Murli de Mamma - gyan-sitar-54
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१२.१०.६३
सच्चा रूहानी वैष्णव वह, जिसकी बुद्धि को कोई भी विकार न छुएं
ओम् शान्ति। जब हम ओम् शान्ति कहते हैं तो एक दो को बाप की याद दिलाते हैं। जैसे टीचर ड्रिल कराते हैं तो कहते हैं अटेन्शन। यहाँ भी पहले ओम् शान्ति कहने से अपनी बुद्धि को स्थिर करना होता है कि मैं आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। ओम् का अर्थ शास्त्रवादी तो बहुत लम्बा करके बतलाते हैं परन्तु इसका अर्थ बड़ा सिम्पल है कि सोल कानसेस होकर रहो। चलो, फिरो तो बुद्धि में अपना बाप याद आये। बाप कहते हैं कि बच्चे सर्वशक्तिवान मैं एक ही हूँ। तो पूरा राज्य-भाग्य सुख, शान्ति, शक्ति, पवित्रता सब पदार्थ मुझ एक से ही लो। सिर्फ शान्ति लेना कोई पदार्थ नहीं है। कई समझते हैं पदार्थों ने ही दुःख दिया है तब कहते हैं हमें देवता भी नहीं बनना। कहते हैं - हम तो मुक्तिधाम में ही बैठना चाहते हैं। अरे, मुक्ति में बैठ जाना कोई स्टेज नहीं है। वो तो एकदम जड़ अवस्था हुई। उसमें कोई सुख, चैन, आराम नहीं। वह तो शान्ति-अशान्ति से परे अवस्था है। ऐसे नहीं कि वही आरामदायक है। कइयों ने मोक्ष को ही ऊंच समझ लिया है। अनेक जन्मों से जो सुनते आये हैं तो उनका वह संस्कार पक्का हो गया है। यहाँ भी कई आते हैं कहते हैं हमको तो योग ही अच्छा लगता है, आपका ज्ञान तो हमको समझ में नहीं आता। तो हम समझ जाते हैं कि यह बेचारा ज्यादा पद पाने वाला नहीं है। शायद यह मुक्ति में बैठने वाला है। यूं तो अविनाशी ज्ञान-योग का विनाश नहीं होता है, उनका मिलेगा जरूर। परन्तु पूर्ण चीज तो पूर्ण पढ़ाई से मिलेगी ना। हमारी एक-एक मिनट में कितनी कमाई है! मुख्य है मन, वचन और कर्म पर अटेन्शन। क्योंकि मन में भी अगर व्यर्थ आता है तो वह भी समय वेस्ट होता है। तो अपने समय की भी सेफ्टी करनी है। उसे भी जितना हम सेफ करें उतना फायदा है। तो अपने मन-वाणी और कर्म पर सेकेण्ड-सेकेण्ड ध्यान देना है कि हम आत्मा से कोई अयोग्य कार्य न हो। इसलिए अपने को पूरा रूहानी वैष्णव बनना है जो कोई विकार हमारी आत्मा को न छुएं। पहले रोग हैं यह पांच विकार, इन रोगों से छुटकारा पाना है। कहते हैं ना संग तारे कुसंग बोरे। तो विकारियों का संग ही कुसंग है जिससे बचना है। ऐसे नहीं कि सन्यासियों माफिक भाग जाना है। नहीं, हमको तो उसी के बीच में रह अपने को बचाना है। हमको भी औरों के कल्याण अर्थ विकारियों के संग में आना पड़ता है। जैसे देखो, कहाँ प्लेग की बीमारी फैलती है तो सब कहते हैं - इससे दूर रहो, इनके साथ नहीं बैठो। परन्तु डॉक्टर को तो उन जीवाणुओं को निकालने अर्थ जीवाणुओं में हाथ भी डालना पड़ेगा। डॉक्टर को तो पेशेन्ट के पास जाना ही पड़े। तो हम रूहानी सर्जन है हमें रूहों के रोगों को दूर करने अर्थ उनके संग में रहना भी पड़ता है। अगर हम भी उनसे हटे तो उनको निरोगी कौन बनायेगा ? जैसे आग बुझाने वालों को कवच पड़ा रहता है तो असर नहीं होता है, वैसे ही हमको ज्ञान-योग का कवच पड़ा हुआ है तो माया का वार हो नहीं सकता। अच्छा