Avyakt murli for Thursday 2 May 1974
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
>
02-05-74 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
अब बाप-समान सर्व गुण सम्पन्न बनो
सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न बनाने वाले, अटल,अखण्ड और निर्विघ्न,विश्व के राज्य का अधिकारी बनाने वाले सर्व-शक्तिवान् शिव बाबा बोले:--
अपने आपको मास्टर ज्ञानसागर समझते हो? जैसे ज्ञान-सागर सर्व-शक्तियों से सम्पन्न हैं, ऐसे अपने को भी सर्व-प्राप्तियों से क्या सम्पन्न अनुभव करते हो?यह जो कहावत है, कि देवताओं के खजाने में अप्राप्त कोई भी वस्तु नहीं होती है-यह कहावत ब्राह्मणों की गाई हुई है या देवताओं की?सर्व संस्कार ब्राह्मण जीवन में ही तुम अनुभव करते हो, क्योंकि अभी तुम सर्व संस्कार अपने में भर रहे हो। तो यह गायन के संस्कार अभी से तुम अनुभव करते हो?क्योंकि इस समय ऊंच ते ऊंच बाप-दादा के तुम बच्चे हो। लेकिन तुम देवताई जीवन में मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कहलावेंगे। जब कि अभी सागर की सन्तान हो, तो सागर-समान सम्पन्न अभी होंगे या भविष्य में होंगे? ज्ञानसागर बाप बच्चों को सब में सम्पन्न अभी बनाते हैं। तब ही लास्ट स्टेज का गायन किया जाता है-सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पन्न,सम्पूर्ण निर्विकारी और सम्पूर्ण आहिंसक। महिमा में भी सबके साथ सम्पन्न व सम्पूर्ण शब्द है। यह सम्पन्न-पन का वर्सा बाप द्वारा इस ब्राह्मण जीवन में ही मिलता है। अब अपने वर्से के अधिकारी हो या बनना है?
जब से बाप के बने, तब से वर्से के अधिकारी बने। वर्सा क्या है?क्या वर्से में सर्व प्राप्ति व सर्व का अखुट खज़ाना अनुभव करते हो?जब वर्से के अधिकारी हैं तो अधिकारी की निशानी क्या है? अधिकारी बाप-समान सदा कल्याणकारी,रहमदिल, महाज्ञानी,गुणदानी,बाप का हर संकल्प, हर बोल, हर कर्म द्वारा साक्षात्कार कराने वाला,साक्षात बाप-समान होगा। ऐसे अधिकारी का गायन है कि उसके जीवन में अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। जो सर्व में सम्पन्न होता है, उसकी आंख व बुद्धि कोई किसी तरफ नहीं डूबती। वह सदा रूहानी नज़र में रहते हैं,अनेक व्यर्थ संकल्पों व अनेक तरफ बुद्धि व दृष्टि जाने से परे, सर्व फिक्रों से फारिग और अपने बाप द्वारा मिले हुए खजाने में सदा रमण करता रहता है। उनको दूसरा कोई अन्य संकल्प करने की भी फुर्सत नहीं रहती, क्योंकि बाप द्वारा मिले हुए खजाने को,स्वयं के प्रति व सर्व-आत्माओं के प्रति बाँटने व धारण करने में वह बहुत बिज़ी रहता है। सबसे बड़े-ते-बड़ा धन्धा, सबसे बड़े-ते-बड़ा दान या सबसे बड़े-ते-बड़ा पुण्य जो भी कहो,वह यही है। इतने श्रेष्ठ कार्य व श्रेष्ठ दान-पुण्य को छोड़कर और क्या करेंगे? क्या फुर्सत मिलती है, जो कि अन्य छोटे-छोटे व्यर्थ कार्य करने का संकल्प भी आवे या कार्य समाप्त कर लिया है क्या इसलिए फुर्सत है? समाप्त नहीं किया है, तो फिर फुर्सत कहाँ से आती है? इतने बड़े कार्य में बिज़ी रहने वाले, फिर गुड़ियों के खेल में क्या कोई एम-ऑब्जेक्ट (Aim Object) होती है? क्या कोई रिज़ल्ट निकलता है? इतने बड़े आदमी होकर हर कदम में पद्मों की कमाई करने वाले और ऐसी गुड़ियों का खेल खेलें,तो क्या इनको महान् समझदार कहेंगे? व्यर्थ संकल्प, गुड़ियों का ही तो खेल है। अभी तक भी ऐसे बचपने के संस्कार हैं क्या?
जिसका अपनी आवश्यक और समीप की चेतन शक्तियों, संकल्पों और बुद्धि अथवा मन और बुद्धि पर कन्ट्रोल नहीं, अधिकार नहीं या विजय नहीं तो क्या,विश्व के स्वराज्य का अधिकारी व विजयी रत्न बन सकता है? जिस राज्य के मुख्य अधिकारी अपने अधिकार में न हों, क्या वह राज्य अटल,अखण्ड,और निर्विघ्न चल सकता है? यह मन और बुद्धि आप आत्मा की समीप शक्तियाँ व मुख्य राज्य अधिकारी हैं,व कार्य अधिकारी हैं,यदि वह भी वश में नहीं,तो ऐसे को क्या कहा जायेगा? महान् विजयी या महान् कमज़ोर?तो अपने आपको देखो कि क्या मेरे मुख्य राज्य-अधिकारी,मेरे अधिकार में हैं? अगर नहीं, तो विश्व राज्य अधिकारी अथवा राजन् कैसे बनेंगे? अपने ही छोटे छोटे कार्यकर्त्ता अपने को धोखा दें, तो क्या ऐसे को महावीर कहा जायेगा? चैलेन्ज तो करते हो,कि हम लॉ और ऑर्डर सम्पन्न राज्य स्थापित कर रहे हैं। तो चैलेन्ज करने वाले के यह छोटे-छोटे कार्यकर्ता अर्थात् कर्मेन्द्रियाँ अपने ही लॉ और आर्डर में नहीं,और वे स्वयं ही कार्यकर्त्ता के वशीभूत हों तो क्या ऐसे वे विश्व में लॉ और ऑर्डर स्थापित कर सकते हैं?हर कर्मेन्द्रियाँ कहाँ तक अपने अधिकार में हैं? यह चैक करो और अभी से विजयीपन के संस्कार धारण करो। बाप-दादा का नाम बाला करने वाले ही बापसमान सम्पन्न होते हैं। अच्छा!
ऐसे इशारे से समझने वाले, हर कार्यकर्त्ता को अपने इशारे पर चलाने वाले,हर आत्मा को बाप की तरफ इशारा देने वाले, सदा अपने अधिकार को अनुभव में लाने वाले, सदा सम्पन्न,और सदा विजयी ऐसे समझदार बच्चों को बाप-दादा का याद-प्यार, गुडनाईट और नमस्ते।
इस मुरली का सार
बाप के वर्से के अधिकारी की निशानी बाप-समान सदा कल्याणकारी, रहमदिल,महाज्ञानी,गुणदानी,बाप का हर संकल्प, बोल और कर्म द्वारा साक्षात्कार कराने वाला साक्षात् बाप-समान होगा।