Avyakt murli for Thursday 23 January 1969
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> 23-01-69ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
"अस्थियाँ हैं स्थिति की स्मृति दिलाने वाली"
आज मैं आप सभी बच्चों से अव्यक्त रूप में मिलने आया हूँ । जो मेरे बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित होंगे वही इसको समझ सकेंगे । आप सभी बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित हो किसको देख रहे हो?व्यक्त रूप में या अव्यक्त रूप में?आप व्यक्त हो या अव्यक्त?अगर व्यक्त में देखेंगे तो बाप को नहीं देख सकेंगे । आज अव्यक्त वतन से मुलाकात करने आया हूँ । अव्यक्त वतन में आवाज नहीं परन्तु यहाँ आवाज में आया हूँ । आप सभी बच्चों के अन्दर में कौन-सा संकल्प चल रहा है?अभी यह अव्यक्त मुलाकात है । जैसे कल्प पहले मिसल बच्चों से रूहरूहान चल रही है । रूह-रूहान करने मीठे-मीठे बाबा ने आप सभी बच्चों से मिलने भेजा है । जो थे वह अब भी हैं । दो तीन दिन पहले मीठे-मीठे बाबा से रूह-रूहान चल रही थी । रूह-रूहान क्या है, मालूम है?बाबा ने बोला, वतन का अनुभव करने के लिए तैयार हो? क्या जवाब दिया होगा? यही कहा कि जो बाप की आज्ञा । जैसे चलायेंगे, जहाँ बिठायेंगे जिस रूप में बिठायेंगे । बच्चों के अन्दर यही संकल्प होगा कि बापदादा ने छुट्टी क्यों नहीं ली? बाबा को भी यह कहा । बाबा ने कहा अगर सभी बच्चों को बिठाकर छुट्टी दिलाऊँ तो छुट्टी देंगे? आप भी बच्चों को देख, सर्विस को देख बच्चों के स्नेह में आ जायेंगे । इसलिए जो बाप ने कराया वही ड्रामा की भावी कहेंगे । व्यक्त रूप में नहीं, तो अव्यक्त रूप से मुलाकात कर ही रहे हैं । सर्विस की वृद्धि वैसे ही है, बच्चों की याद वैसे ही है लेकिन अन्तर यह है कि वह व्यक्त में अव्यक्त था और यह अव्यक्त ही है । जो नयनों की मुलाकात जानते होंगे वह नयनों से इस थोड़ी सी मुलाकात में अपने प्रति शिक्षा डायरेक्शन ले लेंगे । आप सभी को वतन में तो आना ही है । बच्चों से मुला- कात करने के लिए हर वक्त, हर समय तैयार ही रहते हैं । अब जहाँ तक बच्चों की जितनी बुद्धि क्लीयर होगी,उसी अनुसार ही अव्यक्त मिलन का अनुभव कर सकेंगे । शक्ति स्वरूप में स्थित हैं? (दीदी से) जैसे साथ थे वैसे ही हैं । अलग नहीं । अभी शक्ति स्वरूप का पार्ट प्रत्यक्ष में दिखाना है । जो बाप की शिक्षा मिली है,वह प्रैक्टिकल में करके दिखाना है । शक्ति सेना बहुत है, अभी पूरा शक्ति स्वरूप बन जाना । अभी तक बच्चे और बाप के स्नेह में चलते रहे । अब फिर बाप से जो शक्ति मिली है उस शक्ति से औरों को ऐसा शक्तिवान् बनाना है । वही बाप के स्नेही बाप के साथ अन्त तक रहेंगे । अभी मीठे-मीठे बाबा दृश्य दिखला रहे हैं - आप सभी बच्चों का । आप अस्थियाँ उठा रहे थे । अस्थियों को नहीं देखना स्थिति को देखना । यह अस्थियाँ स्थिति स्वरूप हैं । एक एक रग में स्थिति थी । तो बाहर से वह अस्थियों को रखा है । परन्तु इसका अर्थ भक्ति मार्ग का नहीं उठाना । इन अस्थियों में जो स्थिति भरी हुई है,हमेशा उसको देखना है । साधारण मनुष्यों को यह बातें इतना समझ में नहीं आयेगी । बच्चों का स्नेह है और सदा रहेगा, 21 जन्म तक रहेगा । आप सभी सतयुगी दुनिया में साथ नहीं चलेंगे? राज्य साथ नहीं पायेंगे? साथ ही हैं,साथ ही रहेंगे-जन्म जन्मान्तर तक। अभी भी ऐसा नहीं समझना, बाप है दादा नहीं या दादा है तो बाप नहीं । हम दोनों एक दो से एक पल भी अलग नहीं हो सकते । ऐसे ही आप अपने को त्रिमूर्ति ही समझो । इसीलिए कहते हैं त्रिमूर्ति का बैज हमेशा साथ रखो । जब ब्रह्मा,विष्णु और शंकर तीन को देखते हो तो आपके भी त्रिमूर्ति की याद अर्थात् अपना स्वरूप और बापदादा की याद,त्रिमूर्ति की स्थिति मशहूर है । इसमें ही आप सभी बच्चों का कल्याण है । कल्याणकारी बाप जो कहते हैं,जो कराते हैं, उसमें ही कल्याण है । इसमें एक एक महावाक्य में,एक-एक नजर में बहुत कल्याण है । लेकिन स्थूल को परखने वाले कोई कोई अनन्य और महारथी बच्चे हैं । अब आप भी इतना ही शीघ्र कर्मातीत स्थिति में स्थित रहने का पुरुषार्थ करो । जैसे यहाँ हर समय बापदादा के साथ व्यतीत करते थे वैसे ही हर कर्म में, हर समय अपने को साथ ही रखा करो । बच्चे, यही शिक्षा याद रखना,कभी नहीं भूलना । सम्बन्ध,स्नेह, स्मृति स्वरूप,साथ-साथ सरलता स्वरूप, समर्पण और एक दो के सहयोगी बन सफलता को पाते रहना । सफलता आप सभी बच्चों के मस्तक के बीच चमक रही है । अब बहुत समय हुआ है और कुछ कहना है? सूक्ष्मवतन में बैठे भी हर बच्चे की दिनचर्या, हर बच्चे का चार्ट सामने रहता है । व्यक्त रूप से अभी तो और ही स्पष्ट रूप से देखते हैं । इसलिए सभी की रिजल्ट देखते रहते हैं ।
जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे उतना उस अव्यक्त स्थिति से कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म ऐसा होगा जैसे श्रीमत राय दे रही है । यह अनुभव बच्चे पायेंगे । अब अपनी अव्यक्त स्थिति के आधार से ऐसा काम करना,जैसे श्रीमत के आधार से हर काम होता रहा है । जिस चीज के साथ बाप का स्नेह है उससे उतना स्नेह रखना ही अपने को सौभाग्यशाली बनाना है । रग-रग में किस के साथ स्नेह था?5 तत्वों से नहीं । स्नेह गुणों से ही होता है । स्नेह था, नहीं । है और रहेगा । जब तक भविष्य नई दुनिया न बनी है तब तक यह अटूट स्नेह रहेगा । स्नेह आत्मा के साथ और कर्तव्य के साथ ही है तो फिर शरीर क्या! अन्त तक साथी रहेंगे । जिसका बाप के साथ स्नेह है वही अन्त तक स्थापना के कार्य में मददगार रहेंगे । इसलिए स्नेही होने की कोशिश करो । कैसी भी माया आवे, मायाजीत बनना । जैसे बैज लगाते हो वैसे मस्तक पर यह विजय का बैज लगाओ ।
मधुबन का नक्शा सारे वर्ल्ड के सामने म्युजियम के रूप में होना चाहिए । अविनाशी भण्डारा है इसका और भी ज्यादा शो करना है। जैसे सभी बच्चे पत्र लिखते थे वैसे ही लिखते रहना । जैसे डायरेक्शन लेते थे वैसे ही लेना । शरीर की बात दूसरी है । सर्विस वही है । इसलिए जो भी बात हो मधुबन में लिखते रहना । अपना पूरा कनेक्शन रखना । दूसरों को भी अपनी अवस्था का सबूत देना । आपको देख और भी ऐसे करेंगे ।
(विदाई के समय)
यह तो आप बच्चे जानते हो कि जो भी ड्रामा का पार्ट है इसमें कोई गुप्त रहस्य भरा हुआ है । क्या रहस्य भरा हुआ है वह समय प्रति समय सुनाते जायेंगे । अब तो आपका वही यादगार जो आकाश में है,दुनिया वाले इन आँखों से देखेंगे कि यह धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं । बाबा ने कहा है - ज्यादा समय वहाँ नहीं बैठना ।