Mamma's Murli - gyan-sitar-19

८.७.५९

ज्ञान बिना योग यथार्थ नहीं हो सकता, ज्ञान-योग से ही दैवी गुण आ सकते हैं

हम सभी बाप की याद में बैठे हैं, क्योंकि हमें बाप से वर्सा पाना है । बाप और वर्से को अच्छी रीति जानते हैं। याद भी तभी करते हैं। कोई समझते हैं -- बुद्धि ने बाप को जान लिया, बस । लेकिन उनका फरमान है – “निरन्तर मुझे याद करो । जितना याद करेंगे उतना वर्सा पायेंगे।" तो यह टैम्पटेशन है। जानते हैं हर एक सब्जेक्ट से क्या लाभ होगा। जितना ज्ञान उठायेंगे उतना दान भी करेंगे तो पद भी ऊंचा पायेंगे और दैवीगुण धारण करेंगे तो कोई विकर्म नहीं होंगे। योग से फिर विकर्म विनाश होंगे । तो हर एक बात जरुरी है। ज्ञान बिना यथार्थ योग नहीं हो सकता है और ज्ञान-योग के बिना दैवीगुण नहीं आ सकते हैं। तो जब जानते हैं कि इससे यह फायदा है. तो हमारा पुरुषार्थ भी ऐसा तीव्र हो जाता है । सारी पढाई हमारे ध्यान पर है. सिर्फ एक सब्जेक्ट की बात नहीं है। सिर्फ ज्ञान-स्नान ही नहीं करना है लेकिन ज्ञान को धारण कर प्रैक्टिकल लाइफ बनानी है। किसी भी बात में मुझना नहीं है। तन-मन-धन से पूरा-पूरा लाभ उठाना है।

अभी बाप सामने है तो सब प्राप्तियां हो जाती हैं। सुख, सम्पत्ति, तन्दरुस्ती- सबकी गैरन्टी है। शक की तो बात ही नहीं है। जब टैम्पटेशन है तो पुरुषार्थ करना चाहिए। बच्चे का फर्ज है बाप के हर डायरेक्शन पर चलना । स्टूडेन्ट को फिर पढ़ाई पर पूरा अटेन्शन देना पड़ता है। गुरु की आज्ञा पर भी चलना पड़े। तो बाप, टीचर, गुरु - तीनों के फरमान पर चलना है। और फिर प्राप्ति भी इतनी है, रास्ता भी सहज है। तो क्यों न पुरुषार्थ करना चाहिए। यह भी अभी चांस है । पुराने संस्कारों को भी भस्म करना है। तो जब सभी बातों को जानते हैं तो पुरुषार्थ को भी इतना तीव्र रखना है। हर एक बात को इतना ही फोर्स से उठाना है। कहते तो सभी हैं कि हम सूर्यवंशी बनें। तो पुरुषार्थ भी करना है। थकना नहीं है। अच्छा ।

यह तो अच्छी तरह से पक्का है कि हम रुह हैं और हम रुहों का बाप रुहानी रुह है। अभी हमें उस रुहानी रुह के साथ वापस जाना है। इसलिए स्वयं को बदलना है। अभी रुहों के ऊपर ज्ञान की बरसात हो रही है जिससे रुह स्वच्छ बनें। यह ज्ञान - बरसात है जो आत्मा धारण करती है, शरीर धारण नहीं करता । शरीर को भी आत्मा धारण करती है। तो आत्मा को परिवर्तन करने वाला वो रुहानी बाप है।

आत्मा अभी महसूस करती है कि हमारे में कैसे परिवर्तन आ रहा है। दुनिया वाले तो समझते - विकारों को जीतना बहुत कठिन है। लेकिन हमें निश्चय है कि बाप द्वारा हमने अनेक बार विकारों को जीता है। पतित-पावन ने हम पतितों को पावन बनाया है। कहते भी हैं- अहिल्या-गणिका का उद्धार किया । ऐसे नाम भी तब हैं जब तमोप्रधान हैं। ऐसे नहीं-- पाप-आत्मायें, पुण्य-आत्मा बन ही नहीं सकती । लेकिन बाप द्वारा कैसी भी पाप आत्मा, पुण्य-आत्मा बन सकती है। बाप की याद से अनेक जन्मों के पाप खलास हो सकते हैं। अनेक जन्मों के पाप इस एक जन्म में खत्म कर सकते हैं। इसलिए कभी उलझन में नहीं आना चाहिए कि इतने पाप किये हैं। ६३ जन्मों के पाप भी इस जन्म में भस्म हो सकते हैं।

अभी हमारे विकर्मी खाते को परमात्मा स्वच्छ बना रहे हैं। मनुष्यों द्वारा तो न अनेक जन्मों के पाप नाश हो सकते हैं, न प्रालब्ध बना सकते हैं। तो मनुष्य की बात नहीं है। वे तो मोक्ष मांगते रहते हैं। समझते हैं- स्वर्ग से भी मोक्ष उत्तम है। लेकिन मोक्ष के बाद भी पार्ट में तो आना ही है। वहाँ बैठ जाने से तो कोई प्राप्ति ही नहीं। आना है तो क्यों न ऐसी दुनिया में आयें। तो यह सब नॉलेज है। इसमें मूंझने की बात नहीं है।