Avyakt murli for Sunday 2 May 1982
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02-05-82 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
विशेष जीवन कहानी बनाने का आधार - सदा चढ़ती कला
अव्यक्त बापदादा श्रेष्ठ आत्माओं प्रति बोले:-
बापदादा हरेक बच्चे की जीवन कहानी देख रहे हैं। हरेक की जीवन कहानी में क्या-क्या तकदीर की रेखायें रही हैं। सदा एकरस उन्नति की ओर जाते रहे हैं वा उतराई और चढ़ाई में चल रहे हैं! ऐसे दोनों प्रकार की लकीर अर्थात् जीवन की लीला दिखाई दी। जब चढ़ाई के बाद किसी भी कारणवश चढ़ती कला के बजाए उतरती कला में आते हैं तो उतरने का प्रभाव भी अपनी तरफ खींचता है। जैसे बहुतकाल की चढ़ती कला का प्रभाव बहुत काल की प्राप्ति कराता है। सहज योगी जीवन वाले, सदा बाप के समीप और साथ की अनुभूति करते हैं। सदा स्वयं को सर्व शक्तियों में मास्टर समझने से सहज स्मृति स्वरूप हो जाते हैं। कोई भी परिस्थितयाँ वा परीक्षायें आते हुए सदा अपने को विघ्नविनाशक अनुभव करते हैं। तो जैसे बहुत काल की चढ़ती कला का, बहुतकाल ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करते हैं ऐसे चढ़ती कला के बाद फिर उतरती कला होने से स्वतः और सहज यह अनुभव नहीं होते। लेकिन विशेष अटेन्शन,विशेष मेहनत करने के बाद यह सब अनुभव करते हैं। सदा चढ़ती कला अर्थात् सदा सर्व प्राप्ति को पाई हुई मूर्ति। और चढ़ने के बाद उतरने और फिर चढ़ने वाले, गँवाई हुई वस्तु को फिर पाने वाले, ऐसे उतरने-चढ़ने वाली आत्मायें अनुभव करती हैं कि पाया था लेकिन खो गया'। और पाने के अनुभवी होने के कारण फिर से उसी अवस्था को पाने के बिना रह भी नहीं सकते। इसलिए विशेष अटेन्शन देने से फिर से अनुभव को पा लेते हैं लेकिन सदाकाल और सहज की लिस्ट के बजाए दूसरे नम्बर की लिस्ट में आ जाते हैं। पास विद आनर नहीं लेकिन पास होने वालों की लिस्ट में आ जाते हैं। तीसरे नम्बर की तो बात स्वयं ही सोच सकते हो कि उसकी जीवन कहानी क्या होगी! तीसरा नम्बर तो बनना ही नहीं है ना?
अपनी जीवन कहानी को सदा उन्नति की ओर बढ़ने वाली, सर्व विशेषताओं सम्पन्न,सदा प्राप्ति स्वरूप ऐसा श्रेष्ठ बनाओ। अभी-अभी ऊपर, अभी-अभी नीचे वा कुछ समय ऊपर कुछ समय नीचे ऐसे उतरने-चढ़ने के खेल में सदा का अधिकार छोड़ नहीं देना। आज बापदादा सभी की जीवन कहानी देख रहे थे। तो सदा चढ़ती कला वाले कितने होंगे और कौन होंगे? अपने को तो जान सकते हो ना कि मैं किस लिस्ट में हूँ! उतरने की परिस्थितियाँ,परीक्षायें तो सबके सामने आती हैं, बिना परीक्षा के तो कोई भी पास नहीं हो सकता लेकिन - 1. परीक्षा में साक्षी और साथीपन की स्मृति स्वरूप द्वारा फुल पास होना वा पास होना वा मजबूरी से पास होना इसमें अन्तर हो जाता है। 2. बड़ी परीक्षा को छोटा समझना वा छोटी-सी बात को बड़ा समझना,इसमें अन्तर हो जाता है। 3. कोई छोटी-सी बात को ज्यादा सिमरण, वर्णन और वातावरण में फैलाए इससे भी छोटे को बड़ा कर देते हैं। और कोई फिर बड़ी बात को भी चेक किया और साथ-साथ चेन्ज किया और सदा के लिए कमजोर बात को फुल स्टाप लगा देते हैं! फुल स्टाप लगाना अर्थात् फिर से भविष्य के लिए फुल स्टाक जमा करना। आगे के लिए फुल पास के अधिकारी बनना। तो ऐसे बहुतकाल की चढ़ती कला के तकदीरवान बन जाते हैं। तो समझा जीवन कहानी की विशेषता क्या रखनी है? इससे सदा आपकी विशेष जीवन कहानी हो जायेगी! जैसे कोई की जीवन कहानी विशेष प्रेरणा दिलाती है, उत्साह बढ़ाती है, हिम्मत बढ़ाती है, जीवन के रास्ते को स्पष्ट अनुभव कराती है, ऐसे आप हर विशेष आत्मा की जीवन कहानी अर्थात् जीवन का हर कर्म अनेक आत्माओं को ऐसे अनुभव करावे। सबके मुख से, मन से यही आवाज निकले कि जब निमित्त आत्मा यह कर सकती है तो हम भी करें। हम भी आगे बढ़ेंगे। हम भी सभी को आगे बढ़ायेंगे,ऐसी प्रेरणा योग्य विशेष जीवन कहानी सदा बनाओ। समझा - क्या करना है? अच्छा-
आज तो डबल विदेशियों के मिलने का दिन है। एक तरफ है विदेशियों का और दूसरे तरफ है फिर बहुत नजदीक वालों (मधुबन निवासियों) का! दोनों का विशेष मिलन है। बाकी तो सब गैलरी में देखने के लिए आये हैं इसलिए बापदादा ने आये हुए सब बच्चों का रिगार्ड रख मुरली भी चलाई। अच्छा-
सदा मिलन-सीजन के सार को जीवन में लाने वाले, विशेष ईशारों को अपने जीवन का सदाकाल का वरदान समझ, वरदानी मूर्त बनने वाले, सुनना अर्थात् बनना,मिलना अर्थात् समान बनना - इसी स्लोगन को सदा स्मृति स्वरूप में लाने वाले,स्नेह का रिटर्न सदा निर्विघ्न बनाने का सहयोग देने वाले, सदा अनुभवी मूर्त बन सर्व में अनुभवों की विशेषता भरने वाले, ऐसे सदा बाप समान सम्पन्न, श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।''
दीदी जी के साथ:- सभी बाप की निमित्त बनी हुई भुजायें अपना-अपना कार्य यथार्थ रूप में कर रहीं हैं? यह सभी भुजायें हैं ना? तो सभी राइट हैण्ड हैं वा कोई लेफ्ट हैण्ड भी है?जो स्वयं को ब्राह्मण कहलाते हैं,ऐसे ब्राह्मण कहलाने वाले सब राइट हैण्ड हैं या ब्राह्मणों में ही कोई लेफ्ट हैण्ड हैं, कोई राइट हैण्ड हैं? (ब्राह्मण कभी राइट हैण्ड बन जाते कभी लेफ्ट हैण्ड) तो भुजायें भी बदली होती हैं क्या? वैसे तो रावण के शीश दिखाते हैं अभी-अभी उड़ा, अभी-अभी आ गया। लेकिन ब्राह्मणों में भी ब्रह्मा की भुजायें बदली होती रहती हैं क्या?ऐसे तो फिर रोज भुजायें बदलती होंगी?
वास्तव में ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी कहलाते तो सब हैं लेकिन अन्दर में वह स्वयं महसूस करते हैं कि हम प्रत्यक्षफल खाने वाले नहीं है, मेहनत का फल खाने वाले हैं। यह भी अन्तर है ना। कोई प्रत्यक्षफल खाने वाले हैं और कोई मेहनत का फल खाने वाले हैं। बहुत मेहनत की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ दृढ़ संकल्प और श्रीमत - इसी आधार पर हर संकल्प और कर्म करते चले तो मेहनत की कोई बात ही नहीं। इन दोनों ही आधार पर न चलने के कारण जैसे गाड़ी पटरी से उतर जाती है फिर बहुत मुश्किल होता है। अगर गाड़ी पटरी पर चल रही है तो कोई मेहनत नहीं,इंजन चला रहा है, वह चल रही है। तो इन दोनों आधार में से, चाहे दृढ़ संकल्प,चाहे श्रीमत इनमें से एक की भी कमज़ोरी है तो एक पटरी हो गई। कोई श्रीमत पर चले,बहुत अटेन्शन रखे लेकिन दृढ़ संकल्प की कमज़ोरी हो तो इसकी रिजल्ट क्या होगी? मेहनत का फल खायेंगे। ऐसे मेहनत का फल खाने वाले भी क्षत्रिय'की लाइन में आ गये। जब भी उनसे कोई बात पूछो तो मेहनत या मुश्किल की बात ही सुनायेंगे। जैसे सुनाया था एक बात को निकालते तो दूसरी आ जाती,चूहे को निकालते तो बिल्ली आ जाती,बिल्ली को निकालते तो - कुत्ता आता… ऐसे निकालने में ही लगे रहते हैं। तीन धर्म साथ-साथ स्थापन हो रहे हैं ना, ब्राह्मण,देवता और क्षत्रिय। तो तीनों ही प्रकार के दिखाई देंगे ना। कईयों का तो जन्म ही बहुत मेहनत से हुआ है। और कइयों ने बचपन से ही मेहनत करना आरम्भ किया है। यह भी भिन्न-भिन्न तकदीर की लकीरें हैं। कोई से पूछेंगे तो कहेंगे हमने शुरू से कोई मेहनत नहीं की। श्रीमत पर चलना है, योगी बनना है यह स्वतः लक्ष्य स्वरूप हो गया। ऐसे नहीं,अलबेले होंगे लेकिन स्वतः स्वरूप बन करके चलते हैं। अलबेले भी मेहनत नहीं महसूस करते हैं लेकिन वह है उल्टी बात! उसका फिर भविष्य नहीं बनता है। बाप समान प्राप्ति का अनुभव नहीं करते हैं। बाकी जन्म से अलबेले - बस खाया, पिया और अपनी पवित्र जीवन बिताई,नियम-प्रमाण चलने वाले लेकिन - धारणा को जीवन में लाने वाले नहीं। उनका भी यहाँ नेमीनाथ के रूप में गायन होता है। तो कई सिर्फ नेमीनाथ भी हैं। योग में,क्लास में आयेंगे सबसे पहले। लेकिन पाया क्या? कहेंगे हाँ सुन लिया। आगे बढ़ना-बढ़ाना वह लक्ष्य नहीं होगा। सुन लिया मजा आ गया, ठीक है। आया, गया,चला, खाया - ऐसे को कहेंगे - नेमीनाथ। फिर भी ऐसों की भी पूजा होती है। इतना तो करते हैं कि नियम प्रमाण चल रहे हैं। उसका भी फल - पूज्य बन जाते हैं। बरसात में अनन्य नहीं आयेंगे लेकिन वह जरूर आयेंगे। फिर भी पवित्र रहते हैं इसलिए पूज्य जरूर बन जाते हैं। ऐसे भी तो चाहिए ना। दस वर्ष भी हो जायेंगे - तो भी अगर उनसे कोई बात पूछते तो पहले दिन का उत्तर होगा वही 10 वर्ष के बाद भी देंगे। अच्छा-
अभी बापदादा वतन में बहुत चिटचैट करते हैं। दोनों स्वतंत्र आत्मायें हैं। सेवा तो सेकण्ड में किया, सर्व को अनुभव कराया फिर आपस में क्या करेंगे?रूह-रूहान करते रहते हैं। ब्रह्मा बाप की यही जन्म के पहले दिन की आशा थी। कौन-सी?सदा यह फखुर और नशा रहा - कि मैं भी बाप समान जरूर बनूँगा। आदि के ब्रह्मा के बोल याद हैं? आ रहा हूँ,समा रहा हूँ,''यही सदा नशे के बोल जन्म के संकल्प और वाणी में रहे। तो यही आदि के बोल अब कार्य समाप्त कर जो लक्ष्य रखा है उसी लक्ष्य रूप में समा गये। पहले अर्थ मालूम नहीं था लेकिन बनी हुई भावी पहले से बोल रही थी। और लास्ट में क्या देखा?बाप समान व्यक्त के बन्धन को कैसे छोड़ा! साँप के समान पुरानी खाल छोड़ दी ना! और कितने में खेल हुआ? घड़ियों का ही खेल हुआ ना। इसको कहा जाता है बाप समान व्यक्त भाव को भी सहज छोड़ नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप'। यह संकल्प भी उठा - मैं जा रहा हूँ, क्या हो रहा है! बच्चे सामने हैं लेकिन देखते भी नहीं देखा। सिर्फ लाइट-माइट, समानता की दृष्टि देते उड़ता पंछी उड़ गया। ऐसे ही अनुभव किया ना! कितनी सहज उड़ान हुई, जो देखने वाले देखते रहे और उड़ने वाला उड़ गया। इसको कहा जाता है - आदि में यही बोल और अन्त में वह स्वरूप हो गया। ऐसे ही फालो फादर। अच्छा-''
डबल विदेशियों के साथ
सभी स्नेही और सहयोगी आत्मायें हो ना! स्नेह के कारण बाप को पहचाना और सहयोगी आत्मा हो गये। तो स्नेही और सहयोगी हो, सेवा का उमंग उत्साह सदा रहना है लेकिन बाकी क्या रह गया? स्नेही-सहयोगी के साथ सदा शक्ति स्वरूप। शक्तिशाली आत्मा सदा विघ्न-विनाशक होगी और जो विघ्न विनाशक होंगे वह स्वतः ही बाप के दिलतख्तनशीन होंगे। तख्त से नीचे लाने वाली है ही माया का कोई-न-कोई विघ्न। तो जब माया ही नहीं आयेगी तो फिर सदा तख्तनशीन रहेंगे। उसके लिए सदा अपने को कम्बाइन्ड समझो। हर कर्म में भिन्न-भिन्न सम्बन्ध से साथ का अनुभव करो। तो सदा साथ में रहेंगे, सदा शक्तिशाली भी रहेंगे और सदा अपने को रमणीक भी अनुभव करेंगे। किसी भी प्रकार का अकेलापन नहीं महसूस करेंगे क्योंकि भिन्न-भिन्न सम्बन्ध में साथ रहने वाले सदा रमणीक और खुशी का अनुभव करते हैं। वैसे भी जब सदा एक ही बात होती है, एक ही बात रोज-रोज सुनो वा करो तो दिल उदास हो जाती है। तो यहाँ भी बाप के साथ भिन्न-भिन्न सम्बन्धों का अनुभव करने से सदा उमंग उत्साह बना रहेगा। सिर्फ बाप है,मैं बच्चा हूँ यह नहीं,भिन्न-भिन्न सम्बन्ध का अनुभव करो। तो जैसे मधुबन में आने से ही अपने को मनोरंजन में अनुभव करते हो और साथ का अनुभव करते हो ऐसे ही अनुभव करेंगे कि पता नहीं दिन से रात,रात से दिन कैसे हुआ? वेसे भी विदेशी लोग चेन्ज पसन्द करते हैं। तो यहाँ भी एक द्वारा भिन्न-भिन्न अनुभव करने का बहुत अच्छा चांस है।
महावीर की विशेषता - सदा एक बाप दूसरा न कोई
सदा अपने को महावीर समझते हो? महावीर की विशेषता - एक राम के सिवाए और कोई याद नहीं! तो सदा एक बाप दूसरा न कोई ऐसी स्मृति में रहने वाले सदा महावीर'। सदा विजय का तिलक लगा हुआ हो। जब एक बाप दूसरा न कोई तो अविनाशी तिलक रहेगा। संसार ही बाप बन गया। संसार में व्यक्ति और वस्तु ही होती,तो सर्व सम्बन्ध बाप से तो व्यक्ति आ गये और वस्तु,वह भी सर्व प्राप्ति बाप से हो गई। सुख-शान्ति-ज्ञान-आनन्द-प्रेम… सर्व प्राप्तियाँ हो गई। जब कुछ रहा ही नहीं तो बुद्धि और कहाँ जायेगी,कैसे? अच्छा-