Murli de Mamma - gyan-sitar-33

१४.९.६२

अब वृक्ष को बीज में समाना है, इसलिए देह सहित सबसे छुटकारा पाने का पुरुषार्थ करो

ओम् शान्ति। रात और दिन को भी समझना है। रात-दिन हद के भी हैं और दूसरे बेहद के भी हैं जिसको ब्रहमा का दिन-रात कहते हैं। तो सारा कल्प जैसे कि ब्रह्मा का हो गया। यानी सारे कल्प में ब्रहमा का पार्ट हो गया। ज़रुर रात भी ब्रह्मा ने गुजारी, दिन भी गुजारा। अब यह सारा चक्र है। एक जन्म की बात नहीं है। अभी इतने ५००० वर्ष में रात-दिन पूरा होता है। तो एक मनुष्य की इतनी बड़ी आयु नहीं हो सकती है। फिर वह तो लाखों वर्ष कहते हैं ! परन्तु ५००० वर्ष भी एक की आयु हो सकती है क्या ? बाल, युवा, वृद्ध - तो १०० वर्ष में ही क्या से क्या हो जाते हैं ! तो समझना चाहिए कि यह अनेक जन्म की बात है जो बाबा बैठ कहानी सुनाते हैं। बाबा जो ब्रह्मा का भी रचयिता है। मुख्य बच्चे के साथ सभी बच्चों की कहानी आ जाती है। तो हमारा बड़ा बाबा रात और दिन की कहानी सुना रहे हैं।

परमात्मा खुद आकर इस (ब्रह्मा) तन से कहानी सुनाते हैं। तो इनसे ही कहानी शुरु करेंगे - इनकी आत्मा कैसे चक्र लगाती है, कैसे रात पूरी होकर दिन शुरु होता है ? दिन के हैं २१ जन्म क्योंकि यह जन्म भी गिनती होता है। २० जन्म वह और एक जन्म यह जो दिव्य और अलौकिक है। ब्रह्मा का भी यह दिव्य और अलौकिक जन्म गिना जायेगा। बाद में ६३ जन्म कब और कैसे होते हैं, उसका भी विस्तार समझाते हैं। तो इसमें सबकी कहानी आ जाती है। सबका पता बाप ही दे सकते हैं।

हम बाप द्वारा जान गये हैं कि अब हमारे भक्ति के अनेक जन्म पूरे हुए। भक्ति भी हम सबने बहुत जन्म की है। तो लक्ष्मी-नारायण की भक्ति की पूंजी भी बहुत बड़ी है। यह है सारी कहानी। सतयुगी देवी देवता धर्म और राज्य दोनों की स्थापना बाप द्वारा अभी ही होती है। नयी दुनिया फिर पुरानी होती है। पहले था ही देवता धर्म। जैसे पहले जड़ फिर पत्ते आदि निकलते हैं। दूसरे धर्म पहले नहीं थे। हिन्दू धर्म भी पहले नहीं था। पहले देवी-देवता थे, फिर जब गिरे तब हिन्दू बने । कहने में भी पहले सतयुग आता है, ऐसे नहीं कि पहले द्वापर, कलियुग फिर सतयुग। सब बातों का नियम (लॉ) बना हुआ है। हर चीज में नम्बर जरुर हैं। रात-दिन में भी पहले दिन कहेंगे, न कि रात । भले चक्र चलता है परन्तु उसमें भी नम्बरवार हैं। इस चक्र के हिसाब में जितना सुख उतना दुःख । मनुष्य इन बातों को न जानने के कारण कह देते हैं - यह सुख काग विष्टा के समान है। परन्तु हम जानते हैं आधा कल्प है ज्ञान, आधा कल्प है भक्ति। यह वैराग्य मार्ग है बाईप्लाट । देखो, देवताओं के चित्रों द्वारा भी सिद्ध होता है कि अनादि पवित्र प्रवृति थी। वहाँ पवित्रता से ही वृद्धि होती है।

अभी तो हमें देह सहित देह के सब संबंधों से मुक्त होना है। अभी कोई वह वृद्धि नहीं करनी है। अभी तो इसे खत्म करना है। वहाँ की रिहर्सल यहाँ नहीं करनी है। ऐसे नहीं सोचें कि देखें, देवतायें कैसे बच्चे पैदा करते थे ? परमात्मा कहते हैं – अब तो कोई भी हालत में मुझे याद करो, बाकी सबको भूलना है। अभी तो आत्मा ही पवित्र नहीं है तो देह कैसे पवित्र होगी ? तो अब अपनी बुद्धि को एक तरफ लगाना है। देह सहित छुटकारा पाना है क्योंकि देह सहित देह के सब संबंध से निकल वापस जाना है। बाकी वहाँ कैसे वृद्धि होगी ? वह बात वहाँ की है। अभी तो वृक्ष को वापस बीज में जाना है। फिर जब बीज बोयेंगे तब की बात है। अभी तो करवट को बदलना है। अब यह रोशनी परमात्मा द्वारा मिलती है। अभी स्वधर्म का पता लगा है। अभी हम स्वधर्म में रहकर बाप से अपना वर्सा लेते हैं। वहाँ है ही एक देवी-देवताओं का धर्म । वहाँ कोई दैत्य आदि होते नहीं। आसुरी सम्प्रदाय ही नहीं है। वहाँ देवताओं को नॉलेज ही नहीं है कि अपवित्रता क्या होती है ? इस समय की तमोप्रधान बुद्धि वाले इन बातों को नहीं समझ सकते हैं। इसलिए कहते हैं कि क्या सभी पवित्र बनेंगे ? परन्तु यह परमात्मा का काम है, वही जानते हैं।

मनुष्य न जानने के कारण कह देते हैं कि जहाँ सारी दुनिया वहाँ हम। वह तो समझते कि परमात्मा का जन्म है ही नहीं, वह तो सर्वव्यापी है। अगर सर्वव्यापी कहते हैं तो अवतरण कहना भी निषेध हो जाता है। कहते हैं – कण-कण में है। तो फिर उतरा कैसे ? फिर तो न उतरने वाला रहा, न उतरने की जगह ही है। अभी तो सब अवतार बन गये हैं। पहले से ही सब अवतार बैठे हैं, तो फिर और अवतार किसका होगा? तुम जानते हो कि हम सब आत्मायें हैं। आत्मा है ही सत्-चित् । शरीर से आत्मा ही निकलती है, अकेला मन-बुद्धि नहीं निकलता । यही तो आत्मा की चैतन्यता है। हर एक आत्मा के संस्कार अलग-अलग हैं। ऐसे नहीं कि वह कोई जड़ हो जाती है। जैसे आकाश तत्व है, ऐसे कोई आत्मा भी एक तत्व है- नहीं, वह चीज ही अलग है। यह है परमात्मा की नॉलेज जो अभी हम जानते जाते हैं। अच्छा ।