Murli de Mamma - gyan-sitar-14

20/4/1959

आत्मा के नेचुरल - ओरिजनल संस्कार सुख के हैं, दुःख के नहीं

परमात्मा द्वारा आत्माओं के परिचय को भी समझा है कि आत्मा में दुःख और सुख, पाप और पुण्य – दोनों ही संस्कार भरे हुए हैं। परन्तु आत्मा की अपनी ओरीजनल स्टेज प्योरीफाइड सुख की है। जब आत्मा पाप के कर्म में आती है तो दुःख भोगती है और दुःख के समय सुख को याद करती है। सुख के समय दुःख को याद नहीं करती है। जब आत्मा अपने ओरीजनल सुख की स्टेज में है, तो उसी समय उनको दुःख की खींच नहीं होती है। दुःख की नालेज ही नहीं है। परन्तु आत्मा जब दुःख में इमप्योरीफाइड है अथवा आत्मा के संस्कार जब दुःख की स्टेज से शुरु होते हैं तो उसी समय सुख याद आता है। प्योरीफाइड सुख की खैच होती है। तो सिद्ध होता है आत्मा की ओरीजनल स्टेज वह प्योरीफाइ सुख की है। आत्मा अपनी ओरीजनल स्टेज में प्योरीफाइड है, तो उस समय दुःख का नॉलेज ही नहीं रहता। भल दुःख के समय सुख का भी नालेज नहीं रहता है, परन्तु बुद्धि सुख की तरफ खैचती जरुर है कि इस दुःख से हम छूटें, सुख को पावें । सुख की चाहना रहती है। जब सुख में है, फिर तो कोई संकल्प अथवा चाहना ही नहीं है। जब दुःख शुरु होता है तब उनको अपनी ओरीजनल स्टेज की याद आती है जिसके लिए हर तरह की कोशिश करते हैं। अब हमको परमात्मा द्वारा आत्माओं के सारे पार्ट का नालेज मिलता है। यह नॉलेज भी जब पूर्ण धारण हो जाती है तब पूर्ण प्राप्ति होती है और आत्मा पूर्ण तृप्त हो जाती है ।

कई लोग प्रश्न पूछते हैं कि प्योरीफाइड, इमप्योरीफाइड आत्मा के ही संस्कार हैं, फिर तो यह पार्ट हो गया ना ? परन्तु आत्मा के नेचुरल संस्कार भी देखेंगे तो दुःख के समय सुख की चाहना उठती ही है। आत्मा को अपनी ओरीजनल स्टेज चाहिए। उनके लिए ही दौड़ते-भागते हैं। इसलिए वही पुरुषार्थ अथवा संकल्प रहता है। इस नेचुरल चीज से मालूम पड़ता है कि आत्मा की ओरीजनल स्टेज सुख की है। भल दुःख-सुख दोनों संस्कार आत्मा में हैं, परन्तु उसमें भी सुख का ओरीजनल रुप कहेंगे ।