Daily Murli for Sunday 26 July 2026
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
Saving in progress..
You can now listen this murli without Internet.
You can listen this murli without Internet.
in order to be able to listen it without internet.
26-07-26 प्रातःमुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइजः 02-02-11 मधुबन
अपने भाग्य और प्राप्तियों को स्मृति में रख सदा हर्षित व सन्तुष्ट रहो, दृष्टि वृत्ति और प्रवृत्ति द्वारा सन्तुष्टता का अनुभव कराओ
आज बापदादा सभी बच्चों को देख खुश हो रहे हैं। हर एक बच्चा परमात्म प्यार द्वारा पहुंच गये हैं। तो आज बापदादा हर एक बच्चे के मस्तक में भाग्य की रेखायें देख रहे हैं। ऐसा भाग्य और इतना बड़ा भाग्य सारे कल्प में किसी को प्राप्त नहीं है क्योंकि आपको भाग्य देने वाला स्वयं भाग्य दाता है। हर एक के मस्तक में पहले तो चमकता हुआ सितारा का भाग्य चमक रहा है। मुख में मधुर वाणी की रेखा चमक रही है। होठों पर मधुर मुस्कान की रेखा चमक रही है। दिल में दिलाराम बाप के लवलीन की रेखा चमक रही है। हाथों में सर्व खजानों के श्रेष्ठता की रेखा चमक रही है। पांव में हर कदम में पदम की रेखा चमक रही है। अभी सोचो ऐसा भाग्य और किसका हुआ है! इसलिए आपके यादगार चित्रों का भी भाग्य वर्णन होता रहता है। और यह भाग्य स्वयं भाग्यविधाता ने हर एक बच्चे का बनाया है।
बापदादा हर बच्चे का भाग्य देख हर बच्चे को मुबारक दे रहे हैं - वाह बच्चे वाह! और यह भाग्य इस संगम पर ही मिलता है और चलता है। संगमयुग का सुख सब युगों से श्रेष्ठ है। सतयुग का भाग्य भी संगम के पुरुषार्थ की प्रालब्ध है इसलिए संगमयुग की प्राप्ति सतयुग की प्रालब्ध से भी ज्यादा है। अपने भाग्य में खो जाओ। कुछ भी होता रहे, अपना भाग्य स्मृति में लाओ तो क्या निकलता है? वाह मेरा भाग्य! क्योंकि स्वयं भाग्य दाता आपका बाप है। तो भाग्य दाता द्वारा हर एक को अपना भाग्य मिला है। जानते हो कि हम इतने भाग्यवान हैं कि कभी-कभी जानते हो, सदा नशा रहता है? दुनिया वाले तो देखकर पूछते हैं आपको क्या मिला है? और आप लोग उत्तर क्या देते हो? जो पाना था वह पा लिया। पा लिया है, हाथ उठाओ। पा लिया है, अच्छा। पा लिया है? फलक से कहते हो, कोई अप्राप्त वस्तु ही नहीं, है ना फखुर? और मिला कैसे? सिर्फ बाप को जाना, माना, अपना बनाया तो भाग्य मिल गया। इस भाग्य को जितना स्मृति में लाते रहेंगे उतना हर्षित होते रहेंगे। भाग्यवान आत्मा का चेहरा सदा हर्षित रहेगा। रहेगा नहीं रहता है। उनकी दृष्टि, उनकी वृत्ति और उनकी प्रवृत्ति सदा सन्तुष्ट आत्मा बन स्वयं भी सन्तुष्ट रहेगी और दूसरों को भी सन्तुष्ट बनायेगी। तो आप सबको सन्तुष्टता का नशा रहता है? क्योंकि सन्तुष्टता का आधार है सर्व प्राप्ति। अप्राप्ति असन्तुष्टता का आधार है। तो आप क्या अनुभव करते हो? अप्राप्त कोई वस्तु है कि सर्व प्राप्ति हैं? प्राप्ति का नशा है? है, सदा है या कभी-कभी है? वैसे तो यही कहते हो पा लिया जो पाना था। तो जहाँ सर्व प्राप्ति है वहाँ असन्तुष्टता का नाम नहीं है।
तो बापदादा आज देश विदेश, कितने देशों से सभी बच्चे आके इकट्ठे हुए हैं लेकिन सबसे दूर से आने वाला कौन? क्या अमेरिका वाले दूर से आये हैं? अमेरिका वाले दूर से आये हैं ना! और बाप कहाँ से आया है? अमेरिका तो इसी लोक में है लेकिन बापदादा कहाँ से आये हैं? परमधाम से, ब्रह्मा बाप भी सूक्ष्मवतन से आये हैं। तो कौन दूर से आया? सबसे दूर कौन? यह है बाप और बच्चों के प्यार का नज़ारा। आपने कहा मेरा बाबा और बाप ने कहा मेरा बच्चा। सिर्फ एक को जानने से कितना वर्सा मिल गया। दुनिया वाले सुख के लिए, शान्ति के लिए ढूँढ रहे हैं - कहाँ शान्ति मिलेगी, कहाँ सुख मिलेगा और आपकी जीवन ही सुख शान्ति सम्पन्न हो गई। बापदादा से पूछते हो ना कि बापदादा क्या चाहते हैं? तो बापदादा हर बच्चे से यही चाहते हैं कि हर एक बच्चा सदा स्वराज्य अधिकारी बनके रहे। कभी-कभी नहीं क्योंकि अभी के स्वराज्य अधिकार का वरदान बाप ने इस संगमयुग के लिए पूरा दिया है, थोड़ा नहीं, कभी-कभी वाला नहीं, सदा। तो सोचो सदा के लिए स्वराज्य अधिकारी बन रहते हो? क्योंकि बापदादा ने सुनाया कि इन सभी कर्मेन्द्रियों के, मन बुद्धि संस्कार के भी मालिक हो। सबके लिए मेरा शब्द बोलते हो, मैं नहीं बोलते हो, मेरा बोलते हो। तो मन बुद्धि संस्कार मेरा है तो मेरे के ऊपर सदा अधिकार रहता है। ऐसे मन बुद्धि संस्कार के ऊपर पूरा ही अधिकारी हो, इसको कहा जाता है स्वराज्यधारी। जो आर्डर करो उसी प्रमाण यह कार्य करने के लिए निमित्त हैं। लेकिन इसके लिए चलते फिरते कार्य करते मालिकपन का नशा होना चाहिए। निश्चय और नशा।
अब तो आत्माओं को मन्सा द्वारा भी सेवा देने का समय है। चिल्लाते रहते, हे पूर्वज हमें थोड़ा सा सुख शान्ति की किरणें दे दो। तो हे पूर्वज दुःखियों की पुकार सुनाई देती है ना! बापदादा ने इशारा दे दिया है कि कुछ भी आपदा अचानक आनी है, इसके लिए सेकण्ड में फुलस्टॉप। वह प्रैक्टिस भी कर रहे हो क्योंकि उस समय पुरुषार्थ का समय नहीं होगा, अभ्यास करें, लगाओ फुलस्टॉप और हो जाए आश्चर्य की मात्रा, इसलिए पुरुषार्थ का समय अभी मिला हुआ है। उस समय प्रैक्टिकल करने का समय है, तो अभी से इस अभ्यास को कर भी रहे हैं, बापदादा रिजल्ट देखते हैं, अटेन्शन में है, कर भी रहे हैं लेकिन और भी अटेन्शन को अण्डरलाइन करो। देखो पुरुषार्थ कितना सहज है, मैं भी बिन्दी, लगाना भी बिन्दी है सिर्फ अटेन्शन देना है।
बापदादा विशेष बच्चों को सौगात देते हैं बच्चे मैं आपके सदा साथ हूँ। बाबा कहा और बच्चों के लिए बाप सदा हाज़िर है। जो कहा गया है हजूर हाज़िर है, सर्वव्यापी नहीं है लेकिन बच्चों के आगे हजूर हाज़िर है। तो सदा विजयी बनना, जहाँ भगवान साथ है वहाँ विजयी बनना क्या मुश्किल है। विजय आपका जन्म सिद्ध अधिकार है। सिर्फ मेरा बाबा कहा तो विजयी है ही इसलिए सदा विजयी बनना, जो याद में रहता उसके लिए अति सहज है। मुश्किल नहीं। जहाँ भगवान है वहाँ विजय है ही। तो आज बापदादा सभी बच्चों को देख खुश हो रहे हैं कि कितने स्नेह से, कौन से साधन से आये हैं? ट्रेन में या प्लेन में, वह तो शरीर के द्वारा पहुंच गये हैं लेकिन दिल से तो प्यार आपको यहाँ लाया है। हिम्मत आपकी है तो मदद बाप की है ही। अभी बापदादा यही चाहते हैं कि हर बच्चा हर कर्म में अपने स्वराज्य की सीट पर स्थित रहे। अच्छा।
आज पहले बारी कौन आये हैं, वह हाथ उठाओ। खड़े हो जाओ। बहुत हैं। अच्छा, जैसे पहले बारी आये हो वैसे पहला नम्बर जाना है ना। जाना है? बाबा का वरदान है कि जो हिम्मत रखेगा उसको बाप की मदद भी मिलेगी और हिम्मत से जितना भी आगे बढ़ने चाहो वह चांस है क्योंकि टूलेट का बोर्ड नहीं लगा है। याद में रहो और जो प्राप्त हुआ है उससे औरों की सेवा करो। जितनी सेवा करेंगे उतनी दुआयें मिलेंगी और वह दुआयें आपको आगे बढ़ाती रहेंगी। सन्देश देते जाओ बाकी हर एक की तकदीर। लेकिन आप सन्देश दे दो। पुण्य अपना जमा करते रहो। तो पुण्य आपको आगे बढ़ाता रहेगा। अच्छा।
बापदादा अमृतवेले सभी तरफ चक्र लगाते हैं, उनके लिए चक्र लगाना क्या बड़ी बात है। और बापदादा ने यह भी कह दिया है कि चार बजे के मिलन की विशेषता यह भी है कि 4 बजे बापदादा सभी बच्चों को सहज ही वरदान देते हैं। वरदान दाता का विशेष पार्ट अमृतवेले होता है। जो भी वरदान चाहिए वह बापदादा दे देते हैं। ट्रायल करके देखना। लेकिन आप सभी भी वरदान लेने के लिए अलर्ट रहना। अगर अलर्ट नहीं रहे तो बापदादा चक्र लगाके चला जायेगा और आप सोचते रहेंगे इसलिए अमृतवेले का महत्व देते तो हैं लेकिन और अटेन्शन देना। बापदादा ने देखा है कि समय अनुसार सेवा भी बढ़ रही है और सेवा के कारण बाप से वरदान लेना उससे दूर रह नहीं सकते। बाकी डबल फारेनर्स मैजारिटी पुरुषार्थ करते भी हैं फिर भी अटेन्शन को अन्डरलाइन करना। बाकी मधुबन में कैसे भी पहुंच जाते हो बापदादा उसकी विशेष सभी बच्चों को मुबारक दे रहे हैं। बापदादा ने सुना कि जो बापदादा ने संस्कार के ऊपर इशारा दिया है, उसके ऊपर समझते हैं कि हमें करना ही है और करने के लिए रोज़ अमृतवेले जैसे स्वमान रखते हैं उसके साथ-साथ भिन्न-भिन्न प्रकार से कोई एक संस्कार के ऊपर अटेन्शन दो, आज के दिन इस संस्कार के ऊपर विशेष अटेन्शन देना है और फिर रात्रि को जब बापदादा को अपना सारे दिन का चार्ट देते हो उस समय उस संस्कार की रिजल्ट भी विशेष सुनाओ तो विशेष अटेन्शन हो जायेगा। किसी न किसी संस्कार के ऊपर अटेन्शन रखना है। तो जैसे याद के ऊपर अटेन्शन देते हो उसके साथ-साथ उसी समय यह भी रिजल्ट बापदादा को दो। अगर मानो आप चाहते हो लेकिन उस दिन आपके सामने कोई संस्कार मिटाने का कार्य नहीं हुआ, तो अपने आपको बाप की मुबारक देना और रोज़ ऐसे बाप की मुबारक विशेष इस संस्कार प्रति लेते जाना तो संस्कार कार्य में आने में कमी पड़ती जायेगी। तो जैसे योग के बारे में चेक करते हो वैसे संस्कार के लिए भी चेक करो। संस्कार रोज़ नहीं आता है, कभी-कभी आता है, जो पुरुषार्थी हैं उनका बाईचांस पेपर आता है, बाकी रोज़ नहीं आता है। लेकिन चेकिंग रोज़ होगी तो यह भी अटेन्शन टेन्शन को खत्म करता जायेगा क्योंकि बापदादा ने देखा है फॉरेन वालों में से कोई-कोई बच्चे कोई कार्य शुरू करते हैं तो अटेन्शन देते हैं। तो अटेन्शन देने वाले ही मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। बाबा का भी वरदान है। समझा। अभी इसके पीछे लग जायेंगे ना, रोज़ रिजल्ट की चेकिंग करेंगे ना तो संस्कार स्वयं ही ढीला हो जायेगा। और जो बापदादा चाहता है कि संस्कार की सब्जेक्ट में नम्बरवन जाओ, जो संस्कार चाहते हो वही कार्य में लगे। हो जायेगा। अटेन्शन में आया है ना तो हो जायेगा। लेकिन ऐसे नहीं हो जायेगा, अटेन्शन देना पड़ेगा। संगठन में ही यह संस्कार निकलते हैं, क्यों? आपके चित्रों में जो पूजा करते हैं वह आपके संस्कार कितने अच्छे गाते हैं। तो बने हैं तभी तो वर्णन करते हैं। अपना देवताई चित्र इमर्ज करो क्या गाते हैं? ऐसे देवता तो बनना ही है ना। अच्छा।
बाकी सब डबल विदेशी पुरुषार्थ में सफलता का अनुभव करते रहते हैं ना! करते हैं? हाथ उठाओ जो सफलता अनुभव करते हैं। वाह! हाथ तो अच्छे उठा रहे हैं। तो लक्ष्य रखेंगे अभी इसके पीछे अटेन्शन देना ही है। इसमें भी नम्बर लेना ही है। तो आपको देख औरों को भी उमंग आयेगा क्योंकि आप निमित्त हो ना। और निमित्त वालों को बापदादा की विशेष मदद भी मिलती है। बाकी बाबा खुश है कि सेन्टर्स वृद्धि को प्राप्त होते रहते हैं। पुरुषार्थ की तरफ अटेन्शन है लेकिन अभी परिवर्तन के निमित्त बनने वाले बनो तो आपको देख औरों को भी परिवर्तन शक्ति का उमंग आयेगा। बाकी बापदादा खुश है कि पुरुषार्थ में नम्बरवार तो होते ही हैं, वह तो अन्डरस्टुड है लेकिन पुरुषार्थ की तरफ अटेन्शन है, और बढ़ाना है। बाकी बापदादा की रोज़ यादप्यार तो मिलती रहती है। देखो, घर बैठे भी बापदादा की यादप्यार एक दिन भी मिस नहीं होती, अगर रोज़ विधिपूर्वक मुरली पढ़ते हैं तो। एक दिन भी यादप्यार मिस नहीं करते। मिलती है ना! मिलती है? रोज़ यादप्यार मिलती है। सभी को मिलती है ना? यह है बापदादा के प्यार की निशानी। मुरली मिस तो यादप्यार भी मिस। सिर्फ मुरली नहीं मिस की लेकिन बापदादा का यादप्यार, वरदान सब मिस किया। मुरली तो पढ़ भी लेंगे लेकिन जो समय फिक्स है बापदादा की याद-प्यार लेने का, वह तो मिस हुआ ना। तो उमंग है इस पर बापदादा खुश भी है। अच्छा, मुरली मिस करने वाले हैं? डबल फॉरेनर्स में हैं, कोई है जो मुरली मिस करता हो? कारण से? नहीं है। नहीं मिस करते। एक ने हाथ उठाया है। अभी मिस नहीं करना, मुरली मिस नहीं करना। चाहे फोन द्वारा सुनो। पढ़ नहीं सकते हैं तो कैसे भी सुनो जरूर। हाज़िरी जरूर लगाओ। अच्छा। बाकी जो भी सभा में आये हैं, नये भी हैं पुराने भी हैं तो यह पक्का पक्का पक्का नोट करो मुरली नहीं मिस करनी है क्योंकि बाप रोज़ परमधाम से आते हैं, कितना दूर से आते हैं, बच्चों के लिए आता है ना! जैसे बाप मुरली मिस नहीं करते, ऐसे बच्चों को भी मुरली मिस नहीं करना है। अच्छा।
अभी जो मधुबन में आता है ना, तो जैसे फार्म भरते हैं, उसमें यह भी लिखो कि मुरली रोज़ सुनी या कितने दिन मिस किया? मंजूर है? जिसको मंजूर है वह हाथ उठाओ। मधुबन वाले भी हाथ उठाओ। किसी भी कारण से मुरली मिस नहीं करनी है। जैसे खाना नहीं मिस करते हो तो यह भी भोजन है ना। वह शरीर का भोजन, यह आत्मा का भोजन। अच्छा लगा। जो नये भी आये हैं, आने को तो मिला है ना। उन्हों को भी यह नियम पालन करना है। जैसे और नियम हैं वैसे यह भी नियम है। ब्राह्मण माना मुरली सुनने वाला, सेवा करने वाला। अच्छा।
अभी सभी तरफ के बच्चों को बापदादा यादप्यार के साथ मुबारक भी दे रहे हैं। सदा उमंग उत्साह में आगे बढ़ भी रहे हो और बढ़ते रहना। कभी अपना उमंग-उत्साह किसी भी कारण से, किसी भी बात से कम नहीं करना। बात, बात हो जाती है लेकिन पुरुषार्थ और बाप का प्यार वह अपना है इसीलिए कभी भी अपने बुद्धि को बाप के बिना और कोई बातों में बिजी नहीं करना। बाप और बाप की मुरली और बाप द्वारा सर्विस जो मिली है वह सर्विस करते रहना। अच्छा। अभी क्या कहें, साथ तो रहना है ना। तो छुट्टी लेते हैं, यह भी नहीं कह सकते। साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ आयेंगे। अच्छा। अभी समाप्ति।
वरदान:- शक्ति रूप की स्मृति द्वारा पतित संस्कारों का नाश करने वाले काली रूप भव
सदा अपना यह स्वरूप स्मृति में रहे कि मैं सर्व शस्त्रधारी शक्ति हूँ, मुझ पतित-पावनी पर कोई पतित आत्मा के नज़र की परछाई भी नहीं पड़ सकती। पतित आत्मा के पतित संकल्प भी न चल सकें - ऐसी अपनी ब्रेक पावरफुल चाहिए। यदि किसी पतित आत्मा का प्रभाव पड़ता है - तो इसका अर्थ है कि प्रभावशाली नहीं हो। जो स्वयं संघारी हैं वह कभी किसका शिकार नहीं बन सकते। तो ऐसा काली रूप बनो जो कोई भी आपके सामने ऐसा संकल्प भी करे तो उनका संकल्प मूर्छित हो जाए।
स्लोगन:- रॉयल रूप की इच्छा का स्वरूप नाम, मान और शान है।
ये अव्यक्त इशारे - ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
सारथी अर्थात् आत्म-अभिमानी क्योंकि आत्मा ही सारथी है। ब्रह्मा बाप ने इस विधि से नम्बरवन की सिद्धि प्राप्त की। तो फॉलो फॉदर करो। जैसे बाप देह को अधीन कर प्रवेश होते अर्थात् सारथी बनते हैं देह के अधीन नहीं होते, इसलिए न्यारे और प्यारे हैं। ऐसे ही आप सभी ब्राह्मण आत्माएं भी बाप समान सारथी की स्थिति में रहो। सारथी स्वतः ही साक्षी हो कुछ भी करेंगे, देखेंगे, सुनेंगे और सब-कुछ करते भी माया की लेप-छेप से निर्लेप रहेंगे।