Avyakt murli du mardi 19 avril 1983
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19-04-83 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
संगमयुग का प्रभु फल खाने से सर्व प्राप्तियाँ
कर्मयोग की शिक्षा देने वाले, सर्व स्नेही बापदादा बोले:-
आज बापदादा अपने सर्व स्नेही बच्चों को स्नेह का रिटर्न देने, मिलन मनाने, स्नेह का प्रत्यक्षफल,स्नेह की भावना का श्रेष्ठ फल देने के लिए बच्चों के संगठन में आये हैं। भक्ति में भी स्नेह और भावना भक्त-आत्मा के रूप में रही। तो भक्त रूप में भक्ति थी लेकिन शक्ति नहीं थी। स्नेह था लेकिन पहचान वा सम्बन्ध श्रेष्ठ नहीं था। भावना थी लेकिन अल्पकाल की कामना भरी भावना थी। अभी भी स्नेह और भावना है लेकिन समीप सम्बन्ध के आधार पर स्नेह है। अधिकारीपन के शक्ति की,अनुभव के अथार्टी की श्रेष्ठ भावना है। भिखारीपन की भावना बदल, सम्बन्ध बदल अधिकारीपन का निश्चय और नशा चढ़ गया। ऐसे सदा श्रेष्ठ प्राप्ति और सेवा की भावना वाली श्रेष्ठ आत्माओं को प्रत्यक्षफल प्राप्त हुआ है। सभी प्रत्यक्षफल के अनुभवी आत्मायें हो? प्रत्यक्षफल खाकर देखा है?और फल तो सतयुग में भी मिलेंगे और अब कलियुग के भी बहुत फल खाये। लेकिन संगमयुग का प्रभुफल,प्रत्यक्ष फल अगर अब नहीं खाया तो सारे कल्प में नहीं खा सकते। बापदादा सभी बच्चों से पूछते हैं - प्रभु फल, अविनाशी फल, सर्व शक्तियाँ, सर्वगुण,सर्व सम्बन्ध के स्नेह के रस वाला फल खाया है? सभी ने खाया है या कोई रह गया है?यह ईश्वरीय जादू का फल है। जिस फल खाने से लोहे से पारस से भी ज्यादा हीरा बन जाते हो। इस फल से जो संकल्प करो वह प्राप्त कर सकते हो। अविनाशी फल,अविनाशी प्राप्ति। ऐसे प्रत्यक्ष फल खाने वाले सदा ही माया के रोग से तन्दुरूस्त रहते है। दुःख,अशान्ति से,सर्व विघ्नों से सदा दूर रहने का अमर फल मिल गया है! बाप का बनना और ऐसे श्रेष्ठ फल प्राप्त होना।
आज बापदादा आये हुए विशेष पाण्डव सेना को देख हर्षित तो हो ही रहे हैं। साथ-साथ ब्रह्मा बाप के हमजिन्स है। तो हमजिन्स से सदा पार्टी की जाती, पिकनिक मनाई जाती। तो आज इस प्रभुफल की पिकनिक मना रहे हैं। लक्ष्मी नारायण भी ऐसी पिकनिक नहीं करेंगे। ब्रह्मा बाप और ब्राह्मणों की यह अलौकिक पिकनिक है। ब्रह्मा बाप हमजिन्स को देख हर्षित होते हैं। लेकिन हमजिन्स ही बनना। हर कदम में फालो फादर करने वाले समान साथी अर्थात् हमजिन्स। ऐसे हमजिन्स हो ना वा अभी सोच रहे हो क्या करें कैसे करें। सोचने वाले हो वा समान बनने वाले हो?सेकण्ड में सौदा करने वाले हो वा अभी भी सोचने का समय चाहिए?सौदा करके आये हो वा सौदा करने आये हो? परमिशन किसको मिली है,सभी ने फार्म भरे थे?वा छोटी-छोटी ब्राह्मणियों को बातें बताके पहुँच गये हो? ऐसे बहुत मीठी-मीठी बातें बताते हैं। बापदादा के पास सभी के मन के सफाई की और चतुराई की दोनों बाते पहुँचती हैं। नियम प्रमाण सौदा करके आना है। लेकिन मधुबन में कई सौदा करने वाले भी आ जाते हैं। करके आने वाले के बजाए यहाँ आकर सौदा करते हैं इसलिए बापदादा क्वान्टिटी में क्वालिटी को देख रहे हैं। क्वान्टिटी की विशेषता अपनी है, क्वालिटी की विशेषता अपनी है। चाहिए दोनों ही। गुलदस्ते में वैरायटी रंग रूप वाले फूलों से सजावट होती है। पत्ते भी नहीं होंगे तो गुलदस्ता नहीं शोभेगा। तो बापदादा के घर के शृंगार तो सभी हुए,सभी के मुख से बाबा शब्द तो निकलता ही है। बच्चे घर का शृंगार होते हैं। अभी भी देखो यह ओम शान्ति भवन का हाल आप सबके आने से सज गया है ना। तो घर के शृंगार, बाप के शृंगार, सदा चमकते रहो। क्वान्टिटी से क्वालिटी में परिवर्तन हो जाओ। समझा - आज तो सिर्फ मिलने का दिन था फिर भी ब्रह्मा बाप को हमजिन्स पसन्द आ गये। इसलिए पिकनिक की। अच्छा -सदा प्रभु फल खाने के अधिकारी, सदा ब्रह्मा बाप समान सेकण्ड में सौदा करने वाले, हर कर्म में कर्मयोगी, ब्रह्मा बाप को फालो करने वाले, ऐसे बाप समान विशेष आत्माओं को,चारों ओर के क्वालिटी और क्वान्टिटी वाले बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात (अधरकुमारों से)
(1) सदा अपने को विश्व के अन्दर कोटो में से कोई हम हैं - ऐसे अनुभव करते हो?जब भी यह बात सुनते हो - कोटों से कोई,कोई में भी कोई तो वह स्वयं को समझते हो?जब हूबहू पार्ट रिपीट होता है तो उस रिपीट हुए पार्ट में हर कल्प आप लोग ही विशेष होंगे ना! ऐसे अटल विश्वास रहे। सदा निश्चयबुद्धि सभी बातों में निश्चिन्त रहते हैं। निश्चय की निशानी है निश्चिन्त। चिन्तायें सारी मिट गई। बाप ने चिंताओं की चिता से बचा लिया ना! चिंताओं की चिता से उठाकर दिलतख्त पर बिठा दिया। बाप से लगन लगी और लगन के आधार पर लगन की अग्नि में चिन्तायें सब ऐसे समाप्त हो गई जैसे थी ही नहीं। एक सेकण्ड में समाप्त हो गई ना! ऐसे अपने को शुभचिन्तक आत्मायें अनुभव करते हो! कभी चिंता तो नहीं रहती! न तन की चिंता,न मन में कोई व्यर्थ चिंता और न धन की चिंता। क्योंकि दाल रोटी तो खाना है और बाप के गुण गाना है। दाल रोटी तो मिलनी ही है। तो न धन की चिंता, न मन की परेशानी और न तन के कर्मभोग की भी चिंता। क्योंकि जानते हैं यह अन्तिम जन्म और अन्त का समय है इसमें सब चुक्तु होना है इसलिए सदा -शुभचिन्तक। क्या होगा! कोई चिंता नहीं। ज्ञान की शक्ति से सब जान गये। जब सब कुछ जान गये तो क्या होगा, यह क्वेश्चन खत्म। क्योंकि ज्ञान है जो होगा वह अच्छे ते अच्छा होगा। तो सदा शुभचिन्तक,सदा चिन्ताओं से परे निश्चय बुद्धि, निश्चिन्त आत्मायें, यही तो जीवन है। अगर जीवन में निश्चिन्त नहीं तो वह जीवन ही क्या है! ऐसी श्रेष्ठ जीवन अनुभव कर रहे हो? परिवार की भी चिन्ता तो नहीं है?हरेक आत्मा अपना हिसाब किताब चुक्तु भी कर रही है और बना भी रही है इसमें हम क्या चिंता करें! कोई चिंता नहीं। पहले चिता पर जल रहे थे अभी बाप ने अमृत डाल जलती चिता से मरजीवा बना दिया। जिन्दा कर दिया। जैसे कहते हैं मरे हुए को जिन्दा कर दिया। तो बाप ने अमृत पिलाया और अमर बना दिया। मरे हुए मुर्दे के समान थे और अब देखो क्या बन गये। मुर्दे से महान बन गये। पहले कोई जान नहीं थी तो मुर्दे समान ही कहेंगे ना। भाषा भी क्या बोलते थे, अज्ञानी लोग भाषा में बोलते हैं - मर जाओ ना। या कहेंगे हम मर जाए तो बहुत अच्छा। अब तो मरजीवा हो गये,विशेष आत्मायें बन गये। यही खुशी है ना। जलती हुई चिता से अमर हो गये, यह कोई कम बात है! पहले सुनते थे भगवान मुर्दे को भी जिन्दा करता है, लेकिन कैसे करता यह नहीं समझते थे। अभी समझते हो हम ही जिन्दा हो गये तो सदा नशे और खुशी में रहो।
टीचर्स के साथ
सेवाधारियों की विशेषता क्या है? सेवाधारी अर्थात् आँख खुले और सदा बाप के साथ बाप के समान स्थिति का अनुभव करे। अमृतवेले के महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी। विशेष सेवाधारी की महिमा है - जो विशेष वरदान के समय को जानें और विशेष वरदानों का अनुभव करें। अगर अनुभव नहीं तो साधारण सेवाधारी हुए, विशेष नहीं। विशेष सेवाधारी बनना है तो यह विशेष अधिकार लेकर विशेष बन सकते हो। जिसको अमृतवेले का, संकल्प का, समय का और सेवा का महत्व है ऐसे सर्व महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी होते हैं। तो इस महत्व को जान महान बनना है। इसी महत्व को जान स्वयं भी महान बनो और औरों को भी महत्व बतलाकर,अनुभव कराकर महान बनाओ।
अच्छा - ओम् शान्ति।