Daily Murli for Sunday 31 May 2026

31-05-26 प्रातःमुरली ओम् शान्ति' 'अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 15-03-10 मधुबन

परमात्म प्यार की पात्र आत्मायें दुःखियों को सुख की अंचली दो, व्यर्थ को समाप्त कर समर्थ बनो और समय को समीप लाओ

आज बापदादा अपने चारों ओर के परमात्म प्यारे बच्चों को देख रहे हैं। ऐसे परमात्म प्यारे कोटों में कोई बच्चे हैं क्योंकि इस समय ही परमात्म प्यार का अनुभव कर सकते, सारे कल्प में आत्माओं का प्यार, महात्माओं का, धर्मात्माओं का प्यार अनुभव किया लेकिन परमात्म प्यार सिर्फ अब संगमयुग पर होता है, जो आप सभी बच्चे अनुभव कर रहे हैं। कोई आपसे पूछे परमात्मा कहाँ है? तो क्या जवाब देंगे? मेरे साथ है। मेरे साथ ही रहते हैं। मेरे दिल में ही रहते हैं। ऐसा अनुभव कर रहे हो ना! आप ही जानते हो और आपको ही इस प्यार का अनुभव है कि हमारे दिल में बाप रहते और बाप के दिल में हम रहते। जानते हो कि यह परमात्म प्यार का नशा हमें ही अनुभव करने का भाग्य प्राप्त हुआ है। जब किसी से भी प्यार हो जाता है तो उसकी निशानी क्या होती है? उसकी निशानी है उसके ऊपर कुर्बान होना। तो परमपिता परमात्मा आप बच्चों से क्या चाहते हैं, वह तो आप सब जानते हो। बाप की हर एक बच्चे के प्रति यही चाहना है कि मेरा एक एक बच्चा बाप समान बने। जैसे बाप वैसे बच्चों की भी श्रेष्ठ स्थिति बने। वह श्रेष्ठ स्थिति क्या है? सम्पूर्ण पवित्रता की स्थिति। ऐसी पवित्रता जो स्वप्न में भी अपवित्रता आ नहीं सके। ऐसी सम्पूर्ण पवित्र स्थिति बना रहे हो? जिस सम्पूर्ण पवित्रता में अपवित्रता का नामनिशान नहीं।

वर्तमान समय समीप आने के कारण बापदादा अभी यही इशारा दे रहे हैं कि समय की समीपता अनुसार व्यर्थ संकल्प यह भी अपवित्रता की निशानी है। सारे दिन में यह भी चेक करो कि कोई भी व्यर्थ संकल्प अभिमान का वा अपमान का अपने तरफ खींचता तो नहीं है? क्योंकि चलते चलते अगर बाप की दी हुई विशेषताओं को अपनी विशेषता समझ अभिमान में आते हैं तो यह भी व्यर्थ संकल्प हुआ और मेरेपन के अशुभ संकल्प मैं कम नहीं हूँ, मैं भी सब जानता हूँ, यह मेरा संकल्प ही यथार्थ है, ऊंचा है…, यह मेरेपन का अभिमान का संकल्प यह भी सूक्ष्म अपवित्रता का अंश है। तो अपने को चेक करो किसी भी प्रकार का अपवित्रता के व्यर्थ संकल्प का कोई अंश तो नहीं रह गया है? क्योंकि अभी पवित्र दुनिया की स्थापना का समय समीप लाने वाले आप परमात्म प्यारे बच्चे निमित्त हो। तो जो निमित्त आत्मायें हैं उन्हों का वायब्रेशन चारों ओर फैलता है। तो चेक करो किसी भी प्रकार का व्यर्थ संकल्प भी अपने तरफ खींचता तो नहीं है? क्योंकि अभी पवित्र दुनिया, पवित्र राज्य समीप आ रहा है। दुःख और अशान्ति चारों ओर भिन्न-भिन्न स्वरूप में बढ़ रही है। उसके लिए पवित्रता का वायब्रेशन आवश्यक है। दुःख अशान्ति का कारण अपवित्रता है। तो अभी अपवित्र आत्माओं की और भक्त आत्माओं की डबल सेवा चाहिए। वाणी की सेवा तो बापदादा ने देखा कि चारों ओर धूमधाम से चल रही है, अपना उल्हना भी निकाल रहे हो। लेकिन अभी आत्माओं को एकस्ट्रा सकाश चाहिए। वह है मन्सा सेवा द्वारा सकाश देना, हिम्मत देना, उमंग-उत्साह देना। तो इस समय डबल सेवा की आवश्यकता है। इसके लिए बापदादा ने कहा कि हर एक बच्चा अपने को पूर्वज समझो। आप इस कल्प वृक्ष का फाउण्डेशन पूर्वज और पूज्य आप आत्मायें हो। बापदादा तो दुःखी बच्चों का आवाज सुनते रहते हैं। आप बच्चों के पास उन्हों के पुकार का आवाज पहुंचना चाहिए। जितना सम्पूर्ण पवित्र आत्मा बनेंगे। बन रहे हैं, बने भी हैं लेकिन साथ-साथ अभी मन्सा सेवा को बढ़ाना है।

आज विश्व में सुख-शान्ति, सन्तोष आत्माओं में कम हो रहा है। तो आप परमात्म प्यार के पात्र आत्माओं को अभी प्यार की, सन्तुष्टता की, खुशी की अंचली देने की आवश्यकता है। दुःखियों को सुख की अंचली देनी है। एक तो मन्सा सेवा द्वारा सकाश दो और दूसरा अपने चेहरे और चलन द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करो। अभी जो सेवा कर रहे हो और की है बापदादा खुश है कि सेवा में चारों ओर उमंग-उत्साह है लेकिन अभी एक सेवा रही हुई है। अभी तक यह आवाज तो हुआ है कि ब्रह्माकुमारियां मनुष्य आत्मा को अच्छा बना देती हैं, यह जो अशुद्ध व्यवहार है, अशुद्ध व्यवहार से मुक्त कर देती हैं, जो गवर्मेन्ट चाहती है यूथ ग्रुप के लिए, वह सेवा बहुत अच्छी करते हो। लेकिन अभी बाप आया है, परमात्मा आ गया है, परमात्म ज्ञान यह दे रही हैं, मेरा बाप वर्सा देने आ गया है, अभी बाप की तरफ नज़र जाने से उन्हों को भी परमात्म प्यार, परमात्मा की आकर्षण आकर्षित करेगी। अच्छा-अच्छा तो हो गया है लेकिन परमात्मा बाप की प्रत्यक्षता आकर्षित कर अच्छा बनायेगी। तो अभी बाप को पहचानें कि जिसको याद करते हैं वह ज्ञान दे रहा है, उनसे वर्सा मिल रहा है। तो अभी मन्सा द्वारा बाप के समीप लाओ। अपने चेहरे और चलन द्वारा, आपके नयनों में बाप प्रत्यक्ष हो। तो अभी यह आपस में प्लैन बनाओ।

बापदादा ने देखा जो प्लैन बापदादा ने समय प्रति समय दिया है वह बच्चों ने बड़े विधि पूर्वक, उमंग-उत्साह से किया है, कर रहे हैं, इसकी बापदादा सभी बच्चों को पदम पदम गुणा मुबारक दे रहे हैं। अभी एडीशन करो कि भगवान वर्सा दे रहा है। अभी वर्सा नहीं लिया तो कब लेंगे! बाप को दुःख, अशान्ति का वायुमण्डल देख करके बच्चों पर रहम आता है। और बाप और आप जानते हो कि यह तो अति में जाना ही है। बिना अति के अन्त नहीं होता है। ऐसे समय पर आत्माओं को यह अनुभव कराओ, सिर्फ सुनाओ नहीं, अनुभव कराओ कि भगवान वर्सा दे रहा है। आप सभी भी यही पूछते हो ना कि यह बाप की प्रत्यक्षता कब और कैसे होगी! तो ब्रह्माकुमारियों तक पहुंचे हैं लेकिन ब्रह्माकुमारियों को सिखाने वाला कौन! ब्रह्माकुमारियों का, ब्रह्माकुमारों का दाता कौन! अभी समय को समीप लाना है, समाप्ति करनी है। समाप्ति को समीप लाने वाले कौन हैं? हर एक बच्चा समझता है ना कि मैं ही निमित्त हूँ। बाप ने यह जिम्मेवारी अपने साथ बच्चों को दी है। सन शोज़ फादर। कोई-कोई जब बाप को जानते, तो देखो आप सबने बाप को जाना तो क्या किया? पहचान लिया, जान लिया, तो बच्चा बन वर्से के अधिकारी बन गये। अभी वर्सा लेने वाली आत्माओं की क्यू लगनी चाहिए। और क्यू रुकी हुई क्यों है? क्योंकि कोई कोई बच्चे अभी व्यर्थ संकल्पों की क्यु में लगे हुए हैं। क्यों, क्या, कैसे, अभी इस समाप्ति में समय देते हैं लेकिन व्यर्थ समाप्त नहीं हुआ है। व्यर्थ समर्थ बनने में रूकावट डालता है।

आज बापदादा व्यर्थ संकल्पों की समाप्ति करने के लिए सभी चारों ओर के बच्चों को हिम्मत दे रहे हैं कि अभी से व्यर्थ को समाप्त कर सदा समर्थ बन समर्थ बनाओ। सिर्फ सन्देश नहीं दो समर्थ बनाओ, समर्थ बनो, समर्थ बनाओ। व्यर्थ का समाप्ति दिवस मनाओ। हो सकता है? तो समझते हो कि व्यर्थ संकल्प अपने को भी नुकसान पहुंचाते हैं, समय बरबाद करते हैं, चेहरे पर सदा खुशनुमा, खुशकिस्मत का अनुभव कम कराते हैं! इसलिए अभी समाप्ति का समय समीप लाना है, किसको? आपको ना! जो समझते हैं कि अभी समाप्ति के समय को समीप लाना है, उसके लिए व्यर्थ को समाप्त करना ही है, करना है नहीं, करना ही है, स्वप्न में भी नहीं आवे, संकल्प तो छोड़ो लेकिन स्वप्न में भी नहीं आये, ऐसे हिम्मत वाले बच्चे जो अपने को समझते हैं वह हाथ उठाओ। मन का हाथ उठा रहे हो ना! बांहों का हाथ तो बहुत इजी है लेकिन मन का हाथ उठा रहे हो? जो मन का हाथ उठा रहे हैं वह हाथ उठाओ, मन का हाथ। अच्छा।

अभी बापदादा सभी बच्चों को यह वरदान दे रहा है कि आप सभी आने वाली नई दुनिया में 21 जन्म सदा खुश रहेंगे। मेहनत नहीं करेंगे। दुनिया की उलझनों में नहीं पड़ेंगे। जो जीवन में चाहिए, तन मन धन सब मिल जायेगा। तन तन्दु-रुस्त, मन खुश, धन अथाह यह आपको 21 जन्म की गैरन्टी है। अच्छा, आजकल के जमाने के हिसाब से तो बातें बहुत बदलती जाती हैं। गवर्मेन्ट के कायदे भी बदलने हैं, मनुष्यों की वृत्ति भी बदलनी है। तो हर एक के जीवन में व्यर्थ बातें तो आनी ही हैं, तो व्यर्थ को समाप्त करने के लिए समर्थ संकल्प चाहिए। वेस्ट को खत्म करने के लिए बेस्ट संकल्प चाहिए। तो रोज़ की मुरली में जो वरदान, स्लोगन आता है उसे सुनो। यह वरदान ही श्रेष्ठ संकल्प है। जब व्यर्थ आवे तो श्रेष्ठ संकल्प मन को चाहिए। मन खाली नहीं रह सकता है। मन को कुछ न कुछ संकल्प चाहिए। तो व्यर्थ वेस्ट को बेस्ट करने के लिए आपको यह वरदान और स्लोगन आदि के शब्द मन को चेंज करने के लिए चाहिए। दूसरा - जब सवेरे आंख खुलती है तो पहले-पहले शिवबाबा को गुडमार्निंग करो। कर सकते हो? देखो कहावत है सारे दिन में अगर कोई अच्छे को देखते हैं तो सारा दिन अच्छा बीतता है, कोई खराब को देख लेते हैं ना तो क्या कहते हैं? कहते हैं पता नहीं किसकी शक्ल देखी जो सारा दिन खराब गया। तो अच्छे ते अच्छा कौन? शिवबाबा। शिवबाबा से प्यार है ना। तो आंख खुलते शिवबाबा गुडमार्निंग और आंख बन्द करते रात्रि को, जब बेड पर जाओ तो शिवबाबा गुडनाईट। यह तो सहज है ना। तो सारा दिन आपका अच्छा होगा क्योंकि शुभ संकल्प भी ले लिया ना, वरदान सुन लिया। तो ऐसे करना। आप लोगों से बापदादा का प्यार है ना। तो यह करने से और आप आगे बढ़ते जायेंगे। अपने इस जीवन में भी खुशी का अनुभव करेंगे। कभी दुःख की लहर नहीं आयेगी। तो मंजूर है और सहज योगी बनो, बस। मैं आत्मा हूँ, शिवबाबा का बच्चा हूँ, बस, यह सहजयोगी। चलते फिरते यह याद करो मैं आत्मा हूँ, शिवबाबा का बच्चा हूँ। यह तो याद कर सकते हो ना। बहुत अच्छा।

आप सभी जो वारिस भी हैं और वारिस बनने वाले भी हैं। जो अपने आपको बापदादा का पक्का वारिस समझते हैं, वह हाथ उठाओ। वारिस हैं? वी.आई.पी भी सभी हाथ उठा रहे हैं। ताली तो बजाओ। अच्छा। अभी वारिस क्वालिटी आज यह संकल्प अपने से दृढ़ करेंगे, बापदादा को यह संकल्प देंगे कि हम अभी से, कब से नहीं, अब से व्यर्थ संकल्प को समाप्त करके ही छोड़ेंगे। मंजूर है। है मंजूर? है तो हाथ उठाओ। दो काम हैं। एक सदा समर्थ बनना और दूसरा समर्थ समय को समीप लाना। क्योंकि बापदादा के पास पुकार और दुःख की आह बहुत सुनाई देती है। आपके पास पता नहीं क्यों नहीं सुनाई देती है। बापदादा जब ऐसे सुनते रहते हैं तो आप बच्चों को जो अपने को वारिस समझते हैं, वर्सा लेने वाले हैं, तो वर्सा लेने वालों को दूसरों को वर्सा दिलाने के ऊपर रहम आना चाहिए ना। रहम क्यों नहीं आता? वैराग्य, बेहद का वैराग्य और रहम आना चाहिए। छोटी छोटी बातों में क्यों, क्या की क्यू में टाइम नहीं देना है। अभी हे बापदादा के सिकीलधे पदम पदम वरदानों के वरदानी बच्चे! अभी संकल्प को दृढ़ करो और दृढ़ता की चाबी लगाओ। कर्मयोगी बनो। कर्मयोगी लाइफ वाले हो। लाइफ सदाकाल होती है, कभी कभी नहीं। तो अभी अपना कृपालु, दयालु, दुःखहर्ता, सुख देता स्वरूप को इमर्ज करो। बापदादा ने अचानक का समय बहुतकाल से बताया है। तो अचानक के पहले भक्तों की पुकार तो पूरी करो। दुःखियों के दुःख की आवाज तो सुनो। अभी हर एक छोटा बड़ा विश्व परिवर्तक, विश्व के दुःख परिवर्तन कर सुख की दुनिया लाने वाले जिम्मेवार समझो।

बापदादा का यह आना जाना भी कब तक? इसलिए सब अचानक होना है। तो अभी वारिस क्वालिटी, वर्सा दिलाओ, रहमदिल बनने का पार्ट बजाओ। ऐसे नहीं सोचना कब तक होगा! अचानक होगा इसलिए व्यर्थ को समाप्त करना ही है। होना है नहीं, करना ही है। बापदादा ने रिजल्ट देखी सभी के कर्मों के गति को चेक किया। पुरुषार्थ की गति को चेक किया। खजाने जमा का खाता चेक किया। तो रिजल्ट में क्या देखा? जमा करने का पुरुषार्थ बहुत अच्छा करते हैं लेकिन जो जमा करते हो उसमें परसेन्टेज भिन्न-भिन्न है। जितना सोचते हो जमा किया, जमा होता है लेकिन परसेन्टेज़ है, थोड़ा जमा होता है, सदा के लिए जमा नहीं होता। जितना करते हो उतना सदा के लिए जमा में फर्क है इसलिए बापदादा अभी एक एक बात पर दृढ़ संकल्प कराता है। क्रोध पर कराया, कि मन से भी किसके प्रति हलचल नहीं हो। क्यों, क्या नहीं हो। लेकिन मुख से कोई कोई ने कन्ट्रोल अच्छा किया है, लेकिन मन से थोड़ा थोड़ा चलता है। मिटाने की कोशिश कर रहे हैं फिर भी बापदादा खुश है कि अटेन्शन गया है। समझने लगे हैं कि इसमें मेरे को ही नुकसान है। समझा। अच्छा।

अभी चारों ओर के परमात्म प्रेमी बच्चों को जो सदा बाप के प्यार में उड़ते रहते हैं, तीव्र पुरुषार्थी हैं और सेवा में निर्विघ्न सच्चे सेवाधारी हैं, ऐसे चारों ओर के बच्चों को बापदादा भी देख रहे हैं, साथ साथ दूर वालों को भी देख रहे हैं और यहाँ शान्तिवन में भी जो जगह जगह पर स्क्रीन पर देख रहे हैं, सुन रहे हैं, उन सभी बच्चों को बापदादा सदा के लिए खुश रहो और खुशी बांटो, यह वरदान दे रहे हैं। खुश चेहरा, कोई भी आपका चेहरा देखे वह चेहरा देखके खुश हो जाए। कैसा भी हो आपका चेहरा खुशनुमा देखके खुद भी खुश हो जाए, यह वरदान चारों ओर के बच्चे या जो सम्मुख बैठे हैं उन सभी के लिए एक वरदान है। कभी चेहरा मुरझाया हुआ नहीं। अगर आप मुरझायेंगे तो विश्व का हाल क्या होगा! आपको सदा खुशनुमा चेहरा और खुशनुमा चलन में रहना है और रहाना है। ऐसे सभी तीव्र पुरुषार्थी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और मीठे मीठे बच्चों को नमस्ते।

वरदान:- अपनी मूर्त से बाप और शिक्षक की सूरत को प्रत्यक्ष करने वाले अनुभवी मूर्त भव

अपने असली पोजीशन में ठहरना - यही याद की यात्रा है, जो हूँ, जिसका हूँ - उसमें स्थित रहो, इसी असली स्वरूप के निश्चय और अनेक बार के विजय की स्मृति से सदा नशे की स्थिति के सागर में लहराते रहेंगे। जब सुखदाता के बच्चे हैं तो दुःख की लहर आ कैसे सकती, सर्वशक्तिवान के बच्चे शक्तिहीन हो कैसे सकते! इसी पोजीशन के अनुभवों में रहो तो आपकी मूर्त से बाप वा शिक्षक की सूरत स्वतः प्रत्यक्ष होगी।

स्लोगन:- सत्यवादी वह है जिसके चेहरे और चलन में दिव्यता हो।

ये अव्यक्त इशारे - सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो

जब आप बच्चे अपने इस भ्रकुटि के तख्त पर, अकालमूर्त्त बन स्थित होंगे तो एकरस स्थिति के तख्त पर और बापदादा के दिल तख्त पर विराजमान हो सकेंगे। जब इस दैवी संगठन की मूर्त में एकरस स्थिति का प्रत्यक्ष रुप में साक्षात्कार हो तब बापदादा की प्रत्यक्षता समीप आये इसके लिए हर एक को बापदादा के संस्कारों में समान बनना होगा।