Murli de Mamma - gyan-sitar-05
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१७.१२.५८
आत्मा परमात्मा में लीन नहीं होती, उनके समान बनती है
ओम् शान्ति। भगवान के महावाक्य हैं कि मैं बीजरुप हूँ और इस क्रियेशन का क्रियेटर हूँ । मनुष्य आत्मायें कहती हैं कि हम ज्योति ज्योत में समाते हैं । अब भगवान के कहने और आत्माओं के कहने में फर्क हो गया । जैसे बीज में झाड़ लय होता है फिर बीज से झाड़ उत्पन्न होता है । तो आत्मा स्वयं अपने आप ज्योति ज्योत में समावे - यह नहीं हो सकता है । हम अपना पुराना हिसाब-किताब चुक्तू कर वापस जा रहे हैं । परमात्मा भी कहते हैं — मैं आया हूँ फिर से नई दुनिया की स्थापना करने । यह तो प्रैक्टिकल हम देख रहे हैं इस दुनिया का विनाश होना है । यह है दुःख की, आहों की दुनिया। हम जाते हैं सदा सुख की दुनिया में । उसके लिए अब पुरुषार्थ करना है। ज्योति में नहीं समाना है । आत्माओं को तो स्टेज पर पार्ट बजाने आना ही है क्योंकि यह रचना अनादि है ।
भगवान ने सुख की रचना ही रची है। जिसमें दुःख का नाम भी न हो तब तो सुख की दुनिया कहें । अगर दुःख का अंश भी हो तो उसको सुख नहीं कहेंगे। आजकल दुनिया में सुख है ही अल्पकाल क्षणभंगुर । तो सिद्ध है कि बाकी सब दुःखी हैं। हम अब सदाकाल सुख में जाते हैं । अगर अल्प दुःख भी वहाँ हो तो उनको सुख तो नहीं कहेंगे ना । परमात्मा जैसे अविनाशी है वैसे उनकी प्रापर्टी भी अविनाशी है। उसमें दुःख, अशान्ति हो नहीं सकती । अब हम इन सब दुःखों से छूटेंगे तब जब पुराना हिसाब-किताब चुक्तू हो । तब ही सुख की दुनिया में आ सकते हैं। परमात्मा द्वारा हम जीते जी इस पुरुषार्थ में लगे हुए हैं । धर्मराज के पास सजा खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करने से कोई प्रालब्ध नहीं बनती है । अपने को तो पूरी प्रालब्ध बनानी है। जीते जी सुख लेना है तो जीते जी हिसाब-किताब भी चुक्तू करने हैं । फिर उनके द्वारा प्रालब्ध बनानी है। वह करनकरावनहार खुद आकर अपना कर्तव्य करा रहे हैं। कराते हैं आत्माओं द्वारा । अब हम जानते हैं कि उनका और हमारा संबंध क्या है ।
जब सभी सहारे टूट जाते हैं तब परमात्मा ही सहायता देने आते हैं । सहायता देने की समर्थी उसी में है। इस समय सभी सहारे टूटते जा रहे हैं। दुःख-अशान्ति बढ़ती जाती है। न कोई ज्योति ज्योत में समाये हैं, न कोई यहाँ सदा सुखी हैं। परमात्मा के महावाक्य हैं- मैं आता ही कल्प के अन्त में हैं, आकर सारे वृक्ष को नया बनाता हूँ, कलम लगाता हूँ। अब यह सब बातें बुद्धि में हैं तब ही उनका हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। जीते जी पुरुषार्थ कर अपनी प्रालब्ध बनानी है। हम जानते हैं हमारी -- प्रालब्ध कौनसी हैं और उनके लिए पुरुषार्थ कौनसा है ? यह नॉलेज है। बाकी तो सब कहानियाँ सिर्फ सुनते और सुनाते आये हैं। बायोग्राफी को जानते नहीं हैं। उनके जीवन-चरित्र सिर्फ ऐसे ही गाने से भी कुछ बनता नहीं है। राधे-कृष्ण आदि वह सब सर्वगुण आत्मायें हैं। उनके चेहरे सदा मुस्कराते रहते हैं। अब हम वह संस्कार भर रहे हैं। पुराने हिसाब-किताब को चुक्तू कर रहे हैं। दुनिया समझती है कि मनुष्य मरा तो स्वर्गवासी हुआ और कोई साधू-संत मरता है तो कहते हैं ज्योति ज्योत समाया। अब हम जानते हैं कि यह संसार ही जो बहिश्त था, अभी दोजक है। अब फिर भगवान प्रैक्टिकल में वह बहिश्त बना रहे हैं। हम वहाँ जाने का अब पुरुषार्थ कर रहे हैं। यह काम कोई मनुष्य नहीं कर सकता। बाप और उनके कर्तव्य को भूलने से ही मनुष्य आत्मायें अपने कर्तव्य को भूल जाती हैं। हम आत्माओं को सद्गति देने वाला वही है। क्योंकि परमात्मा तो न्यारी चीज है ना। आत्माओं के साथ उनका ही संबंध है। अब मालूम पड़ता है कि तो बड़ा गहरा कनेक्शन है। परमात्मा सबसे न्यारा है तो उनके कर्तव्य भी न्यारे होंगे। जो मनुष्य आत्मा न कर सकती है, न कर सकेगी। तब ही उनके कर्तव्य निराले गाये हुए हैं।