Avyakt murli for Monday 27 October 1975 - 1

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27-10-75 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन

महादानी और वरदानी ही महारथी

विश्व-कल्याणी और महावरदानी शिव बाबा महारथी बच्चों को देख बोले:-

ब्रह्मा बाप के समान क्या महारथी भी बाप समान सदा अपने को निमित्त-मात्र अनुभव करते हैं? महारथियों की यह विशेषता है कि उनमें मैं-पन का अभाव होगा। मैं निमित्त हूँ और सेवाधारी हूँ - यह नैचुरल स्वभाव होगा। स्वभाव बनाना नहीं पड़ता है। स्वभाव-वश संकल्प, बोल और कर्म स्वतः ही होता है। महारथियों के हर कर्त्तव्य में विश्वकल् याण की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। उसका प्रैक्टिकल सबूत व प्रमाण हर बात में अन्य आत्मा को आगे बढ़ाने के लिए ‘पहले आप’ का पाठ पक्का होगा। ‘पहले मैं नहीं’। ‘आप’ कहने से ही उस आत्मा के कल्याण के निमित्त बन जायेंगे। ऐसे महारथी जिनकी ऐसी श्रेष्ठ आत्मा है और ऐसा श्रेष्ठ स्वभाव हो, ऐसे ही बाप समान गाये जाते हैं।

महारथी अर्थात् महादानी। अपने समय का, अपने सुख के साधनों का, अपने गुणों का और अपनी प्राप्त हुई सर्व शक्तियों का भी अन्य आत्माओं की उन्नति-अर्थ दान करने वाला - उसको कहते हैं महादानी। ऐसे महादानी के संकल्प और बोल स्वतः ही वरदान के रूप में बन जाते हैं। जिस आत्मा के प्रति जो संवल्प करेंगे या जो बोल बोलेंगे वह उस आत्मा के प्रति वरदान हो जायेगा। क्योंकि महादानी अर्थात् त्याग और तपस्यामूर्त्त होना। इसी कारण त्याग,तपस्या और महादान का प्रत्यक्ष फल उनका संकल्प वरदान रूप हो जाता है। इसलिए महारथी की महिमा ‘महादानी और वरदानी’ गाई हुई है। ऐसे महारथियों का संगठन लाइट-हाउस और माइट-हाउस का काम करेगा। ऐसी तैयारी हो रही है ना। ऐसा संगठन तैयार होना अर्थात् जयजयकार होना और फिर हाहाकार होना। यह दृश्य भी वन्डरफुल होगा। एक तरफ अति हाहाकार और दूसरी तरफ फिर जयजयकार। अच्छा।

मुरली का मुख्य सार

1. महारथी की यह विशेषता है कि उसमें मैं-पन का अभाव होगा। 2. महारथी के हर कर्त्तव्य में विश्व-कल्याण की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देगी।