Murli de Mamma - gyan-sitar-29
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
२१.९.५९
मन्सा में भी कोई विकल्प न आये - यही है सूक्ष्म पुरुषार्थ
ओम् शान्ति । हम जब ओम् शान्ति कहते हैं तो हमारी बुद्धि में क्या आता है ? ओम् शान्ति कहने से अब हमारी बुद्धि में यही आता है कि हम आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। अभी जो पक्के ब्राह्मण हैं, ऐसे तो नहीं कह सकते कि आत्मा सो परमात्मा है। अब यही आयेगा कि हम आत्मा उस परमात्मा की सन्तान हैं। उस परमात्मा का सारा सिजरा सामने आता है अथवा ऐसे कहेंगे कि अपना सारा खानदान, सर्वोत्तम ब्राह्मणों का सारा परिवार सामने आता है। हमारे ब्राह्मण कुल के जो भी हैं सब सामने आते हैं। मूल बीजरुप परमात्मा, फिर उनकी रचना ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, फिर हमारा दादा, फिर उनके बड़े बच्चे – यह है हमारा कुल। यह हुआ निराकार और साकार कुल ।
देखो, ओम् शान्ति का कितना अच्छा अर्थ है ! हम निराकार, आकार और साकार तीनों का अर्थ जानते हैं। ब्राह्मणों को साकार द्वारा परमात्मा ने रचा है। वही ब्राह्मण कुल वालों को निराकार परमात्मा देवी- देवता, लक्ष्मी-नारायण का पद दिलाते हैं। जिसकी हम सन्तान हैं, उनको ऑक्यूपेशन सहित जानते हैं। हमको शूद्रों से ब्राह्मण बनाया है, अब ब्राह्मण से देवता बना रहे हैं -- ऐसा सौभाग्य पा रहे हैं। वह भी अभी संगम पर। जिससे जन्म-जन्मान्तर सुख को पाते आते हैं ।
हम ऐसे नहीं कहेंगे – चाहे गम दो, चाहे खुशी दो। चढ़ती कला है, अब तो खुशी ही है। ऐसे नहीं सोचेंगे - फिर गिरना है। भल ड्रामा में है लेकिन अब इससे छूटे हैं। अब चलने का समय है। तो उसका नशा भी रहेगा, खुशी भी रहेगी। जैसे लौकिक सम्बन्ध में भी लौकिक कुटुम्ब का नशा रहता है। लेकिन इससे भी कोई ऊंचे होंगे। अपना है सबसे ऊंचा कुटुम्ब । इससे ऊंचा और कोई है नहीं। जब तक यह नशा, खुशी प्रैक्टिकल नहीं है तब तक समझो भविष्य इतना पद नहीं बनेगा। यह है अभी की अवस्था से भविष्य पद को जानना । मीटर चेक करना चाहिए। कभी नशा, खुशी नहीं रहती - क्यों ? देह के सम्बन्ध में आने से खुशी नहीं रहती। भल प्रवृत्ति में रहते हो लेकिन वहाँ रहते भी देह सहित देह के सम्बन्ध से न्यारा होना है। यह है अन्दर की बात । बाहर से न कुछ छोड़ना है, न कोई स्थूल साधना करनी है। अपना बहुत सूक्ष्म गहरा पुरुषार्थ है। बुद्धियोग की ही मेहनत है । बुद्धि कहाँ लटकी तो वह खुशी, नशा कायम नहीं रहता। ऐसे नहीं, छोड़ने से छूट जाता । तुमको तो और ही ऑफरीन है जो साथ रहते भी बुद्धियोग न जाये ।
ऐसे नहीं समझना – बस, सुना-सुनाया, यही पुरुषार्थ है। लेकिन सब कुछ बुद्धि से भुलाकर सम्पूर्ण कर्मातीत अवस्था में जाना, मन्सा तक भी कोई विकल्प नहीं आवे – यह है मेहनत । कर्मणा में छोड़ने से मन्सा भी छूट जानी है। यह अभी-अभी अवस्था बनानी है। इससे भविष्य बनेगा। तो अपने पास सब जैसे मरे पड़े हैं। इन्हों से बुद्धि निकाल एक के साथ जोड़ना है। दैवी सम्बन्ध से भी देह का सम्बन्ध नहीं लगाते। परमात्मा की सन्तान हैं, इस सम्बन्ध से भाई-भाई हैं। तो सबसे निकल कहते मुझ एक में लटको । अव्यक्त देवताओं में भी लटकना नहीं है, तो स्थूल की तो बात ही नहीं है। तो कितना ऊंच अपने पुरुषार्थ में रहना है। इसको ही पुरुषार्थ कहा जाता है।
अब तक तो क्रोध, लोभ… यह मोटी भूलें होती रहती हैं। लेकिन इन्हों को संस्कारों सहित मिटाना है। बाहर से तो चलन बहुत साधारण है, सूक्ष्म बुद्धि को क्लीयर करते हैं। तो बाहर से दिखाई नहीं पड़ेगा। बुद्धि को ठीक ठिकाना देना है। बाकी शरीर से कैसे भी बैठें। हमारी बुद्धि में एक ही घूमता है। बाप, टीचर, गुरु एक ही है। हद के बाप, गुरु, टीचर से कुछ - कुछ मिलता है, लेकिन उसको मिलाकर भी पूरा नहीं मिलता है। लेकिन अब हमें एक से कम्पलिट मिल जाता है। सिर्फ पुरुषार्थ कर उनसे खींचना है। खींचने का काम है बुद्धि का । बुद्धि की ही कमाल है। मनुष्य तो मनुष्य है। वह बुद्धि से इतना विनाश कर सकते हैं, तो क्या हम बुद्धि-बल से नई दुनिया नहीं बना सकते हैं ? वह समझते हैं - यह इन्हों की कल्पना है, दुनिया तो बहुत चलनी है। हम कहाँ कहते नहीं चलनी है ? लेकिन बदल-सदल होने वाली है। हम पुराने कर्मों के खेत को उखेड़ नया खेत लगाते हैं। अपना है सूक्ष्म पुरुषार्थ ।
बुद्धि सबसे सूक्ष्म है। आत्मा का भी साक्षात्कार हो सकता है। लेकिन बुद्धि उससे भी सूक्षम है। कर्म बनाने-बिगाड़ने वाली भी बुद्धि है। तो बुद्धिवानों का बुद्धि इसको बना रहे हैं। इसलिए इतनी गहराई, गम्भीरता से धारण करो । ईश्वरीय ताकत है ना। दुनिया स्थूल ताकत के पीछे पड़ी है। लेकिन रुहानी ताकत को तो जानती नहीं है। सूक्ष्म योग लगाने से आत्मा प्योर होती है, तो उसका प्रभाव कर्म पर पड़ता है। इतना थोड़े में खुश नहीं होना है। पूर्ण साफ होना है। दुनिया इतनी बदलती है तो हमको भी इतना बदलना है। परमात्मा बैठ इतना कार्य कराते हैं। स्थूल विनाश स्थूल द्वारा कराएंगे, सूक्ष्म फिर वहाँ चुक्तू कराएंगे। मनुष्यों को समझाओ तो कह देते – परमात्मा को कराना होगा तो करायेंगे। हद की कमाई के लिए तो खूब पुरुषार्थ करते हैं। लेकिन इस बेहद की कमाई के लिए परमात्मा पर रख देते हैं। यह तो कमाई है, इसके लिए पुरुषार्थ करना है, वह भी एक बार। घड़ी - घड़ी तो पुरुषार्थ नहीं करना पड़ेगा। जैसे वह शरीर निर्वाह अर्थ, थोड़े सुख के लिए कमाई करते हैं। फिर भी शारीरिक रोग आदि झंझट चलते आते हैं। लेकिन हमारी कमाई से सब प्रालब्ध मिल जाती है।
बुद्धि को और कोई खलल (विघ्न) पड़ने से शरीर से भोगना जास्ती अच्छा है। बुद्धि सालिम है तो समझते हैं - यह भी हिसाब-किताब भोग कर छूटते हैं। दुःख नहीं भासेगा। बुद्धि में खलल पड़े तो कड़ी भोगना चलती है। हिसाब-किताब तो सबको भोगना है। लेकिन इसमें भी सतो, रजो, तमो स्टेज हैं। जैसे जेल में भी ए, बी, सी क्लास है। तो इस शारीरिक भोगना में भी स्टेज़ेस हैं। उसे हम परमात्मा की याद से सूली से काँटा बनाए खलास कर देते हैं। इससे नुक्सान नहीं होता है। बुद्धि का खलल तो बहुत नुक्सान करता है। ऐसे नहीं, परमात्मा की सन्तान हैं, फिर भोगते क्यों ? नहीं, विकर्मों का बहुत बड़ा स्टॉक है। इसको खलास कर जाएँगे तो बाबा खुश होगा। कुछ रह गया तो डंडा भी मिलेगा, पद भी नहीं देगा। ऐसे तो नहीं, डंडे लगाकर पद बड़ा देगा ? इसलिए यहाँ खुशी से चुक्तू करते हैं। वह चुक्तू हो गया फिर तो चले जाएंगे । फिर नम्बरवार आएंगे ।