Mamma's Murli - gyan-sitar-17

28/4/1959

यह खेल स्मृति-विस्मृति का बना हुआ है, आत्मा सदा ही मन-बुद्धि सहित है

ओम् शान्ति । परमात्मा और आत्मा - इसकी नॉलेज को अभी हम परमात्मा द्वारा जानते जा रहे हैं। आत्मा को मन-बुद्धि सहित कहा जाता है। आत्मा जन्म-मरण में आने वाली है। इसमें सारा जो पार्ट चल रहा है, उसकी स्मृति नहीं रह सकती है। भल आत्मा मन-बुद्धि सहित बेशक है, परन्तु अनेक जन्मों का जो कुछ हुआ वह स्मृति तो नहीं रह सकती है ना। एक जीवन का ही हम लें, तो भी सब बातें डिटेल सहित याद थोड़े ही रहती है। बुद्धि में स्मृति-विस्मृति होती है । परन्तु बुद्धि तो रहती है ना। ऐसे थोड़े ही कहेंगे कि बुद्धि चली जाती है। परन्तु जब वह ठीक कर्त्तव्य नहीं करती है तो इस पर कहा जाता है जैसे कि इनकी बुद्धि चली गई है। परन्तु ऐसे तो नहीं है ना कि बुद्धिहीन है। आत्मा सदा ही मन-बुद्धि सहित है। सतयुग में आत्मा है तो ऐसे नहीं, उसे ८४ जन्मों की स्मृति है।

परमात्मा जो नॉलेजफुल है उसमें ही सबकी नॉलेज है । तो इस समय पर उनका पार्ट है। जब पार्ट में आते हैं तब आकर के नॉलेज सुनाते हैं। नॉलेज इमर्ज भी इतनी करते हैं जितना आत्मा की उन्नति के लायक है। भल वह जानी-जाननहार है परन्तु पार्ट में फिर भी अन्दाज है ना, उतना ही सुनाते हैं। तो ऐसे नहीं, आत्मा को सारी स्मृति इक्ट्ठी रह सकती है। स्मृति-विस्मृति तो चलती आती है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि आत्मा मन-बुद्धि सहित नहीं है। सिर्फ वह स्मृति चली जाती है। बॉडी कान्सेस, सोल - कान्सेस - यह भी खेल है ना। आत्मा, आत्मा ही है। सिर्फ विस्मृति हो जाती है। फिर परमात्मा द्वारा स्मृति मिलती है। जन्म-मरण में आते-आते आत्मा की कला घटती जाती है। यह भी परमात्मा आकर बतलाते हैं। सो भी अनेक जन्मों का डिटेल थोड़े ही बतलाते हैं। उनसे हमारा प्रयोजन नहीं। जानते हैं कि पहले दुःख की जीवन थी, उनको भूलना ही है। तो फिर उसके विस्तार को जानने की क्या जरुरत है ? ड्रामा का खेल और आत्मा का परिचय – यह परमात्मा बैठ समझाते हैं। बुद्धि तो है, फिर कई बातें ख्याल से हट जाती हैं । तो ऐसे थोड़े ही कहेंगे बुद्धि ही नहीं है ।

इस नॉलेज को समझने से ऐसी छोटी-छोटी बातें तो अपने विचार से भी हल हो जाती हैं । हम भी पास्ट-फ्युचर दोनों के अनुभवी हैं । बुद्धि द्वारा हम जान सकते हैं । ऐसे भी नहीं कि साक्षात्कार हो तब हम जान सकते । यह तो बुद्धि का काम है जानना । साक्षात्कार नहीं हुआ है तो भी हर्जा नहीं है । जानने का संबंध साक्षात्कार से नहीं है । ज्ञान का मतलब साक्षात्कार नहीं है । मनुष्य समझते हैं साक्षात्कार से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है । परन्तु ज्ञान तो नॉलेज को कहा जाता है । कहा भी जाता है ज्ञान बिगर गति नहीं । ऐसे नहीं कहा जाता है कि साक्षात्कार बिगर गति नहीं ।

परमात्मा को न्यारा भी कहा जाता है और प्यारा भी कहा जाता है । दुनिया वाले समझते हैं कि जैसे आत्मा जन्म-मरण में आती भी है और न्यारी निर्लेप भी है, ऐसे परमात्मा भी है । क्योंकि समझते हैं आत्मा ही परमात्मा है । परन्तु हम जानते हैं -- परमात्मा न्यारा और प्यारा कैसे है । वह अजन्मा, दुःख-सुख से न्यारा भी है परन्तु उनके पार्ट बजाने के संस्कार भी हैं और पार्ट भी अति प्यारा बजाया है क्योंकि सबको सुखी बनाते हैं । परमात्मा तो बेहद का कार्य आकर करते हैं । सर्व आत्माओं को सुखी बनाते हैं । इसलिए सर्व आत्माओं को वह प्यारा लगता है । आत्माओं को प्यार मिला है, सुखी बनी है, तब रिटर्न में इतना प्यार करती है । परमात्मा ने हम आत्माओं के साथ यह पार्ट बजाया हुआ है । सुखी बनाया है, इसलिए अति प्यारा है । लेकिन वह हम आत्माओं से न्यारा है । भल खुद भी आत्मा बन पार्ट बजाते हैं परन्तु उनके कर्त्तव्य न्यारे हैं । जो आत्मा नहीं कर सकती वह काम करते हैं । सर्व आत्माओं को सन्तुष्ट करते हैं, सर्व आत्माओं को सुख शान्ति देते हैं । इसलिए प्यारे हैं । तो न्यारे का अर्थ यह नहीं कि लेप-छेप से न्यारा है । वह तो जो कुछ करता है उसका बनता जरुर है । सर्विस की है तब तो उनको सभी प्यार करते हैं । यह भी रिटर्न है ना । भल जानते नहीं हैं कि वह कौन है, हमारे साथ संबंध क्या है? लेकिन प्यार तो करते हैं ना । याद भी करते हैं ।