Murli de Mamma - gyan-sitar-36
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
१९.९.६२
प्रवृत्ति में रहते विकारों को तजना ही श्रेष्ठ कर्म है
इस दुनिया में जो ऊंच कर्त्तव्य करके गये हैं उनका इतिहास में नाम गाया जाता है। जिनके कर्तव्य ऊंच हैं उन्हें मन्दिरों में पूजा जाता है। जरुर उन्होंने कभी राज्य भी चलाया है। परन्तु उन्होंने कौनसा कर्म किया जो इतनी ऊंच प्रालब्ध बनाई ? उन्हों का संसार जिसे 'स्वर्ग' कहा जाता है - यह है मनुष्यों की ऊंच ते ऊंच प्रालब्ध । इतनी ऊंच प्राप्ति के लिए कोई पठन-पाठन की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई कर्म-श्रेष्ठ नहीं कहा जाता है। प्रवृत्ति में पवित्र रहना ही कर्म-श्रेष्ठ है।
सिर्फ विकारों को तजना है। विकार अपनी चीज नहीं हैं, प्रवृत्ति अपनी चीज है। तो प्रवृत्ति का सन्यास नहीं करना है। प्रवृत्ति को ही पवित्र बनाना है। आसुरी को दैवी बनाना है। असुर भयानक नहीं है परन्तु विचार भयानक हैं। सिर्फ कोई का गला काटना आदि विकर्म नहीं परन्तु आज मनुष्य का हर एक कर्म ही विकर्म है। ऐसा नहीं कि परमात्मा ही विकर्म आदि कराता है। नहीं। परमात्मा ने सिखाया था कि शरीर-निर्वाह करते कर्म से विकारों को निकालो । परन्तु मनुष्य समझते हैं कि पाप के बिगर कर्म हो नहीं सकते हैं।
अब तो है झूठ-खण्ड, तो सब झूठ है। साधू, सन्त, महात्मा कहलाने वाले भी झूठे संसार में हैं। अब परमात्मा ही आकर सच्चा साधन अर्थात् पुरुषार्थ सिखाते हैं। सब आत्माओं के चक्र की कहानी सुनाते हैं जिसको कहते हैं स्वदर्शन-चक्र । बाकी कोई रावण, कंस आदि का गला काटने की बात नहीं है। अब वही समय है जबकि परमात्मा समझाने फिर से आया है। अब मनुष्य दुःख से निकलने चाहते हैं। परन्तु कह देते हैं - परमात्मा ही दुःख-सुख देता है। यह कहना परमात्मा पर दोष धरना है। तो अब परमात्मा बाप कहते कि पुरुषार्थ करो । अब आसार नजदीक दिखाई दे रहे हैं। अब जगाने वाला आया है तो भी सोते रहेंगे तो क्या मिलेगा ?
वृद्धि तो होनी ही है परन्तु विघ्न भी जरुर पड़ने हैं। सत्संग माना जहाँ विकारों से झगड़ा चले । इसमें इस ज्ञान का दोष ही क्या है ? और सत्संगों में तो लड़ाई सिखाते नहीं हैं। यहाँ सिखाने वाले सिखाते हैं और जीतने वाले जीतने के लिए युद्ध करते हैं। तो यहाँ तो झगड़ा ही सौभाग्य है। सहनशील तो बनना है। भल पुरानी दुनिया इन आंखों से देखते रहो। नई नहीं देखते हो परन्तु वह होकर ही रहेगी और यह विनाश हो ही जायेगी। इसलिए उस संसार के लिए सब कुछ करना है। अच्छा । ओम् शान्ति ।