Avyakt murli for Saturday 15 January 1983
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15-01-83 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
सहजयोगी और प्रयोगी की व्याख्या
सदा सहजयोगी की स्थिति में स्थित करने वाले सुख के सागर शिव बाबा बोले :-
आज बाप दादा अपने सहयोगी भुजाओं को देख रहे हैं। कैसे मेरी सहयोगी भुजायें श्रेष्ठ कार्य को सफल बना रही हैं। हर भुजा के दिव्य अलौकिक कार्य की रफतार को देख बापदादा हर्षित हो रूहरिहान कर रहे थे। बापदादा देखते रहते हैं कि कोई-कोई भुजायें सदा अथक और एक ही श्रेष्ठ उमंग और उत्साह और तीव्रगति से सहयोगी हैं और कोई-कोई कार्य करते रहते लेकिन बीच-बीच में उमंग उत्साह की तीव्रगति में अन्तर पड़ जाता है। लेकिन सदा अथक तीव्रगति वाली भुजाओं के उमंग उत्साह को देखते-देखते स्वयं भी फिर से तीव्रगति से कार्य करने लग पड़ते हैं। एक दो के सहयोग से गति को तीव्र बनाते चल रहे हैं।
बापदादा आज तीन प्रकार के बच्चे देख रहे थे। एक सदासहज योगी। दूसरे हर विधि को बार-बार प्रयोग करने वाले प्रयोगी। ताrसरे सहयोगी। वैसें हैं तीनों ही योगी लेकिन भिन्न-भिन्न स्टेज के हैं। सहजयोगी, समीप सम्बन्ध औरसर्व प्राप्ति के कारण सहज योग का सदा स्वतः अनुभव करता है। सदा समर्थ स्वरूप होने के कारण इसी नशे में सदा अनुभव करता कि मैं हूँ ही बाप का। याद दिलाना नहीं पड़ता स्वयं को मैं आत्मा हूँ,मैं बाप का बच्चा हूँ। मैं हूँ हीसदा अपने कोइस अनुभव के नशे में प्राप्ति स्वरूप नैचुरल निश्चय करता है। सहयोगी को सर्व सिद्धियाँ स्वतः ही अनुभव होती हैं। इसलिए सहजयोगी सदा ही श्रेष्ठ उमंग उत्साह खुशी में एकरस रहता है। सहजयोगी सर्व प्राप्तियों के अधिकारी स्वरूप में सदा शक्तिशाली स्थिति में स्थित रहते हैं।
प्रयोग करने वाले प्रयोगी सदा हर स्वरूप के, हर पाइंट के, हर प्राप्ति स्वरूप के प्रयोग करते हुए उस स्थिति को अनुभव करते हैं। लेकिन कभी सफलता का अनुभव करते,कभी मेहनत अनुभव करते। लेकिन प्रयोगी होने के कारण, बुद्धि अभ्यास की प्रयोगशाला में बिजी रहने के कारण 75% माया से सेफ रहते हैं। कारण? प्रयोगी आत्मा को शौक रहता है कि नये ते नये भिन्नभिन्न अनुभव करके देखे। इसी शौक में लगे रहने के कारण माया से प्रयोगशाला में सेफ रहते हैं। लेकिन एकरस नहीं होते। कभी अनुभव होने के कारण बहुत उमंग उत्साह में झूमते और कभी विधि द्वारा सिद्धि की प्राप्ति कम होने के कारण उमंग उत्साह में फर्क पड़ जाता है। उमंग उत्साह कम होने के कारण मेहनत अनुभव होती है। इसलिए कभी सहजयोगी, कभी मेहनत वाले योगी। हूँ ही के बजाय हूँ हूँ। आत्मा हूँ बच्चा हूँ, मास्टर सर्व शक्तिवान हूँ - इस स्मृति द्वारा सिद्धि को पाने का बार-बार प्रयत्न करना पड़ता है। इसलिए कभी तो इस स्टेज परस्थित होते जो सोचा और अनुभव हुआ। कभी बार-बार सोचने द्वारा स्वरूप की अनुभूति करते हैं। इसको कहा जाता है - प्रयोगी आत्मा। अधिकार का स्वरूप है सहजयोगी। बार-बार अध्ययन करने का स्वरूप है प्रयोगी आत्मा। तो आज देख रहे थे- सहज योगी कौन और प्रयोगी कौन है? प्रयोगी भी कभी कभी सहजयोगी बन जाते है। लेकिन सदा नहीं। जिस समय जो पोजीशन होती है, उसी प्रमाण स्थूल चेहरे के पोज़ भी बदलते है। मन की पोजीशन को भी देखते हैं। और पोज़ को भी देखते हैं। सारे दिन में कितनी पोज़ बदलते हो। अपने भिन्न-भिन्न पोज़ को जानते हो? स्वयं को साक्षी होकर देखते हो?बापदादा सदा यह बेहद का खेल जब चाहे तब देखते रहते हैं।
जैसे यहाँ लौकिक दुनिया में एक के ही भिन्न-भिन्न पोज़ हंसी के खेल में स्वयं ही देखते हैं। विदेश में यह खेल होता है? यहाँ प्रैक्टिकल में ऐसा खेल तो नहीं करते हो ना। यहाँ भी कभी बोझ के कारण मोटे बन जाते हैं और कभी फिर बहुत सोंचने के संस्कार के कारण अन्दाज से भी लम्बे हो जाते हैं और कभी फिर दिलशिकस्त होने के कारण अपने को बहुत छोटा देखते हैं। कभी छोटे बन जाते, कभी मोटे बन जाते,कभी लम्बे बन जाते हैं। तो ऐसा खेल अच्छा लगता है?
सभी डबल विदेशी सहजयोगी हो? आज के दिन का सहज योगी का चार्ट रहा? सिर्फ प्रयोग करने वाले प्रयोगी तो नहीं हो ना। डबल विदेशी मधुबन से सदाकाल के लिए सहजयोगी रहने का अनुभव लेकर जा रहे हो? अच्छा - सहयोगी भी योगी हैं इसका फिर सुनायेंगे।
(सभी टीचर्स नीचे हाल में मुरली सुन रही थीं)
बापदादा के साथ निमित्त सेवाधारी कहो, निमित्त शिक्षक कहो तो आज साथियों का ग्रुप भी आया हुआ है ना। छोटे तो और ही अति प्रिय होते हैं। नीचे होते भी सब ऊपर ही बैठे हैं। बापदादा छोटे वा बड़े लेकिन हिम्मत रखने वाले सेवा के क्षेत्र में स्वयं को सदा बिजी रखने वाले सेवाधारियों को बहुत बहुत यादप्यार दे रहे हैं। इसलिए त्यागी बन अनेकों के भाग्य बनाने के निमित्त बनाने वाले सेवाधारियों को बापदादा त्याग की विशेष आत्मायें देख रहे हैं। ऐसी विशेष आत्माओं को विशेष रूप से बधाई के साथ-साथ यादप्यार। डबल कमाल कौन सी है? एक तो बाप को जानने की कमाल की। दूरदेश,धर्म का पर्दा रीति रसम, खान-पान सबकी भिन्नता के पर्दे के बीच रहते हुए भी बाप को जान लिया। इसलिए डबल कमाल। पर्दे के अन्दर छिप गये थे। सेवा के लिए अब जन्म लिया है। भूल नहीं की लेकिन ड्रामा अनुसार सेवा के निमित्त चारों ओर बिखर गये थे। नहीं तो इतनी विदेशों में सेवा कैसे होती। सिर्फ सेवा के कारण अपना थोड़े समय का नाम मात्र हिसाब किताब जोड़ा,इसलिए डबल कमाल दिखाने वाले सदा बाप के स्नेह के चात्रक, सदा दिल से मेरा बाबा के गीत गाने वाले, जाना है,जाना है, 12मास इसी धुन में रहने वाले,ऐसे हिम्मत कर बाप दादा के मददगार बनने वाले बच्चों को यादप्यार औ नमस्ते।
सेवाधारी भाई बहनों से :-महायज्ञ की महासेवा का प्रसाद खाया? प्रसाद तो कभी भी कम होने वाला नहीं है। ऐसा अविनाशी महाप्रसाद प्राप्त किया?कितना वैरयटी प्रसाद मिला?सदाकाल के लिए खुशी, सदा के लिए नशा,अनुभूति ऐसे सर्व प्रकार का प्रसाद पाया? तो प्रसाद बांटकर खाया जाता है। प्रसाद आंखों के ऊपर, मस्तक के ऊपर रखकर खाते हैं। तो यह प्रसाद ऑखों मे समा जाए। मस्तक में स्मृति स्वरूप हो जाए अर्थात् समा जाए। ऐसा प्रसाद इस महायज्ञ में मिला?महाप्रसाद लेने वाले कितने महान भाग्यवान हुए ऐसे चान्स कितनों को मिलता है? बहुत थोड़ों को उन थोड़ो में से आप हो। तो महान भाग्यवान हो गये ना। जैसे यहाँ बाप और सेवा इसके सिवाए तीसरा कुछ भी याद नहीं रहा, तो यहाँ का अनुभव सदा कायम रखना है। वैसे भी कहाँ जाते हैं तो विशेष वहाँ से कोई न कोई यादगार ले जाते हैं, तो मधुबन का विशेष यादगार क्या ले जायेंगे? निरन्तर सर्व प्राप्ति स्वरूप हो रहेंगे। तो वहाँ भी जाकर ऐसे ही रहेंगे या कहेंगे वायुमण्डल ऐसा था, संग ऐसा था। परिवर्तन भूमि से परिवर्तन होकर जाना। कैसा भी वायुमण्डल हो लेकिन आप अपनी शक्ति से परिवर्तन कर लो। इतनी शक्ति है ना। वायुमण्डल का प्रभाव आप पर न आवे। सभी सम्पन्न बन करके जाना।
माताओं के साथ -माताओं के लिए तो बहुत खुशी की बात हैं - क्योंकि बाप आया ही है माताओं के लिए। गऊपाल बनकर गऊ माताओं के लिए आये हैं। इसी का तो यादगार गाया हुआ है। जिसको किसी ने भी योग्य नहीं समझा लेकिन बाप ने योग्य आपको ही समझा - इसी खुशी में सदा उड़ते चलो। कोई दुःख की लहर आ नहीं सकती। क्योंकि सुख के सागर के बच्चे बन गये। सुख क सागर में समाने वालों को कभी दुःख की लहर नहीं आ सकती है - ऐसे सुख स्वरूप।