Murli de Mamma - gyan-sitar-02

१२.१२.५८

पवित्रता का संबंध कर्मयोग से है, मुक्ति से श्रेष्ठ कर्मयोग है

सभी मनुष्यात्मायें धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, ज्ञान-अज्ञान, राइट-रंग— यह शब्द तो कहती हैं। परन्तु इसकी असली नॉलेज क्या है, इससे अनजान हैं। धर्म की स्थापना वा अधर्म का विनाश करने परमात्मा को आना पड़ता है। यह विनाश, स्थापना का कर्तव्य एक परमात्मा ही कर सकता है। जबकि यह काम परमात्मा ही करते हैं तो जरूर धर्म-अधर्म, ज्ञान-अज्ञान को जानने वाला भी वह होगा।

सृष्टि के नियम अनुसार हम जानते हैं कि कर्मों के आधार पर ही सृष्टि का चक्र बना हुआ है। आत्मा को कर्मों में आना है। कर्म अनादि ही है। इसलिए परमात्मा ने भी कर्म-योग को सिद्ध किया है। उनको जानना है। उस असली श्रेष्ठ कर्म को न जानने के कारण ही वियोग हो गया है, गिरे पड़ते हैं। परमात्मा ने आकर के श्रेष्ठ कर्म करना सिखाया है। सारी सृष्टि पर धर्म स्थापना कर अधर्म विनाश किया, वह भी कर्म से ना । और वही कर्म स्थापना किये जिससे सारी सृष्टि पवित्र-सुख-शानतिमय बनी । परमात्मा ने सिद्ध किया कर्मयोग को, न कि कर्म संन्यास को । राइट और रंग कर्म की नॉलेज होनी चाहिए । यह जो कहते हैं कि मुक्त हो जाना अच्छा है, फिर तो कर्म की बात ही नहीं है । भगवान ने तो कर्मयोग सिखाया है कि इस पार्ट में होते इन कर्मों के आधार से मनुष्यों की ऐसी सर्वोत्तम अवस्था रह सकती है । सारी मनुष्य सृष्टि की ही बात है । अगर मुक्ति श्रेष्ठ होती तो परमात्मा कर्मयोग को श्रेष्ठ क्यों रखता ?

फिर तो कहते – कर्म-अकर्म से जो न्यारी चीज़ है वही प्राप्त करनी चाहिए । परमात्मा ने तो राजयोग सिद्ध किया है। परमात्मा के सब महावाक्य प्रवृत्ति को ही सिद्ध करते हैं । इस रचना में वह प्रवृत्ति कैसी चाहिए जिसमें पवित्रता, सुख और शांति हो ? 'पवित्रता' शब्द ही कर्मयोग के साथ तालुक रखता है । ऐसे नहीं कि मुक्त हो जाने को पवित्रता कहा जाता है । वहाँ तो न पवित्रता है, न अपवित्रता है । आत्मा आई ही है इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने ।

कर्मयोग, प्रवृत्ति – ये मनुष्य सृष्टि की बात है । बाकी मुक्त तो सब होंगे ही । परमात्मा ने मनुष्यों को ही समझाया है कि कैसे पवित्र, अपवित्र बने हैं ? मनुष्य सृष्टि के खेल पर ही यह शब्द है । धर्म-अधर्म अक्षर ही पार्ट के साथ हैं । समझते हैं – कैसे पार्ट में होते प्रवृत्ति को पवित्र रखो । कर्मों की ही बात हैं । आत्मा सदैव न्यारी भी नहीं रह सकती है । मनुष्य के लिए ही पुरुषार्थ है – अपनी प्रवृत्ति को पवित्र बनाना । मुक्त हो जाए तो फिर खेल की बात ही नहीं इसलिए परमात्मा ने भी कर्मयोग को श्रेष्ठ किया है । श्रेष्ठ कर्मों से प्रारब्ध भी श्रेष्ठ बनती है । श्रेष्ठ कर्म इस सहज ज्ञान और सहज योग से ही बनते है । यह है अन्तिम जन्म। कर्मबन्धन की जो प्रवृत्ति है उससे हमको हिसाब-किताब चुक्तू करना है, बदलना है । इस जन्म के लिए ही कहते हैं – पवित्र बनो । फिर तो रहोगे भी प्रैक्टिकल पवित्र जीवन में। दुनिया पवित्र चली है ना । उन्हो के यादगार कायम है । सब कुछ प्रवृत्ति चली हुई है । निर्विकारता गाई हुई है । नहीं तो पवित्र-अपवित्र शब्द दें ही नहीं। अमर सृष्टि का नियम ही है विकार में जाना तो फिर अपवित्रता अक्षर क्यों कहा है ? यह समझने की बात है। अब हम वह पुरुषार्थ करते हैं जिससे पवित्र प्रवृत्ति बने।

अब कर्मातीत अवस्था धारण करनी है। वह दुनिया ही इस दुनिया से न्यारी है। वह न्यारी दुनिया परमात्मा द्वारा ही रची जाती है। मनुष्य समझते हैं--जैसे इस मनुष्य सृष्टि की वृद्धि होती आई हैं ऐसे ही होती रहेगी। परमात्मा कहते हैं-- मैं जो पवित्र सृष्टि रचता हूँ, उसमें प्रारब्ध भी मैं अभी देता हूँ। निर्विकारीपने से ही सृष्टि की वृद्धि होती है। वहाँ विकार की बात ही नहीं रहती। पवित्रता के आधार से सृष्टि की वृद्धि चली है। परमात्मा अनादि प्रवृत्ति, अनादि कर्म को सिद्ध करते हैं। यह है ही कर्मक्षेत्र। अच्छे और बुरे कर्म को जानना है। पुराने कर्मबन्धन से छूटना है, इसलिए हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। फिर तो है ही प्रारब्ध। फिर यह प्रश्न नहीं उठेगा कि सृष्टि की वृद्धि कैसे होगी, सृष्टि पवित्र कैसे रहेगी ? वह तो रचयिता ही जानते हैं ना। परमात्मा ने कहा है— यह विक्रम है। विक्रम से सृष्टि की जो वृद्धि होती है उनका नतीजा तो देख रहे हैं। परमात्मा की तरकीब जरूर न्यारी होगी ना। दुनिया वालों की बुद्धि में यह संकल्प भी नहीं आ सकता कि ऐसी भी दुनिया बन सकती है।

बाप समझते हैं— मेरी सृष्टि ही पवित्र है। वहाँ कर्म, अकर्म होते हैं। तमोगुणी बुद्धि तो यह महसूस नहीं कर सकती कि पवित्र प्रवृत्ति कैसे चली है। पार्ट से न्यारा होना, वह कोई स्टेज नहीं है। प्रवृत्ति की सृष्टि ही ऊंच गई हुई है। यह समझना मनुष्यों के लिए मुश्किल हो गया है। तब तो गिरते आए हैं। दुःख का हिसाब-किताब दुःख तरफ़ खींचता है, सुख का हिसाब-किताब सुख तरफ़ खींचता है। यह कान्ट्रास्ट समझना है। सृष्टि के वृद्धि की तो अब बात ही नहीं है। अब तो वापस लौटना है। कर्मबन्धन से छूटने के लिए पूरी पवित्रता धारण करनी है।