Daily Murli for Thursday 18 September 2025
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18-09-2025 प्रातःमुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - जब तुम फूल बनेंगे, तब यह भारत काँटों के जंगल से सम्पूर्ण फूलों का बगीचा बनेगा, बाबा आया है तुम्हें फूल बनाने''
प्रश्न:- मन्दिर लायक बनने के लिए किन बातों पर विशेष ध्यान देना है?
उत्तर:- मन्दिर लायक बनना है तो चलन पर विशेष ध्यान दो - चलन बहुत मीठी और रॉयल होनी चाहिए। इतना मीठापन हो जो दूसरों को उसकी महसूसता आये। अनेकों को बाप का परिचय दो। अपना कल्याण करने के लिए अच्छी रीति पुरुषार्थ कर सर्विस पर लगे रहो।
गीत:- बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम…
ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाप ब्रह्मा द्वारा समझा रहे हैं। ब्रह्मा के रथ द्वारा ही समझाते रहते हैं। हम यह प्रतिज्ञा करते हैं कि श्रीमत पर हम इस भारत की भूमि को पतित से पावन बनायेंगे। भारत खास और दुनिया आम, सबको हम पतित से पावन बनने का रास्ता बताते हैं। इतने ख्यालात हर एक को अपनी बुद्धि में रखना है। बाप कहते हैं ड्रामा अनुसार जब तुम फूल बन जायेंगे और जब समय आ जायेगा तो सम्पूर्ण बगीचा बन जायेगा। बागवान भी निराकार को कहा जाता है, माली भी निराकार को कहा जाता है, साकार को नहीं। माली भी आत्मा है, न कि शरीर। बागवान भी आत्मा है। बाप समझायेंगे तो जरूर शरीर द्वारा ना। शरीर के साथ ही उनको माली बागवान कहा जाता है, जो इस विश्व को फूलों का बगीचा बनाते हैं। बगीचा था जहाँ यह देवतायें रहते थे। वहाँ कोई दुःख नहीं था। यहाँ इस कांटों के जंगल में तो दुःख है, रावण का राज्य है, कांटों का जंगल है। फट से कोई फूल नहीं बनते। देवताओं के आगे जाकर गाते भी हैं कि हम जन्म-जन्मान्तर के पापी हैं, अजामिल हैं। ऐसी प्रार्थना करते हैं, अब आकर हमको पुण्य आत्मा बनाओ। समझते हैं अभी हम पाप आत्मा हैं। कोई समय पुण्य आत्मा थे। अभी इस दुनिया में पुण्य आत्माओं के सिर्फ चित्र हैं। राजधानी के हेड्स के चित्र हैं और उन्हों को ऐसा बनाने वाला निराकार है शिव। उनका चित्र है, बस। और कोई चित्र हैं नहीं। इसमें भी शिव का तो बड़ा लिंग बना देते हैं। कहते भी हैं कि आत्मा स्टार मिसल है, तो जरूर बाप भी ऐसा होगा ना। परन्तु उनकी पूरी पहचान नहीं है। इन लक्ष्मी-नारायण का विश्व में राज्य था। इनके लिए कहाँ भी कोई ग्लानि की बात नहीं लिखते। बाकी श्रीकृष्ण को कब द्वापर में, कब कहाँ ले जाते। लक्ष्मी-नारायण के लिए सब कहेंगे स्वर्ग के मालिक थे। यह है तुम्हारी एम आब्जेक्ट। राधे-कृष्ण कौन हैं - मनुष्य बिचारे एकदम मूंझे हुए हैं, कुछ नहीं समझते। जो बाप द्वारा समझते हैं, वह समझाने लायक भी बनते हैं। नहीं तो लायक बन नहीं सकते। दैवीगुण धारण कर नहीं सकते। भल कितना भी समझाओ। परन्तु ड्रामा अनुसार ऐसा होना ही है। तुम अभी खुद समझते हो हम सब बच्चे बाप की श्रीमत पर भारत की रूहानी सर्विस करते हैं अपने ही तन-मन-धन से। प्रदर्शनी अथवा म्युज़ियम आदि में पूछते हैं तुम भारत की क्या सेवा करते हो? तुम जानते हो हम भारत की बहुत अच्छी सर्विस करते हैं, जंगल से बगीचा बना रहे हैं। सतयुग है गार्डन। यह है काँटों का जंगल। एक-दो को दुःख देते रहते हैं। यह तुम अच्छी रीति समझा सकते हो। लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी बहुत अच्छा बनाना चाहिए। मन्दिरों में बहुत खूबसूरत चित्र बनाते हैं। कहाँ गोरा, कहाँ सांवरा चित्र बनाते, उनका क्या राज़ है, यह भी समझते नहीं। तुम बच्चों को अभी यह सारा ज्ञान है। बाप कहते हैं मैं आकर सबको मन्दिर लायक बनाता हूँ, परन्तु सब मन्दिर लायक नहीं बनते हैं। प्रजा को तो मन्दिर लायक नहीं कहेंगे ना। प्रजा उन्हों की होगी जो पुरुषार्थ कर बहुत सर्विस करते हैं।
तुम बच्चों को रूहानी सोशल सर्विस भी करनी है, इस सेवा में अपना जीवन सफल करना है। चलन भी बहुत मीठी सुन्दर होनी चाहिए, जो औरों को भी मीठे-पन से समझा सकें। खुद ही कांटा होगा तो किसको फूल कैसे बनायेंगे, उनका तीर पूरा लगेगा नहीं। बाप को याद नहीं करते होंगे तो तीर कैसे लगेगा। अपने कल्याण के लिए अच्छी रीति पुरुषार्थ कर सर्विस में लगे रहो। बाप भी सर्विस पर है ना। तुम बच्चे भी दिन-रात सर्विस पर रहो।
दूसरी बात, समझाते हैं शिवजयन्ती पर बहुत बच्चे तारें भेज देते हैं, उनमें भी ऐसी लिखत लिखनी चाहिए जो वह तारें किसको भी दिखायें तो समझ जाएं। आगे के लिए क्या करना है, उसका पुरुषार्थ किया जाता है। सेमीनार भी इसलिए करते हैं कि क्या-क्या सर्विस करें जो बहुतों को बाप का परिचय मिले। तारें ढेर रखी हैं, इनसे बहुत काम ले सकते हो। एड्रेस डालते हैं शिवबाबा केयरऑफ ब्रह्मा। प्रजापिता ब्रह्मा भी है, वह रूहानी पिता, वह जिस्मानी। उनसे जिस्मानी रचना रची जाती है। बाप है मनुष्य सृष्टि का रचता। कैसे रचना रचते हैं, यह दुनिया भर में कोई नहीं जानते। बाप ब्रह्मा द्वारा अब नई रचना रच रहे हैं। ब्राह्मण हैं चोटी। पहले-पहले ब्राह्मण जरूर चाहिए। विराट रूप की है यह चोटी। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। पहले शूद्र तो नहीं हो सकते। बाप ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचते हैं। शूद्र कैसे और किस द्वारा रचेंगे?
तुम बच्चे जानते हो कैसे नई रचना रचते हैं, यह एडाप्शन है बाप की। कल्प-कल्प बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं फिर ब्राह्मण से देवता बनाते हैं। ब्राह्मणों की सर्विस बहुत ऊंची है। वह ब्राह्मण लोग खुद ही पवित्र नहीं हैं तो दूसरे को पवित्र कैसे बनायेंगे। कोई भी ब्राह्मण संन्यासी को कभी राखी नहीं बांधेंगे। वह कहेंगे हम तो हैं ही पवित्र। तुम अपना मुंह देखो। तुम बच्चे भी कोई से राखी नहीं बंधवा सकते। दुनिया में तो सब एक-दो को बांधते हैं। बहन-भाई को बांधती है, यह रिवाज अभी निकला है। अभी तुम शूद्र से ब्राह्मण बनने के लिए पुरुषार्थ करते हो। समझाना पड़ता है। मेल-फीमेल दोनों पवित्रता की प्रतिज्ञा करते हैं, दोनों बता सकते हैं कि हम कैसे बाप की श्रीमत से पवित्र रहते हैं। अन्त तक इस काम विकार पर जीत रहे तो पवित्र जगत का मालिक बनेंगे। पवित्र दुनिया सतयुग को कहा जाता है, सो अब स्थापन हो रही है। तुम सब पवित्र हो। विकार में गिरने वाले को राखी बांध सकते हो। प्रतिज्ञा कर और फिर पतित बने तो कहेंगे तुम राखी बंधवाने आये थे फिर क्या हुआ? कहेंगे माया से हार खा ली, यह है युद्ध का मैदान। विकार बड़ा दुश्मन है। इन पर जीत पाने से ही जगतजीत अर्थात् राजा-रानी बनना है, प्रजा को जगतजीत नहीं कहेंगे। मेहनत तो राजा-रानी करते हैं ना। कहते भी हैं हम तो लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। लक्ष्मी-नारायण के बाद उनके तख्त पर जीत उनके बच्चे की होती है। वह लक्ष्मी-नारायण फिर दूसरे जन्म में नीचे चले जायेंगे। भिन्न नाम-रूप से बच्चे को गद्दी मिलती है तो ऊंच नम्बर गिना जायेगा। पुनर्जन्म तो लेते हैं ना। बच्चा तख्त पर बैठेगा तो वह सेकण्ड ग्रेड हो जायेगा। ऊपर वाला नीचे, नीचे वाला ऊपर आ जायेगा। तो अब बच्चों को ऐसा ऊंच बनना है तो सर्विस में लग जाना चाहिए। पवित्र होना भी बहुत जरूरी है। बाप कहते हैं मैं पवित्र दुनिया बनाता हूँ। अच्छा पुरुषार्थ थोड़े करते हैं, पवित्र तो सारी दुनिया बन जाती है। तुम्हारे लिए स्वर्ग की स्थापना करते हैं। यह ड्रामा अनुसार होना ही है, यह खेल बना हुआ है। तुम पवित्र बन जाते हो फिर विनाश शुरू हो जाता है। सतयुग की स्थापना हो जाती है। ड्रामा को तो तुम समझ सकते हो। सतयुग में था देवताओं का राज्य। अभी नहीं है फिर होना है।
तुम हो रूहानी मिलेट्री। तुम 5 विकारों पर जीत पाने से जगत जीत बनने वाले हो। जन्म-जन्मान्तर के पाप कटने लिए बाबा युक्तियाँ बताते हैं। बाप एक ही बार आकर युक्ति बताते हैं। जब तक राजधानी स्थापन न हो जाए तब तक विनाश नहीं होगा। तुम बहुत गुप्त वारियर्स हो। सतयुग होना ही है कलियुग के बाद। फिर सतयुग में कभी लड़ाई होती नहीं। तुम बच्चे जानते हो सब आत्मायें जो भी पार्ट बजाती हैं, वह सब नूंधा हुआ है। जैसे कठपुतलियाँ होती हैं ना, ऐसे नाचती रहती हैं। यह भी ड्रामा है, हर एक का इस ड्रामा में पार्ट है। पार्ट बजाते-बजाते तुम तमोप्रधान बने हो। फिर अब ऊपर जाते हो, सतोप्रधान बनते हो। नॉलेज तो सेकण्ड की है। सतोप्रधान बनते हैं फिर गिरते-गिरते तमोप्रधान बनते हैं। फिर बाप ऊपर ले जाते हैं। वास्तव में वह मछलियाँ तार में लटकती हैं, इस तार में मनुष्यों को डालना चाहिए। ऐसे उतरती कला फिर चढ़ती कला होती है। तुम भी ऐसे चढ़ते हो फिर उतरते-उतरते नीचे आ जाते हो। 5 हज़ार वर्ष लगते हैं ऊपर जाकर फिर उतरने में। यह 84 का चक्र तुम्हारी बुद्धि में है। उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ बाप ने ही समझाया है। तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं और फिर पुरुषार्थ करते हैं, जो बाप को याद करते हैं वह जल्दी ऊपर जाते हैं। यह प्रवृत्ति मार्ग है। जैसे जोड़ी को दौड़ाते हैं तो जोड़ी का एक-एक पांव बांधते हैं फिर दौड़ते हैं। यह भी तुम्हारी दौड़ी है ना। कोई की प्रैक्टिस नहीं होती है तो गिर पड़ते हैं, इसमें भी ऐसे होता है। एक आगे बढ़ता है, तो दूसरा रोक लेता है, कहाँ दोनों गिर पड़ते हैं। बाबा वन्डर खाते हैं - बूढ़ों को भी काम की आग लगती है तो वह भी गिर पड़ते हैं। ऐसे थोड़ेही उसने गिराया। गिरना, न गिरना अपने हाथ में है। कोई धक्का थोड़ेही देते हैं, हम गिरें क्यों? कुछ भी हो जाए हम गिरेंगे नहीं। गिरे तो खाना खराब, जोर से चमाट लगती है। फिर पछताते भी हैं, हड्डी-हड्डी टूट जाती है। बहुत चोट लगती है। बाबा भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाते रहते हैं।
यह भी समझाया शिव जयन्ती पर तारें ऐसी आनी चाहिए जो मनुष्य पढ़ने से समझ जाएं। विचार सागर मंथन करने के लिए बाबा टाइम देते हैं। कोई देखें तो वन्डर खाये। कितनी चिट्ठियां आती हैं, सब लिखते हैं बापदादा। तुम समझा भी सकते हो शिवबाबा को बाप, ब्रह्मा को दादा कहते हैं। एक को कभी कोई बापदादा कहते हैं क्या? यह तो वन्डरफुल बात है, इसमें सच्चा-सच्चा ज्ञान है। परन्तु याद में रहें तब किसको तीर भी लगे। घड़ी-घड़ी देह-अभिमान में आ जाते हैं। बाप कहते हैं आत्म-अभिमानी बनो। आत्मा ही शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। कोई मरता है तो भी कोई ख्याल नहीं। आत्मा में जो पार्ट की नूंध है उसको हम साक्षी हो देखते हैं। उनको एक शरीर छोड़ दूसरा ले पार्ट बजाना है। इसमें हम कर ही क्या सकते हैं? यह ज्ञान भी तुम्हारी बुद्धि में है। वह भी नम्बरवार। कईयों की बुद्धि में तो ठहरता ही नहीं इसलिए किसको समझा नहीं सकते। आत्मा बिल्कुल ही गर्म तवा, तमोप्रधान पतित है। उन पर ज्ञान अमृत डाला जाता है तो ठहरता नहीं। जिसने बहुत भक्ति की है, उनको ही तीर लगेगा, झट धारणा होगी। हिसाब ही वन्डरफुल है - पहले नम्बर में पावन, वही फिर पतित बनते हैं। यह भी कितनी समझने की बातें होती हैं। कोई की तकदीर में नहीं है तो पढ़ाई को छोड़ देते हैं। अगर छोटेपन से ही नॉलेज में लग जाएं तो धारणा होती जायेगी। समझेंगे इसने बहुत भक्ति की हुई है, बहुत होशियार हो जाए, क्योंकि आरगन्स बड़े होने से फिर समझ भी जास्ती आती है। जिस्मानी, रूहानी दोनों तरफ अटेन्शन देने से फिर वह असर निकल जाता है। यह है ईश्वरीय पढ़ाई। फ़र्क है ना। परन्तु जब वह लगन भी लगे ना। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूहानी मिलेट्री बन 5 विकारों पर जीत पानी है, पवित्र जरूर बनना है। श्रीमत पर भारत को पावन बनाने की सेवा करनी है।
2) इस बेहद नाटक में हर पार्ट आत्म-अभिमानी होकर बजाना है, कभी भी देह-अभिमान में नहीं आना है। साक्षी होकर हर एक एक्टर का पार्ट देखना है।
वरदान:- सदा खुशी व मौज़ की स्थिति में रहने वाले कम्बाइन्ड स्वरूप के अनुभवी भव
बापदादा बच्चों को सदा कहते हैं बच्चे बाप को हाथ में हाथ देकर चलो, अकेले नहीं चलो। अकेले चलने से कभी बोर हो जायेंगे, कभी किसकी नज़र भी पड़ जायेगी। बाप के साथ कम्बाइन्ड हूँ - इस स्वरुप का अनुभव करते रहो तो कभी भी माया की नज़र नहीं पड़ेगी और साथ का अनुभव होने के कारण खुशी से मौज से खाते, चलते मौज मनाते रहेंगे। धोखा व दुःख देने वाले सम्बन्धों में फँसने से भी बच जायेंगे।
स्लोगन:- योग रूपी कवच पहन कर रखो तो माया रूपी दुश्मन का वार नहीं लगेगा।
अव्यक्त इशारे - अब लगन की अग्नि को प्रज्वलित कर योग को ज्वाला रूप बनाओ
जैसे दुःखी आत्माओं के मन में यह आवाज शुरू हुआ है कि अब विनाश हो, वैसे ही आप विश्व-कल्याणकारी आत्माओं के मन में यह संकल्प उत्पन्न हो कि अब जल्दी ही सर्व का कल्याण हो तब ही समाप्ति होगी। विनाशकारियों को कल्याणकारी आत्माओं के संकल्प का इशारा चाहिये इसलिए अपने एवर-रेडी बनने के पॉवरफुल संकल्प से ज्वाला रूप योग द्वारा विनाश ज्वाला को तेज करो।