Murli de Mamma - gyan-sitar-23

५.९.५९

पांच विकारों ने लाज खोई, अब पवित्र ब्राह्मण बन एक परमात्मा से नाता रखो

गीत:- हे महादेव मेरी लाज रहे…

ओम् शान्ति । मनुष्य महादेव की महिमा गाते हैं। परन्तु महादेव हम शिव को कहें वा शंकर को ? शिव को। महिमा सारी शिव की करेंगे। देवों का देव महादेव । उन्होंने साँप, त्रिशूल दिया है आकारी देवता को । हम तो नहीं देंगे। महादेव तो वह शिव ठहरा जो तीनों द्वारा कार्य कराते हैं। यह गीत भी पुरानी याद दिलाते हैं कि फिर से वह राज्य स्थापन करो। इस समय इन ५ विकारों ने लाज खो दिया है। सारी दुनिया की लाज खोई हुई है। न पिता का पता है, न उनकी प्रॉपर्टी का पता है। तो कहते हैं- मेरी लाज, तेरा राज्य कायम रहे जहाँ एक राजा-रानी थे, जिसमें मेरी लाज थी । अब वह तेरा राज्य कायम हो तो मेरी लाज कायम रहे। गीत की एक लाइन से कितनी बातें सिद्ध होती हैं। हम ही द्रोपदियाँ हैं, जिन्हों को बाप ने नग्न होने से बचाया है। आना भी उस टाईम है जब लाज खोई हुई हो। कलियुग के अन्त में ही तो उनको आना पड़े। परन्तु मनुष्य कहते हैं - कलियुग अभी बच्चा है। इस ख्याल से तो अभी अधर्म और बढ़ेगा। यही सिद्ध करते हैं कि जब बिल्कुल बूढ़ा होगा तब आएगा। ऐसे तो नहीं कहते कि कलियुग जब छोटा हो तब आकर विनाश करे। तो उन्हों के हिसाब अनुसार भी कलियुग के अन्त में अति धर्म ग्लानि होती है तब आते हैं। द्वापर में तो रजोप्रधान था। अगर पहले से ही आकर ब्रेक देवे तो अधर्म बढ़े नहीं। तो फिर यह चक्र पूरा कैसे हो ? चक्र को अन्त तक चलना है। तो उसको आकर रोक कैसे सकता ? तो कब आया है ? कुछ बुद्धि में ठहरता नहीं। शास्त्रों में तो मनुष्यों की मत है। अब हमें मिलती है परमात्मा की मत। भल सुनने वाले हम मनुष्य हैं लेकिन बुद्धि तो परमात्मा की मिली है। तो परमात्मा को बरोबर आना ही अन्त में चाहिए जो आकर अन्तिम संस्कार करे, नई दुनिया की आदि करे। तो महादेव उनको कहते ।

वह खुद राजा-महाराजा नहीं बनते, लेकिन स्थापन करते हैं। नाम उनका होता है। यह बातें अब हमारे पास हैं। इसकी भेंट में कहते कि दुनिया वाले बिचारे जानते नहीं कि कौनसे राज्य में हमारी लाज रहेगी ? शंकर के लिए भी लिखा है – शंकर पार्वती का स्वयंवर हुआ। तो समझते उनका राज्य चला है। लेकिन वह तो हैं आकारी देवतायें। राज्य तो साकार देवताओं का चला है। वह साकार में तो आते नहीं ।

दुनिया तो समझती – जब से नर-नारी बने हैं, तो यह विकार भी चलते आये हैं, इस बिगर दुनिया नहीं चल सकती। लेकिन देवताओं को कहते हैं सम्पूर्ण निर्विकारी । निर्विकारी प्रवृत्ति भी चली है ना। उन्होंने तो बहुत कहानियाँ बना दी हैं। सत्य नारायण की कथा, अमरनाथ की कथा.. बनाई हैं । अनेक कथायें अथवा कहानियाँ ! वास्तव में तो कहानी उनकी एक ही है। सत्य नारायण भी वही परमात्मा है, अमरनाथ भी परमात्मा को कहते हैं। वह एवर अमर है। नाथ उसको कहेंगे। सत्य नारायण भी वह है जो सत्य बताते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का भी भेद बताने वाला परमात्मा है। वह मूल एक क्रियेटर है, बाकी सब क्रियेशन हैं। ब्रह्मा-विष्णु का भी क्रियेटर वह है। यह तो हरेक अपना-अपना कार्य करते हैं। स्थापना वाला विनाश नहीं कर सकता, विनाश वाला स्थापना नहीं कर सकता। तीनों कार्य कराने वाला एक परमात्मा है। वह भी कार्य इस सृष्टि पर करता है, सूक्ष्मवतन में तो कुछ चलता नहीं। तो यह कहानी परमात्मा बैठ सुनाते हैं। एक ही कहानी में सब आ जाता है। चारों युग, वर्ण, सब धर्म उसमें आ जाते हैं। ऐसे नहीं सतयुग की अलग कहानी, त्रेता की अलग कहानी है। यह भी अभी यहाँ की ही बातें हैं। चार युग भी यहाँ भारत में कहते हैं। और धर्म तो आते ही द्वापर से हैं। तो उन्हों को इस वर्ण, युग का पता नहीं। मुख्य कहानी यहाँ की है और सब हैं बाईप्लॉट्स । बाईप्लाट में तो सारी कहानी नहीं होगी ।

यहाँ ब्राहमण, क्षत्रिय हैं...। भल विकारी हैं परन्तु ब्राह्मण कहलाते हैं तो उन्हों का कितना मान करते हैं ? इतना मान क्यों होता है ? इस समय सच्चे ब्राह्मण पवित्र बने हैं। अपवित्र से नाता ही नहीं है। नाता एक परमात्मा से है, दूसरा अव्यक्त देवताओं से है। साकार में भी माँ-बाप, भाई-बहिन । दूसरा नाता है ही नहीं। इसलिए इतना मान है। जो सिर्फ नाम लगाते उन्हों का भी मान होता है। ऐसा कुल देवताओं का भी नहीं है। उन्हों की भी कलाएं नीचे होती जाती हैं। यह तो एकदम ऊपर चढ़ते हैं। तो कहाँ की बातें कहाँ ले गये हैं !

यह गीत दूसरे जब सुनेंगे तो साँप, त्रिशूल वाले शंकर को याद करेंगे । तुम उसका भी अर्थ करेंगे कि माया रुपी साँप को जीता है ज्ञान त्रिशूल से। बाकी ऐसे तीन ऑखों वाले, १० शीश वाले, ४ भुजा वाले मनुष्य होते नहीं। आगे तो समझते थे – ऊपर ऐसी कोई दुनिया है। लेकिन बाबा समझाते हैं - ऊपर-नीचे कोई दुनिया नहीं है। यही मनुष्य सृष्टि है। लोग तो मूँझ गये हैं। ऊपर एरोप्लेन भेजते हैं देखने के लिए कि कोई दुनिया है क्या ? लेकिन है तो यही दुनिया । सूक्ष्मवतन में भी जाकर साक्षात्कार कर वापस आते हैं, वहाँ बैठ नहीं जाते हैं। ब्रह्मा-विष्णु भी अभी पार्ट बजाते हैं। बाकी भक्ति मार्ग में परमात्मा ही साक्षात्कार कराते हैं। ऐसे नहीं कि उस समय सूक्ष्मवतन है। यह तो अभी पार्ट है। बाकी साकार और निराकार दुनिया का कनेक्शन चलता आता है। आत्मायें आती रहती हैं, संख्या बढ़ती रहती है। सतयुग से कलियुग तक संख्या बढ़ती रहती है ।

अब तक तुम जो नालेज सुनते आये हो उस नॉलेज के चिन्तन के आधार से तो चिंतायें और ही बढ़ती गई। लेकिन इस नॉलेज के चिंतन से सतयुग स्थापन होता है, तो सब चिंताओं से छूट जाते हैं। अब स्वयं परमात्मा बाप, टीचर और गुरु बन गोद में लेते हैं अथवा शरण में लेते हैं। कहते हैं - अब इस चिंतन में रहो । लेकिन जितनी भक्ति की पूँजी होगी उतनी नॉलेज उठायेगा और सूर्यवंशी में आयेगा।