Daily Murli for Thursday 30 November 2023
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30-11-2023 प्रातःमुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम्हें रूहानी पण्डा बन यात्रा करनी और करानी है, याद ही तुम्हारी यात्रा है, याद करते रहो तो खुशी का पारा चढ़े''
प्रश्न:- निराकारी दुनिया में जाते ही कौन-से संस्कार समाप्त हो जाते और कौन से संस्कार रह जाते हैं?
उत्तर:- वहाँ नॉलेज के संस्कार समाप्त हो जाते, प्रालब्ध के संस्कार रह जाते हैं। जिन संस्कारों के आधार पर तुम बच्चे सतयुग में प्रालब्ध भोगते हो, वहाँ फिर पढ़ाई का वा पुरुषार्थ का संस्कार नहीं रहता है। प्रालब्ध मिल गई फिर ज्ञान ख़त्म हो जाता है।
गीत:- रात के राही थक मत जाना…
ओम् शान्ति। यहाँ सम्मुख शिव भगवानुवाच है। गीता में दिखाते हैं - श्रीकृष्ण भगवानुवाच परन्तु श्रीकृष्ण तो उस नाम-रूप से सम्मुख हो न सके। यह तो सम्मुख कहते हैं, निराकार भगवानुवाच। श्रीकृष्णवाच कहें तो वह साकार हो जाता है। जो भी वेद-शास्त्र आदि सुनाते हैं, वह ऐसे नहीं कहेंगे कि भगवानुवाच क्योंकि वह साधू, सन्त, महात्मा आदि सब साकार में बैठे हैं। और फिर बाप कहते हैं - हे रूहानी राही। रूहानी बाप जरूर रूहों को ही कहेंगे कि बच्चे, थक मत जाना। यात्रा पर कई थक जाते हैं तो फिर वापस आ जाते हैं। वह है जिस्मानी यात्रा। भिन्न-भिन्न मन्दिरों में जिस्मानी तीर्थ यात्रा करने जाते हैं। कोई शिव के मन्दिर में जाते हैं, वहाँ सब जिस्मानी चित्र रखे हैं भक्ति मार्ग के। यह तो सुप्रीम रूह परमपिता परमात्मा आत्माओं को कहते हैं कि हे बच्चे, अब मुझ एक के साथ बुद्धि का योग लगाओ और ज्ञान भी देते हैं। तीर्थों पर जाते हैं तो वहाँ भी ब्राह्मण लोग बैठे हैं, कथा-कीर्तन करते हैं। तुम्हारी तो एक ही सत्य नारायण की कथा है, नर से नारायण बनने की। तुम जानते हो पहले स्वीट होम में जायेंगे फिर विष्णुपुरी में आयेंगे। इस समय तुम हो ब्रह्मापुरी में, इसको पियरघर कहा जाता है। तुमको जेवर आदि कुछ नहीं हैं क्योंकि तुम पियरघर में हो। तुम जानते हो ससुरघर में हमको अपार सुख मिलने हैं। यहाँ कलियुगी ससुरघर में तो अपार दुःख हैं। तुमको तो जाना है उस पार सुखधाम में। यहाँ से ट्रांसफर होना है। बाप सभी को नयनों पर बिठाकर ले जाते हैं। दिखाते हैं ना श्रीकृष्ण का बाप उनको टोकरी में बिठाकर उस पार ले गया तो यह बेहद का बाप तुम बच्चों को उस पार ससुरघर ले जाते हैं। पहले अपने निराकारी घर में ले जायेंगे फिर ससुरघर भेज देंगे। तो वहाँ यह सब पियरघर, ससुरघर की बातें भूल जायेंगी। वह है निराकारी पियरघर, वहाँ यह नॉलेज भूल जाती है, नॉलेज के संस्कार निकल जाते हैं, बाकी प्रालब्ध के संस्कार रह जाते हैं। फिर तुम बच्चों को प्रालब्ध ही ध्यान में रहती है। प्रालब्ध अनुसार जाकर सुख के जन्म लेंगे। सुखधाम जाना है। प्रालब्ध मिल गई फिर ज्ञान ख़त्म। तुम जानते हो प्रालब्ध में हमारी फिर वही एक्ट चलेगी। तुम्हारे संस्कार ही प्रालब्ध के हो जायेंगे। अभी हैं पुरुषार्थ के संस्कार। ऐसे नहीं कि पुरुषार्थ और प्रालब्ध दोनों संस्कार वहाँ रहेंगे। नहीं, वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता। तो यह तुम्हारी रूहानी यात्रा है, तुम्हारा चीफ पण्डा है बाप। यूं तो तुम भी रूहानी पण्डे बन जाते हो, सबको साथ में ले जाते हो। वह हैं जिस्मानी पण्डे, तुम हो रूहानी पण्डे। वह लोग अमरनाथ पर बड़े धूमधाम से जाते हैं, झुण्ड के झुण्ड ख़ास अमरनाथ पर बहुत धूमधाम से जाते हैं। बाबा ने देखा है कितने साधू-सन्त बाजे गाजे ले जाते हैं। साथ में डॉक्टर आदि भी ले जाते हैं क्योंकि ठण्डी का समय होता है। कई बीमार पड़ जाते हैं। तुम्हारी यात्रा तो बहुत सहज है। बाप कहते हैं याद में रहना ही तुम्हारी यात्रा है। याद मुख्य है। बच्चे याद करते रहें तो खुशी का पारा चढ़ा रहे। साथ में औरों को भी यात्रा पर ले जाना है। यह यात्रा एक ही बार होती है। वह जिस्मानी यात्रायें तो भक्ति मार्ग से शुरू होती हैं। वह भी कोई शुरूआत में नहीं होती। ऐसे नहीं कि फट से मन्दिर, चित्र आदि बन जाते हैं। वह तो आहिस्ते-आहिस्ते बाद में बनते जाते हैं। पहले-पहले शिव का मन्दिर बनेगा। वह भी पहले घर में सोमनाथ का मन्दिर बनाते हैं तो फिर कहाँ जाने की दरकार नहीं रहती। यह मन्दिर आदि बाद में बनते हैं, समय लगता है। आहिस्ते-आहिस्ते नये शास्त्र, नये चित्र, नये मन्दिर आदि बनते रहते। टाइम लगता है क्योंकि पढ़ने वाले भी चाहिए ना। मठ आदि जब वृद्धि को पायेंगे, फिर विचार होगा शास्त्र बनायें। तो इतने तीर्थस्थान बनें, मन्दिर बनें, चित्र बनें, टाइम लगता है ना। भल कहा जाता है कि भक्ति मार्ग द्वापर से शुरू होता है परन्तु टाइम तो लगता है ना। फिर कलायें कमती होती जायेंगी। पहले अव्यभिचारी भक्ति, फिर व्यभिचारी भक्ति हो जाती है। यह सब बातें अच्छी रीति चित्रों पर सिद्ध कर बताई जाती हैं। समझाने वालों की बुद्धि में यही चलता रहेगा कि ऐसे-ऐसे चित्र बनायें, यह समझायें। सबकी बुद्धि में नहीं चलेगा। नम्बरवार है ना। कोई की बुद्धि बिल्कुल चलती नहीं, वह फिर पद भी ऐसे पायेंगे। मालूम पड़ जाता है - यह क्या बनेंगे? जितना आगे चलेंगे - तुम समझते जायेंगे। जब लड़ाई आदि लगेगी फिर प्रैक्टिकल देख लेंगे। फिर बहुत पछतायेंगे। उस समय पढ़ाई तो हो न सके। लड़ाई के समय त्राहि-त्राहि होती रहेगी, सुन नहीं सकेंगे। पता नहीं क्या हो जायेगा। पार्टीशन हुआ तो क्या हो गया, देखा ना। यह विनाश का समय बहुत कड़ा है। हाँ, बाकी साक्षात्कार आदि बहुत होंगे, जिससे जान जायेंगे कि यह कितना पढ़ा है। बहुत पछतायेंगे भी और साक्षात्कार होंगे - देखो तुमने पढ़ाई छोड़ दी तब यह हाल हुआ है। धर्मराज साक्षात्कार कराने सिवाए सजायें कैसे देंगे? सब साक्षात्कार करायेंगे। फिर उस समय कर कुछ नहीं सकेंगे। कहेंगे हाय तकदीर। तदबीर का समय तो गया। तो बाप कहते हैं क्यों नहीं अभी पुरुषार्थ करते हो। सर्विस से ही दिल पर चढ़ेंगे। बाप कहेंगे यह बच्चे अच्छी सर्विस करते हैं। मिलेट्री का कोई मरता है तो उनके मित्र-सम्बन्धियों आदि को भी इनाम देते हैं। यहाँ तुमको इनाम देने वाला है बेहद का बाप। बाप से भविष्य 21 जन्मों के लिए इनाम मिलता है। यह तो हरेक को अपनी दिल पर हाथ रख पूछना है कि मैं कितना पढ़ता हूँ। धारणा नहीं होती तो गोया तकदीर में नहीं है। कहेंगे कर्म ही ऐसे फूटे हुए हैं। बहुत खराब कर्म करने वाले कुछ उठा नहीं सकते हैं।
बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, तुम्हें इस रूहानी यात्रा पर अपने साथियों को भी ले जाना है। फ़र्ज है हरेक को यह यात्रा की बात बताना। बोलो, हमारी यह रूहानी यात्रा है। वह है जिस्मानी। दिखाते हैं रंगून की तरफ एक छम-छम तलाव है, जहाँ स्नान करने से परी बन जाते हैं। लेकिन वह परी आदि तो बनते नहीं। यह है ज्ञान स्नान करने की बात, जिससे फिर तुम बहिश्त की बीबी बन जाते हो और ज्ञान-योगबल से वैकुण्ठ में आना-जाना तो तुम्हारे लिए कॉमन बात है। और ही तुमको रोका जाता है, घड़ी-घड़ी ध्यान में नहीं जाओ, आदत पड़ जायेगी। तो यह ज्ञान मान-सरोवर है, परमपिता परमात्मा आकर इस मनुष्य तन द्वारा ज्ञान सुनाते हैं, इसलिए इनको मान-सरोवर कहा जाता है। मान-सरोवर अक्षर सागर से निकला है। ज्ञान सागर में ज्ञान स्नान करना तो बहुत अच्छा है। बहिश्त की बीबी को महारानी कहा जाता है। बाप कहेंगे तुम भी बहिश्त के मालिक बनो। बच्चों पर लव रहता है। हरेक पर रहम पड़ता है, साधुओं पर भी रहम आता है। यह तो गीता में लिखा हुआ है कि साधुओं का भी उद्धार करते हैं। उद्धार होता है - ज्ञान योग से। तुम बच्चों में समझाने की बड़ी फुर्ती चाहिए। बोलो - तुम और तो सब जानते हो लेकिन छांछ जानते हो, बाकी मक्खन खिलाने वाले को तुम जानते ही नहीं हो। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। परन्तु किसकी बुद्धि में भी बैठे ना। बाप को जानने से मनुष्य हीरे जैसा बनते हैं, न जानने से मनुष्य कौड़ी मिसल, बिल्कुल पतित हैं। बाप को जानने से ही पावन बनते हैं। पतित दुनिया में कोई पावन हो न सके। तो जो महारथी बच्चे हैं, वह अच्छी रीति समझा सकेंगे। कितने ढेर ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। प्रजापिता ब्रह्मा नाम भी मशहूर है। प्रजापिता ब्रह्मा के यह हैं मुख वंशावली। ब्रह्मा को ही 100 भुजा, 1000 भुजा दिखाते हैं। यह भी समझाया जाता है इतनी भुजायें तो हो नहीं सकती। बाकी ब्रहमा तो बहुत बचड़े वाला है। ब्रह्मा फिर किसका बच्चा? इनका तो बाप है ना। ब्रह्मा है शिवबाबा का बच्चा। इनका और कौन बाप हो सकता? मनुष्य तो कोई हो नहीं सकता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर गाये जाते हैं सूक्ष्मवतन के। वह तो यहाँ आ न सकें। प्रजापिता ब्रह्मा तो जरूर यहाँ होगा ना। सूक्ष्मवतन में तो प्रजा नहीं रचेंगे। तो परमपिता परमात्मा आकर इस ब्रह्मा मुख द्वारा शक्ति सेना रचते हैं। पहले-पहले परिचय देना है हम ब्रह्मा मुख वंशावली हैं। तुम भी ब्रह्मा के बच्चे हो ना। प्रजापिता ब्रह्मा है सबका बाप। फिर उनसे और बिरादरियाँ निकलती हैं, नाम बदलते जाते हैं। अब तुम ब्राह्मण हो। प्रैक्टिकल में देखो प्रजापिता ब्रह्मा की कितनी औलाद हैं। जरूर औलाद को वर्सा मिलता होगा। ब्रह्मा के पास तो कोई प्रापर्टी है नहीं, प्रापर्टी है शिवबाबा के पास। ब्रह्मा वल्द शिव। बेहद के बाप से ही वर्सा मिलता है। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा बैठ पढ़ाते हैं। हमको दादे का वर्सा मिलता है। बाबा समझाते तो बहुत हैं, परन्तु योग नहीं। कायदे पर नहीं चलते तो बाप भी क्या करे। बाप कहते हैं इनकी तकदीर। अगर बाबा से पूछें तो बाबा बता सकते हैं - इस हालत में तुम्हारा क्या पद होगा? दिल भी गवाही देता है, मैं कितनी सर्विस करता हूँ? श्रीमत पर कहाँ तक चलता हूँ? श्रीमत कहती है मनमनाभव। सबको बाप और वर्से का परिचय देते रहते हैं, ढिंढोरा भी पीटते रहते हैं। बाबा इशारा देते रहते हैं, तुम्हें गवर्मेन्ट को भी समझाना है। जो वह भी समझें बरोबर भारत की ताकत ही चली गई है। परमपिता परमात्मा सर्वशक्तिमान से योग ही नहीं है। इनसे तुम योग लगाते हो तो एकदम विश्व के मालिक बनते हो, माया पर भी तुम जीत पहनते हो। गृहस्थ व्यवहार में रहते माया पर जीत पानी है। हमारा मददगार बाप है। कितना समझाया जाता है, धारणा करनी चाहिए। बाबा ने समझाया है धन दिये धन ना खुटे। सर्विस करेंगे तब बाबा की दिल पर चढ़ सकेंगे। नहीं तो इम्पासिबुल है। इसका मतलब यह नहीं कि बाबा प्यार नहीं करते। बाबा प्यार सर्विसएबुल को करेंगे। मेहनत करनी चाहिए। सबको यात्रा लायक बनाते हैं। मनमनाभव। यह है रूहानी यात्रा, मुझे याद करो तो तुम मेरे पास पहुँच जायेंगे। शिव पुरी में आकर फिर विष्णुपुरी में चले जायेंगे। यह बातें सिर्फ तुम बच्चे जानते हो। कोई और मनमनाभव का अर्थ समझते नहीं, पढ़ते तो बहुत हैं। बाप महामंत्र देते हैं, मुझे याद करो तो तुम विकर्मा-जीत बन जायेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान स्नान करना है। प्यार से सर्विस कर बाप के दिलतख्त पर बैठना है। पुरुषार्थ के समय में अलबेला नहीं बनना है।
2) बाप की पलकों पर बैठ कलियुगी दुःखधाम से सुखधाम चलना है इसलिए अपना सब कुछ ट्रांसफर कर देना है।
वरदान:- जीवन में दिव्यगुणों के फूलों की फुलवाड़ी द्वारा खुशहाली का अनुभव करने वाले एवरहैप्पी भव
सदा खुशहाल अर्थात् भरपूर, सम्पन्न। पहले कांटों के जंगल में जीवन थी अभी फूलों की खुशहाली में आ गये। सदा जीवन में दिव्यगुणों के फूलों की फुलवाड़ी लगी हुई है, इसलिए जो भी आपके सम्पर्क में आयेगा उसे दिव्य-गुणों के फूलों की खुशबू आती रहेगी और खुशहाली देख करके खुश होंगे, शक्ति का अनुभव करेंगे। खुशहाली औरों को भी शक्तिशाली बनाती और खुशी में लाती है इसलिए आप कहते हो कि हम एवरहैप्पी हैं।
स्लोगन:- मास्टर सर्वाशक्तिमान् वह हैं जो माया के बुदबुदों से डरने के बजाए उनसे खेलने वाले हैं।