फाउण्डेशन वा अनेक प्रकार की प्राप्तियों के आधार में स्वयं ही हिल जाते हैं। नामालूम विनाश होगा या नहीं होगा, भगवानुवाच ठीक है वा नहीं है, दुनिया के आगे निश्चय से कहें वा नहीं कहें, गुप्त रहें वा प्रत्यक्ष होवें-जमा करें वा सेवा में लगायें…प्रवृत्ति को सम्भालें वा सेवा में लगें। आखिर भी क्या होना है। बाप तो निराकार और आकारी हो गये-साकार में सामना करने वाले तो हम हैं। ऐसे व्यर्थ संकल्पों का तूफान रच स्वयं को ही डगमग करते हैं। अपने निश्चय के फाउण्डेशन को हिला देते हैं। जैसे तुफान कहाँ पहुँचा देता है-वैसे यह व्यर्थ संकल्पों का तूफान तीव्र पुरूषार्थ से पुरूषार्थ तरफ ले आता है। ऐसे तूफानों में मत आओ-बाप-दादा ऐसे बच्चों से पूछते हैं कि क्या अब तक भी ट्रस्टी हो वा गृहस्थी हो?जब ट्रस्टी हो तो ज़िम्मेवार कौन, आप वा बाप? जब बाप ज़िम्मेवार है तो होगा वा नहीं होगा, क्या होगा यह बाप की ज़िम्मेवारी है वा आपकी है?निश्चयबुद्धि की पहली निशानी क्या है? निश्चयबुद्धि अर्थात् सदा निश्चिंत। जब बाप ने आपकी सब चिंतायें अपने ऊपर ले लीं फिर आप क्यों चिंता करते। विनाश हो न हो वा कब होगा यह चिंता ब्राह्मण जीवन में क्यों? क्या ब्राह्मण जीवन हीरे तुल्य जीवन,बाप से मिलन मनाने की जीवन,चढ़ती कला की जीवन, सर्व खजानों से सम्पन्न होने वाली जीवन, सर्व अनुभूति सम्पन्न जीवन अच्छी नहीं लगती है? जल्दी समाप्त करने चाहते हो? कोई कष्ट वा तकलीफ है क्या? भक्तिमार्ग में यही पुकारा कि यह अतीन्द्रिय सुख की जीवन के दिन एक से चौगुने हो जायें-और अब थक गये हो। ऐसा संकल्प करने वालों के ऊपर बाप-दादा को हंसी आती है। अप्राप्ति क्या है जो ऐसे संकल्प उठाते हो-जब कल्याणकारी बाप कहते हो,कल्याणकारी जीवन कहते हो तो जो भी भगवानुवाच है उसमें अनेक प्रकार के कल्याण समाये हुए हैं। क्यों और कैसे कहा, इस संकल्प से निश्चयबुद्धि का फाउण्डेशन हिलाते क्यों हो? अगर ऐसे छोटे-छोटे तूफानों में फाउण्डेशन हिल जाता है तो महाविनाश के महान तूफान में कैसे ठहर सकेंगे। यह तो सिर्फ एक अपने व्यर्थ संकल्पों का तूफान है लेकिन महाविनाश में अनेक प्रकार के चारों ओर के तूफान होंगे फिर क्या करेंगे? इतनी छोटी सी बात में जिसमें और ही आगे के लिए समय मिला है,साथ मिला है,अनेक प्रकार के खजाने मिल रहे हैं, प्राप्ति होते हुए समाप्ति की उत्कण्ठा क्यों करते हो? सुख के दिनों में धीरज धरो। कब और क्यों के अधीर्य में मत आओ। अपने ही व्यर्थ संकल्पों के तूफान समाप्त करो, सम्पत्तिवान बनो, समर्थीवान बनो। सदा निश्चयबुद्धि। कल्याणकारी बाप और कल्याणकारी समय का हर सेकेण्ड लाभ उठाओ। सारे कल्प में ऐसे सम्पतिवान,भाग्यवान दिन, भाग्य विधाता के संग के दिन फिर नहीं आने वाले हैं। विनाश के समय भी यह प्राप्ति का समय याद करेंगे इसलिए ड्रामा अनुसार कल्याण अर्थ जो ड्रामा का दृश्य चल रहा है उसको त्रिकालदर्शी बन हिम्मत और उल्लास वाली समर्थ आत्मायें बन स्वयं भी समर्थ रहो और विश्व को भी समर्थ बनाओ। पत्थर तोड़ने में थको मत,स्वयं के तूफान में हिलो मत, अचल बनो। समझा। करते क्या हो और करना क्या है? यही रूह-रूहान बाप-दादा की हुई कि बच्चे क्या खेल करते हैं। अब समर्थी का खेल खेलो। जिससे यह सब खेल समाप्त हो जाएं। दिलशिकस्त के बजाए दिल सदा खुश हो जाए। अभी ऐसे संकल्प इस महान यज्ञ में आहुति डालकर जाना-साथ नहीं लेकर जाना-सदा के लिए स्वाहा। जब स्वयं ही स्वाहा हो तो यह संकल्प कैसे आ सकते। इसलिए स्वाहा का भोग लगाकर जाना। समर्थ संकल्पों रूपी फलों का भोग लगाना-समझा कौन सा भोग लगाना है। अच्छा।
ऐसे सदा निश्चिंत, सदा निश्चयबुद्धि,हर महावाक्य के महान अर्थ को जानने वाले,संकल्प के भी ट्रस्टी अर्थात् जो बाप के संकल्प वह बच्चे के संकल्प ऐसे मन,बुद्धि,संस्कार में समान, बाप-दादा के समीप आत्माओं को बाप-दादा का यादप्यार और नमस्ते।