Avyakt murli for Friday 27 December 1974
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27-12-74 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
योगी भव और पवित्र भव द्वारा वरदानों की प्राप्ति
सर्व वरदानों को देने वाले वरदाता शिव बाबा बोले:-
आज की सभा वरदाता द्वारा, सर्व वरदान प्राप्त की हुई आत्माओं की है। वरदाता द्वारा, सर्व वरदानों में,मुख्य दो वरदान हैं, जिसमें कि सर्व वरदान समाये हुए हैं। वह दो वरदान कौन-से हैं?उसको अच्छी तरह जानते हो या स्वयं वरदान-स्वरूप व वरदानी-मूर्त बन गये हो? जो वरदानी-मूर्त हैं; वह स्वयं स्वरूप बन, औरों को देने वाला दाता बन सकता है। तो अपने से पूछो कि क्या मुख्य दो वरदान-स्वरूप बने हैं? अर्थात् योगी भव और पवित्र भवः - इस विशेष कोर्स के स्वरूप बने हो? इसी कोर्स को समाप्त किया है या अभी तक कर रहे हो? सप्ताह कोर्स का रहस्य, इन दो वरदानों में समाया हुआ है। जो भी यहाँ बैठे हैं,क्या उन सबने यह कोर्स,समाप्त कर लिया है या उनका अभी तक यह कोर्स चल रहा है? कोर्स अर्थात् फोर्स भर जाना। सदा योगी-भव और सदा पवित्र-भव का फोर्स अर्थात् शक्ति-स्वरूप का अनुभव नहीं होता, तो उसको शक्ति-स्वरूप नहीं कहेंगे। लेकिन उसे शक्ति-स्वरूप बनने का अभ्यासी ही कहेंगे। क्योंकि स्वयं का स्वरूप, सदा और स्वतः ही स्मृति में रहता है। जैसे अपना साकार स्वरूप, सदा और स्वतः याद रहता है और उसका अभ्यास नहीं करते हो बल्कि और ही, उसको भुलाने का अभ्यास करते हो। ऐसे ही अपना निजी-स्वरूप व वरदानी स्वरूप,सदा ही स्मृति में रहना चाहिए। अपवित्रता का और विस्मृति का नामोनिशान न रहे। इसको कहा जाता है-वरदानों का कोर्स करना। क्या ऐसा कोर्स किया है?
जैसे आप लोग, सप्ताह कोर्स समाप्त करने से पहले,किसी भी आत्मा को क्लास में नहीं आने देते हो, ऐसे ही ब्राह्मण बच्चे, जो यह प्रैक्टिकल कोर्स समाप्त नहीं करते तो बाप-दादा व ड्रामा भी उनको कौन-सी क्लास में आने नहीं देते। अर्थात् फर्स्ट क्लास में आने नहीं देते। फर्स्ट क्लास कौन-सी है?-वे सतयुग के आदि में नहीं आ सकते। जब आप लोग, उन को क्लास में आने नहीं देते, तो ड्रामा भी फर्स्ट क्लास में का अधिकारी नहीं बना सकता। फर्स्ट क्लास में, आने के लिए यह मुख्य दो वरदान प्रैक्टिकल रूप में चाहिए। विस्मृति या अपवित्रता क्या होती है इसकी अविद्या हो जाए। तुम संगम पर उपस्थित हो ना? तो ऐसा अनुभव हो कि यह संस्कार व स्वरूप मेरा नहीं है, लेकिन मेरे पास्ट जन्म का था और अब है नहीं। मैं तो ब्राह्मण हूँ और यह तो शूद्रों के संस्कार व उनका स्वरूप है। ऐसे अपने से भिन्न अर्थात् दूसरों के संस्कार हैं,ऐसा अनुभव होना-इसको कहा जाता है न्यारा और प्यारा। जैसे देह और देही अलग-अलग वस्तुयें हैं,लेकिन अज्ञानवश इन दोनों को मिला दिया है। वैसे ही मेरेको मैंसमझ लिया है। तो इस गलती के कारण कितनी परेशानी व दुःख व अशान्ति प्राप्त की। ऐसे ही, यह अपवित्रता और विस्मृति के संस्कार,जो मेरे अर्थात् ब्राह्मणपन के नहीं, लेकिन जो शूद्रपन के हैं, उनको मेरा समझने से,माया के वश व परेशान हो जाते हो अर्थात् ब्राह्मणपन की शान से परे (दूर) हो जाते हो। यह छोटी-सी भूल,चैक करो कि कहीं यह मेरे संस्कार तो नहीं था, यह कहीं यह मेरा स्वरूप तो नहीं? समझा?तो पहला पाठ,पवित्र-भव व योगी-भव को प्रैक्टिकल स्वरूप में लाओ, तब ही बाप-समान और बाप के समीप आने के अधिकारी बन सकते हो।
आज कल्प पहले वाले, बहुत काल से बिछुड़े हुए, बाप की याद में तड़पने वाले व अव्यक्त मिलन मनाने के शुद्ध संकल्प में रमण करने वाले,अपने स्नेह की डोर से बाप-दादा को भी बांधने वाले और अव्यक्त को भी आप-समान व्यक्त में बनाने वाले,वह नये-नये बच्चे व साकारी देश में दूर-देशी बच्चे जो हैं,उनके प्रति विशेष मिलन के लिए बाप-दादा को आना पड़ा है। तो शक्तिशाली कौन हुए? बाँधने वाले या बँधने वाला? बाप कहते हैं-वाह बच्चे। शाबास बच्चे। नयों के प्रति विशेष बाप-दादा का स्नेह है। ऐसा क्यों? निश्चय की सदा विजय है। विशेष स्नेह का मुख्य कारण,नये बच्चे सदा अव्यक्त मिलन मनाने की मेहनत में रहते हैं। अव्यक्त रूप द्वारा,व्यक्त रूप से किये हुए चरित्रों का अनुभव करने के सदा शुभ आशा के दीपक जगाए हुए होते हैं। ऐसी मेहनत करने वालों को,फल देने के लिए बाप-दादा को भी विशेष याद स्वतः ही आती है। इसलिए आज की याद, आज की गुडमार्निंग व नमस्ते विशेष चारों ओर के नये-नये बच्चों को पहले बाप-दादा दे रहे हैं। साथ में, सब बच्चे तो है हीं। अब व्यक्त द्वारा अव्यक्त मिलन, सदा काल तो हो नहीं सकता। इसलिए आने के बाद, जाना होता है। अव्यक्त रूप में अव्यक्त मुलाकात तो सदाकाल की है। ऐसे वरदानी बच्चों को याद-प्यार और नमस्ते।